श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)
Srimad Ananda Ramayana Hindi
महर्षि वाल्मीकि / अज्ञात द्वारा
स्रोत: Srimad Ananda Ramayana Complete 9 Kandas with Hindi Translation (उद्गम)
पृष्ठ 513, कुल 811 में से
संदर्भ में पढ़ेंसर्गः १७ ] गद्यकाण्डम् ( उत्तरार्द्धम् ) ४९७
ययुर्देवाः सगन्धर्वा मुनयोऽपि समाययुः ॥ ३ ॥
यदा सभायामानीता हेमालङ्कारभूषिता । आरुह्य शिविकायां तु रुक्मवर्णा वरानना ॥ ४ ॥
नवरत्नमयीं मालां बिभ्रती सा स्वयम्बरा । ददर्श नृपनीम्बांश्चपुत्रामश्वविशारदान् ॥ ५ ॥
तद्भ्रचापविनिर्मुक्तेस्तत्कटाक्षपवत्रिभिः । सम्भग्नस्ते नृपाः सर्वे के वयं न विदुस्तदा ॥ ६ ॥
एतस्मिन्नन्तरे तत्रान्वितपायसुतो महान् । चित्रांगदो सभायाश्च तां जहार कुशात्मजाम् ॥ ७ ॥
दृष्ट्वा कार्पान्तगन्धर्व्वान्नानादीग्वेंगसञ्चरः । मोहनास्त्रेण सकलान्वीरान् हन्त्वातिममोहितान् ॥ ८ ॥
रथे निवेश्य तां हेमां हेमाभां वेगवत्तरः । चित्रांगदो बहिर्गत्वा क्रोशमात्रे स्थितोऽभवत् ॥ ९ ॥
किं तृष्णीं चौरवन्नेया मयेयं कुशबालिका । इति निश्चित्य मेधावी तस्थौ चित्रांगदो महान् ॥१०॥
एतस्मिन्नन्तरे पुर्यां हाहाकारो महानभूत् । नीता हेमा योधवरैः पुत्रेणातिबलीयरसा ॥११॥
नृपाः सर्वे महोत्सृष्टुः सभायां खिन्नमानसाः । उपसंहृते तेन मोहनास्त्रेऽतिसम्भ्रमात् ॥ १२।
चित्रांगदेन योद्धुं ते स्वम्हैर्निन्यैर्युतैनृपाः । बहिः साकेतनगरात् क्रोधादारक्तलोचनाः १३।
तूष्णीमेत्रोप्रवाहुः स ददर्श पुत्रकौतुकम् । एतस्मिन्नन्तरे सर्वे तद्रथं पार्थिवोत्तमाः ॥१४।
सर्वेष्ट्य कोटिशः शस्त्रैर्ववर्षुश्चोग्रवाहूजम् । तदा चित्रांगदो वीरो वायव्यास्त्रेण पार्थिवान् ॥१५।
गमने भ्रामयामास वाहनाथैः समन्वितान् । ततो राजाज्ञया सह लक्षाद्या निर्ययुः पुरात् ॥१६।
उत्सवार्थं समायाताः स्वस्वराज्यान् बालकाः । अनुराध्या निजैः सैन्यैः सङ्गताः सङ्गरं ययुः ॥१७॥
तदा बभूव तुमुलं युद्धं सह्नोमहर्षणम् । चित्रांगदं वनंगुस्ते नानास्त्राणि राघवदाः ।१८।
चित्रांगदः स्ववर्णार्थमिश्च्छ। शस्त्राणि तानि हि । निजवाणैर्युपकेतुं चकार विरथं सपात् ॥१९॥
तथा चकार विरथं सुबाहुं पुष्करं तथा । तद्युक्तं चित्रकेतुं च सङ्गदं बलवत्तरः ॥२०॥
आसनेपर बैठे। यह बात राजाओं ही तक नह। थी, बल्कि देवता, गन्धर्व, ऋषि-मुनि, विद्याधर, नाग, किन्नर भी आ-आकर उस उत्सवमें सम्मिलित हुए थे। इन सबके आ जानेपर एक सुवर्णकी पालकीमें बैठो सुमुखी सुन्दरी हेमा हाथमें नवरत्नोंसे बना माला लिय आ पहुंची। सभाके प्राङ्गणम पहुंचकर उसने वहाँपर बैठे हुए समस्त राजाओं तथा राजपुत्रोंको भार प्रकारसे देखा ॥ १-५ ॥ हेमाकन भौंहरूपी धनुषस छूटे हुए कटाक्ष-रूपी बाणोसे घायल होकर सबके सब राज अपन अपक भूल गये। उनको यह भी ज्ञान न रहा कि हम कौन हैं। उसी समय अरिनन्दनके राजा अग्रबाहुका पुत्र चित्राङ्गद कुशकी पुत्रीका हरण करके ले भागा। उसने देखा कि गन्धर्वादि सर्व वृतान्त वर्ताव व्याप्त है। उस उसन एक महनास्त्र छोड़ा। जिससे वहाँ निम्नस्थानमें आये हुए राजे मोहित हो गये। तब वह सुवर्णके समान तेजस्विनी हेमाको रथपर बिठाकर भग ले गया और वहाँसे एक कोसकी दूरीपर जाकर रुका । उसने अपने मनमें सोचा कि चोरोंकी तरह हेमाको लेकर भग जाना ठीक नहीं है। इसलिए वहीं वह ठहर गया ॥६-१०॥ उधर सारी पुरीम यह हाहाकार मच गया कि राजा उग्रबाहुका पुत्र चित्रांगद हेमाका हरण कर के गया ॥ ११ ॥ चित्रांगदक द्वारा मोहनास्त्रका संवरण हो जानेपर सब राजे होशमे आकर उठे और अपनी-अपनी सेना लेकर क्रोधमें लाल-लाल आंखें किये अयोध्यासे बाहर निकले । १२ ॥ १३ ॥ वहींपर हीं बैठा हुआ राजा उग्रबाहु अपने पुत्रका कौतुक देख रहा था। उसी समय सब राज चित्रांगदके पास पहुंचे और उसका रथ बाणों औरमे घेरकर शस्त्रोंकी वर्षा करने लगे। तब चित्रांगदने वायव्य अस्त्र चलाया। जिससे सब राजे अपनी सेना तथा वाहनके साथ आकाशमण्डलमें उड़न लगे। इसके अनन्तर रामकी आज्ञासे सब आदि सतो भट शहरसे निकल पड़े। उनके अतिरिक्त उत्सव-में आये हुए राजकुमार भी अपनी-अपनी सेना लेकर लड़नेको चल दिये। उस समय चित्रांगदके साथ रोंगटे खड़े कर देनेवाला तुमुल युद्ध होने लगा। रघुवंशके वे बालक चित्रांगदपर विविध प्रकारके अस्त्र-शस्त्र चलाने लगे ॥ १४- १७। अपने बाणोंसे प्रहार बचाते हुए चित्रांगदने अपने बाणोंके द्वाराझटवें यूपकेतुका रथ ध्वस्त कर डाला। उस वीर बालकने थोड़ी ही देरमें सुबाहु, पुष्कर, तक्ष, चित्रकेतु तथा आंगदको भी विरथ कर