भारतकोश
श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)

श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)

Srimad Ananda Ramayana Hindi

महर्षि वाल्मीकि / अज्ञात द्वारा

स्रोत: Srimad Ananda Ramayana Complete 9 Kandas with Hindi Translation (उद्गम)

DevanagariHindipublished811 पृष्ठ

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पृष्ठ 296
२८०आनन्दरामायणे[ सर्गः ७

समागतां मुनिं श्रुत्वा तं प्रत्युद्गम्य राघवः । ननाम शिरसा भक्त्या निनाय निजमन्दिरम् ॥ २ ॥
दृष्ट्वाऽऽगमनं तस्मै द्विजेभ्यश्चापि वै पृथक् । दत्त्वाऽऽसनानि दिव्यानि चकार पूजनं पृथक् ॥ ३ ॥
कामधेनूद्भवै रत्नैरुपविष्टां मनोरमैः । व्यासं तं भोजयामास मुनिभिर्मांनकीपतिः ॥ ४ ॥
तांबूलं दक्षिणां दत्त्वा प्रबद्धकरसम्पुटः । पप्रच्छ कुशलं तस्मै व्यासाय रघुनन्दनः ॥ ५ ॥
सीता तं वीजयामास श्यामं पत्त्यवतीसुतम् । एतस्मिन्नन्तरे व्यासो रामाय कुशलं निजम् ॥ ६ ॥
निवेद्य पृष्ट्वा तत्क्षेमं तमाह कौतुकात्पुनः । राम राम महाबाहो यथा राज्यं त्वया भुवि ॥ ७ ॥
भुज्यते न तथाऽन्येन केनापि पृथिवीभृता । पुरा भुक्तं न कोऽप्यग्रे भोक्ष्यते पृथिवीपतिः ॥ ८ ॥
अन्यच्चैतन् महद्वैर्यमेकपत्नीव्रतं शृतं । दृष्ट्वातिविस्मयोचित्ते जायते मे रघूत्तम ॥ ९ ॥
कः सहेताव तारुण्यकामदावानलं नृपः । पदस्थे यौवने क्वापि त्वमेवास्मिन्मने क्षमः ॥१०॥
इति व्यासवतः श्रुत्वा राघवो व्यासमब्रवीत् । मया त्रयः कृताः सन्ति नियमा मुनिसत्तम ॥११॥
मुखाद्विनिर्गतं वाक्यमेकमेव सुनिश्चितम् । न क्रियते मृषा तच्च नोच्यते ह्यपरं पुनः ॥१२॥
अन्यन्सीतां विनाऽन्या स्त्री कोमलामलशीतला । न क्रियते परा पत्नी मनसाऽपि न चिन्त्यते ॥१३॥
तथा यं हन्तुमिच्छामि बाणेनैकेन कोपतः । निहन्म्येवं तदैकेन नान्यं बाणं सृजाम्यहम् ॥१४॥
इत्थं त्रयः कृताः पूर्वं नियमाश्च मया भो मुने । मय्या एव भवत्प्रेम्णाऽविनास्त्व वाक्यतः ॥१५॥
तथैवास्त्विति मोऽप्याह व्यासः श्रीराघवं तदा । पुनराह मुनिः धीमान् व्यासः श्रीराघव प्रति ॥ १६ ॥
एकपत्नीव्रतस्यास्य फलेनापरजन्मनि । त्वं कृष्णरूपेण बह्वीर्नारीर्भोक्ष्यसि राघव ॥१७॥
तन्मुनेर्वचनं श्रुत्वा विहस्य राघवोऽब्रवीत् । यद्यस्ति कामिनां भोक्तुं कृष्णरूपधरोऽप्यहम् ॥१८॥


श्रीरामदास उवाच—एक बार रामचन्द्रजीका दर्शन करने तथा चैत्र रामनवमीको स्नान करनेके लिए अपने शिष्योंके साथ व्यासजी अयोध्यामें आये। उनके साथ बहुतसे मुनि भी थे ॥ १ ॥ मुनिका आगमन सुनकर राम स्वयं अगवानी करनेके लिए गये। उनके पास पहुँचकर रामचन्द्रजीने बड़ी भक्तिके साथ प्रणाम किया और अपने भवनमें ले गये ॥२॥ उन्होंने व्यासजीको एक उत्तम आसनपर बिठाया। इसके पश्चात् अन्य ऋषियों एवं शिष्योंको भी सुन्दर आसनपर बैठाकर और विधिपूर्वक कामधेनु तथा रत्नों द्वारा उत्पन्न वस्तुओंसे उन मुनियोंकी अलग अलग पूजा की और सब मुनियोंके साथ व्यासजीको रामने भोजन कराया । ३ ॥ ४ ॥ बादमें ताम्बूल और दक्षिणा दी। तब रामने हाथ जोड़कर भगवान् व्याससे कुशल-मङ्गल पूछा ॥ ५ ॥ सीताजी उस समय व्यासजीका पवन झाल रही थीं। इसके बाद व्यासजीने रामको अपना कुशल-मङ्गल सुनाया और बहुत लगे—हे महाबाहो राम ! आप जैसा राज्य इस धराधामपर कर रहे हैं, वैसा किसी राजाने नहीं किया और भविष्यमें भी कोई नहीं करेगा ॥ ६-८ ॥ इसके अतिरिक्त आप जैसे महिपालका एक पत्नीव्रत पालन करना देखकर मेरे हृदय तो बड़ा आश्चर्य होता है ॥ ९ ॥ इस जगत्में ऐसा कौन राजा है, जो तरुनाईमें कामरूपी दावानलको सहनेमें समर्थ हो । ऐसे ऊंचे पदपर रहकर कंदर्पके समररूपमे एकपत्नीव्रतधारी केवल आप ही हैं ॥ १० ॥ इस प्रकार व्यासजीकी बात सुनकर रामने कहा हे मुनिसत्तम ! मैंने अपने लिए तीन नियम बना लिये हैं। एक यह कि—॥ ११ । एक बार मेरे मुखसे जो बात निकल जाय वह ध्रुव होती है। प्राणसङ्कट आनेपर भी बात नहीं बदलती। दूसरी बात यह कि—सीताजी छोड़कर संसारकी समस्त स्त्रियां मेरे लिये कौसल्याके समान माता हैं, दूसरी स्त्रीको मैं अपने मनमें भी नहीं चाहता । १२ ॥ १३ ॥ तीसरी बात यह कि—मैं जिसे क्रोध करके मारना चाहता हूँ उसपर केवल एक बाण छोड़ता हूँ। उसी से उसे मार डालता हूँ, दूसरा बाण नहीं उठाता ॥ १४ । हे मुनिराज ! ऐसा मैंने नियम बना रक्खा है। आपके आशीर्वादसे मेरे ये नियम अविरत भावसे चल रहे हैं। तब व्यासने कहा—हे राजन् ! जैसी आपकी इच्छा है, वैसा ही होगा। और सुनिये, जो आप इस जन्ममें एकपत्नीव्रतका पालन कर रहे हैं इसके फलसे दूसरे जन्ममें आप बहुत-सी स्त्रियाँ पायेंगे ॥ १५-१७॥ इस पर व्यासजीकी बात सुनकर रामने कहा—हे महामुने !