श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)
Srimad Ananda Ramayana Hindi
महर्षि वाल्मीकि / अज्ञात द्वारा
स्रोत: Srimad Ananda Ramayana Complete 9 Kandas with Hindi Translation (उद्गम)
पृष्ठ 113, कुल 811 में से
संदर्भ में पढ़ेंसर्गः ९ ] सारकाण्डम् ९७
इत्युक्त्वा तत्करे सीता ददौ श्रीराममुद्रिकाम् । ततस्तां मारुतिः पृष्ट्वा नत्वा शीघ्रं ययौ पुनः ॥२७९॥
आरुरोह सुवेलाद्रिं चूर्णं तमकरोद्द्रुतम् एतस्मिन्नन्तरे ब्रह्मा ददौ पत्रं सविस्तरम् ॥२८०॥
यद्यत्कृतं मारुतिना रक्षार्थं तस्य सूचकम् । तद्गृह्य मारुतिर्गन्त्वा पृष्ट्वा विधिं पुनः ॥२८१॥
तत उड्डीय वेगेन ययावाकाशवर्त्मना । कुर्वन् शब्दं महाघोरं कपीनामूर्ध्वतस्तदा ॥२८२॥
उदग्दिश्यतग किंचिन्पपात भुवि मारुतिः । ततो दृष्ट्वा कपीन्द्रस्तं ददृशे मुनिसत्तमम् ॥२८३॥
किंचिद्भ्रममाविष्टस्तं मुनिं प्राह मारुतिः । मया श्रीरामकार्यं तु कृतमस्ति मुनीश्वर ॥२८४॥
पानीयं पातुमिच्छामि दर्शयस्व जलाशयम् । तर्जन्या दर्शयामास मुनिस्तस्मै जलाशयम् ॥२८५॥
ततः स मारुतिर्मुद्रां मणिं पत्रं मुनेः पुरः । संस्थाप्य नीरं पातुं वै ययो कासारमुत्तमम् । २८६॥
ततस्तत्र कपिः कश्चिन्मुद्रिकां मुनिसंनिधौ । कमण्डलौ प्रक्षिपन्म पयो तारञ्च मारुतिः ॥२८७॥
गृहीत्वा तं मणिं पत्रं मुनिं पप्रच्छ मुद्रिकाम् । मुनिर्नूनेत्रसंज्ञया तस्मै कमण्डलुमदर्शयत् ॥२८८॥
दत्तः कमण्डलीं तूर्णं मुद्रिकामवलोकयन् । तावद्ददर्शान्वनेयस्तस्मिन् भोगममुद्रिकाः ॥२८९॥
दृष्ट्वा सहस्रशस्तत्र चकितः प्राह तं मुनिम् । कुतस्त्विमा मुद्रिकाश्चवद का मम मुद्रिका ॥२९०॥
एतासु त्वं मुनिश्रेष्ठ तदा तं मुनिरब्रवीत् । यदा यदा वायुपुत्रः सीतां तां राघवाज्ञया । २९१॥
लङ्कां गन्त्वा समानीता शुद्दिमुद्राम्तदा तदा । मदग्रे स्थापितास्ताश्च कपिभिश्च कमंडलौ ॥२९२॥
निक्षिप्तास्तास्त्विमाः सर्वा पश्यताम् स्वमुद्रिकाम् । तन्मुनेर्वचनं श्रुत्वा गतगर्वस्तमब्रवीत् ॥२९३॥
कियंतो राघवाश्चात्र ममापाता मुनीश्वर । मुनिस्तं प्राह निष्कास्य गणयस्वाद्य मुद्रिकाम् । २९४॥
पर सवार हो जायें, तो मैं आपको ले चलकर आज ही रामका दर्शन करा दूँ ॥ २७७ ॥ जानकीने कहा—मुझे दूसरा कोई छुड़ाकर ले जाय, इस बातको भगवान राम सहन नहीं कर सकेंगे। इसलिए तुम इस अंगूठीको ले जाकर रामको दे दो । २७८ । इतना कहकर साताजीने हनुमानके हाथमें वह मुद्रिका दे दी । तब हनुमानजी सीताकी आज्ञा ले तथा नमस्कार करके शीघ्र ही लौट पड़े ॥ २७९ ॥ उन्होंने समुद्रके किनारे-वाले पर्वतपर चढ़कर उसे चूर्ण कर डाला । उस समय ब्रह्माने विस्तारपूर्वक एक पत्र लिखकर उन्हें दिया । २८० । जिसमें यह लिखा था कि लंकाम जाकर मारुतिने क्या-क्या काम किया है। उसको लेकर ब्रह्माकी आज्ञा ले तथा उन्हें नमस्कार करके हनुमान् पुन वहाँ से उड़कर आकाशमार्गसे घोर तथा महान् वानरोकी तरह शब्द करते हुए जोरसे चल पड़े ॥ २८१ ॥ २८२ ॥ उत्तर दिशाकी ओर कुछ दूर आगे जाकर नीचे उतरे या वहाँ उन्होंने एक मुनिको विराजमान देखा ॥ २८३ ॥ तब कुछ श्रमसे मारुतिने कहा हे मुनीश्वर ! मैं श्रीरामका काम करके आ रहा हूँ । २८४ । यहाँ मैं पानी पीनेकी इच्छासे आया हूँ मुझे कोई जलाशय बतलाइये । तब मुनिने उन्हें तर्जनी अंगुल से जलाशय बतला दिया । २८५ तदन्तर हनुमान् अंगूठी, चूडामणि तथा पत्र मुनिके पास रखकर उस उत्तम तालाबकी ओर जल पीने गये ॥ २८६ । इतनेमें किसी बन्दरने आकर रामकी मुद्रिकाको मुनिके पास रक्खे कमण्डलुमें डाल दिया । उधरस हनुमान्जी आ आ पहुंचे । २८७ ॥ चूडामणि तथा पत्रके विषयमें उन्होने मुनिसे पूछा कि मुद्रिका कहां गयी ? मुनिने भौंहोके संकेतसे कमण्डलु दिखाया ॥ २८८ ॥ जब हनुमान्ने कमण्डलुमें देखा तो उसमे श्रीरामकी हजारों मुद्रिकाएं दिखायी दीं । तब हनुमान्ने आश्चर्यचकित होकर मुनिसे पूछा कि इतनी अंगूठियें कहाँसे आयीं, सो बताइए ॥ २८९ ॥ २९० ॥ हे मुनिश्रेष्ठ ! आप यह भी कहिये कि इनमेंसे मेरी मुद्रिका कौन-सी है ? मुनिने उत्तर दिया कि जब-जब श्रीरामकी आज्ञासे हनुमान् लंकामें जाकर सीताका पता लगाया है और अंगुलियें मेरे सामने रक्खी हैं तब-तब बन्दरोंने उन्हें इस कमण्डलुमें डाल दी हैं। वे ही ये सब हैं। इनमेंसे तुम अपनी अंगूठी खोज लो । मुनिके इस वाक्यको सुनकर हनुमान्का गर्व खर्च हो गया । तब उन्होंने मुनिसे कहा— ॥ २९१ ॥ २९२ । हे मुनीश्वर ! यहाँ कियन राम आये हैं ? मुनिने कहा—कमण्डलुमेंसे अंगूठियें निकालकर