भारतकोश
श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)

श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)

Srimad Ananda Ramayana Hindi

महर्षि वाल्मीकि / अज्ञात द्वारा

स्रोत: Srimad Ananda Ramayana Complete 9 Kandas with Hindi Translation (उद्गम)

DevanagariHindipublished811 पृष्ठ

पृष्ठ 489, कुल 811 में से

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पृष्ठ 489

सर्गः १४ ] राज्यकाण्डम् (उत्तरार्द्धम्) ४७३

अवताराश्च बहवो धृता नो रिपवो हताः। शंखासुरो वेदहर्ता मत्स्यरूपेण दारितः ॥१२८॥ तथाऽस्माकं सुधां दातुं मज्जंतं मंदराचलम् । दृष्ट्वा स कूर्मरूपेण त्वया पृष्ठे धृतो गिरिः ॥१२९॥ मत्पृथ्वीति स्पर्द्धमानं हिरण्याक्षं निहत्य च। त्वया वाराहरूपेण जलात्पृथ्वी समुद्धृता ॥१३०॥ प्रह्लादवचनात्स्तम्भादाविर्भूय त्वया पुरा। नरसिंहस्वरूपेण हिरण्यकशिपुर्हतः ॥१३१॥ हृत्वा राज्यं हृतं दृष्ट्वा पुरा तु मघवतस्त्वया। बलिर्वामनरूपेण पाताले विनिवेशितः ॥१३२॥ नृपैरधर्मनिरतैरदृष्टा ध्यार्त्ता सुभृं पुरा। त्वयैकविंशद्वारं हि जामदग्न्यस्वरूपिणा ॥१३३॥ पितृवैरं पुरस्कृत्य निःक्षत्रो पृथिवी कृता। दशास्यकुम्भकर्णौ तौ रामरूपेण राक्षसौ ॥१३४॥ पत्नीवैरं पुरस्कृत्य त्वया दृष्टौ हताविह। उद्धारितौ तौ स्वगणौ द्विवारं देवशापतः ॥१३५॥ एकवारं पुनस्त्वग्रे त्वं तावेवोद्धरिष्यसि । तच्छ्रुत्वावचनं श्रुत्वा वसिष्ठो मुनिसत्तमः ॥१३६॥ सर्वं जानन्नपि ज्ञानान्मां प्रप्रच्छ तं विधिम् ॥१३७॥

इति श्रीमत्परमहंसपरिव्राजकाचार्य श्रीमदानन्दरामायणे वाल्मीकीये राज्यकाण्डे उत्तरार्धे रामहस्त्यप्रतिरोघो नाम त्रयोदशः सर्गः ॥ १३ ॥


चतुर्दशः सर्गः

( शंखचूड़िकी जन्मगाथा तथा बहुतेरे मंत्रोंका निरूपण )

श्रीरामदास उवाच

कौ गणौ देवशप्तौ तौ कथमद्धारितौ वद। पुरा द्विवारं रामेणाग्रे कथं वोद्धरिष्यति ॥१॥ तद्वसिष्ठवचः श्रुत्वा विधिः प्राह विहस्य तम्। सर्वं वेत्सि भवान् लोकान् ज्ञापितुं मां हि पृच्छसि ॥२॥ तदा वदाम्यहं सर्वं गणयोः शापकारणम्। एकदाऽथ महाविष्णुर्वैकुण्ठे रमया रहः ॥३॥ संस्थितश्च तदा द्वारि विष्णुं द्रष्टुं सुचेतसौ। तापसाश्विनीकुमारौ हि समाजग्मतुरुदगतौ ॥४॥

करनेके पश्चात् ब्रह्माने कहा—मैंने जो कुछ अपराध किया है, सो क्षमा करें । हे रघुकुलश्रेष्ठ ! आपका कर्त्तव्य है कि आप हमारी रक्षा करें। पहले भी आपने हमारी रक्षा करनेके लिए पृथ्वीतलपर कितने ही अवतार लेकर हमारे शत्रुओंको मारा है। वेदोंको चुरानेवाले शंखासुरको आपने मत्स्यका रूप धारण करके मारा था ॥१२८-१२९॥ हम सबोंको अमृत पिलानेकी इच्छासे, समुद्रमन्थनके समय जब मन्दराचल डूबा जा रहा था, तब कूर्मरूप धारण करके उसे अपनी पीठपर रखा था। "यह पृथ्वी मेरी है" इस प्रकार कहकर डींग मारनेवाले हिरण्याक्षको मारकर आपने वाराहरूप धारण करके जलमें डूबी हुई पृथ्वीका उद्धार किया ॥ १३० ॥ १३० ॥ प्रह्लादके वचनसे आप खम्भेसे प्रकट हुए और हिरण्यकशिपुका संहार किया। जब दैत्योंते इन्द्रसे राज्य छीन लिया था, तब आपने वामनरूप धारण करके भीख माँगी और बलिको पाताल लोक भेज दिया ॥१३१ १३२॥ जब इस पृथ्वीमण्डलमे पापी राजाओंका अत्याचार देखा तो परशुरामका रूप धारण करके पितृवैरके व्याजसे पृथ्वीको क्षत्रियविहीन कर दिया । रावण और कुम्भकर्णको आपने पत्नीवैरके बहाने यमपुर पहुँचाया। दो बार आपने देवताओंके शापसे अपने गणोंकी रक्षा की है और भविष्यमे फिर एक बार उनका उद्धार करेंगे। ब्रह्माकी बातको सुनकर सब कुछ जानते हुए भी वसिष्ठने ब्रह्माजीसे पूछा—॥ १३३-१३७ ॥ इति श्रीमदानन्दरामायणे वाल्मीकीये पं० रामतेजपाण्डेयविरचित'ज्योत्स्ना' भाषाटीकासमन्वित राज्यकांडे उत्तराद्धे त्रयोदशः सर्गः ॥१३॥

वसिष्ठजी कहने लगे—वे दोनों कौनसे गण थे, जिनको देवताओंका शाप प्राप्त हुआ था और रामने उनका उद्धार किया था और फिर भी उद्धार करेंगे, सो कहिए ॥ १॥ इस प्रकार वसिष्ठकी बातसुनकर ब्रह्माने हँसकर कहा—आप सब कुछ जानते हैं, किन्तु मुझे ज्ञान प्राप्त करानेके लिए मुझसे पूछ रहे हैं तो मैं भी उन गणोंके शापका कारण बतलाता हूँ। एक समय महाविष्णु एकान्तमें

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