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अकबर-बीरबल विनोद (न्याय, चातुर्य एवं हास्य कथाएँ)

अकबर-बीरबल विनोद (न्याय, चातुर्य एवं हास्य कथाएँ)

पारम्परिक लोक संग्रह द्वारा

स्रोत: अकबर-बीरबल विनोद (न्याय, चातुर्य एवं हास्य कथाएँ) · खेमराज श्रीकृष्णदास / नवल किशोर प्रेस · 1935 (उद्गम)

DevanagariHindipublished292 पृष्ठ

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११५ अकबर बीरबल विनोद झिपाने के लिये बादशाह को सच्चा मसाला मिल गया। वह बारबार उसका याद दिलाकर बीरबल को नीचा दिखाता और!विचारा बीरबल चुप रह जाता। एक दिन बीरबल ज्यों ही दरबार में आया त्योंही बादशाह ने उससे छेड़खानी की-“क्यों बीरबल ! वह ताक का सेव कहाँ है।” बीरबल फिर भी कुछ उत्तर न दिया। बादशाह को इसमें बड़ा आनन्द आता और वह नित्य किसी न किसी समय 'ताक वाला सेब' कह कर बीरबल को लजवाता। बिचारा बीरबल चुप रह जाता। जब उसके नाकोंदम आ गया तो बादशाह के झिपाने की तरकीब सोचने लगा। एक दिन बीरबल ने तीर्थयात्रा का बहाना कर बादशाह से दो मास की छुट्टी ली। उसकी छुट्टी मंजूर हो गई। बीरबल घर पहुँच कर एक नया ढोंग रचकर अपना वेष परिवर्तन कर साधु का स्वरूप धारण किया। इस प्रकार खूब बनठन कर थोड़ी रात गये घर से बाहर निकला और रातोरात उस जंगल में जा पहुँचा जहाँ बादशाह शिकार खेलने जाया करता था। एक सघन झाड़ी के अन्दर आराम से पड़ रहा। दैवात् सन्ध्याकाल में बादशाह भी शिकार खेलने गया। एक हिरन चौकड़ी भरता हुआ उसके आगे आया, बादशाह ने अपना घोड़ा हिरन के पीछे डाल दिया, वह इतनी तेजी से भागा कि उसके सब साथी पिछड़ गये। अन्त में हिरन एक घने जंगल में पहुँच कर आँख से ओझल हो गया । कोई आगे-पीछे नहीं दीख पड़ता था। बादशाह बहुत घबड़ाया क्योंकि उ से जंगल से बाहर

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