श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)
Srimad Ananda Ramayana Hindi
महर्षि वाल्मीकि / अज्ञात द्वारा
स्रोत: Srimad Ananda Ramayana Complete 9 Kandas with Hindi Translation (उद्गम)
पृष्ठ 307, कुल 811 में से
संदर्भ में पढ़ेंसर्गः ९ ] विलासकाण्डम् २९१
इति सीतायचोभिः सा लोपामुद्रा जिता तदा । तूष्णीमाप क्षणं नत्रीमध्यायां लज्जिताऽभवत् । २७। ततो विहस्य वैदेही लोपामुद्रां प्रपूजयत् । मुनिपत्नीश्च संपूज्य प्रार्थयामास ता मुहुः ॥२८॥ मयाऽपराधितं वैऽद्य तत्क्षमस्व पतिव्रते । स्नेहात्प्रणयजोत्थोक्तं न्वद्वशे गम्यतेऽहान् । २९ मद्भर्तुश्शिशुता राधे पौरुषं वेति वेद्म्यहम् । इति संप्रार्थ्य ताः सर्वा मुनिपत्नीर्विसर्जयन। ३०॥ पूजिता नृपपत्नीभिर्ययौ सीता गृहंमथ् । ततो रामोऽपि पृथिवी. पूजितो जनक विमिः ।३१॥ ययौ स नगरीं तुष्टः सीतया गरुडे स्थितः । ये ये समागतास्तत्र कुरुक्षेत्रे रविग्रहे ।३२॥ ते सर्वे स्वस्थलं जग्मु रामदर्शनहर्षिताः । रामोऽपि नगरीमध्ये पुरस्त्रीभिर्मुहुः पथि । ३३॥ नीराजितः कुंकुमार्घ्यैर्ययौ निजगृहं मुदा । रेमे जनकनन्दिन्या चिरकालं यथासुखम् ।३४ । एवं रामेण साकेतनृपतिर्मन्दिरुन्मया । नानाक्रोडाकौतुकानि कृतवत्यनिशं०ान्यपि ॥ ३५ । यथा कृतं राघवेण मुदं क्रीडा च सीतया । तथैवोर्मिलया रेमे लक्ष्मणेऽपि यथासुखम् । ३६॥ मांडव्या भरतश्चापि रेमे रामो यथा स्त्रिया । तथैव श्रुतकीर्त्याऽपि शत्रुघ्नः कोडनेऽबधात् ।।३७। एवं ते स्त्रीपपत्नीभिः पौराः क्रू डाः प्रचक्रेिरे । तथैव विविधैर्भोपास्त्रानादेशनिवासिनः । ३८॥ रेमिरे तेऽपि पत्नीभिः स्तीयामर्मुदिताः सुखम् । सीतया राघवो रेमे यथा गौर्या स शङ्करः । ३९॥ रामे शासतिराज्येऽत्र न कोऽपि जगतीतले । परदाररतो वेश्यागामी मादकद्रव्यानुक्रू ॥४०॥ न दरिद्री नैव रोगी चिन्ताग्रस्तो न विह्वलः । न पापिन्मण्डो नाशीन गौरो नापि हिंसकः ।४१।। एवं शिष्य मया प्रोक्त विलासचरितं वरम् सीतया रामचन्द्रस्य साकेने मौख्यदं नृणाम् ॥४२। विलासकाण्डमेतद्धि यः पठिष्यति मानवः प्रातः काले च सन्ध्यक्षे निशायां रामसन्निधौ ॥४३।
बधयाया था। जिस बालक ने तवणका विसाव किया था और न जान कई बार मारा, सो उन्होंने कह दिखाया ॥ २७ । अब सब कोई परस्पर कहते हैं कि जिन रामने मनुष्य शिर काटेंगेग दिया था वे ही यवणान्तक पुत्र राम हैं ॥ २६ ॥ इस प्रकार माताकी बातोमे लोपामुद्रा पराजय हो गयी, थोडा देरके लिए इसपर सभाके नृपबाल बैठी हुई व कुछ लज्जित-सा हो गयीं ॥ २७।। फिर हंसकर व बाल लोपामुद्रा तथा अन्य-अन्य मुनिपत्नियोकी पूजा की ओर बारम्बार प्रार्थना करक कहा- ॥ २८ । मने जो वचन कहा है, उसे आप क्षमा करें। आपके स्नेह तथा प्रेमके आश्रय जानकर मैंने इस प्रकार रामके पौरुषका वर्णन किया है ॥ २९ ॥ हमारे पतिदेव रामके श्रीकुक पराक्रम है, यह सब आपके स्वामी अगस्त्यजीके ही माल ओफिस है। इस प्रकार विनती करक सीताने उन मुनिपत्नियोकी विदा किया ॥ ३० ॥ तदनन्तर र जगनिवा द्वारा पूजित होकर सीता राथक पास चली गयीं । राम जी उन दश-देशान्तरस अ य हुए राजाअ स विनत हो हावा-पादोका उपहार लकार पूजित हुए और प्रसन्नतापूर्वक सीताके साथ गरुडपर सवार होकर अयोध्याका चल पड़े ॥३१॥ ३२ । सूर्यग्रहणके समय कुरुक्षेत्रम जो लोग स्नान करन आयथ व रामके दशनस हर्षित हो-होकर अपने-अपन घरको आपस गये । राम भी अयोध्यामे पहुंचकर नागरिक स्त्रियोके द्वारा नीराजित हुए अपन महलोम गए। इसके बाद फिर बहुत कालपर्यन्त रामचन्द्रजी सीताक साथ विहार करते रहे ॥ ३३ ॥ ३४ ॥ इस तरह रामने सोताक साव अयोध्यामे विचित्र प्रकारक क्रोडा-कौतुक किये ॥ ३५ ॥ जिस तरह राम सीताके साथ आनन्द करत थ, ठीक उसी तरह लक्ष्मण ऊर्मिलाके साथ सुखपूर्वक विलास करते थे ॥ ३६ ॥ उस तरह भरत माडवीके साथ तथा शत्रुघ्न श्रुतकीतिके साथ क्रीडा करते थे ॥ ३७॥ पुरवासी-गण नाना विविध प्रकार और देशके नवासी भी अपनी-आपनी स्त्रियाके साथ प्रसन्नतापूर्वक भोग-विलास करते थे । राम तो सीताके साथ उसी तरह आनन्द करते थे जैसे कैलाशप पर्वतके साथ शंकरजी स्वच्छन्द विहार करते हैं ॥ ३८ ॥ ३९ ॥ रामके शासनकालम कोई भी मनुष्य दूसरंकी स्त्रियोपर आसक्त तथा वेश्यागामी नहीं था । न कोई किसी तरहकी मादक वस्तु ही खाता-पीता था ॥ ४० ॥ रामके राज्यमें कोई दरिद्र, रोगी, चिन्तातुर, विह्वल पापी, मूर्ख चोर अथवा हिंसक नहीं था ॥ ४१ ॥ हे शिष्य ! मैने तुम्हे इस प्रकार रामका सुन्दर दिललसाकाण्ड कह सुनाया। जिसमे राम और सीताका सबके लिए सुखद चरित्र भरा हुआ है ॥४२॥