भारतकोश
श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)

श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)

Srimad Ananda Ramayana Hindi

महर्षि वाल्मीकि / अज्ञात द्वारा

स्रोत: Srimad Ananda Ramayana Complete 9 Kandas with Hindi Translation (उद्गम)

DevanagariHindipublished811 पृष्ठ

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१२४ आनन्दरामायणे [ सर्गः ११

दैत्यौ रामेण निहतो श्रुत्वा सदसि रावणः । तस्माच्चकितः प्राह पूर्ववृत्तं भयान्वितः ॥१३२॥
मानुषेणैव मृत्युर्मे प्राह पूर्वं पितामहः । अतो नारायणः साक्षान्मानुषोऽभून्न संशयः ॥१३३॥
रामो दाशरथिर्भूत्वा मां हर्तुं समुपस्थितः यदाऽनरण्यः पूर्वं हि म हतो दीक्षितो मया ॥१३४॥
शप्रश्चाहं तदा तेन सूर्यवंशीद्भवेन हि उत्पत्स्यते च मद्वंशे परमात्मा सनातनः ॥१३५॥
स एव त्वां पुत्रपौत्रवान्धवैःसहितंनिहन्नि इत्युक्त्वा स ययौ नाकं सोऽधुना समयो मम ॥१३६॥
समागंतो राघवो मां समरे स हनिष्यति विबोध्य कुम्भकर्णं समानयध्व त्वरान्विताः । १३७।
ततस्ते तां गुहां गत्वा तच्छ्वासेन विकर्षिताः यातायाते प्रचक्रस्ते कुम्भकर्णोदरे मुहुः ॥१३८॥
उद्वेगत्र बाहुपाशंश्च कृत्वार्थ राक्षसाः गत्वा तन्निकटंभीत्या निजघ्नूस्तं द्रुमैः पदैः ॥१३९॥
शिलाभिस्ताडयामासुश्चाश्वैरूंट्रैश्चचूर्णयन् काष्ठभारैर्महादाहं देहे चक्रुस्तथाङ्गया ॥१४०।
तदा प्रबुद्धश्वोत्थाय सूकरान् महिषान् वगन् कोटिशः स्वमुखे क्षिप्त्वा जलवापींविशोषय सः ॥१४१॥
गत्वा नत्वा राक्षसेन्द्रं बोधयामास रावणम् एकदाऽहं वनं गत्वा दृष्टवांस्तं नारदं मुनिम् । १४२॥
पृष्टवांस्त्वं कुत्र यासि कुतश्चागमनं कृतम् स मां प्राह देवलोकादयोध्यां प्रति गम्यते ॥१४३॥
रावणादीन् रणे हर्तुं विष्णुर्र्जातोऽत्र मानुषः । देववाक्यानुवर्त्यतु रामं गच्छाम्यहं जवात् ॥१४४।
इत्युक्त्वा सो गतः सोऽद्य प्रेषयामास राघवम् । इति श्रुतं मया पूर्वं तवाग्रे तन्निवेदितम् ॥१४५।
अतोऽर्पयस्व रामाय सीतां सख्यं कुरु प्रभो । इति तद्वचनं श्रुत्वा रावणस्तं रुधोऽब्रवीत् ॥१४६।
निद्राव्याजेनेक्षिणी तेऽद्य गच्छ निद्रां मुखं कुरु । तत्तथाः कृतवचनं श्रुत्वा नत्वाऽथ रावणम् १४७॥

यहाँका सब समाचार सुग्रीव आदिको कह सुनाया । १३० । १३१ । उधर भरा सभामें रावणने जब ऐरावण तथा मैरावणकी मृत्युका समाचार सुना तो घबराकर भयभीत होकर अपना पूर्ववृत्तान्त राक्षसोंसे कहने लगा ॥ १३२॥ उसने कहा कि पितामह ब्रह्माने मुझे पहिले ही कह रक्खा है कि तेरा मरण मनुष्यके द्वारा होगा। इससे ज्ञात होता है कि ये राम साक्षात् नारायण ही मनुष्यरूप धारण करके आये हैं, इसमें संदेह नहीं है ॥ १३३ ॥ इन रामने मुझे मारनेके लिए ही दशरथपुत्र बनना स्वीकार किया है और यहाँ आकर उपस्थित हुए हैं। जब मैंने पूर्वकालमें (दीक्षाको प्राप्त या ससद्गुणनिरत) अनरण्य नामके सूर्यवंशी राजाको मार डाला था। १३४ ॥ उस समय राजाने मुझे शाप दिया था कि मेरे वंशम सनातन पुरुष परमात्मा उत्पन्न होगा ॥ १३५ ॥ वे तुम्हें पुत्र पौत्र तथा बान्धवो सहित मारेंगे। इतना कहकर राजा स्वयं चले गये। बस, अब वह समय आ गया है ॥ १३६ ॥ राम मुझे समरमें अवश्य मारेंगे तुमलोग जाकर शीघ्र कुम्भकर्णको जगाकर यहाँ ले आओ ॥ १३७॥ वाके म सब जब उस गुफामें गये, जहाँपर कुम्भकर्णका सोना था। तब तो उसके लम्बे तथा बलवान् श्वाससे आकर्षित होकर वे सब बार-बार उसके पेटमें आते जाते हुये ॥ १३८ ॥ यह देखकर वे बड़े घबराये और एक साथ मिल तथा बाहुबलका आश्रय लेकर किसी प्रकार उसके शरीरके पास पहुँचे। वहाँ जाकर डन्त वृक्षों व लातो तथा पड़ोसे पीटकर उसे जगाने लगे ॥ १३९ ॥ उसपर बहुतरे पत्थर फेंक घाड़े तथा ऊँटासे कुचलवाया, पर उसकी नींद नहीं टूटी। तब राजाज्ञा आज्ञा से उसपर बहुतस लकड़ीफ कर डालकर जलाये गये ॥ १४० । तब वह किसी प्रकार उठा और करोड़ों सूअर तथा भाट-भाट भैंसाका खा तथा जलपान करके उसने एक बावलीको सुखा दिया ॥ १४१ ॥ तत्पश्चात् वह राक्षसेन्द्र रावणके पास गया और समझाकर कहने लगा कि एक बार मैं वनमें गया था। मैंने वहाँ नारद मुनिको देखकर पूछा -॥ १४२ । हे मह् मुने ! आप कहाँसे आये और कहाँ जा रहे है? उन्होंने कहा कि मैं देवलोकसे अयोध्या जा रहा हूँ । १४३ । वहाँ रावणादिको मारनेके लिए साक्षात् नारायण अवतरे हैं। उन भगवान् रागको देवताओंके कथनानुसार जल्दी करनेका स्मरण करानेके लिए मैं वेगसे आ रहा हूँ । १४४ ।। इतना कहकर वे चले गये। उन्होंने ही रामको भेजा है। इस प्रकार जो मैंने सुना था, सो कह सुनाया ॥ १४५ ।। इसलिए तुम सीता रामको समर्पण करके उनसे मित्रता कर लो। यह सुनकर