भारतकोश
श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)

श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)

Srimad Ananda Ramayana Hindi

महर्षि वाल्मीकि / अज्ञात द्वारा

स्रोत: Srimad Ananda Ramayana Complete 9 Kandas with Hindi Translation (उद्गम)

DevanagariHindipublished811 पृष्ठ

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२७८आनन्दरामायणे[ सर्गः ६

पूर्वाधिकानलङ्कारान् स्वदेहे जानकी पुनः । दधार दिव्यवासांसि हेमतन्तूद्भवानि सा ॥२८॥
लक्ष्मणं ब्राह्मणो गत्वा सीतावाक्यं न्यवेदयत् । ददौ तस्मै लक्ष्मणोऽपि हेममुद्रास्तथैव सः ॥२९॥
सीतावाक्यानुभूमिता मृषा मेने न तद्वचः । कः समर्थो रामराज्ये मृषां वक्तुं भवेदिति ॥३०॥
अथ सीताऽपि सौमित्रिं स्त्रीदासीप्रेषणेन तदा । अयोध्यायां तदा राष्ट्रे घोषयामास दुन्दुभिम् ॥३१॥
सप्तद्वीपेषु सर्वत्र पूषवच्चेयु सादरम् । काचिन्नारी पुमान् वापि विना सद्भूषणैर्नः ॥३२॥
रत्नक्षारैर्मया ज्ञातो यद्देशे यत्पुरे कदा । तद्राज्ञश्चास्तु मे दण्डो रामस्यापि विशेषतः ॥३३॥
इति मच्छासितं ज्ञात्वा स्वकोशैः सर्ववरन्नृपैः । वस्त्राद्यलङ्कारभूषाभिर्भूषणीया द्विजातयः ॥३४॥
सप्तद्वीपनृपतमयैश्च सीतामुद्दिशितम् । गजदुन्दुभिघोषेण श्रुत्वा चक्रुस्तथैव च ॥ ३५॥
तदारभ्य जगन्त्यां न कश्चिद्दिगतभूषणः । नारी वा पुरुषो वाऽऽसीत् कुत्राप्यवनिजाप्रभात्॥३६॥
एवं नाना कौतुकानि भूम्यां सीताऽकरोद्बहुश अथ रामः सभां गत्वा पुनर्नामे चतुथके ॥३७॥
चकार राजकर्माणि धर्मेणैव स्वबन्धुभिः नटनाटकवेश्यानां कौतुकानि महांसि च ॥३८॥
ददर्श स सभामध्ये स्तुतो मागधवंदिभिः । ततः सर्वान्विसृज्याथ ययौ सीतागृहं प्रभुः ॥३९॥
सायंसन्ध्यादिकं कृत्वा हुत्वा होमं यथाविधि । ततो गन्धादिभि पूज्य ब्राह्मणांश्चापि राघवः ॥४०॥
नानोपहारनैवेद्य दत्त्वा तेभ्यः स्वयं प्रभुः । कुन्जोपहारं श्रीरामः शुश्राव पौराणिकीं कथाम् ॥४१॥
कीर्तनैर्हरिदासानां वेश्यानां नर्तनैरपि पौरोदिताभिर्वार्ताभिर्गायकानां च गायनैः ॥४२॥
सार्धयामां निशां नीत्वा ययौ निद्रास्थलं शनैः । ततो रत्नप्रकृष्टार्थैः स जगाम जानकीं प्रति ॥४३॥


दे दिये और कहा कि तुम लक्ष्मणके पास चले जाओ और उनसे मेरे आज्ञानुसार एक लाख स्वर्णमुद्रा ले लो । 'बहुत अच्छा' कहकर वह ब्राह्मण लक्ष्मणके पास गया ॥ २५-२७॥ इसके अनन्तर सीताने फिर उससे दूने गहने पहन लिये और सुवर्णके तागेसे बने हुए बहुमूल्य सुन्दर वस्त्रोंको भी धारण किया। २८॥ उधर ब्राह्मण लक्ष्मणके पास गयो और सीताजीकी आज्ञा सुनायी । लक्ष्मणने जानकीके कथनानुसार उसे एक लाख स्वर्णमुद्रायें दे दीं ॥२९॥ ब्राह्मणकी बातपर लक्ष्मणको कुछ भी संदेह नहीं हुआ। क्योंकि रामचन्द्रजीके राज्यमें किसका झूठ बोलनेका साहस ही कैसे हो सकता था ॥ ३०॥ इसके पश्चात् सीताने लक्ष्मणके पास एक दासी द्वारा यह कहला भेजा कि मेरी आज्ञासे अयोध्याके समस्त राज्यमें ढिंढोरा पिटवा दो और सातों द्वीप तथा भिन्न-भिन्न देशोंमें भी कहला दी कि कोई स्त्री और पुरुष ऐसा न दिखायी दे कि जिसके शरीरपर बढ़िया वस्त्र और आभूषण न हो ॥ ३१॥ ३२॥ मेरे गुप्तचर इस बातकी टोह लेनेको सर्वत्र घूमते रहें। यदि कहीं किस देश या किस राष्ट्रमें कोई वस्त्र-भूषणविहीन देखा जायगा तो उस देशके राजाको मेरा तथा रामचन्द्रजीका आज्ञाके अनुसार घोर दण्ड भुगतना पड़ेगा । ३३॥ मेरो यह आज्ञा सुनकर सब राजे अपने देशकी प्रजाको अपने खजानेके द्रव्यसे उत्तम वस्त्राभूषण तैयार करवाकर बंटवा दें। समस्त ब्राह्मणादि द्विजातियोंको अच्छे-अच्छे वस्त्र-अलङ्कारोंसे अलंकृत करावें ॥ ३४॥ तदनुसार सातों द्वीपके नृपतिमान राजदुन्दुभि द्वारा घोषित सीताजीकी उस घोषणाको सुन-सुनकर विधिवत् उसका पालन किया ॥ ३५॥ तबसे सीताके अच्छे जगत्तलमें कोई ऐसा मनुष्य नहीं दिखाई देता था, जो सुन्दर वस्त्राभूषण न पहने हो ॥ ३६॥ इस प्रकार सीताजीने पृथ्वीमण्डलमें न जाने कितने कौतुक किये। तदनन्तर चौथे प्रहर रामचन्द्र अपने भ्राताओंके साथ सभाभवनमें गये ॥ ३७॥ वहाँ धर्मपूर्वक राज्यके आवश्यक कार्य सम्पन्न किये। फिर नटोंके नाटक और वेश्याओंके विविध प्रकारके नृत्य देखे, वन्दीजनोंकी स्तुतियां सुनीं और सबको विदा करके फिर सीताजीके भवनको लौट गये ॥ ३८ ॥ ३९ ॥ शामको सन्ध्यादिक नित्यकृत्य करके विधिवत् हवन किया, गन्धादिक अनेक उपचारोंसे शिवजी तथा ब्राह्मणों- की पूजा की ॥ ४० ॥ उन सबको विविध पकवानोंका नैवेद्य देकर स्वयं भोजन किया। पुराणोंकी कथायें सुनीं। तदनन्तर भगवद्भक्तोंका कीर्तन सुना और वेश्याओंके नृत्य देखे। जनपदवासियोंके कुशल-प्रश्न पूछे और