भारतकोश
श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)

श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)

Srimad Ananda Ramayana Hindi

महर्षि वाल्मीकि / अज्ञात द्वारा

स्रोत: Srimad Ananda Ramayana Complete 9 Kandas with Hindi Translation (उद्गम)

DevanagariHindipublished811 पृष्ठ

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पृष्ठ 530
५१४आनन्दरामायणे[ सर्गः १९

प्रत्युद्गम्य तोयहस्ता तन्प्रतीक्षां चकार सा । रामोऽपि पूर्वलोकान्नमस्कृत्यत्वनुक्रमात् ॥ ६९॥
प्रविशन्मकलानात्रो ददौ ताम्मान्स्वनोपयत् । ततोऽग्रे बन्धुभिर्गेहं पृथाभ्यां संविवेश सः ॥७०॥
ददर्श जानकीं रामः पीतकौशेयधारिणीम् । साऽपि शर्म ययौ सीता लज्जायाऽवनतानना ॥७१॥
वक्रनेत्रकटाक्षैश्च मोहयन्ती रघूत्तमम् । नानालङ्कारसंयुक्ता वन्नूपुरनिःस्वना ॥७२॥
ततो रामो जलं स्पृष्ट्वा धृत्वा सीताकरं मुदा । लक्ष्मणादीन्विमृज्यैवं सीतागेहं विवेश सः ॥७३॥
बहिर्दृष्टं श्रुतं वाऽथ यद्यत्कौतुकमुत्तमम् । तन्मवं जानकीं प्राह तोषयामास तां मुहुः ॥७४॥
ततः सर्वान् समाहूय भोजनार्थं समुद्यतः । स्नानं कृत्वा स मध्याह्नकर्म चक्रे रघूत्तमः ॥७५॥
तर्पयित्वा पितॄंश्चापि नैवेद्यान् शम्भवे ददौ । वैश्वदेवं ततः कृत्वा बलिदानं विधाय सः ॥७६॥
दत्त्वा भूतबलिं चापि पितॄंश्चापि स्वधेति च । बहिस्त्यक्त्वा काकबलिं त्वतिथीन्पूजयन्मादरात् ॥७७॥
यतींश्च ब्राह्मणान्पूज्य हेमपात्रेषु राघवः । परिविष्टेषु जानक्या त्रिपदासु धृतेषु च ॥७८॥
तैः सर्वैर्भोजनं चक्रे स्नुषाभिर्विजितो मुदा । करशुद्धिं ततः कृत्वा भुक्त्वा ताम्बूलमुत्तमम् ॥७९॥
ददौ तेभ्यो दक्षिणाश्च विप्रेभ्यो रघुनायकः । गत्वा शतपदं रामो निद्राशालां ययौ शनैः ॥८०॥
एतस्मिन्नन्तरे सीता भुक्त्वा रामान्तिकं ययौ । वीजयामास राघवं मञ्चकस्थं पुरःस्थिता ॥८१॥
चकार निद्रां श्रीरामो मञ्चके सीतया सह । ता दास्यो वीजयामासुर्दिव्यालङ्कारभूषिताः ॥८२॥
ततः प्रबुद्धा सा सीता प्रबुद्धोऽभूद्रमापतिः । सारिभिः सीतया क्रीडां तथा बुद्धिवलेन हि ॥८३॥
नानाकृत्रिमसैन्यैश्चाकरोदश्चैरपि प्रभुः । ततो द्राक्षाषण्डपाधो जल्यन्त्रादिकौतुकम् ॥८४॥
दृष्ट्वा पक्षिकुलान्सर्वान्पञ्जरस्थान्ददर्श सः । गत्वा सोपानमार्गेण प्रासादाग्रे पुरीं निजाम् ॥८५॥


के कौतुक देखनेके बाद पहिलेकी तरह अपने घरको लौट आते थे । ६६ ॥ ६७ ॥ उस समय गोमुखादि बाजे बजने लगते थे । उन बाजोंको सुनकर घबड़ायी हुई सीता हाथमे जलकी झारी लेकर रामके आनेकी प्रतीक्षा करने लगती थी, राम भी पहली तरह साता चोक शोधकर ॥ ६८ ॥ ६९ ॥ प्रसन्न हुए सब लोगोंको प्रसन्न करते आते थे । फिर भाई तथा गुरुंके साथ आगे बहन हुए उस भवनमे आते थे । ७० ॥ वहाँ पीले रङ्गके रेशमी कपड़े पहने सोमको देखते और सीता भी लज्जाके मारे सिर झुक़ाये अपने तिर्छे नेत्रकटाक्षास रामका मुग्ध करतो हुई सामने जाती थीं । उस समय सीताके अलङ्कारों और नूपुरोंकी अनेक प्रकारकी झनकार सुनायी पड़ती थी ॥ ७१ ॥ ७२ ॥ इसके बाद राम जल लेकर हाथ-पैर धोत, कुल्ला करके और सीताका हाथ अपने हाथसे पकड़कर उठते थे । तब लक्ष्मण आदिको बिदा करके सीताके महलामें जाते थे । ७३ ॥ वहाँपर बाहर जो कुछ कौतुक देख रहेत वह सब एक-एक करके सीताको सुनाने हुए उन्हें प्रसन्न करते थे ॥ ७४ ॥ इसके बाद सब लोगोंको भोजनका बुलावा भेजत और स्वयं स्नान करके मध्याह्नकालीन कर्म करते थे ॥ ७५ ॥ पितरोंका तर्पण करके शिवजीके लिये नैवेद्य अर्पण करते थे । फिर बलिर्वैश्वदेव करत और काकबलि आदि देते थे ॥ ७६ ॥ तदनन्तर भूतबलि देकर पितरोंको 'स्वधा' शब्दका उच्चारण करके तृप्त करते, काकबलि बाहर निकाल देते और उसके बाद आदरपूर्वक अतिथियोंका सत्कार करते थे ॥ ७७ ॥ ब्राह्मणों और यतियोंका पूजन कर लेनेके पश्चात् सामने तिपाईपर रखे हुए सुवर्णके पात्रोंमें जानकीके हाथों परोसे अनेक प्रकारके पकवानोंको सब लोगोंके साथ खाते थे । उस समय सब पुत्रवधुयें उन लोगोंका पंखा झला करती थी । भोजन करनेके पश्चात् हाथ धोते और उत्तम ताम्बूल खाकर ब्राह्मणोंको दक्षिणा देते थे । फिर सौ पग चलकर अपनी निद्राशालामें पहुँच जाते थे । ७८-८० ॥ इसी बीच सीता भी भोजन करके रामके पास पहुँच जाती और वहाँ मञ्चके ऊपर बैठे हुए रामके पास बैठकर पंखा झलने लगती थीं ॥ ८१ ॥ बादमें राम सीताके साथ शय्यापर शयन करते थे, तब दासियाँ उनपर पंखा झलने लगती थीं ॥ ८२ ॥ कुछ देर शयन करनेके बाद सीता उठ जातीं और राम भी जाग जाते थे । तब राम सीताके साथ बुद्धिवलसे कुछ देरतक चौसर आदिके खेल खेलते थे । फिर अङ्गरको झाड़ीके नीचे बने