श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)
Srimad Ananda Ramayana Hindi
महर्षि वाल्मीकि / अज्ञात द्वारा
स्रोत: Srimad Ananda Ramayana Complete 9 Kandas with Hindi Translation (उद्गम)
पृष्ठ 522, कुल 811 में से
संदर्भ में पढ़ें| ६०६ | आनन्दरामायणे | [ सर्गः १८ |
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तत्तेषां वचनं श्रुत्वा फलभागान्विचारितान् । पुरस्तात्स्थापयामास विप्राणां वरमद्गतः ॥ ४१ ॥
उवाच मधुरं वाक्यं राघवः स्मितपूर्वकम् । फलानीमानि भो विप्रा भक्षयध्वं यथासुखम् ॥ ४२ ॥
लेखयित्वा शिलायां हि यदा मुद्रां करोम्यहम् । तदाऽशनादिकं कर्म सर्वमन्यत्करोम्यहम् ॥ ४३ ॥
क्षणं वित्तं क्षणं चित्तं क्षणिकं च स्वजीवितम् । यमोऽतिनिर्दयः सोऽस्ति धर्मं शीघ्रमथाचरेत् ॥ ४४ ॥
शतं विहाय भोक्तव्यं सहस्रं स्नानमाचरेत् । लक्षं त्यक्त्वा तु दातव्यं कोटिं त्यक्त्वा शिवं भजेत् ॥ ४५ ॥
कोटिविघ्नानि गीतायां दशकोटानि जाह्नवीम् । शतकोटानि जायन्ते दाने विघ्नानि भूसुराः ॥ ४६ ॥
अतः कार्या त्वरा दाने सर्वदा तु नरोत्तमैः । निद्रायाः पूर्वकाले तु निद्रायाः परतस्तथा ॥ ४७ ॥
भोजनात्पूर्वकाले तु भोजनात्परतस्तथा । क्षणे क्षणे मतिर्भिन्ना जायतेऽत्र द्विजोत्तमाः ॥ ४८ ॥
तस्मात्कार्या त्वरा दाने मतिर्या प्रथमे क्षणे । कृता क्षणेनापरे माऽभूत्येतदेव मतं मम ॥ ४९ ॥
एतस्मिन्नन्तरे तत्र हनूकर्तः शिला वरा । समानीता गण्डकीजा नवहस्ता समन्ततः ॥ ५० ॥
तस्यान्ते लेखयामासुष्टङ्ककारैः स्फुटाक्षरैः । सूर्यवंशोद्भवोऽनाथ सप्तद्वीपेश्वरेण हि ॥ ५१ ॥
त्रेतायां दाशरथिना रामराज्ञा द्विजोत्तमाः मया ब्रह्मपुरस्यैव राज्यदानं कृतं मुदा ॥ ५२ ॥
यावत्पतति खे भानुर्यावत्पश्यत्र मे कथा । यावन्प्रवर्तते वायुस्तावद्दानं ममास्त्विदम् ॥ ५३ ॥
सम्मान्योऽयं धर्मसेतुर्द्विजानां काले काले पालनीयो भवद्भिः ।
सर्वानेतान् भाविनः पार्थिवेन्द्रान् भूयो भूयो याचते रामचन्द्रः ॥ ५४ ॥
एवं विलेख्य श्रीरामः शिलायां निजमुद्रिकाम् । रामनामांकितां वायुपुत्रेणाऽपर्पयत्तदा ॥ ५५ ॥
आञ्जनेयस्य भारेण छिन्ना जाता तदाङ्किता । राजारामेति तस्यान्ते ददृशुश्च स्फुटाक्षरम् ॥ ५६ ॥
कहा कि आप पहले भोजन कर लीजिये, तब शिलालेख लिखवाइयेगा हे राम ! आप लिखनको इतनी जल्दी क्यों कर रहे हैं ? पात्राम समर्पितों कराया जा चुका है और हम लोग भी भूखे हैं। ३९ ॥ ४० ॥ इनकी बात सुनी तो रामने शोकके बाद विविध प्रकारके फल मंगवाकर उनके सामने रखवा दिये और कहा-हे विप्रगण ! आप लोग सुखसे यह फल खाइए । हम तो शिला लिखवाकर और उनपर अपनी मुहर अंकित कर देनेके बाद ही भोजन करेंगे ॥ ४१ ॥ ४२ ॥ ४३ ॥ धन क्षणस्थायी है, चित्तवृत्ति क्षणिक है, अपना जीवन भी क्षणभंगुर है और यमराज बड़ा निर्दयी है। इसलिये जितने शीघ्र हो सके, धार्मिक काम पूरा कर डाले । ४४ ॥ सौ काम सामने हों तो उन्हें त्यागकर पहिले भोजन करना चाहिए, सहस्र कामोंको त्यागकर पहले स्नान करना चाहिए, लाख कामोंको त्याग करके पहले दान करना चाहिए एवं करोड़ों कर्मोंको छोड़कर पहिले शिवका भजन करना चाहिए ॥ ४५ ॥ हे विप्रो ! गीताका पाठ करते समय एक करोड़, गङ्गास्नानपर दस करोड़ विघ्न और दानकर्ममें सौ करोड़ विघ्न आकर उपस्थित होते हैं ॥ ४६ ॥ इसलिये सज्जनोंको चाहिए कि दानमें सर्वदा शीघ्रता करें । निद्राके पूर्वकालमे, निद्रासे उठनेके बाद, भोजनके पहले और भोजनके बाद क्षण क्षणमें बुद्धि बदला करती है । इसलिए प्रथम क्षणमें जैसी अपनी बुद्धि हो गयी हो उसके अनुसार दानकर्म शीघ्र कर डालना चाहिये । यह मेरा निजी मत है । ४७-४९ ॥ उसी समय हनुमाननि नौ हाथकी लम्बी-चौड़ी गण्डकी नदीकी एक अच्छी-सी शिला लाकर रामके सामने रख दी ॥ ५० ॥ इसके अनन्तर सन्तगाळोने साफ-साफ अक्षरोंमें उस शिलापर सादकर लिखा कि सूर्यवंशमें उत्पन्न और सप्तद्वीपके अधीश्वर महाराज दशरथका पुत्र मैं राजा राम प्रसन्नतापूर्वक ब्रह्मपुरका राज्य दान करके ब्राह्मणोंको दे रहा हूँ ॥ ५१ । ५२ ॥ जब तक कि आकाशमें सूर्य देवता तपत रहे, जब तक संसारमें मेरा नाम रहे और जब तक कि पवन चलता रहे, तब तक मेरा यह दान दान माना जाय ॥ ५३ ॥ मेरे आगे जो राजे होनेवाले हैं, उनसे मैं राम बार-बार यही भीख मांगता हूँ कि 'ब्राह्मणोंके इस धर्मसेतुको आप लोग सदा रक्षा करते रहिएगा' ॥ ५४ ॥ इस प्रकार लिखवाकर रामने हनुमानजीके द्वारा उसपर अपनी रामनामांकित मुहर लगवा दी ॥ ५५ ॥ हनुमानजीके भारसे शिलापर रामकी मुहर खुद गयी और उसमे "राजा राम" यह शब्द साफ-