श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)
Srimad Ananda Ramayana Hindi
महर्षि वाल्मीकि / अज्ञात द्वारा
स्रोत: Srimad Ananda Ramayana Complete 9 Kandas with Hindi Translation (उद्गम)
पृष्ठ 303, कुल 811 में से
संदर्भ में पढ़ेंसर्गः ८ ] विलासकाण्डम् २८७
त्वां विसृज्य चिरादद्य ज्ञातुं ते चरितं मया। मृषा त्वया प्रतिज्ञातं पुरा व्यासमुनेः पुरः ॥६२॥
एकपत्नीव्रतं मेऽस्ति कौसल्यापदवी सम। अन्याः स्त्रीति मृषा वाक्यं कत्थसे त्वं पुनः पुनः ॥६३॥
क्व गतं तद्वचस्तेऽद्य क्व गतं तद्व्रतं तव। अद्यैव जीवितं स्वीयं त्यजामि सरयूजले ॥६४॥
वेश्यायाः पृष्ठसंलग्नां शय्यां नाथ स्पृशाम्यहम्।
वैश्यासक्त स्वामिन न्यां दृष्ट्वा द्वेषो भवेन्मयि ॥६५॥
मृषायां मयि रुष्टश्च वेश्यासक्तस्य ते मदेन। वेश्यासक्तपवित्रस्य चिरं राज्यं न तिष्ठति। ६६॥
इत्युक्त्वा राघवं नत्वा देहत्यागसमुद्यता। ययौ वेगेन सरयूं वस्त्रगेहाद्विनिर्गता। ६७॥
गच्छन्तीं राघवो दृष्ट्वा मुक्तकच्छः प्रदुद्रुवे। संभ्रमाज्जानकीं धृत्वा भुजाभ्यां सैकतेऽस्थले ॥६८॥
अब्रवीन्मधुरं वाक्यं मा रुष त्वं विदेहजे। शृणुष्व वचनं मे त्वं दिव्यं ते प्रददाम्यहम् ॥६९॥
मयि ते शपथंश्च अन्यथो न भविष्यति। दुष्टं यत्पुनैरपि च तद्दिव्यं प्रददाम्यहम् ॥७०।
वद शीघ्रं जनकजे मा क्रोधं भज भामिनि। इति रामवचः श्रुत्वा जानकी प्राह राघवम् ॥७१॥
जानक्यवाच
राम ब्रूयामहे किं ते येन दिव्यं ददामि ते। अनलस्त्वन्मुखोद्भूतो नयने शशिभास्करौ ७२॥
वामस्ते जलधौ राम पृथ्वीयं विभृता त्वया। शेषस्त्वदल्पसंशाय लक्ष्मणस्त्वद्वपुषो बहिः। ७३।
शास्त्राणि त्वन्मुखाज्जातानि सर्वाण्यत्र न संशयः यद्यत्पश्यामि तन्मयं तव रूपं न संशयः। ७४॥
न दुघंटं ते दिव्यार्थं किंचित्पश्यामि राघव। किं ब्रूयामश्चुना नेद्य येन मे प्रत्ययो भवेत् ॥७५॥
एकमेवास्ति जानेऽहं अनुकुरुष्व पृच्छनम्। इदानीमेव स्वगुरुं समाहूय रघूद्वह ॥७६॥
क्यों नहीं जगाया ? ॥ ६० । आज तुम्हारा एकपत्नीव्रत समाप्त हो गया । त्रिजटा आयी, उसके साथ तुम रस भोग कर लिया और जब वह चली गयी, तब मुझे जगाया ॥ ६१ । बहुत दिनों बाद आज तुम्हारी यह चाल खुला है। उस दिन व्यासमुनिके सामने जो एकपत्नीव्रत धारण करनेकी कसम खायी थी, सो सब दगा था ॥ ६२ ॥ 'कहो न !' राघवने प्रणामपूर्वक कहा—"वास्तवमें मैं एक पत्नीव्रतधारी हूँ। तुम्हारे सिवाय संसारकी समस्त स्त्रियां मेरे लिए कौशल्याके समान है। तुम व्यर्थ मेरे ऊपर रुष्ट हो रही हो'। ६३ । तब सीता और भी तमतमाकर कहने लगी कि तुम्हारी वह प्रतिज्ञावाली बात कहाँ गयी ? वह व्रत कहाँ गया ? आज ही मैं सरयूँके जलमें डूबकर अपना जीवन समाप्त कर दूँगी ॥ ६४॥ मैं ऐसी शय्यापर अब नहीं सोना चाहती, जिसपर कि एक वेश्याको पीठ लग चुकी है। तुम्हारे जैसे वेश्यासक्त राजाकी जो दशा होनी होगी, सो होगी लेकिन यह समझ रखियेगा कि वेश्यासक्त राजाका राज्य ज्यादा दिन नहीं ठहरता ॥६५- ६६॥ इतना कहकर सीताने रामको प्रणाम किया और अपना देह त्याग करनेके लिए पटगृहसे बाहर होकर सरयूके तीरकी ओर चली ॥ ६७ । सीताको जाती देखकर राम भी पीछे-पीछे दौड़ पड़े और जलके पास पहुँचनेसे पहले ही उन्हें रेतामें पकड़ लिया । ६८ ॥ फिर वे मीठी-मीठी बातें कहने लगे—हे विदेहजे ! मेरे ऊपर इतना नाराज मत होओ। मेरी बात सुनो—यदि मेरी बातपर विश्वास न हो तो मैं शपथ खानेको भी तैयार हूँ ॥ ६९- ७० ॥ हे सीते ! बोलो, क्या कहती हो ? हे भामिनि ! इस तरह क्यों क्रोध करती हो ? इस प्रकार रामकी बात सुनकर सीताने कहा—मैं तुम्हें कुछ कहती ही नहीं। फिर तुम कसम किसलिए खानेको तैयार हो ? क्यों दिव्य परीक्षा कराना चाहते हो ? फिर यदि मैं दिव्य परीक्षा लेनाभी चाहूँ, तो कैसे दूँ। अग्नि तुम्हारे मुखसे निकला है, सूर्य-चन्द्रमा तुम्हारे दोनों नेत्र हैं, समुद्र तुम्हारा निवासस्थान है, पृथ्वीको तुमने अपने ऊपर रख छोड़ा है, शेष तुम्हारी शय्या है, सो वे भी लक्ष्मणके रूपमें बाहर बैठे हुए हैं । ७१-७३ ॥ इसमें कोई सन्देह नहीं है कि समस्त शास्त्र तुम्हारे मुखसे जायमान हुए हैं, मैं जिधर देखती हूँ, जो कुछ भी देखती हूँ, सब तुम्हारा ही रूप है ॥ ७४ । मैं कोई भी दुघट दिव्य (कसम) नहीं देखती,