भारतकोश
श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)

श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)

Srimad Ananda Ramayana Hindi

महर्षि वाल्मीकि / अज्ञात द्वारा

स्रोत: Srimad Ananda Ramayana Complete 9 Kandas with Hindi Translation (उद्गम)

DevanagariHindipublished811 पृष्ठ

पृष्ठ 47, कुल 811 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 47

[सर्गः ३] सारकाण्डम् ३१

अथ राजा दशरथो जनकं विन्यवर्तयत् । तदा दशरथं प्राह जनकः साश्रुलोचनः ॥३२७॥
समालिङ्ग्याथ ताः कन्या विरहाद्गद्गदाक्षरः । एतावत्कालपर्यन्तं सीताद्याः पालिता मया ॥३२८॥
अधुना त्वन्मयाप्यग्रे लाल्याश्च कृतेक्षणैः । इत्युक्त्वा नृपतिं नत्वा मिथिलां जनको ययौ ॥३२९॥
ततो दशरथोऽपि स्नुषासंनयनादिभिः । भूपैः सैन्येन स्वपुरीं ययौ मार्गे शनैः शनैः ॥३३०॥
अथ गच्छति श्रीरामे मैथिलाद्योजनत्रयम् । निमित्तान्यतिघोराणि ददर्श नृपसत्तमः ॥३३१॥
नत्वा वसिष्ठं पप्रच्छ किमिदं मुनिपुङ्गव । निमित्तानीह दृश्यन्ते विषमाणि समन्ततः ॥३३२॥
वानप्रस्थमथो प्राह भयमात्राणि सूच्यते । पुनरेषां प्रभावेऽद्य शीघ्रमेव भविष्यति ॥३३३॥
मृगाः प्रदक्षिणीयान्ति त्वां पश्य शुभसूचकाः । एवं वै वदतस्तस्य ववौ घोरतरोऽनिलः ॥३३४॥
मुष्णंश्चक्षूंषि सर्वेषां पांसुवृष्टिभिरर्हयन् । ततो ददर्श परमं जामदग्न्यं महाप्रभम् ॥३३५॥
नीलमेघनिभं प्रांशुं जटामण्डलखण्डितम् । धनुः शृङ्गरस्तं च साक्षात्कालमिव स्थितम् ॥३३६॥
कार्त्तवीर्यान्तकं रामं दृप्तक्षत्रियमर्द्दनम् । प्राप्तं दशरथस्याग्रे रक्तास्यं रक्तलोचनम् ॥३३७॥
तं दृष्ट्वा भयसंत्रस्तो राजा दशरथस्तदा । पर्णादिपूजां विस्मृत्य त्राहि त्राहीति चाब्रवीत् ॥३३८॥
दण्डवत्प्रणिपत्याह पुत्रप्राणान्प्रयच्छ मे । इति ब्रुवन्तं राजानमनादृत्य रघूत्तमम् ॥३३९॥
उवाच निष्ठुरं वाक्यं क्रोधात्प्रज्वलितेन्द्रियः । त्वं राम इति नाम्नाऽत्र चरसि क्षत्रियाधम ॥३४०॥
द्वन्द्वयुद्धं प्रयच्छाशु यदि त्वं क्षत्रियोऽसि मे । पुराणं जर्जरं चापं भङ्क्त्वा त्वं कत्थसे मुधा ॥३४१॥
इदं तु वैष्णवं चापमारोपयसि चेद्गुणम् । तर्हि युद्धं त्वया सार्द्धं न करोमि नृपात्मज ॥३४२॥
नो चेत्सर्वान्हनिष्यामि क्षत्रियान्तकरस्त्वहम् । इति तद्वचनं श्रुत्वा राघवो वाक्यमब्रवीत् ॥३४३॥


छातीसे लगाया तथा आश्वासन देकर विदा किया ॥ ३२६ ॥ तब राजा दशरथने राजा जनकको लौटनेके लिये कहा । राजा जनक आँखोंमें आँसू भरकर कन्याओंको छातीसे लगाये हुए पुत्रियोंके वियोगसे गद्गदस्वर होकर राजा दशरथसे कहने लगे कि आज तक मैंने सीता आदिका लालन-पालन किया और अब आजसे आप अपनी कृपादृष्टिसे इनका पालन-पोषण करें। ऐसा कह और राजाको नमस्कार करके राजा जनक मिथिलाको लौट गये ॥ ३२७-३२९ ॥ राजा दशरथ भी पुत्रों, स्नुषाओं (बहू), राजाओं तथा सेनाके साथ लेकर धीरे-धीरे अपनी नगरीको चले ॥ ३३० ॥ जब श्रीरघुवीर मिथिला देशसे केवल चार कोस आगे बढ़े। तब राजा दशरथको अतिघोर अशकुन दिखाई दिये ॥ ३३१ । तब वे नमस्कार करके वसिष्ठजीसे कहने लगे—हे मुनिपुंगव ! यह क्या कारण है कि चारो तरफ ये अशकुन दिखाई दे रहे हैं ? ॥ ३३२ । वसिष्ठजीने कहा कि ये भयके मात्र सूचक हैं। परन्तु शीघ्र ही आपका भय निवृत्त हो जायगा ॥ ३३३ ॥ देखिये, शुभसूचक हिरण दाहिनी ओर जा रहे हैं। इतना कहना ही था कि घोरतर वायु बहने लगी ॥ ३३४ ॥ पवनसे सबकी आँख भर गई। दारुण बड़े तेजस्वी, नीले मेघके समान लंबे-तगड़े ऊंची जटाओंके मंडलवाले, कंधेपर धनुष बाण धारण किये, साक्षात् कालके समान लाल मुँह किये हुए कार्त्तवीर्यार्जुनके महाशत्रु तथा उद्धत मदोन्मत्त घमण्डी क्षत्रियोंका नाश करनेवाले परशुरामजी दशरथके आगे खड़े हो गये ॥ ३३५-३३७ । राजा दशरथ उनको देखकर भयसे विह्वल हो सत्कार पूजा भूलकर त्राहि-त्राहि करने लगे ॥ ३३८ ॥ उन्होंने दण्डवत् प्रणाम करके कहा कि आप मेरे पुत्र रामके प्राण बचायें । परन्तु परशुरामजीने क्रोधातुर होकर राजाका अनादर करके रघूत्तम रामसे इस प्रकार निष्ठुर वचन कहा—अरे क्षत्रियाधम राम ! तू मेरे नामके समान इस मण्डलमें प्रसिद्ध हुआ फिरता है ? ॥ ३३९ ॥ ३४० ॥ यदि तू सच्चा क्षत्रिय हो तो मेरे साथ युद्ध कर । पुराना सड़ा हुआ धनुष तोड़कर क्या अपनी बड़ाईकी झूठी डींग हाँक रहा है ? ॥ ३४१ ॥ ओ नृपपुंगवज ! यदि तू इस विष्णुके धनुषपर डोरी चढ़ा दे तो मैं तेरे साथ युद्ध न करूँगा ॥ ३४२ ॥ नहीं तो मैं तुम सबको मार डालूँगा । क्योंकि क्षत्रियोंका नाश करना ही मेरा काम है । परशुरामका यह वचन सुनकर रामने कहा—॥ ३४३ ॥