श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)
Srimad Ananda Ramayana Hindi
महर्षि वाल्मीकि / अज्ञात द्वारा
स्रोत: Srimad Ananda Ramayana Complete 9 Kandas with Hindi Translation (उद्गम)
पृष्ठ 279, कुल 811 में से
संदर्भ में पढ़ेंसर्गः १ ] विलासकाण्डम् २६१
ज्ञातं त्वया वा न ज्ञातं वेत्तुमिच्छामि तन्मुखात् । यदि किंचिद्वया नाशां ज्ञानं तद्बोधयाम्यहम् ॥ ३० । इति रामवचः श्रुत्वा निमग्नानन्दसागरे । मंचारूढ्या रामचन्द्रं जानकी वाक्यमब्रवीत् ॥ ३१ । श्रीसीतोवाच राम रावणदर्पघ्न त्वद्दत्ता ज्ञानपेटिका। मयाऽवलोकिता बुद्ध्या लब्धं ज्ञानं तत्र प्रभो । ३२। निर्गुणो निर्विकारस्त्वं क्रीडेयं सकला त्वया । मत्सङ्गेनैव भूम्यां कृत्वा लोकहिताय हि ॥३३॥ पेटिकायां यथा ज्ञानं मया तत्प्रवदामि ते त्वया पञ्चदशश्लोकैर्युक्तं गुह्यमनुत्तमम् ॥३४। प्रकटं तन्करोम्यद्य तवाग्रे रघुनन्दन। सर्वेषां मन्दबुद्धीनां हिताय ज्ञानमिद्धये ॥३५। जनानां सम्बोधयितुं चरित्रं भवताऽत्र यत् । कृतं तस्य विचारेण ह्यात्मज्ञानं लभेश्वरः ॥३६॥ सच्चिदानन्दरूपी यो विष्णुर्ज्ञेयः स सागरः। भूभारहरणादीच्छा विष्णोर्या जायते शुभा ॥३७॥ स वै श्रेयस्तरङ्गोऽत्र तथाऽऽत्मांशुलवः शुभः । बहिःकृतः सागरात्तं प्रान्तात्म्यः कथ्यते भुवि ॥३८॥ बुद्धिस्तु जननी चैव कौसल्या साऽत्र कथ्यते। शुद्धसत्त्वांतःकरणं पिता तस्यात्मनः स्मृतः ॥३९॥ राजा दशरथो ज्ञेयः श्रीमानन्त्यपरः क्रमः । तस्यात्मनश्च चत्वारो भेदास्ते बान्धवाः स्मृताः । ४०॥ रामसौमित्रिभरतशत्रुघ्ना एव चात्र हि । तुर्यावस्थस्तनु वाः स त्वं दशरथान्मजः ॥४१॥ ततो जाग्रदवस्थश्च लक्ष्मणः सोऽत्र कथ्यते । स्वप्नावस्थस्तृतीयश्च भरतोऽपि निगद्यते ॥४२॥ अपरः सुषुप्त्यवस्थस्तु ज्ञेयः शत्रुघ्न एव सः । हृदयाकाशं सन्धानमयोध्याऽत्र स्मृता तु सा ॥४३॥ मनोवेगो बहिर्यात्रा विश्वामित्राध्वरे गमः मनोवृत्तिनिघातश्च ताडिकाया वधोऽत्र सः ॥४४॥ मनोवेगस्य यो भङ्गः स धनुर्भङ्ग उच्यते । मायायोगस्तनस्तस्य मम्पाणिग्रहणं स्मृतम् । ४५॥ पूर्वसंस्कारनिग्रहो जामदग्न्येनिग्रहः । ततः सुषुद्दिरेवेहि कैकेय्या वरदानतः ॥४६॥
हुआ ? अन्या, अब बताओ कि मैं कौन हूँ मुत्र तूमन जगत मन्म क्या समझा है ? मैं तुम्हारे मुखसे यह सुनना चाहता हूँ । तुमने मुझे जाना या नही ? यदि तुम्हे हमको जाननेम अब भी कुछ कसर होगी तो मैं समझाऊँगा ॥ २६ । ३० ॥ इस प्रकार रामचन्द्रजीके बचनं सुनकर माताजी मौर भी आनन्दित हो गयीं और रामचन्द्रसे कहने लगीं ॥ ३१ ॥ माताजी बोली-हे रघुनन्दन ! हे रावणके गर्वको नष्ट करनेवाले राम ! आपने मुझ जो यह ज्ञानकी पिटारी दी है, उसे मैंने अपनी आत्मदृष्टिम खूब गौर करके देखा और मुझे आपका ज्ञान-प्राप्त हो गया । ३२॥ आप निर्गुण और निर्गकार है । फिर भी मेरे साथ संसारम आपन जा जा लीलाएं की हैं, उनका उद्देश्य एकमात्र लोकहित है। मैंने इस पिटारीमें जा जो देखा है, वह बतलाती हूँ। आपने पन्द्रह श्लोकोंमें मुझे जो उत्तम ज्ञान दिया है उसे मै आपके सम्मुख प्रकट करती हूँ ॥ ३३ ॥ ३४॥ उससे संसारके समस्त अज्ञानियोंका उपकार होग अर्थात् उन्ह का ज्ञानकी प्राप्ति हो जायगी । ३५ ॥ मंदबुद्धाको समझानेके लिए आपन इस जगतीतलमे जा जो चरित्र किये है उनपर अच्छी तरह विचार करनेसे नि सन्देह आत्मज्ञानकी प्राप्ति हो सकती है ॥३६॥ सच्चिदानन्दस्वरूप विष्णु भगवान् ही सागर हैं । भगवान् भीपृथ्वीका भार उतारनेकी इच्छा करते हैं, वही उस सागरकी तरंग है। उसमेंसे एक बिन्दु आत्माशरूप होकर बाहर आ जाता है । वही आत्मा कहलाता है। उसकी बुद्धिरूपा जननी कौशल्या है। शुद्ध और सत्वगुणमय अन्तःकरण उस आत्माका पिता होता है, सो साक्षात् श्रीदशरथजी हैं । उस आत्माके चार भेद आपने बतलाये हैं। वे चार भाई राम, लक्ष्मण, भरत और शत्रुघ्नस्रप होकर विद्यमान हैं। उनम् तुरीयावस्थाका अंश कहा है। सो इन चारों भाइयोंम बड आप हीं हैं ॥ ३७-४१ ॥ ज पदवस्थास्वरूप लक्ष्मणजी हैं, जाग्रतावस्थास्वरूप भरतजी तथा सुषुप्तिअवस्थास्वरूप शत्रुघ्नजी हैं। हृदयाकाश स्थान जो आपने बतलाया है, वह यही अयोध्या है ॥४२-४३॥ मनोवेगका दूर होना जो आपने कहा, वही मानो विश्वामित्रके यज्ञमें आपकी यात्रा है। मनकी दुर्वृत्तियोंका घात ही ताड़का-वध है ॥ ४३ ॥ ४४ ॥ मनोवेगका भंजन ही जनकपुरमे धनुष टूटना है। वही मेरा पाणिग्रहण होना ही मायाका