भारतकोश
श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)

श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)

Srimad Ananda Ramayana Hindi

महर्षि वाल्मीकि / अज्ञात द्वारा

स्रोत: Srimad Ananda Ramayana Complete 9 Kandas with Hindi Translation (उद्गम)

DevanagariHindipublished811 पृष्ठ

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१०८आनन्दरामायणे[ सर्गः १०

विश्वनाथाभिधं लिङ्गं स्वीयं संस्थापयाधुना । तथेति मारुतिर्लिङ्गं स्थापयामास सादरम् ॥१४१॥
मारुतेश्चैव लिङ्गाय ददौ रामो वरं तदा अमपूज्य विश्वनाथं मारुते त्वत्प्रतिष्ठितम् ॥१४२॥
यमादौ पूजयन्त्यत्र ये नरा लिङ्गमनुत्तमम् । रामेश्वराभिधं सेतौ तेषां पूजा वृथा भवेत् ॥१४३॥
इत्युक्त्वा तं पुनः प्राह रामो राजीवलोचनः । मदर्थं यत्समानीतं त्वया लिङ्गं महत्तमम् ॥१४४॥
विश्वनाथस्य तत्पृष्ठामस्तु देवालये चिरम् । अनर्चितमवन्यां तदप्रतिष्ठितमुत्तमम् ॥१४५॥
अग्र कालान्तरेणाहं तच्चापि स्थापयामि वै । तत्तत्र वर्ततेऽद्यापि लिङ्गं विश्वेश्वरान्तिके ॥१४६॥
अप्रतिष्ठापितं भूमौ न केनापि प्रपूजितम् । पुनः प्राह कपिं रामस्त्वमत्र च्छिन्नलाङ्गुलः ॥१४७॥
वस भूमौ गुप्तपादः स्मरन्मद्रूपगर्वित निवृतम् । ततः कपिः स्वीयमूर्तिं स्थापयामास स्वाग्रतः ॥१४८॥
छिन्नपुच्छा गुप्तपादा सा तत्राद्यापि वर्तते । पतितो मूर्च्छितो यत्र मारुतिस्तत्र तद्ध्रुवम् । १४९॥
बभूव मारुतेर्नाम्ना तीर्थं पापप्रणाशनम् । रामस्तत्राकरोत्पुण्यं स्वनाम्ना तीर्थमुत्तमम् । १५०।
स्वाङ्गेन स्थापयामास मूर्तिं तत्र रघूद्वहः । सेतुमाधवनाम्नी सा वर्ततेऽद्यापि पार्वति ॥१५१॥
स्वनाम्ना लक्ष्मणश्चापि चकार तीर्थमुत्तमम् । ततो रामः स्वहस्तेन स्पृष्ट्वा मारुतिलाङ्गुलम् ॥१५२॥
चकार पूर्ववद्रम्यं दृढसन्धिसमन्वितः । तत्पुच्छवेष्टनाज्जातः कृशो रामेशमस्तकः ॥१५३।
स तथैव कृशोऽद्यापि तत्रास्ति शिवमस्तकः । तदारभ्य त्यक्तगर्वश्चाभूद्रामे स मारुतिः ॥१५४।
ततोऽहं सैकताल्लिङ्गादाविर्भूय रघूद्वहम् । अब्रुवं देवि तत्सर्वं शृणुष्व ते वदाम्यहम् ॥१५५।
राघवेन्द्र गुणश्रेष्ठ शृणु वृत्तं पुरातनम् । एकदाऽहं पुरा भूमौ मलिनाम्बरसंयुतः । १५६।
भिक्षार्थं कौतुकाद्विप्ररूपेणाविचरं सुखम् । ऋषीणामाश्रमायेषु ह्यटनन् मां विलोक्य च ॥१५७॥

हे राम ! मम वा अपराध हुआ हो, उसे क्षम कर । यह श्लोक अप श्रुतिनिधि है । तदनन्तर रामने कहा हे मारुति तुम मत्स्थापित लिङ्गके उत्तरकी ओर इस विश्वनाथ नामक अपने लिङ्गको स्थापित करो । 'तथास्तु' कहकर मारुतिने सादर शिवलिंगकी स्थापना कर दी ॥१४०॥१४१॥ तब रामने उस मारुतिलिङ्गको वरदान देत हुए कहा हे मारुते तुम्हारे द्वारा स्थापित विश्वनाथलिङ्गकी पूजा किये बिना जो सेतुबन्धरामेश्वरकी पूजा करेगा उसकी पूजा व्यर्थ हो जायगी ॥ १४२॥ १४३॥ इतना कहकर रामने फिर हनुमान्‌से कहा कि जो तुम मेरे लिए उत्तम लिङ्ग लाये हो ॥ १४४॥ वह विश्वनाथलिङ्ग यों ही इस देवालयमें पड़ा रहे । बहुत कालतक यह उत्तम लिङ्ग पृथ्वीपर अपूजित ही पड़ा रहेगा । १४५॥ आगे चलकर बहुत दिनों बाद इसकी भी मैं अच्छी स्थापना करूंगा। वह लिङ्ग अभी भी वहीं विश्वेश्वरलिङ्गके पास पड़ा हुआ है । १४६ ॥ न अभी उसका प्रतिष्ठा हुई है और न कोई उसकी पूजा ही करता है रामने फिर हनुमान्‌से कहा कि तुम्हारी पूंछ यहींपर छिन्न हुई है । अतः तुम यहींपर भूमिमें छिन्नपुच्छ तथा गुप्तपाद होकर अपने गर्वका स्मरण करते हुए पड़े रहो, तब हनुमान्‌ने अपने आगे वहीं अपनी मूर्ति स्थापित कर दी । १४७ १४८।, तथा का वहीं हनुमान्‌की छिन्नपुच्छ और गुप्त पांवकी मूर्ति विद्यमान है । जहाँपर मारुति मूर्छित होकर गिरे थे, वह उत्तम स्थान मारुतिके नामसे पवित्र तथा पापोंको नष्ट करनेवाला तीर्थ प्रसिद्ध हुआ । वहीं ही रामने भी अपने नामसे एक उत्तम तीर्थ बनाया ॥ १४९ ॥ १५० । रामने वहीं अपने अंगकी एक मूर्ति भी स्थापित कर दी । सेतुमाधव नामकी वह मूर्ति अभी भी वहां प्रस्तुत है ॥ १५१ ॥ हे पार्वति ! लक्ष्मणने भी वहीं अपने नामका उत्तम तीर्थ स्थापित किया । पश्चात् रामने अपने हाथसे छूकर हनुमान्‌की पूंछको पूर्ववत् सुन्दर तथा दृढ़ सन्धियुक्त बनाकर हनुमान्‌को प्रसन्न कर लिया । पूंछके लपेटे जानेके कारण रामेश्वरका मस्तक कुछ दब गया था ॥ १५२ ॥ १५३ ॥ वह शिवमस्तक अभी भी वैसा ही चिपटा है, तबसे हनुमान् रामके समक्ष सर्वथा गर्व्वरहित हो गये । १५४। हे देवि ! उस समय बालुक लिङ्गमसे प्रकट होकर मैने रघूद्वह रामसे जो कुछ कहा था, वह सब तुमको सुनाता हूँ । ध्यान देकर सुनो ॥१५५ । मैन कहा - हे राघवेन्द्र ! हे रघुश्रेष्ठ तुम्हें मैं एक प्राचीन इतिहास सुनाता हूँ । एक समय कौतुकवश मै पुराने कपड़े पहिन तथा ब्राह्मणका