भारतकोश
अध्यात्म रामायण

अध्यात्म रामायण

Adhyatma Ramayana

महर्षि वेदव्यास (टीकाकार: मुनीलाल) द्वारा

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सर्ग ८ ] उत्तरकाण्ड ३७७


धर्मे नष्टेऽखिले राम त्रैलोक्यं नश्यति ध्रुवम् ।<br>त्वं तु सर्वस्य लोकस्य पालकोऽसि रघूत्तम ।<br>त्यक्त्वा लक्ष्मणमेवैकं त्रैलोक्यं त्रातुमर्हसि ॥ ६३॥<br>रामो धर्मार्थसहितं वाक्यं तेषामनिन्दितम् ॥ ६४॥<br>...णमध्ये समाश्रुत्य प्राह सौमित्रिमञ्जसा ।<br>यथेष्टं गच्छ सौमित्रे माभूद्धर्मस्य संशयः ॥ ६५॥<br>परित्यागो वधो वापि सतामेवोभयं समम् ।<br>एवमुक्ते रघुश्रेष्ठे दुःखव्याकुलितेक्षणः ॥ ६६॥<br>रामं प्रणम्य सौमित्रिः शीघ्रं गृहमगात्स्वकम् ।<br>ततोऽगात्सरयूतीरमाचम्य स कृताञ्जलिः ॥ ६७॥<br>नव द्वाराणि संयम्य मूर्ध्नि प्राणमधारयत् ।<br>यदक्षरं परं ब्रह्म वासुदेवाख्यमव्ययम् ॥ ६८॥<br>पदं तत्परमं धाम चेतसा सोऽभ्यचिन्तयत् ।<br>वायुरोधेन संयुक्तं सर्वे देवाः सहर्षयः ॥ ६९॥<br>साग्नयो लक्ष्मणं पुष्पैस्तुष्टुवुश्च समाकिरन् ।<br>अदृश्यं विबुधैः कैश्चित्सशरीरं स वासवः ॥ ७०॥<br>गृहीत्वा लक्ष्मणं शक्रः स्वर्गलोकमथागमत् ।<br>ततो विष्णोश्चतुर्भागं तं देवं सुरसत्तमाः ।<br>सर्वे देवर्षयो दृष्ट्वा लक्ष्मणं समपूजयन् ॥ ७१॥नाश हो जानेपर निश्चय ही त्रिलोकीका नाश हो जाता है । हे रघुश्रेष्ठ ! आप तो सम्पूर्ण लोकोंके रक्षक हैं; अतः अकेले लक्ष्मणजीको ही त्यागकर आपको त्रिलोकीकी रक्षा करनी चाहिये" ॥ ६३॥<br><br>रघुनाथजीने सभामें उनके धर्मार्थयुक्त और निर्दोष वचन सुनकर तुरन्त ही लक्ष्मणजीसे कहा—"लक्ष्मण ! तुम्हारी जहाँ इच्छा हो वहाँ चले जाओ, जिससे धर्ममें संशय उपस्थित न हो ॥ ६४-६५॥ सत्पुरुषोंके लिये त्याग और वध दोनों समान ही हैं।" रघुश्रेष्ठ भगवान् रामके ऐसा कहनेपर लक्ष्मणजीकी आँखें दुःखसे डबडबा आयीं और वे शीघ्र ही उन्हें प्रणाम कर अपने घर आये । वहाँसे वे सरयूतटपर पहुँचे और आचमन करनेके अनन्तर उन्होंने हाथ जोड़ अपने नवों इन्द्रियगोलकोंको रोककर प्राणोंको ब्रह्मरन्ध्रमें स्थिर किया । फिर जो वासुदेव नामक अव्यय और अविनाशी परब्रह्म पद है, उस परमधामका चित्तमें ध्यान किया । इस प्रकार प्राणनिरोध करनेपर ऋषियों तथा अग्निके सहित समस्त देवताओंने लक्ष्मणजीपर पुष्प बरसाये और उनकी स्तुति की । इसी समय इन्द्र किसी भी देवताको दिखायी न देते हुए उन्हें सशरीर लेकर स्वर्गलोकमें चले आये । तब विष्णुभगवान्‌के चतुर्थांशरूप उन लक्ष्मणदेवको देखकर समस्त देवताओं और देवर्षियोंने उनका पूजन किया ६६-७१॥ भगवान्
लक्ष्मणे हि दिवमागते हरौ<br>$\hspace{2cm}$सिद्धलोकगतयोगिनस्तदा ।<br>ब्रह्मणा सह समागमन्मुदा<br>$\hspace{2cm}$द्रष्टुमाहितमहाहिरूपकम् ॥ ७२॥लक्ष्मणजीके स्वर्ग पधारनेपर ब्रह्माजीके सहित सिद्धलोकनिवासी समस्त योगीजन अति प्रसन्न होकर महासर्प (शेष) रूपधारी श्रीलक्ष्मणजीका दर्शन करनेके लिये आये ॥ ७२॥

इति श्रीमदध्यात्मरामायणे उमामहेश्वरसंवादे उत्तरकाण्डे अष्टमः सर्गः ॥ ८ ॥