श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)
Srimad Ananda Ramayana Hindi
महर्षि वाल्मीकि / अज्ञात द्वारा
स्रोत: Srimad Ananda Ramayana Complete 9 Kandas with Hindi Translation (उद्गम)
पृष्ठ 126, कुल 811 में से
संदर्भ में पढ़ें११० आनन्दरामायणे [ सर्गः १०
एतावत्कालपर्यन्तं नेदं केचिदलोकितम् । अद्य त्वया सादराद्यद्दृष्टं स्पष्टं विमोक्षदम् ॥१७५॥ स्वप्रतिष्ठितलिङ्गस्य प्रसादादवनीतले । ख्यातिं गतं त्विदं लिङ्गं यस्मात्तस्माद्रघूत्तम ॥१७६॥ अस्य लिङ्गस्य यज्ज्योतिर्मदीये त्वत्प्रतिष्ठिते । याम्यद्यैव संकेतेऽत्र लिङ्गे सेतौ स्थिरा भव ॥१७७॥ ज्योतिर्लिङ्गं द्वादशमं तव रामेश्वराभिधम् । वदिष्यन्ति जनाः सर्वे ह्यद्यारभ्य रघूत्तम ॥१७८॥ पूजास्रग्वादिकं कर्म यद्यत्किंचिदिरा मम । सर्वत्र लिङ्गे तत्सर्वमस्तु रामेश्वरे सदा ॥१७९॥ अहं चापि मुनेर्वाक्यादगस्तेस्त्वत्प्रियापि च । त्यक्त्वा काशीमागतोऽस्मि त्वल्लिङ्गेऽस्मिन्सदावसम् ॥ प्रणमेत्सेतुबन्धे यः पुमान् रामेश्वरं शिवम् । ब्रह्महत्यादिपापेभ्यो मुच्यते तदनुग्रहात् ॥१८१॥ स्वं प्रदाय रघुश्रेष्ठ वरं देन जनाः सदा । स्नानार्थमाययिष्यन्ति मणिकर्णीजलं मम ॥१८२॥ शर्वस्यैतद्वचनं श्रुत्वा प्रमथो गणनायकः । जगाद स्नात्वा सेतुबन्धे रामेशं परिपश्यति ॥१८३॥ संकल्प्य नियतो भूत्वा गृहीत्वा सेतुवालुकाम्। काडिकामिर्यत्नेन गत्वा वाराणसीं शुभाम् ॥१८४॥ क्षिप्य्त्वा तां बालुकां त्यक्त्वा वेण्यां बालुकण्डिकाम् । आनीय गङ्गासलिलं रामेश्वरमभिषिच्य च ॥१८५॥ समुद्रे त्यक्तकङ्कारो मोक्षं प्राप्नोत्यसंशयम् । संकल्पेन विना गंतो रामेशं नागमिव्यति ॥१८६॥ आगता चेत्तदा ज्ञेयः संकल्पः पूर्वजन्मनि । कृतोऽस्तीत्यत्र मद्रूपवाद्यात्र कार्या विचारणा ॥१८७॥ एवं नानावदान्रामो यावल्लिङ्गाग्र मोऽब्रवीत् । तावत्तत्र समायातः कुम्भजन्मा मुनीश्वरः ॥१८८॥ नत्वा शङ्करो रामं रामोऽपि प्रणनाम तम् । तदा मुनिः प्राह रामं प्रसादात्तव राघव ॥१८९॥ दर्शनं विश्वनाथस्य जातं मेऽद्यात्र वै चिरात् । अथात्र तुष्टिर्जाता मे लिङ्गमत्र करोम्यहम् ॥१९०॥ इत्युक्त्वा स्थापयामास स्वनाम्ना लिङ्गमुत्तमम् । रामेश्वराग्निदिग्भागे कुम्भजन्मा मुदान्वितः ॥१९१॥
प्रिया तुम्हारे प्रतिष्ठित लिंगकी ईशानदिशामें वाम ही विद्यमान है ॥ १७४ ॥ इतने समय तक इसको किसीने नहीं देखा था । पर आज वानरसहित तुमने इस मोक्षप्रद लिंगका स्पष्ट देख लिया है ॥ १७५ ॥ तुम्हारे द्वारा स्थापित लिंगकी महिमासे ही पृथ्वीपर इसकी प्रसिद्धि हुई है। इस कारण हे रघुत्तम ! इस लिंगका जो ज्योति है, वह ज्योति तुम्हारे द्वारा स्थापित बालुकामय लिंगमें भरे कहुनेसे आज ही चली जायगी ॥ १७६ ॥ १७७ ॥ हे रघूत्तम ! आजसे बारहवां ज्योतिर्लिंग तुम्हारा स्थापित रामेश्वर ही दुनियाके सब मनुष्योम प्रसिद्ध होगा ॥ १७८ ॥ भेंट वस्त्रगले दूवा आदि सब उपचार तथा तुम्हारे रामेश्वर लिंगका ही होगा ॥ १७९ ॥ मैं या अगस्त्य मुनिके तथा तुम्हारे कहनेसे काशी छोड़कर यहाँ आ गया हूँ और अब तुम्हारे इस लिंगमें ही निवास करूंगा ॥ १८० ॥ जो मनुष्य सेतुबन्ध रामेश्वरको प्रणाम करेगा, वह मेरी कृपासे ब्रह्महत्या आदि भयानक पापोसे भी मुक्त हो जायगा ॥ १८१ ॥ हे रघुश्रेष्ठ ! आप मुझे यह वर दें कि सब लोग मुझे स्नान करानेक लिए सदा काशीका मणिकर्णिकाका जल लाकर चढ़ाण करें ॥ १८२ ॥ हे पार्वती ! शरे इस वचनको सुनकर श्रीराम हर्षित होकर बोले कि जो मनुष्य सेतुबन्धमें स्नान करके रामेश्वर शिवका दर्शन करेंगे ॥ १८३ ॥ फिर दृढ़ संकल्पसे सेतुकी बालुकाको काँवरमें रखकर प्रेम तथा यत्नसे काशीमे से जाकर गङ्गाके प्रवाहम् डालने और उस काँवरको वही छोड़कर दूसरी काँवरके द्वारा गंगाजल लाकर उससे रामेश्वरका अभिषेक करेंगे ॥ १८४ ॥ १८५ ॥ वहाँ उस काँवरको को समुद्रमें फेंककर निःसंदेह सायुज्यपदको प्राप्त होगे । जबतक दृढ़ संकल्प न होगा, तब तक रामेश्वर आना न होगा ॥ १८६ ॥ कदाचित् कोई आगया तो यही मानना चाहिए कि उसके पूर्वजन्मका संकल्प था । मेरे कहनेसे आप इस बातमें तनिक भी संदेह न करें ॥ १८७ ॥ इस प्रकार राम जब अनेक वर दे रहे थे, तभी वहीं कुम्भजन्मा (अगस्त्य) मुनि आ पहुंचे ॥ १८८ ॥ उन्होंने वहाँ आकर शिव तथा रामको प्रणाम किया । तब रामने भी मुनिको प्रणाम किया । अगस्त्य मुनिने रामसे कहा— हे राघव ! आपके अनुग्रहसे मुझे आज बहुत दिनके बाद विश्वनाथका दर्शन प्राप्त हुआ है। इससे मुझे बड़ी प्रसन्नता हो रही है। इसलिए मैं भी यहाँ एक लिंग स्थापित करता हूँ ॥ १८९ ॥ १९० ॥ इतना कहकर अगस्त्य मुनिने भी अपने नामसे एक उत्तम