भारतकोश
श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)

श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)

Srimad Ananda Ramayana Hindi

महर्षि वाल्मीकि / अज्ञात द्वारा

स्रोत: Srimad Ananda Ramayana Complete 9 Kandas with Hindi Translation (उद्गम)

DevanagariHindipublished811 पृष्ठ

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पृष्ठ 483

सर्गः १२] गद्यकाव्यम् (उत्तरार्द्धम्) ४६७


नैवोपदेटुं योग्यः स ममापि जनरुच्युपः। युक्त्या कार्यं साधयामि येन वोऽद्य हितं भवेत् ॥२७॥
इत्याश्वास्य सुरान् सर्वान्विधिर्भूण्डलं ययौ। अयोध्यायाश्च सीमायां दृष्ट्वा वृक्षं सुविस्तृतम् ॥२८॥
स्वयं दिव्येण रूपेणो दृष्ट्वा पामरान् जहाश सः। एतस्मिन्नन्तरे कश्चिल्लक्कड़हारहः पुमान् ॥२९॥
श्रुत्वा पिप्पलहास्यं अनेन दीर्व जहाह सः। ततः स मतवाहश्च ययौ दृष्टं प्रमोः पुरेऽथ ॥३०॥
काष्ठभारक्रियाथै तत्र स्मृत्वा स्मितं हृदि। बणपुत्रस्य सोऽप्युच्चैर्न समर्थो निरोधितुम् ॥३१॥
द्वारपालस्य हास्यं तद्भावदूतोऽथ शुश्रुवे। राजदूतौ जहामोच्चैर्न समर्थो निरोधितुम् ॥३२॥
राजदूतः सभां गत्वा द्वारपालस्य यत् स्मितम्। हृदि स्मृत्वा जहामोच्चैरन्तस्स्थास्ते समासदः ॥३३॥
सभायां बहुगुः सर्वे रुन्द्ध्वा राघवोऽपि गः। उच्चैर्जहास सदसि दर्शितहामने स्थितः ॥३४॥
रामो विचारयामन्त किमर्थं हसितं मया। यस्मिस्रं सदा दण्डं वीगन् जानपदान्द्विजान् ॥३५॥
अहं करोमि सोऽप्यहं सभायां हसितः कथम्। दण्डयिष्यति मा कोऽप्य किंवां पौरा वदन्ति हि ॥३६॥
अस्माकमेव शिक्षाऽस्ति सर्वदा राघवस्य ना। न कथं हसितस्याथ सर्वैर्वा पुरत स्फुटम् ॥३७॥
शिक्षां करिष्यति विभोः कोऽप्य मिति वदंति ते। मानयिष्यति नाऽस्मते सभाणे शिक्षित जनाः ॥३८॥
अमंतव्यं व्रतं योग्यमिति रामस्त्वमन्यत। पुनर्जेहस श्रीगमस्तन्निरोद्धुं न सक्षमः ॥३९॥
ततो रामोऽब्रवीत्पौरान् सभास्थान्स्स्मितान्नभः। किमर्थं हसिता यूष मेम्बो हास्य मनापि हि ॥४०॥
प्रणागतं सभाणध्ये पौराः प्रोचुर्नृपोत्तमम्। दृष्ट्वा स्वदूतहाम्य हि तेनास्माक मनागतम् ॥४१॥
तत् पौरवचनं श्रुत्वा दूतमह रघूत्तमः। त्वया किमर्थं हसितं सोऽब्रवीत्पृष्ठनन्दनम् ॥४२॥


के क्योंकि पुत्रदादि मत्कार्य लुप्त होने जा रहे हैं तो ब्रह्माके पास जाकर यह बात बतायी। ब्रह्माजी कह कि रामचन्द्रजीके आगे हम बोलने कुछ भो शक्ति नहीं है ॥२५॥ २६॥ मैं उन्हें उपदेश नहीं दे सकता। क्योकि वे मेरे ईश हैं। इसलिए मैं किसी युक्ति अपना कार्यसाधन करूंगा कि जिससे आप लोगोंका कल्याण हो ॥२७॥ इस प्रकार उन्हें आश्वासन देकर ब्रह्माजी भूमण्डलकी ओर चल पड़े अयोध्याका सीमायार एक विशाल पिप्पल वृक्षको देखकर वे स्वयं उसके भीतर प्रविष्ट हो गए और उस रास्तेसे जाने-आनेवाले लोगोंको देख-देखकर जोरोंसे हंसने लगे। उसी समय एक लकड़हारा लकडोका बोझ माथेपर रखे हुए वहां आ पहुंचा। उसे यों देखकर पीपलके भीतर बैठे हुए ब्रह्माजी हंसे ॥२८॥२९॥ पीपलका हास्य सुनकर लकड़हारा पुने जोरोंसे हँसा और लकड़ोका बोझ लिए हुए अयोध्या नगरमें जा पहुंचा। गस्तमें उस पीपलकी हँसीवाली बात याद आ गयी और ठहाका मारकर हंस पड़ा। लेकिन क्षण भर बाद उसे रामको आज्ञाका स्मरण हो आया जिससे बेचारा शंकित हो उठा ॥३०॥३१॥ लकड़हारेकी हँसी सुनकर ओरपर-पर खड़ा सिपाही भी अपनी हँसी नहीं रोक सका । ३२॥ सिपाही सभामें गया तो उसे वहीं लकड़हारेकी हँसी याद आ गयी, जिससे वह हंस पड़ा। सिपाहीको हँसते देखा तो सभामें बैठे हुए लोग भी अपनी हंसी नहीं रोक सके और वे भी हंसने लगे ॥ ३३॥ इसपर सभामें लोगोंका हंसते देखकर रामचन्द्रका या हंसन गये । ३४॥ तब रामचन्द्रजी तुरन्त हंसी रोककर सोचने लगे—और लोग हंसे तो हंसे, मैं क्यों हंसा? जब मैं सारे भूमण्डलवासियोंका इस कामसे रोक रहा हूँ और दण्ड देता हूँ। तब मैं क्यो हंसा ? मुझे कौन दण्ड देगा ? और ये पुरवासी क्या कहेंगे ? यही न कि राम दूसरोंको ही शिक्षा देते हैं, प्रजाके वास्ते ही दण्डविधान करते हैं और स्वयं जो मनमें आता है सो कर डालते हैं। सब लोगोंके लिए जो हंसनेकी मनाही कर दी है, किन्तु स्वयं हजारों मनुष्योंके सामने ठठाकर हँसते हैं ॥३५-३७॥ इसका परिणाम यह होगा कि ये भविष्यमें मेरी बात नहीं मानेंगे। यह सब विचारकर रामने यह ठहराया कि मैंने बड़ी भारी भूल की है। लेकिन क्षणभर बाद ही रामको फिर हंसी आ गयी। पूरी चेष्टा करके भी वे हँसनेसे नहीं रुक सके ॥३८॥ तब रामचन्द्रजी सभाके लोगोंसे कहने लगे-आपलोग किस बातपर हंसे ? आप लोगोंको हंसते देख-कर मैं भी हंस गया। सभामें बैठे हुए पुरवासियोंने उत्तर दिया कि आपके सिपाहीको हंसते देखकर हमें