भारतकोश
श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)

श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)

Srimad Ananda Ramayana Hindi

महर्षि वाल्मीकि / अज्ञात द्वारा

स्रोत: Srimad Ananda Ramayana Complete 9 Kandas with Hindi Translation (उद्गम)

DevanagariHindipublished811 पृष्ठ

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९४आनन्दरामायणे[ सर्गः ९

आत्मानं दर्शयित्वा तां शीघ्रं गच्छ गृहं प्रति । तां वाणीं हनुमाञ्छ्रुत्वा बभूव हर्षपूरितः ॥२३२॥ द्रुतं तां जानकीं दृष्टुमशोकवनिकां ययौ । तावद्ददर्श लङ्कायां सुवर्णवेष्टितां भुवम् ॥२३३॥ तत्कारणं वदाम्यद्य तच्छृणुष्व शिरोध्वजे । अस्तीद्रिशिखरे देवि त्रिकूट इति विश्रुतः ॥२३४॥ क्षीरोदेनावृतः श्रीमान्योजनायुतमुच्छ्रितः। तावन्न विस्तीर्णः पर्यंक त्रिभिः शृङ्गैः पयोनिधिम् २३५ दिशः खं रोधयन्नास्ते रौप्यायसहिरण्मयैः । तस्य द्रोण्यां भगवतो वरुणस्य महात्मनः ॥२३६॥ उद्यानमृतुमन्नाम आक्रोडं सुरयोषिताम् । तस्मिन्सरः सुविपुलं लसत्कांचनपंकजम् ॥२३७॥ कुमुदोत्पलगह्वारशतपत्रशियोर्जितम् । नैतत्कथंञ्चा पश्यन्ति न नृशंसा न नास्तिकाः ॥२३८॥ तस्मिन्सरसि दुष्टात्मा विरूपोऽभूज्जलाशयः । सामोऽभूद्ग्राहो गजेन्द्राणां दुराधर्षो महाबलः ॥२३९॥ अथ दंतोज्ज्वलमुखः कदाचिद्गजयूथपः । आजगाम तृषाक्रान्तः करेणुपरिवारितः ॥२४०॥ तृषितः पानकामोऽभूदवतीर्णश्च तत्र सरः । पिवतस्तस्य ततोयं ग्राहस्तमुपपद्यत ॥२४१॥ सुलीनः पंकजवृते यूथमुख्यतरः करी। गृहीतस्तेन नेत्रैव ग्राहणातिकलीयसा ।। गजो चाकर्षते तीरं ग्राह माकर्षते जलम् ॥२४२॥ पश्यन्तीनां करेणूनां क्रोशन्तीनां सुदारुणम् । नीयते पंकजवने ग्राहेणान्वक्तमूर्तिना ॥२४३॥ तथाऽऽतुरं यूथपतिं करेणवो विकृष्यमाणं सरसा बलीयसा। विचुक्रुशुर्दीनाभयोऽपरे गजाः पार्थिग्रहास्तारयितुं न चाशकन् ॥२४४॥ तयोर्युद्धमभूद्घोरं दिव्यवर्षसहस्रकम् । दारुणैः सवतः पार्थिनिष्प्रयत्नगतिः कृतः ॥२४५॥ वेप्यमानः सुपीरंस्तु पार्थनामैर्दढैस्तथा । विस्फूर्जितमहाशक्तिर्भक्तश्च महाबवान् ॥२४६॥

कपिश्रेष्ठ ! खेद न करो । कल्याणकारिणी जानक.जी यहाँ नहीं हैं ॥ २३१ ॥ उनसे मिलकर तुम शीघ्र रघुवृद्ध रामके पास जाओ। उस गगनवाणीको सुनकर हनुमान् बहुत प्रसन्न हुए ॥ २३२ ॥ वे जानकीको देखनेके लिए शीघ्र अशोकवनमें गये। वहाँ जाकर हनुमान्ने कुछ सुवर्णवेष्टित धरती देखी ॥ २३३ ॥ हे गिरीन्द्रजे ! उसका कारण मैं बताता हूँ, सुनो-हे देवि ! त्रिकूट नामसे प्रसिद्ध एक श्रेष्ठ पर्वत था ॥ २३४ ॥ वह चारों ओर क्षीरसागरसे घिरा हुआ सुन्दर आभूषण तथा दस हजार योजन ऊँचा था। वह उतना ही गहराई में भी था। वह चाँदी, लोह और मानिक तीन शिखरोंसे दसों दिशाओं तथा आकाशका व्याप्त किए हुए था। उसके एक भागमें महात्मा भगवान् वरुणका ऋतुमान् नामक दवस्त्रियोंका क्रीड़ास्थान एवं उद्यान था। उसमें विशाल सुवर्णकमलोंसे सुशोभित एक तालाब था ॥ २३५-२३७ ॥ जो कि कुईयां, लाल कमल श्वेत कमल तथा काष्ठपद्म जैसे कमलोंसे अतीव सुन्दर प्रतीत होता था। उसको कुत्सित, क्रूर और नास्तिक लोग नहीं देख सकते थे ॥ २३८ ॥ उसी जलाशयमें छिपा हुआ महाबलवान्, बड़ा कठिनाईसे पकड़ा जानेवाला तथा गजेन्द्रोंको भी त्रास देनेवाला एक दुष्ट मगरमच्छ रहता था ॥ २३९ ॥ किसी समय श्वेत दांत तथा श्वेत मुखवाला गजोंमे मुख्य एक गजराज प्याससे व्याकुल होकर हथिनियांस घिरा हुआ वहाँ आया ॥ २४० । वह पानी पीनेकी इच्छासे ज्यों ही पानीमं उतरा और पानी पीने लगा त्यो ही ग्राह उसके पास आ पहुँचा ॥ २४१॥ कमलवनसे ढके हुए हाथियोंके मुख्यके चरण स्थित उस हथियोको उस भयानक तथा अति बलवान् ग्राहने पकड़ लिया ॥ २४२॥ अब वह हाथी ग्राहको तीरकी ओर खींचत रहा। उसके माथकी हथिनियाँ देखती और दुखसे चिल्लाती ही रह गई और जलमें छिपा हुआ ग्राह हाथीको कमलके बनमें दूर खींच ले गया ॥२४३॥ जब घबराये हुए उस यूथपति गजको ग्राह अनूकूल बेगसे जलमें खींच रहा था, तब हथिनियों बलीन मुखसे क्रन्दन करने लगीं और दूसरे तथा पीछे रहनेवाले हाथी दीन होकर चिल्लाने लगे, पर कोई उसे बचा नहीं सका ॥ २४४ ॥ उस गज तथा ग्राह दोनोंमें देवताओंके हजार वर्ष तक घोर युद्ध होता रहा। अन्तमें गजराज जैसे दन्तपाश तथा अति भयानक एवं दृढ़ नागपाशमें बँधकर सर्वथा असमर्थ हो गया। तब उस्कण्ठ वर्ष तथा महाशक्तिसम्पन्न होता हुआ भी वह गजराज चिल्लाने लगा महाम् चीत्कार