श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)
Srimad Ananda Ramayana Hindi
महर्षि वाल्मीकि / अज्ञात द्वारा
स्रोत: Srimad Ananda Ramayana Complete 9 Kandas with Hindi Translation (उद्गम)
| ५१४ | आनन्दरामायणे | [ सर्गः १९ |
|---|
प्रत्युद्गम्य तोयहस्ता तन्प्रतीक्षां चकार सा । रामोऽपि पूर्वलोकान्नमस्कृत्यत्वनुक्रमात् ॥ ६९॥
प्रविशन्मकलानात्रो ददौ ताम्मान्स्वनोपयत् । ततोऽग्रे बन्धुभिर्गेहं पृथाभ्यां संविवेश सः ॥७०॥
ददर्श जानकीं रामः पीतकौशेयधारिणीम् । साऽपि शर्म ययौ सीता लज्जायाऽवनतानना ॥७१॥
वक्रनेत्रकटाक्षैश्च मोहयन्ती रघूत्तमम् । नानालङ्कारसंयुक्ता वन्नूपुरनिःस्वना ॥७२॥
ततो रामो जलं स्पृष्ट्वा धृत्वा सीताकरं मुदा । लक्ष्मणादीन्विमृज्यैवं सीतागेहं विवेश सः ॥७३॥
बहिर्दृष्टं श्रुतं वाऽथ यद्यत्कौतुकमुत्तमम् । तन्मवं जानकीं प्राह तोषयामास तां मुहुः ॥७४॥
ततः सर्वान् समाहूय भोजनार्थं समुद्यतः । स्नानं कृत्वा स मध्याह्नकर्म चक्रे रघूत्तमः ॥७५॥
तर्पयित्वा पितॄंश्चापि नैवेद्यान् शम्भवे ददौ । वैश्वदेवं ततः कृत्वा बलिदानं विधाय सः ॥७६॥
दत्त्वा भूतबलिं चापि पितॄंश्चापि स्वधेति च । बहिस्त्यक्त्वा काकबलिं त्वतिथीन्पूजयन्मादरात् ॥७७॥
यतींश्च ब्राह्मणान्पूज्य हेमपात्रेषु राघवः । परिविष्टेषु जानक्या त्रिपदासु धृतेषु च ॥७८॥
तैः सर्वैर्भोजनं चक्रे स्नुषाभिर्विजितो मुदा । करशुद्धिं ततः कृत्वा भुक्त्वा ताम्बूलमुत्तमम् ॥७९॥
ददौ तेभ्यो दक्षिणाश्च विप्रेभ्यो रघुनायकः । गत्वा शतपदं रामो निद्राशालां ययौ शनैः ॥८०॥
एतस्मिन्नन्तरे सीता भुक्त्वा रामान्तिकं ययौ । वीजयामास राघवं मञ्चकस्थं पुरःस्थिता ॥८१॥
चकार निद्रां श्रीरामो मञ्चके सीतया सह । ता दास्यो वीजयामासुर्दिव्यालङ्कारभूषिताः ॥८२॥
ततः प्रबुद्धा सा सीता प्रबुद्धोऽभूद्रमापतिः । सारिभिः सीतया क्रीडां तथा बुद्धिवलेन हि ॥८३॥
नानाकृत्रिमसैन्यैश्चाकरोदश्चैरपि प्रभुः । ततो द्राक्षाषण्डपाधो जल्यन्त्रादिकौतुकम् ॥८४॥
दृष्ट्वा पक्षिकुलान्सर्वान्पञ्जरस्थान्ददर्श सः । गत्वा सोपानमार्गेण प्रासादाग्रे पुरीं निजाम् ॥८५॥
के कौतुक देखनेके बाद पहिलेकी तरह अपने घरको लौट आते थे । ६६ ॥ ६७ ॥ उस समय गोमुखादि बाजे बजने लगते थे । उन बाजोंको सुनकर घबड़ायी हुई सीता हाथमे जलकी झारी लेकर रामके आनेकी प्रतीक्षा करने लगती थी, राम भी पहली तरह साता चोक शोधकर ॥ ६८ ॥ ६९ ॥ प्रसन्न हुए सब लोगोंको प्रसन्न करते आते थे । फिर भाई तथा गुरुंके साथ आगे बहन हुए उस भवनमे आते थे । ७० ॥ वहाँ पीले रङ्गके रेशमी कपड़े पहने सोमको देखते और सीता भी लज्जाके मारे सिर झुक़ाये अपने तिर्छे नेत्रकटाक्षास रामका मुग्ध करतो हुई सामने जाती थीं । उस समय सीताके अलङ्कारों और नूपुरोंकी अनेक प्रकारकी झनकार सुनायी पड़ती थी ॥ ७१ ॥ ७२ ॥ इसके बाद राम जल लेकर हाथ-पैर धोत, कुल्ला करके और सीताका हाथ अपने हाथसे पकड़कर उठते थे । तब लक्ष्मण आदिको बिदा करके सीताके महलामें जाते थे । ७३ ॥ वहाँपर बाहर जो कुछ कौतुक देख रहेत वह सब एक-एक करके सीताको सुनाने हुए उन्हें प्रसन्न करते थे ॥ ७४ ॥ इसके बाद सब लोगोंको भोजनका बुलावा भेजत और स्वयं स्नान करके मध्याह्नकालीन कर्म करते थे ॥ ७५ ॥ पितरोंका तर्पण करके शिवजीके लिये नैवेद्य अर्पण करते थे । फिर बलिर्वैश्वदेव करत और काकबलि आदि देते थे ॥ ७६ ॥ तदनन्तर भूतबलि देकर पितरोंको 'स्वधा' शब्दका उच्चारण करके तृप्त करते, काकबलि बाहर निकाल देते और उसके बाद आदरपूर्वक अतिथियोंका सत्कार करते थे ॥ ७७ ॥ ब्राह्मणों और यतियोंका पूजन कर लेनेके पश्चात् सामने तिपाईपर रखे हुए सुवर्णके पात्रोंमें जानकीके हाथों परोसे अनेक प्रकारके पकवानोंको सब लोगोंके साथ खाते थे । उस समय सब पुत्रवधुयें उन लोगोंका पंखा झला करती थी । भोजन करनेके पश्चात् हाथ धोते और उत्तम ताम्बूल खाकर ब्राह्मणोंको दक्षिणा देते थे । फिर सौ पग चलकर अपनी निद्राशालामें पहुँच जाते थे । ७८-८० ॥ इसी बीच सीता भी भोजन करके रामके पास पहुँच जाती और वहाँ मञ्चके ऊपर बैठे हुए रामके पास बैठकर पंखा झलने लगती थीं ॥ ८१ ॥ बादमें राम सीताके साथ शय्यापर शयन करते थे, तब दासियाँ उनपर पंखा झलने लगती थीं ॥ ८२ ॥ कुछ देर शयन करनेके बाद सीता उठ जातीं और राम भी जाग जाते थे । तब राम सीताके साथ बुद्धिवलसे कुछ देरतक चौसर आदिके खेल खेलते थे । फिर अङ्गरको झाड़ीके नीचे बने
सर्गः १९ ] राज्यकाण्डम् ( उत्तरार्द्धम् ) ५१५
सर्गः १९ ] राज्यकाण्डम् ( उत्तरार्द्धम् ) ५१५
जनागमान्वितां दृष्ट्वा दृष्ट्वेष्यांडिरिङ्गिताम् । शनैर्ययौ प्रभुर्गोष्ठं नानाधेनूर्ददर्श सः ॥८६॥ तां सम्प्रेक्ष्य गृहं मातुः स्वदासीपरिवेष्टिताम् । द्वारान्निर्गत्य ययौ रामस्तत्र ते लक्ष्मणादयः ॥८७॥ चक्रुः प्रणामं श्रीरामे तैः सहैव शनैः शनैः । वाजिशालां ययौ रामो दृष्ट्वा तत्र स वाजिनः ॥८८॥ गजशालामुष्ट्रशालां दृष्ट्वा रामः शनैः शनैः । ददर्श शस्त्रागारांश्च व्याघ्रशालां प्रभुर्ययौ ॥८९॥ दृष्ट्वाऽथ शिविकाशालां माहिषेयीं विलोक्य च । महिषादृष्टवानां च रथशालां ददर्श सः ॥९०॥ आरुह्य स्यन्दने रामः शनैः सर्वैरनिर्ययौ । सप्तकक्षाः समुल्लङ्घ्य तत्रस्थाः पूर्ववज्जनैः ॥९१॥ सर्वैर्युक्तब्रह्मचर्य्यां तां श्रेष्ठां कक्षां ददर्श सः । तत्र यन्त्राणि श्रेष्ठानि शतघ्नीः सङ्कटस्थिताः ॥९२॥ तृणकाष्ठादिमत्तानि दूतस्थानान्यपश्यत । ततो नवमकक्षायां ददर्श रघुनन्दनः ॥९३॥ शस्त्रपाणीन्गजान्स्थांश्च तुङ्गस्थाननेकशः । रक्षयन्ति हि ये सर्वे स्वीयं गेहं त्वहर्निशम् ॥९४॥ एवं स नवरक्षाश्च समुल्लङ्घ्य रघूत्तमः । बहिः समाचनो दृष्ट्वा परिखाः सजला नव ॥९५॥ शनैः पश्यन्नयोध्यां तां राजमार्गं मुदान्वितः । शीघ्रं ययौ पुरद्वारं ददर्श द्वाररक्षकान् ॥९६॥ नवकक्षास्त्वयोध्यायाः समुल्लङ्घ्य शनैः प्रभुः । परिखाश्च नरापश्वनौषयन्त्रादिसंरिताः ॥९७॥ ततो नानावनारामकौतुकानि रघूत्तमः । पश्यन्म बन्धुपुत्रैश्च सरय्वास्तीरमाययौ ॥९८॥ तत्र स्थित्वा सुनीकायां क्रीडां कृत्वा कियत्क्षणम् । नद्यास्तटे सभायां म तन्व्यों सैन्यवृतः प्रभुः ॥९९॥ यत्रापि वारयोषितां पश्यन्कल्याणनि राघवः । कियत्कालमतिक्रम्य ययौ शीघ्रं ततः पुरम् ॥१००॥ ततः शनैः सभां गत्वा पूर्वकिङ्करसंयुतः । लक्ष्मणाद्यैः सेवितश्च तव्यां सिंहासनेोपरि ॥१०१॥ ततः कृत्वा ह्यनेकानि नानाकार्याणि राघवः । आज्ञाप्य बन्धुपुत्रांश्च पूर्ववन्म गृहं ययौ ॥१०२॥
फौवार आदि दखत थे ॥ ८३ ॥ ८४ ॥ फिर पोकराम पान हुए पौलपका दखत थ। सन्चभूत होकर मार्गमे सर्वोच्य प्रासादपर चढ़ जाते और बट्टभि वनों और बगीचास अलंकृत, बावली तथा गंजोसे अतिरंजित अपनी अयोध्यापुरीको देखत थ। फिर बार-वारे गोशालास जात और वहांपर गौओका देख्या करते थे। ८५ ॥ ॥ ८६ ॥ इसके अनन्तर दासियो सम्त सीताका घर नल दन और म्वयं पाहरका आर जाते थे। वही लक्ष्मण आदि भ्राता रामका संविभ्रम प्रणाम करत थ ॥ ८७ ॥ फिर उनका साथ लेकर राम धीरे-धीरे अश्वशालाका जाते । वहाँ पाशेका देखकर ॥ ८८ ॥ गजशाला और उष्ट्रशालाका देखत हुए अस्त्रशाला तथा व्याघ्रशालाका अवलोकन करते थे ॥ ८६ ॥ फिर शिविकाशाला और महिषीशालाम जाकर शिविकाओं तथा भैंसोको देखकर बाद रथशाला दखत थे ॥ ९० ॥ तत्पश्चात् एक रथपर सवार होकर बनै बनै बाहरकी तरफ जाया करते थे । सातवे महलके सातों चौकाका लाघत एव पहनेक तरह उपस्थित सब लोगी दखत हुए आठवें फाटकवाले आँगनम पहुंचते थ। वहाँपर लट्टध्याय काम आनवाल कितन ही यन्त्र तथा बहुत-सी तोपे रक्खी रहती थी ॥ ९१ ॥ ९२ ॥ उण्टे दक्सर दूतके निवासस्थान तथा तृण काष्ठ दिके सग्रहभवनका देखनेके अनन्तर नव आँगनम पहुंचते थे ॥ ९३ ॥ वहीं यह दखत थे कि हाथम शस्त्र लिये पाठ और हाथोपर सवार होकर सिपाही रात-दिन अपने अपने स्थानो की रक्षा कर रहे है ॥ २४ ॥ इस प्रकार नया कक्षाओका लांघकर कोटके चारों ओर जलसे भरी बाहरकी नौ साइरोका देखत थे ॥ ९५ ॥ इसके बाद राजमार्गम चलकर अयोध्याको देखत हुए शीघ्र पुरद्वारपर पहुँचत और वहाँपर रहनेवाले द्वाररक्षकोभी देख-रेख करते थे ॥ ९६ ॥ फिर अयोध्याकी नौ कक्षाओंको लांघकर जल और अग्निस परिपूर्ण नौ परिखाएँ और अनेक बाग-बगीचेके कौतुक देखते हुए अपने भाइयो और पुत्रोके साथ सरयूके तीर पहुंचते थे ॥ ९७। ९८ ॥ वहीं एक अच्छी नौकापर बैठ तथा कुछ देरतक तैर करके सेनके शिबिरमे जाते और सैनिकोके साथ सभा में बैठते थे ॥ ९९ ॥ वहाँ कुछ समय तक वेश्याओक नृत्य देखकर पुरमें लोट आया करते थे ॥ १०० ॥ तदनन्तर सभामे जाते ओर पूर्वमे जो कह भये है, उन सबके साथ लक्ष्मणादि भ्राताओसे संवित होकर सिंहासनपर बैठते थे ॥ १०१ ॥ वहाँ कनक कार्योंको करनेके पश्चात् भइओं और पुत्रोको अपने-अपने घर जाने-
५१६ आनन्दरामायणे [ सर्गः १२
सायंकाले ततः संध्यां कृत्वा हुत्वा यथाविधि । गंधाद्यैरुपचारैश्च शिवं सम्पूज्य भक्तितः ॥१०३॥ कृतोपहारं निर्वेद्य पुत्राभ्यां बन्धुभिः सह । शिविकायां पुनः स्थित्वा देवयानेषु च ॥१०४॥ साकेतस्थेषु श्रीरामोगत्वा नत्वा शिवादिकान् । नानाविधान्देवगणान् फलैः पुष्पैर्ह्यपूजयत् ॥१०५॥ देवालयेषु सर्वेषु सुराणां तेषु राघवः । शृण्वन्नानाकीर्तनानि वारस्त्रीनर्तनान्यपि ॥१०६॥ पश्यन्नानाकौतुकानि परां मुदमवाप सः । वाहना रूढ देवान् मपश्यत्कौतु कानि च ॥१०७॥ ततो ययौ ब्राह्मणेन दृढमार्गेण राघवः । रत्नदीपप्रकाशैश्च विवेश निजमंदिरम् ॥१०८॥ क्षणे नानागथाभिश्च वार्त्ताभिः पुत्रबन्धुभिः । सार्द्धयामां निशां नीत्वा रतिगेहे विवेश सः ॥१०९॥ एतस्मिन्नन्तरे तत्र सीताऽग्रे रतिमन्दिरे । पुष्पशय्यादि सम्पाद्य तन्प्रतीक्षां चकार सा ॥११०॥ तावदायांतमालोक्य सहसोत्थाय जानकी । धृत्वा हस्ते रामचंद्रं रतिशालां निनाय सा ॥१११॥ सर्वा विसर्ज्य दासीश्च मुक्ताजालान्यनेकशः । समततो विमुच्याथ तस्थौ रामः स मंचके । ११२॥ ततस्तां मैथिलीं धृत्वा मंचके संन्यवेशयत् । नाना क्रीडां विधायाथ तस्थौ रामः स मंचके ॥११३॥ ततस्तुष्टं रमानाधं जानकी लज्जिताऽब्रवीत् । राम राजोदवत्राक्ष किंचिन्पृच्छामि मे वद ॥११४॥ कुशजन्मानन्तरं हि कथं गर्भो मयान वै । धार्यते कारणं स्वस्य किमस्ति तद्वदस्व माम् ॥११५॥ तत्सीतावचनं श्रुत्वा सस्मित प्राह राघवः । हे सीते कञ्जनयने सम्यक् पृष्टं त्वया मम । ११६॥ तत्सर्वं ते वदाम्यद्य तच्छृणुष्व सुमध्यमे । किमर्थं च बहून् पुत्रांस्त्वमत्र वाञ्छसि प्रिये ।॥११७॥ सदृशे बहवः पुत्रा न योग्यास्त्वत्र वै भुवि । कुर्दकस्य दुराचारात्कुलस्य लांछनं भवत् ॥११८॥ अतएव ममेच्छा न बहुपुत्रेषु मैथिलि । मदिच्छया त्वया गर्भो धार्यते न कदाचन ॥११९॥ पुत्रस्त्वेकः प्रतीक्ष्यो हि यः कुल भूपयेद्गुणैः । किं भ्रात्रा बहवः पुत्रा दुष्टास्ते कुमयो यथा । १२० ।
की आज्ञा देकर स्वयं भी अपने घर चले जात थे ॥१०२॥ सायंकालके समय विधिवृर्वक सन्ध्या और हवन करके धूप-दीप-गन्धादि उपचारोंस भक्तिपूर्वक शिवजीकी पूजा करते थे । १०३ । फिर भोजन करके पुत्रों तथा बान्धवोंके साथ पालकीमें बैठकर देवताओंके मन्दिर को जाते थे ॥१०४॥ साकेतपुरी (अयोध्या) के सब मन्दिरोंमें जाकर शिवाटिक देवताओंको नमस्कार करके फल-फूलसे पूजन करते थे ॥१०५॥ उन्हीं देवालयोंमें थोड़ी देर तक हरिकीर्तन सुनने तथा गणिकाओंका नृत्य देखने थे ॥१०६॥ इस प्रकार विविध कौतुकोंको देखकर राम बहुत प्रसन्न होते थे। तदनन्तर देवताओंका सवारोक कौतुक देखते थे। १०७॥ इसके बाद सवारीपर बैठकर रत्नके बने दीपकोंके प्रकाशमें चलते हुए राजमार्गेसे अपने घर जाते थे ॥ १०८ फिर पुत्रों तथा भ्राताओंके साथ कुछ देरतक इधर उधरकी बात करते और डेढ़ पहर रात बीतनेक बाद रतिशालामें प्रविष्ट होते थे। १०९। उधर सीता अपना रतिशालामे फूलोंकी शय्या बिछाकर रामके आनेकी प्रतीक्षा करती रहती थीं ॥ ११० ॥ वे शमको आते देखती तो तुरन्त आगे बढ़ती और उनका हाथ पकड़कर रतिशालाके भीतर ले जाती थी ॥ १११ ॥ वहाँ सीताका सेवाम उपस्थित दासियोंको बिदा करके रामचन्द्र कमरेकी सारी खिड़कियां खोलकर शय्यापर बैठते थे ॥ ११२ । इसके बाद सीताका हाथ पकड़कर उन्हें भो बैठाते और विविध क्रीड़ा करके सीताको प्रसन्न करने लग जाते थे । ११३ ॥ इस प्रकार प्रसन्न रामको देख-कर एक दिन सीताने लज्जित भावसे कहा- हे राजोवपत्राक्ष राम ! मैं आपसे यह पूछना चाहती हूँ कि कुशके जन्म लेनेके बाद फिर मेरे गर्भ क्यों नही रहता ? इसका कारण बतलाइये ॥ ११४-११५ ॥ इस प्रकार सीता का प्रश्न सुनकर मुस्कुराते हुए राम कहने लगे-हे कञ्जनयनी सीते ! तुमने बहुत अच्छा प्रश्न किया है। मैं सब कारण बतलाता हूं । ११६ ॥ हे सुमध्यमे ! तुम सावधान होकर सुनो । हे प्रिये ! पहले मुझे यह बतलाओ कि तुम अधिक पुत्र क्या चाहती हो ? ॥ ११७ ॥ इस संसारके अच्छे कुलम अधिक पुत्र होना ठीक नहीं है। बहुतरे पुत्रोंमें यदि एक पुत्र भी दुराचारी निकल गया तो सारे कुलपर लाञ्छन लग जाता है ॥ ११८ । इसलिये हे मैथिलि ! मुझे अधिक पुत्नोंकी इच्छा नहीं है। मेरी इच्छा न रहनेके कारण ही तुम्हें गर्भ नहीं रहता ॥११९॥
सर्गः १९ ] राज्यकाण्डम् ( उत्तरार्द्धम् ) ५१७
दौहित्रार्था कदाचित्तु यथा नेत्रे भुजौ यथा । यथा तौ मणिसूनू च यथाऽहं लक्ष्मणस्तथा ॥१२१॥
तथापि अङ्कौ द्वौ पुत्रौ माऽभूद्भूयोऽपि सन्ततिः । अतः परं पुनः संविन्न जाता दुहितापि वा ॥१२२॥
एकादपि कारणं तत्र कियदिति तदुच्यते मया । तस्यास्तद्वचनं श्रुत्वा जानकीं प्राह राघवः ॥१२३॥
स्वकन्या च मया कस्मै देयाऽत्र जगत्त्रये । मत्समो नृपः कोऽत्र मन्त्रीशाऽर्कनिखण्डनात् ॥१२४॥
यस्य पादौ नृपाः सर्वे शिरसा नम्रतां गताः । को योग्यः सन्न मे जामातुश्चरणेऽमृतात् ॥१२५॥
मद्दानवाणां चरणीं विनाऽहं यस्य वै ददाम् । अतस्त्वं सर्वलोकेऽस्मिन्मातृणाम् परा प्रिये ॥१२६॥
कुशादीनां तु याः कन्याश्चामन्द्रे कन्यकेव नित्यशः । किं यावन्मदङ्गात् प्राप्ताऽसि भुवि ले ॥१२७॥
आश्चर्यं विष्णुमायायास्त्रैलोक्यजननीमिति । पदत्रं दिव्यं काम्यं रूपञ्चेह परात्परम् ॥१२८॥
पौरुषं दृश्यते यच्च तत्त्वं सर्वं समाहितम् । अत्र त्वां पृच्छामि ये च मे पुत्रदुहितारस्त्व ॥१२९॥
यष्टव्या बहवः पुत्रा यद्येकोऽपि गयां व्रजेत् । इति यद्वचनं माने मामन्यं विद्धि नो वरम् ॥१३०॥
एकः स तनयो धन्यः कुलं यस्त्वेषयेन्नृषु । कुलेन्धनाय ते पुत्राः शतशो दुष्टमार्गगाः ॥१३१॥
इति यद्वचनं दीने वसिष्ठे तत्स्मृतं नृपैः । अन्यच्चे कारणं वच्मि यस्मान्न बहवः सुताः ॥१३२॥
मया नैवार्पितास्त्वत्र तच्छृणुष्व शुचिस्मिते । विनोदान्न वदाम्यद्य माऽन्यथा कुरु मद्द्वचः ॥१३३॥
बहुपुत्रैश्च नारीणां तारुण्यं व्याहन्यते न हि । मय्यतो नह तारुण्यच्छेदिनी बहुसन्ततिः ॥१३४॥
न मयाऽत्रापिता भीते शुभं विद्धीति मे प्रिये । यदीच्छाऽस्त्येव बहूनां ने तनयानां विदेहजे ॥१३५॥
तर्हि वै द्वापरे कृष्णरूपेण द्वापरूपिणे । दश पुत्रान् प्रदास्यामि तदा तेषां सुखं भव ॥१३६॥
केवल एक ऐसे पुत्रकी इच्छा करना चाहिए कि जो अपने अनोखे गुणसे कुलको विभूषित कर सके। काठोंकी तरह व्यर्थ जन्म लेनेवाले बहुतसे दुष्ट पुत्रोंसे क्या लाभ ॥१३०॥ बस, ये दोनों चिरञ्जीव रहे। ये मेरे दो नेत्र, दो भुजा, चन्द्र, सूर्य और हमारे तथा लक्ष्मणके सदृश हैं। तुम्हारे दो बेटा तो हो गये हैं, अब और सन्तति न हो यही ठीक है। फिर सात न कहा—अग्रिम हमारा कोई कन्या क्यों नहीं हुई ? ॥१२१॥ १२२। इसका क्या कारण है ? सो हमसे कहिये। सीताका यह प्रश्न सुनकर रामने कहा कि यदि तुम्हारा कन्या होती तो मैं किसको देता ? संसारमें कौन ऐसा है, जो मेरा जामाता बन सके ? हमारे बराबर कौन राजा है, जो सातों द्वीपोंका अधीश्वर है ॥१२३॥ १२४॥ जिसके चरणोंको नृप मस्तक झुकाकर प्रणाम कर सकें। संसारमें कौन ऐसा वर मिल सकता है कि सिवा इसके जिसके पैर से अमृत द्रायता हुआ था। इसी कारण मैंने पुत्रीकी इच्छा नहीं की ॥१२५॥१२६॥ फिर कुश आदिके जो कन्याएँ उत्पन्न हुई हैं, वे क्या तुम्हारी नहीं हैं ? हे सीते ! यौवन के मदसे तुम पागल तो नहीं हो गयीं हो ? ॥१२७॥ आश्चर्यकी बात है कि माता होकर भी ऐसी कटपटाती बात कर रही हो। इस संसारमें जितना स्वास्थ्य दिखता है, वह सब तुम्हारे ही अंगसे प्राप्तमान हुआ है ॥१२८॥ संसारमें जितना भी पुरुषरूप है, वह पर प्रधान उत्पन्न हुआ है। यहाँ जितने पुरुष रूप हैं, वे सब तुम्हारे लड़के और लड़कियाँ हैं ॥१२९॥ शास्त्रमें भी यह बात कही गयी है कि ‘एक ही नहीं, मनुष्यको कई पुत्र उत्पन्न करनेकी इच्छा रखनी चाहिए। सम्भव है कि उनमेंसे कोई ऐसा सपूत निकल आये, जो गयामें श्राद्ध करके कुलका उद्धार करे।’ यह एक साधारण बात है। यह कोई श्रेष्ठ उक्ति नहीं कही जा सकती ॥१३०॥ मेरा रायमें तो अपने कुलका विस्तार करनेवाला केवल एक पुत्र ही। दूषित मार्गपर चलनेवाले काँटेकी तरह उत्पन्न सैकड़ों बेटोंसे कोई लाभ नहीं ॥१३१॥ मैं जिस बातको कह रहा हूँ, बहुवस विद्वानों ने उसे श्रेष्ठ माना है। दूसरा कारण यह बतलाता हूँ कि मैंने तुमसे कई पुत्र क्यों नहीं उत्पन्न किये। हे शुचिस्मिते ! मैं विनोदवश इस बातको कह रहा हूँ। इसे व्यर्थ मत जाने देना, ठीकसे समझना ॥१३२॥ बहुत पुत्रोंके होनेसे स्त्रीका तरुनाई नहीं रह जाती। बहुत सन्तान होनेसे तुम्हारे यौवनका नाश हो जाता ॥१३३॥ १३४॥ यही सोचकर मैंने अधिक सन्तति नहीं उत्पन्न की। यह युक्त स्वरूप जानना। हे विदेहजे ! फिर भी बहुत सन्तान पानेकी ही तुम्हारी इच्छा हो तो द्वापरमें कृष्णरूपसे मैं तुम्हें...
An exact transcription of the page into clean Markdown in Unicode Devanagari:
५१८ आनन्दरामायणे [ सर्गः २०
कन्यामपि तथैकां तेऽहं दास्यामि न संशयः । तदा ते बहुपुत्रैश्च तारुण्यं स्वास्यते न हि ॥ १३७॥ अत स्त्रीणां सहस्राणि षोडशैकशतं पुनः । तथा मुख्याष्टम्यश्च नार्यस्त्वया सह करीम्यहम् ॥१३८॥ तदा बहूनां पुत्राणां स्नुषाणां त्वं सुखं भज । अहं चापि बहुस्त्रीणां तदा सौख्यं भजामि वै ॥१३९॥ इति रामवचः श्रुत्वा तदा सीता स्मितानना । राघव हर्षिता प्राह वाक्चातुर्यं कृतः प्रभो ॥१४०॥ एतल्लक्ष्ण त्वया राम येन रञ्जयसीह माम् । एवं प्रोक्ता मया शिष्य दिनचर्या रमापतेः ॥१४१॥ इति श्रीमत्कोटिरामचरितान्तर्गते श्रीमदानन्दरामायणे वाल्मीकीये राज्यकाण्डे उत्तरार्द्धे रामदिनचर्यावर्णनं नामैकोनविंशः सर्गः ॥ १९ ॥
विंशः सर्गः
( भगवान्के विविध अवतार )
श्रीरामदास उवाच
अथैकदा वसिष्ठं हि प्रभाते क्षत्रवोद्भवः । किञ्चित् प्रष्टुमिच्छामि तत्त्वं वद मुनीश्वर । १ ॥
सर्वं यद्यपि जानामि वाल्मीकेश्च प्रसादतः । तथापि लोकान्सकलान् ज्ञातुं पृच्छामि तेऽद्य हि ॥२।
यदाऽस्माभिर्निद्रायां हि सर्वैर्निद्रा विधीयते । तदा संश्रूयते कर्णे भस्मचक्रस्य वै ध्वनिः ॥ ३ ॥
अमुं मत्संशयं छिन्धि परं कौतूहलं गुरो । लवस्येति वचः श्रुत्वा वसिष्ठस्तमथाब्रवीत् ॥ ४ ॥
बह्व्यश्च ब्रह्महत्याश्च रावणेन कृताः पुरा । येन देहेन सोऽद्यापि लंकायां ज्वलते लव ॥ ५ ॥
रात्रौ रामहस्तेन वधान्मुक्तिं गतः क्षणात् । रामचिंतनपुण्येन वैरबुद्ध्या कृतेन च ॥ ६ ॥
आत्मना सकलं पापं तेन दग्धं पुरैव हि । देहेन न कृतं तस्य देवानां नमनं पुरा ॥ ७ ॥
सम्मार्जनादिकं कर्म देवागारेऽपि नो कृतम् । न कृता तीर्थयात्रा हि तेन देहेन भक्तितः ॥ ८ ॥
दस बेटे दूँगा । उस समय तुम बहुत सन्तानका भी सुख भोग लेना । १३५ ॥ १३६ ॥ उस समय मै तुम्हे एक कन्या भी दूँगा । इसमे कोई संशय नही है । किन्तु इतना अवश्य होगा कि अधिक सन्तान होनेसे तुम्हारा यौवन ढल जायगा । १३७ ॥ इसी कारण मुझे सोलह हजार एक सौ स्त्रियोके साथ विवाह करना पड़ेगा और तुम्हारे साथ आठ मेरो मुख्य स्त्रियो भी होंगी ॥ १३८ ॥ उस समय तुम बहुतसे पुत्रो और बहुओंका सुख भोगीयो और मै भी बहुतसी स्त्रियोका सुख भोग दूँगा ॥ १३९ ॥ इस प्रकार रामकी बात सुनकर स हाते मुसकाकर कहा— हे प्रभो ! तुमने बातचीत करनेका इतना चतुराई कहाँस सीखा ? जिससे इस तरह मेरा मनोरंजन कर रहे हो । इस तरह रामने बहुत देर तक आपसमे बातें की और दोनों एक दूसरेका आलिङ्गन करके आधी रातके समय सो गये । हे शिष्य ! मैने इस प्रकार तुम्हे रामचन्द्रकी दिनचर्या सुनायी । १४० ॥ १४१ ॥ इति श्रीमत्कोटिरामचरितान्तर्गते श्रीमदानन्दरामायणे पण्डितरामतेजशास्त्रिकृत 'ज्योत्स्ना' भाषाटीकासहितं राज्यकाण्डे उत्तरार्धे एकोनविंशः सर्गः ॥१९॥
श्रीरामदास कहने लगे—एक दिन सबेरे लवने वसिष्ठसे कहा कि हे मुनीश्वर ! मै आपसे कुछ पूछना चाहता हूँ उसे आप बताइए । १ । यद्यपि वाल्मीकिजीकी कृपासे मै सब कुछ जानता हूँ । फिर भी संसारी लोगोंको ज्ञान प्राप्त करानेके लिए आज आपसे पूछ रहा हूँ ॥ २ ॥ जब कि रात्रिमें हम लोग सोते हैं, तब कानमें कोंकणीकी तरह किसकी ध्वनि सुनायी देती है ॥ ३ ॥ मेरे इस संशयका निवारण करिए । इसका मुझे बड़ा कौतूहल है । लवकी बात सुनकर वसिष्ठने कहा— ॥ ४ ॥ रावणने जिस देहसे बहुत सी ब्रह्महत्याएं की थीं हे लव ! वह देह आज भी लंकामे जल रही है ॥ ५ ॥ रामके हाथो वध होने, रामका स्मरण करने और उनके साथ वैरबुद्धि रखनेसे रावण क्षण भरमें मुक्त हो गया । आत्माके सारे पापोंको वह पहले ही जला
सर्गः २० ] राज्यकाण्डम् ( उत्तरार्द्धम् ) ५१९
सर्गः २० ] राज्यकाण्डम् ( उत्तरार्द्धम् ) ५१९
न देहेन न निष्कामं तपश्चर्याव्रतं कृतम् । न देहः श्रमितस्तस्य शीतोष्णसहनादिभिः ॥ ९ ॥ एतादृशस्तस्य देहो बहुब्राह्मणहिंसकः । लङ्कायां ज्वलनेऽद्यापि निष्पापां भूयतेऽग्रसः ॥ १० ॥ ज्वालानां भस्त्रवच्छब्दो यः पृष्टो मां त्वया लव । जनशब्दादिने नैव श्रूयतेऽत्र जनैः सदा ॥ ११ ॥ चितायां यस्य चाद्यापि वायुपुत्रेण प्रत्यहम् । काष्ठभारशतं नीत्वा लङ्कायां क्षिप्यते मुहुः ॥ १२ ॥ यदा तस्याघशान्तिः स्यात्तदा भस्मीभविष्यति । अन्यत्ते कारणं वच्मि तच्छृणुष्व द्विजो लव ॥ १३ ॥ देहान्ते रावणेनापि रामाय याचितो वरः । वरेण येन लोकानां स्मरणं मे भविष्यति ॥ १४ ॥ न त्वया मे वरो देयस्तच्छ्रुत्वा राघवोऽब्रवीत् । त्वद्देहज्वलिनी ज्वालाशब्दः सर्वे जना भुवि ॥ १५ ॥ श्रोष्यन्ति सप्तद्वीपेषु तेन ते स्मरणं सदा । भविष्यति हि सर्वेषां ब्रह्मांडान्तनिवासिनाम् ॥ १६ ॥ एवं लब्ध्वा दशास्यः स वरं रामे लयं ययौ । एवं यच्च त्वया पृष्टं तन्मयं कथितं मया ॥ १७ ॥ गुरोरिति वचः श्रुत्वा तं नत्वा स लवोऽपि च । स्वगेहं गतसंदेहः प्रययौ शिविकास्थितः ॥ १८ ॥ एकदा बन्धुभिर्गेहं पुत्राभ्यां सीतया सह । मुनिभिर्गुरुणा रामः संस्थितः प्राह हर्षितः ॥ १९ ॥
श्रीरामचन्द्र उवाच
शृण्वंतु मुनयः सर्वे सर्वे शृण्वंतु बान्धवाः । पुत्रौ सीता मन्त्रिणश्च सखीः शृण्वन्तु मातरः ॥ २० ॥ यथा यथाऽवतारेऽस्मिन् सुखं भुक्तं द्विमान्वयाः । न तथाऽन्येषु सर्वेषु ह्यवतारेषु वै कदा ॥ २१ ॥ अवतारास्तु बहवः शतशोऽथ मया धृताः । नानाकार्याणि वै कर्तुं तेषां संख्या न विद्यते ॥ २२ ॥ सप्तावतारास्तेष्वेव श्रेष्ठाश्चात्र मया धृताः । ईदृशं न सुखं तेषु कदा भुक्तं मया भुवि ॥ २३ ॥ शंखासुरो महादैत्यः पूर्वं जातो महोदधौ । येन वेदा हृताः सर्वे सत्यलोकात् कृते युगे ॥ २४ ॥ तदर्थं मत्स्यरूपेण ह्यवतारो मया धृतः । तं हन्त्वा क्षणमात्रेण विष्णुरूपं मया धृतम् ॥ २५ ॥
चुका था, किन्तु शरीरसे उसने कभी देवताओंको नमस्कार भी नहीं किया ॥ ६ ॥ ॥ ७ ॥ न कभी देवमन्दिरकी सफाई की, न उस शरीरसे तीर्थयात्रा की, न अपने शरीरसे कोई निष्काम तपश्चर्या की और न शीत उष्णको ही सहन करके शरीरसे परिश्रम किया। बहु ब्राह्मणोंकी हत्या करनेवाली उसकी देह आज भी लङ्कामें जल रही है। उसका शब्द प्रत्येक मनुष्यको सुनाई देता है। ज्वालाकी धकधकाहटका निनाद धौंकनीकी तरह सुनाई पड़ता है ॥ ८ ॥ १० ॥ दिनके समय मनुष्योंके कोलाहलमें वह शब्द नहीं सुन पड़ता। वायु की हनुमान्जीको रोज सौ भार लकड़ा उसकी चितामें डालनी पडती है ॥ ११ ॥ १२ ॥ जब उसके पाप नष्ट होंगे, तब कहीं उसका शरीर जलेगा। हे वत्स लव ! मैं एक दूसरा कारण भी बतलाता हूँ सो सुनो। १३ ॥ अपने देहान्तके समय रावणने रामसे यह वरदान माँगा था कि आप मुझे कोई ऐसा वर दीजिए, जिससे संसारके लोग मेरा भी स्मरण किया करें ॥ १४ ॥ रामने कहा कि तुम्हारी देह जलानेवाली आगका धक् धक् शब्द सातों द्वीपोंके हर एक व्यक्तिको सुनाई पड़ता रहेगा। इसीसे सबको तुम्हारी याद आती रहेगी ॥ १५ ॥ १६ ॥ इस प्रकारका वरदान पाकर वह रामके शरीरमें लीन हो गया। इस तरह तुमने हमसे जैसा प्रश्न किया, सो सब कह सुनाया ॥ १७ ॥ गुरुकी बात सुनकर लवका सन्देह निवृत्त हो गया और वे पालकीमें बैठकर अपने घर चले गये ॥ १८ ॥ एक दिन सब भाइयों, पुत्रों सीता तथा गुरुके साथ रामचन्द्रजी बैठे थे। प्रसङ्गवश हर्षित होकर राम कहने लगे -॥ १९ ॥ समस्त ऋषि, मेरे सब भाई, दोनों बेटे, सीता, समस्त मन्त्री और माताएं सब लोग मेरी बात सुनें। २० ॥ मैंने इस अवतारमें सीताके साथ जितना सुख भोगा है, उतना किसी भी अवतारमें नहीं भोगा ॥ २१ ॥ विविध प्रकारके कार्यसाधन करनेके लिए मैंने इतने अवतार लिये, जिनकी कोई संख्या नहीं है ॥ २२ ॥ फिर भी मेरे सात अवतार मुख्य हैं, लेकिन उन सातोंमें भी मैंने इतना आनन्द नहीं पाया ॥ २३ ॥ आजसे बहुत दिनों पहले महोदधिमें एक शंखासुर नामका दैत्य हुआ था जो सत्यलोकसे चारों वेदोंको चुरा ले गया था। उसके लिये मैंने मत्स्यरूप धारण किया और उसे मारकर फिर विष्णुरूपधारी बन गया ॥ २४ ॥ २५ ॥ उस मत्स्य तथा तिर्यक् (वराह) योनिमें कोई विशेष सुख नहीं था।
५७० आनन्दरामायणे [ सर्गः २०
किं सुखं ह्यवतारोऽयं हि तिर्यग्योनावपि मयि । अतश्चास्मिन्नवतारे न स्थितं हि चिरं मया ।२६। ततः समुद्रमथने मज्जन्तं मन्दराचलम् । दृष्ट्वा धृत्वा कूर्मरूपं स्वपृष्ठे पर्वतो धृतः ॥२७॥ तत्रापि गर्हितं रूपं मया ैव विचार्य तत् । किं चाग्निरजस्त्वां हि सुखं तत्र भवेज्जले ॥२८। ततो दृष्ट्वा सागरे हि मज्जन्तीं पृथिवीं मया । क्रोडरूपं महत्कृत्वा दंष्ट्रायामवनिर्धृता ॥२९॥ मम पृथ्वीति मन्यधी हिरण्याक्षो मया हतः किं सुखं पशुयोन्यौ हि गदितायां भवेज्जले ॥३०। अतश्चास्मिंश्चावतारे न लब्धं ह सुखं मया । प्रह्लादवचनात्स्तम्भाच्चाऽनिसिंहस्वरूपधृक् ॥३१। अवतीर्णस्त्वहं भूम्यां हिरण्यकशिपुः क्षणात् मया तदा हतः क्रोधात्तद्वयमतिभास्वरम् ।३२। यद्द्रष्टुन्निकटे कोऽपि प्रह्लादाच्च विनाऽपरः । न मानवः स्थितो भूम्यां तत्र वार्ता सुखस्य का ।३३। तदाऽतिक्रोधरूपेण सिंहयोन्या तु किं सुखम् । मयाऽनुभूतं विपुलं सुखेच्छामुपिमाप न ।३४। ततो बलेर्मोहनार्थं खर्वरूपं तु वामनम् । धृत्वा कृत्वा त्रिपद्याञ्च भूमेः पातालतः कृतः ।३५। तत्र किं मुनिदेहेन वने मौर्य्य भरेन्मम । न यत्रास्ति यथायोग्यं देहमप्यतिसुन्दरम् । ३६ । तत्र का सुखवार्ताऽस्ति भूम्यां मे ब्रह्मचारिणः । अश्वमेधैः सहमा नाकलोकं गतं मया ॥३७॥ पुनर्विप्रोद्भवेनैव जामदग्न्यस्वरूपिणा । एकविंशतिवारं हि निःक्षत्रा पृथिवी कृता ॥३८॥ सहस्रार्जुननामा च महावीरो हतस्तदा । तत्रापि क्रोधसंयुक्तं मुनिरूपं मया धृतम् ॥३९॥ सुखवार्ता मुनीनां हि का तत्र वनचारिणाम् । ज्ञात्वैवं जन्मना तेन तपश्चर्या मया कृता ॥४०॥ किं सुखं तपसस्तत्र वने मे जनमुत्तमम् । एवं षड् वै धृताः पूर्वमवतारा मया भुवि ।४१। न ज्ञाता सुखवार्ताऽपि तत्र क्वापि मुनैःसखाः । द्वपरेऽद्य कृष्णरूपं गोकुलेऽत्र करोम्यहम् । ४२॥
इसलिये उस अवतारमें उस रूपमें मैं ज्यादा दिनोंतक नहीं रहा ॥ २६ ॥ इसके बाद समुद्रमन्थनके समय जब मैने मन्दराचल पर्वतको डूबते देखा, तब कूर्म (कछुआ) का रूप धारण करके उस पर्वतको अपनी पीठपर धारण किया ॥ २७ ॥ उस स्वरूपको भी अच्छा न समझकर मैं अधिक दिनोंतक उस रूपमें नहीं रहा । भला जलचर जाति तथा जलमें रहकर मैं सुखी कैसे हो सकता था ? ॥ २८ ॥ तदनन्तर पृथ्वोको समुद्रम डूबती देखकर मैने क्रोड (शूकर) रूप धारण करके पृथ्वोको अपने दाँतोंपर रखकर उठाया । २९ । इस पृथ्वीपर मेरा राज्य है। अतएव यह पृथ्वी मेरी है। इस प्रकार दुर्बुद्धि मानवाले हिरण्याक्ष नामक असुरका मैंने संहार किया। पशुयोनिमें रहकर भी मुझे कोई विशेष सुख नहीं मिला। इसलिए उस रूपको भी जल्दी ही त्याग दिया, फिर प्रह्लादके वचनानुसार नृसिंहम्प धारण करके खम्भेसे निकलना पड़ा ॥ ३० । ३१ उस समय अवतार लेकर मैंने क्षणमात्रमें हिरण्यकशिपुको समाप्त कर दिया। मेरा वह रूप बड़ा तेजस्वी था ॥ ३२ ॥ उनके डरसे प्रह्लादके सिवाय मेरे पास जानेकी सामर्थ्य किसीमें नहीं थी तो बताओ, ऐसी योनिमें मैं सुखो कैसे रह सकता था । उस समय मेरा वह क्रोधपूर्ण रूप था, दूसरे सिंहकी योनि थी। इस योनिको मैने अनुभव कर लिया। इच्छा थी कि इस रूपमे मैं कुछ आनन्द पाऊँ, लेकिन नहीं पा सका ॥ ३३ । ३४ ॥ तत्पश्चात् बलिको नीचा दिखानेके लिए मैने बहुत ही छोटा वामनका रूप धारण किया और तीन पैरोमें सारी त्रिलोकी नापकर बलिको पाताल लोकमे भेज दिया। ३५ ॥ उस समय भी एक तो मुनिका भेष, दूसरे वनोमे रहना, तीसरे शरीर भी जितना चाहिए उतना सुन्दर नहीं था । ३६ । ब्रह्मचारी बनकर पृथ्वोपर रहकर सुख कहाँ था ? इसी लिए उस रूपको भी शीघ्र त्यागकर मैं स्वर्गलोकको लौट गया ॥ ३७॥ फिर मैंने ब्राह्मणरूपसे परशुरामका अवतार लेकर इक्कीस बार पृथ्वीको क्षत्रियशून्य कर डाला। उसी समय महावीर सहस्रार्जुनका वध किया। उस समय भी एक क्रोधी मुनिका रूप धारण करना पड़ा था ॥ ३८। ३९ ॥ वनमें रहनेवाले मुनियोंको भला कब सुख मिल सकता था। यह समझकर मैंने उस जन्मम भी तपस्या ही की ॥ ४० ॥ उस तपस्वी जीवनमें वनोंमें रहकर मुझे क्या सुख मिला होगा इसका आप लोग भी अनुमान कर सकते हैं। इस तरह मैने छः
सर्गः २० ] राज्यकाण्डम् ( उत्तरार्द्धम् ) ५२१
नेदृशं तत्र भोक्ष्यामि सुखं शृणुत विस्तरात् । कारागृहस्थितिः पित्रोर्जन्मन्दावेव मे भवेत् ॥४३॥
मातृपितृविहीनश्च तदा स्थास्यामि शैशवे । परकीये नन्दगेहे वृद्धिं गच्छामि गोकुले ॥४४॥
गोपवेषस्य किं सौख्यं गोरक्षे भ्रमणं मम । स्त्रीगोनागाश्वपश्यादि बहूँस्तत्र निहन्म्यहम् ॥४५॥
देवपत्नीवरान्कुर्यां वस्त्रौघमयनादिकम् । जनार्यचोरि दुष्कर्म कृत्वाहं गोकुले ततः ॥४६॥
मथुरायां हनिष्यामि सजं कंसमातुलम् । तत्र दास्या रतिं कुर्यां नैष्ठुर्यं गोपिकादिषु ॥४७॥
सङ्कोचा गोपिकाः सर्वा रामो बन्धुर्मोक्ष्यति । अन्यच्च बाल्यवनशयान्मे हि पराश्रयः ॥४८॥
न पराश्रयतो दुःखं किञ्चिदस्ति जगत्त्रये । ततोऽहं स्वस्थलं त्यक्त्वा तटाके सागरस्य च ॥४९।
स्थास्यामि स्वल्पकालं हि चिरकालं न मे स्थितिः । न स्थलं मध्यदेशे हि न राज्यं मे भविष्यति ॥५०।
विना राज्येन किं सौख्यं परभावप्रवर्त्तिनः । छत्रादिराज्यभोगाश्च तस्मिन्न जन्मनि मे न हि ॥५१।
बह्वर्णामेकदेस्तदाङ्गं मे भविष्यति । सदा कामा सुखं देयं दुःखं कासां तदा मया ॥५२।
एवं मदा व्यग्रचित्तस्तासां रंजनकर्मणि । सङ्ग का सुस्वप्नानांऽपि निशया भ्रमणो मम ।५३।
घटिकायां च षट्त्रिंशच्छयनाद्गेहानि हि । पञ्चेटन्पञ्चविंशांग्रैर्गेहानि तदा मम ।५४।
शेषावि गंतु नैवास्ति कालो भानुदयेष्यति । विप्रदट्टीमयी रात्रिश्चत्वेवं मे मा यिष्यति ॥५५॥
बदा मे भ्रमतो रात्री कुतो निद्रा कुत सुखम् । यदा भवेन्निद्रावृद्धिः किंचिद्विठो तदाऽऽनुयाम् ॥५६॥
यस्येच्छाऽत्यन्तदुःखं हि हि मे ऽनेन नरेण हि । कर्त्तव्या बह्वयः पत्न्यो द्रष्टव्यं तत्फलं ततः ॥५७॥
एवं भवेन्न मे सौख्यं द्वापरे कृष्णजन्मनि । भविष्यत्यवतारश्च ममापिविधिणोद्यतः ॥५८॥
अवतार लिये ॥४१॥ लेकिन उन छहोंमें मुझे सुखका नाम भी नहीं मिला। आगे द्वापर युगमें इस पृथ्वीपर गोकुलमें कृष्णरूप में अवतार लूंगा ॥४२॥ लेकिन ऐसा सुख उस अवतारमें भी नहीं पा सकूंगा। सुनिए, उस अवतारका विशेप विस्तारपूर्वक आप लोगोंको बतलाता हूँ। जन्मके पहले ही मेर माता पिता कारागारम रहेंगे ॥४३॥ शैशव समयमें ही माता-पितासे वियुक्त होकर एक अन्य व्यक्ति (नन्द) के घर गोकुलमें रहकर पहूंगा। उस गोपवेषमें गौओंके पीछे-पीछे घूमनेमे मुझे क्या सुख मिलेगा ? फिर गो (वत्सासुर), स्त्री (पूतना), नाग (कालिया), अश्व (केशी) तथा पक्षी (बकासुर) को मारूँगा ॥४४॥४५॥ देवस्त्रियोंके वरदानरू पश्चशोभन आदि (वस्त्र) हरूँगा। फिर गोकुलमें चोरी आदि दुष्कर्म कर लेनेके बाद मथुरा जाकर हाथी कुवलयापीडके साथ मामा कंसको मारूँगा। वहाँ मुझे गोपिकांके साथ निष्ठुरई करके दासी (कुब्जा) के साथ विलास भी करना पड़ेगा ॥४६॥४७॥ जिन गोपियोंको मैंने भोग होगा, भविष्यमें बलभद्रजी उन्हें भोगेंगे। फिर बाल्यवयसके वयमे मुझे परान्त भी होना पड़ेगा ॥४८॥ पराश्रयसे बढ़कर संसारमें और कोई दुःख नहीं हो सकता। फिर समुद्रके किनारे अपना निवासस्थान बनाकर कुछ दिनों तक वहां ही रहूँगा। यह निश्चित है कि उस अवतारम भी मैं अधिक दिनतक संसारमे न रहूँगा। मध्य देशमें निवासस्थान न रहनेके कारण मेरे पास कोई राज्य भी नहीं रहेगा ॥४९॥५०॥ राज्यरहित होकर दूसरेकी आज्ञामें रहनमे भला क्या सुख मिल सकता है ? उस जन्ममे राजाओंको उपभोग्य वस्तुएं छत्र चमर आदि भी मेरे पास नहीं रहेगे ॥५१॥ बहुत सी स्त्रियोंके बीच मेरा अकेला शरीर रहेगा। उस समय रात-दिन यही चिन्ता रहा करेगी कि इनमेंसे किसे सुख दें और किसे दुःख। सदा मुझे उनका अनुहार करना पड़ेगा। भला रातभर एक घरसे दूसरे घरकी दौड़ मारनमें मुझे क्या सुख मिल सकता है ? ॥५२॥५३॥ उस समय एक घड़ीमें पाँच सौ छतीह घरोंका चक्कर लगानेपर भी अट्ठाईस घर छूट जायेंगे और यही सोचना पड़ेगा कि सूर्योदयका समय हो रहा है, अब किसीके यहाँ जानेका समय नहीं है। इस तरह तीस वर्षोंकी रातें बीतेंगी ॥५४॥५५॥ उस समय रातभर घूमनेमें निद्रा तथा सुख क्योंकर मिल सकेगा ? हाँ, जब रात कुछ बड़ी होगी तो चाहे बड़ी आधी घड़ी सोनेके लिये समय मिल जाय ॥५६॥ जिस मनुष्यको संसारमें दुःख भोगनेकी इच्छा हो, वह कई स्त्रियोंको रख ले और फिर देख उसका फल ॥५७॥ भाव यह है कि मुझे उस अवतारमें भी कुछ सुख
| ५२२ | आनन्दरामायणे | [ सर्गः २० |
|---|
ततो दैत्यान्यज्ञकर्मसक्तान्दृष्ट्वा पुनस्त्वहम् । कलावग्रे बुद्धरूपं धरिष्याम्यतिमोहनम् ॥५९॥
निजवाक्यैर्मतिंस्तेषां दैत्यानां यज्ञकर्मतः । परावर्त्य कियत्कालं स्थास्यामि जगतीतले ॥६०॥
तदाऽहं मौनमाश्रित्य मलिनः केशलोञ्चकः । यूकादिजीवधारी च सर्वेषामुपदेशकत् ॥६१॥
अहिंसनंवनं सर्वान् दर्शयिष्याम्यहं जनान् । तज्जन्मन्यतिदुःखं मे केशयूकामलादिना । ६२॥
ततोऽग्रेऽहं धरिष्यामि कल्किरूपं महन्मखेः । अंते दृष्ट्वा जनानां च सर्वत्र वर्णसंकरम् ॥६३॥
भूत्वाऽत्र विप्रदेहेन खङ्गधारी हयस्थितः । संहारं क्षणमात्रेण दुष्टानां हि करोम्यहम् ॥६४॥
सोऽवतारो नातिचिरं मम स्थास्यति भूतले । न तत्र सुखलेशोऽपि मे भविष्यति भूसुराः ॥६५॥
प्रवर्तिष्यति पुनस्ततोऽग्रे तत्र कृतं युगम् । पूर्ववच्च पुनस्तत्र ह्यवतारान्करोम्यहम् ॥६६॥
एवं नवावतारेषु न सुखं हि सुखं मया । अतस्त्वस्मिन्नवतारे सुखं भुक्तं यथेच्छया ॥६७॥
नानेन सदृशः कश्चिदवतारोऽवनीतले । पूर्वं भूतो मयाग्रेऽपि न भविष्यति वै कदा ॥६८॥
सप्तलोकाधिपत्यं च नारी सीता च वर्तते । यत्रेमौ बालको पुत्रौ महारथौ धनुर्धरौ ॥६९॥
यत्र श्वेते बंधवश्च त्रैलोक्यजयिनः शुभाः । कामधेन्वादिरत्नानि सप्त यत्र ममान्तिके । ७०॥
साक्षादयं वेदरूपो वसिष्ठस्त्वस्ति मे गुरुः । आर्यावर्ते पुण्यदेशेऽयोध्यायां वसतिर्मम ॥७१॥
राज्यभोगादिभोगानां मत्ताऽऽह म्त्वत्र नोद्भवः । यत्र सत्यव्रतं मेऽस्ति यत्रैकदपिताव्रतम् ॥७२॥
यत्रैकेनैव बाणेन मया बाल्यादिका हताः । यत्रैकैव हि सीताया मम शय्या न चापरा । ७३॥
यत्राप्रतिहताज्ञा मे त्रैलोक्ये हि मुनीश्वराः । यत्र यानं पुष्पकं तु यत्र दूतोऽञ्जनीसुतः ॥७४॥
सुग्रीवराक्षसेन्द्रां च यत्र मित्रे ममांतिके । कोदण्डमदृशं चापं यत्र मेडारिनिषूदनम् ॥७५॥
सूर्यवंशे यत्र जन्म ततो दशरथो वरः । कौसल्या यत्र जननी यत्राहं स्ववशः सदा ॥७६॥
नहीं मिलेगा । अन्तमें ब्राह्मणके शापसे मेरे उस अवतारकी समाप्ति होगी । ५८ । इसके अनन्तर कलिमें दैत्यों को यज्ञकर्म करते देखकर मैं अतिशय मनोमोहक बौद्ध अवतार लूँगा ॥ ५९ ॥ अपनी बातोंस उन दुष्टोंकी मति यज्ञकी ओरसे फेरकर कुछ दिनों तक मैं संसारमें रहूँगा ॥ ६० । उस समय मैं मौनव्रत धारण करके मैले-कुचैले कपड़े पहने ओर कितने ही जू आदि जीवोंको शरीरमें पाले हुए सारे संसारके लोगोंको उपदेश दूँगा । सबकी अहिंसाव्रतका अभिनय दिलाऊँगा । उस जन्ममें दाढ़ीमें पड़े हुए जूँएं, कपड़ोंके फोलर तथा खटमल आदिके महान् दुःख उठाना पड़ेगा ॥६१॥ ६२॥ फिर कलियुगके अन्तमें सब लोगोंको वर्णसंकर होत देखकर मैं कल्कि अवतार लूँगा ॥ ६३ ॥ उस जन्ममें एक विप्रके यहाँ उत्पन्न हो ओर घोड़ेपर सवार होकर क्षणमात्रमें दुष्टोंका संहार कर डालूँगा ॥ ६४ ॥ हे ब्राह्मणों ! वह अवतार भी चिरस्थायी नहीं होगा । अतएव उसमें भी मे कुछ सुख नहीं भोग सकूँगा ॥ ६५ ॥ उसके बाद फिर सत्ययुग आ जायगा ओर मैं पहलेकी तरह फिर अवतार लेता रहूँगा ॥ ६६ ॥ इस तरह नौ अवतारोंमें कुछ सुख नहीं मिलेगा । किन्तु इस अवतारमें मैने अपने इच्छानुसार सुख भोग लिया है ॥ ६७ ॥ इस अवतारके समान कोई अवतार अवनीतलम न हुआ है, न होगा ॥ ६८ ॥ जिसमे सातों द्वीपोंका प्रभुत्व, सीता जैसी स्त्री, कुश-लव जैसे महारथ र और धनुर्धारी पुत्र, तीनों लोकोंको जीतनेवाले भ्राता और कामधेनु आदि सात रत्न विद्यमान हैं । ६९ । ७० ।। जहाँ वेदके साक्षात् स्वरूप वसिष्ठ जैसे गुरु हैं आर्यावर्त जैसे पवित्र देशमें निवासस्थान है, राज्यभोगादि करनेवाला और कोई नहीं है, जहाँ सत्यका व्रत है, जहाँ अटल एकपत्नीव्रत है ॥ ७१ । ७२ । जहाँ केवल एक वाणसे शत्रुको मारनेकी सामर्थ्य है, जहाँ सीताकी और हमारी एक शय्या है ॥ ७३ ॥ जहाँ मुनिगण बेरोक-टोक जहाँ चाहें वहाँ आ जा सकते हैं जहाँ कि पुष्पकविमान जैसा सवारी है ॥ ७४ ॥ सुग्रीव और विभीषण जैसे मित्र हैं, शत्रुओंका नाश करनेवाला कोदण्ड जैसा धनुष है ॥ ७५ सूर्यवंशमें जन्म हुआ है, दशरथ जैसे पिता और कौसल्या जैसी
सर्गः २० ] गव्यकाण्डम् (उत्तरार्द्धम्) ५२३
सर्गः २० ] गव्यकाण्डम् (उत्तरार्द्धम्) ५२३
सुमेधासदृशी यत्र मे श्वश्रूः स्नेहवर्धिनी। विद्रुहः शमुग यत्र विवादो यत्र गाधिनः ॥७७॥ लक्ष्मणो यत्र मे मन्त्री सरयूश्च मे नदी। पार्षदा छत्रपाद्याश्च चतुरन्तो गजो महान् ॥७८॥ द्विजेच्छानुरूपं यत्र मन्नं मेऽङ्गुष्ठितं सदा। इदं वैकुण्ठसदृशं गृहं यत्राणिमागुणः ॥७९॥ चिन्तामणिलकारो हृदये यत्र वर्तते । एकादश सहस्राणि वर्षाण्यायुश्चिरं मम । ८० । अनशं मे शिरच्छेदं केषामप्यवनीभृताम्। एष मया सुख भुक्तमिह जन्मनि भूयसः ॥८१॥ नाऽल्पा बाष्पपुरिवाऽस्ति सुगेच्छा मम भूतले । जनएवायतारो ऽयं पूर्णकाममया धृतः ॥८२॥ भूतनाम्भावनाय चे तेऽंशादेव मया धृताः । यदन तु बने पूर्वं सीतया बन्धुना यया ॥८३॥ तच्च लोकोपदेशार्थं भूभारहरणाय च । जनोपदेशः कीदृक् म कृतस्तं प्रवदाम्यहम् ॥८४॥ पितुर्वचो मानमीय यद्यप्यनिशश्रमप्रदम् । पुत्रैग्गिपूपदशार्थं मया वाक्यं पितुः कृतम् ॥८५॥ न तदा कि मया कृते पितुर्वाक्य बल मयि । तथापि लोकशिक्षार्थ तद्वाक्यं पालित मया ॥८६॥ न हन्तव्या मया क्रोशाद्दुष्टाकि कैकयी तदा । तथा मा मंथरा चापि मे गञ्जे विघ्नकारिणी ॥८७॥ कि तदा कुंठिता शक्तिः कैकेयीमंथराबधे । स्त्रीहत्या नैव कर्तव्या चेति सर्वान्युशिक्षितम् ॥८८॥ सापत्नमातृवाक्यं तु पालनीयं स्वमातृवत् । स्वसुखार्थं वधोऽन्यस्य न कर्तव्यो जनेरिति ॥८९॥ उपदेष्टुं मया नैव कैकेयीमंथरे हते । न बहुदिंसा कर्तव्या परराज्यं न काङ्क्षयेत् । ९० ॥ अहमूंपदिशंश्चित्यं जनान्द्यधर्तो न म । मृते पितर्यपि ह्यंतं न तद्राज्यं स्वतान्मया ॥९१॥ राज्यासक्ता नरा भूम्यां भोगासक्ता भवन्तुन । उपदेष्टुं जनेभ्यस्त्वहं पूर्वं वनं गतः । ९२ । मातृपितृसुहृत्पुत्रस्नेहाद्कर्मिक न कामयेत् । इत्थ मयोपदिष्टास्त्यक्तः स्नेहस्तदा द्विजाः । ९३ ॥
माता है, जहाँ कि मैं सदा सावधान रहता हूँ ॥७६॥ स्मरण हटाने का रास्ता जहाँ पास है विरह जैसे समुद्र है, विश्वामित्र जैसे विवादाता गुरु हैं । ७७॥ लक्ष्मण जैसे मन्त्री, सरयू जैसी नदी है, अङ्गादि वीर अह्रक्षक हैं, बड़ा भारी चतुरंग्रन्त हाथी है ॥ ७८ ॥ दूसरा इष्ट गुण करना तथा अङ्गुष्ठित व्रत है वैकुण्ठके समान सुन्दर भवन है ॥ ७९ ॥ चिन्तामणि ज्ञेय अनुसार सदा हृदयपर रहता है, ग्यारह हजार वर्षोंकी लम्बा आयु है ॥ ८० । किसी भी राजाके सामने झुकना यह मस्तक है। यहाँ जो सुख है, सो क्या अन्यत्र मिल सकता है ? हे विप्रा ! इस संसारमें मैंने जिन सुखोंका भोग किया है, सो बतला दिया ॥ ८१ ॥ अब मेरे हृदयमें किसी प्रकारका भी सुखभोग करने की वासना शेष नहीं रह गयी है। इसीलिये मैंने पूर्णरूपसे इस अवतारको धारण किया था, भूत मात्रोंके लिये अनन्त रोग जो अंश बाकी रह गये थे, उनके समत यह अवतार लिया है। जो बाल्यावस्थामें तथा भरतके साथ वनकी यात्रा की थी वह दुःख भोगनेके लिए नहीं। बल्कि दुनियाँके लोगोंको उपदेश देनेके लिए की थी। उसमें मैंने संसारके लोगोंको कौन-सा उपदेश दिया है, सो भी बतला रहा हूँ । ८२-८४ । चाहे बाक्यशय परिश्रमसाध्य हो, फिर भी पिताकी बात माननी चाहिये। यह उपदेश देनेके लिए मैंने उस समय पिताकी आज्ञाका पालन किया था ॥८५॥ क्या पिताकी बात टालनेकी सामर्थ्य मुझमे नहीं था ? था, पर लोकशिक्ष के लिये उनकी बात मान ली थी ॥८६॥ क्या उस समय दुष्टा कैकेयी तथा राज्यातिलवमे विघ्न डालने वाली पापिनी मन्थराके वध करने-का पराक्रम मुझमे नहीं था ? था, पर उनको दण्ड न देकर मैंने संसारको यह शिक्षा दी कि स्त्रीका वध कभी भी न करना चाहिए और अपनी सौतली माँको बाक,का भी उसी तरह पालन करना चाहिए, जैसे लोग अपनी सगी माताका करते हैं। दूसरे मुझे लोगोंको यह भी उपदेश देना था कि अपने सुखके लिए परायेका वध न करना चाहिए। इससे कैकेयी और मन्थराको नही मारा ॥ ८७-८९॥ अपने भाईकी हिंसान करे जोर दूसरेका राज्य न हड़पना चाहे। यह उपदेश देनहूं.क लिये मैंने परारार माँक नहीं उठारो, उन्हें नहीं मारना चाहा। पिताके स्वर्गवासी हो जानेपर भी मैंने उस राज्यको नहीं स्वीकार किया । ९० । ९१ ॥ राज्यमें आसक्त लोग सर्वथा विलासी न हो जायें, यह उपदेश देनेके लिए ही मैं वनको गया था । ९२ ॥ माता, पिता, मित्र,
35
| ६२४ | आनन्दरामायणे | [ सर्गः २० |
|---|
सुख दुःखं समं ज्ञेयं सुखं हर्षो न मानयेत् ।
शोकः कार्यो विपत्तौ न चेति लोकान् प्रदर्शितम् ॥९४॥
राज्यभोग्यं मया त्यक्त्वा भुक्ताः क्लेशास्सदा वने।
कामक्रोधां रिपूणां च दुष्टानां हि वशो भुवि ॥९५॥
जनैः कार्यं सदा चेति ह्युपदेशं मया वने।
बहवो निहतास्तत्र राक्षसा मुनिहिंसकाः ॥९६॥
स्त्रीसङ्गः सर्वदा त्याज्यस्त्वेकाकी च तपेश्चरेत्।
नाभक्त निस्रुतिश्च हि स्त्रीषु कार्यं नरैः सदा ॥९७॥
इत्थं मयोपदिशता सीतयाऽथ तदा वने ।
वियोगो दर्शितो लोकान् मत्तो भिन्ना न जानकी ॥९८॥
कदापि जायते विप्राः सत्यं चेदं ब्रवीम्यहम् ।
आर्त्तस्य रक्षणं कार्यं कार्यो दुष्टस्य निग्रहः ॥९९॥
मयोपदिशता चेत्थं जनान्सूर्य्यसुतस्तथा।
दृप्तौ निहतौ वालिरावणावितरे हताः ॥१००॥
कीर्तिः कार्या जनेष्वत्र मयोपदिशता त्विति ।
पारमपारात्सिन्धोस्तीरे किंमात्राद्यगतेने मे ॥१०१॥
यद्यपि शुद्धं स्वे चित्ते विरुद्धं च जनेषु यत् ।
त्यक्तव्यं तत्प्रियं चापि मयोपदिशता त्विति ॥१०२॥
जनापवादात्तु सुन्द्धाऽपि लक्ष्यापि दिव्यदर्शनात् ।
लोकापवादभीत्या सा पुरा त्यक्ताऽत्र जानकी ॥१०३॥
स्वयमेवात्र यत्त्यक्तं शुद्धं ज्ञात्वा हि तत्पुनः ।
अङ्गीकार्यं जनैर्बुद्ध्या मयोपदिशता त्विति ॥१०४॥
जनापवावृता सीता पुनः स्वीकृता मया शुभा ।
एकपत्नीव्रतादानं राजकर्त्तान्यनेकधाः ॥१०५॥
अश्वमेधादियज्ञश्च सदाचारो जगद्गुरः ।
स्नानमध्याधिकं यच्चन्मयाऽत्र क्रियते सदा ॥१०६॥
तन्मवै जनशिक्षार्थं मुक्तसङ्गस्य किं मम ।
कर्मणांनन्वयं मोक्षविद्याः सदानन्दस्वरूपिणः ॥१०७॥
अहं सदानन्दमयः सुखात्मा सुखदो नृणाम्।
अवतारस्त्ववेन सुखं दुःखं मयाऽकारि ॥१०८॥
यदत्र भवतामग्रे कौतुकार्यं न संशयः ।
उत्तरोत्तरोत्तमाश्वंमवताराः स्मृतं मया ॥१०९॥
पुत्र अधिक होनेसे अधिक त्यागना न जाना चाहिए। यह स्वदेश देश हुए मैंने भरतका परित्याग कर दिया था ॥९३॥ सुख दुःख शोक समान समझना चाहिए। सुखमें न विषय हर्षित हो, न दुःखमें घबराय। यह उपदेश जनके लिए ही मैंने जानकीको छोड़कर मयूर दम्पती संप्रतीको अपनाया था। काम-क्रोध आदि दुष्ट शत्रुओंको मारना चाहिए ॥९४॥९५॥ यह उपदेश देनेके लिए ही मैंने वनमें रहकर बहुतसे मुनिहिंसक राक्षसों को मारा था। ९६। विषयमें अधिक आसक्त होना ठीक नहीं बल्कि उनका सङ्ग त्यागकर दूर रहना हुआ तपस्या करे। ९७। यह उपदेश देनेके लिए मैंने वनमें सीताको तजकर उनसे वियोग दर्शाया था। वास्तवमें सीता हमसे पृथक् कदापि नहीं हो सकतीं। ९८॥ हे ब्राह्मणो ! यह सब बात मैंने सर्वथा सत्य कहा है। मनुष्यमात्रको चाहिए कि जो दुःखी, जनका रक्षा करे और दुष्टोंको दण्ड दे ॥९९॥ सुग्रीव और विभीषणकी रक्षा करके दुष्ट बाली और रावणको मारकर संसारको मैंने यही उपदेश दिया है ॥१००॥ इस संसारमें मनुष्यको चाहिए कि वह अपना सुयशका विस्तार करे। इसलिए मैंने समुद्रके पारसे पत्थर मँगाये थे। वैसे तो क्या पाषाणको जलकर लङ्का नहीं पहुंच सकता था? ॥१०१॥ यदि कोई वस्तु अपनेको प्रिय हो किन्तु दुनियॉकी दृष्टिमें विरुद्ध हो तो उस प्रिय वस्तुका भी परित्याग कर देना चाहिए। यह नियम देनेके लिए ही मैंने सुलोभा आत्मसाक्षात् द्रष्टा तथा पवित्र जानकर भी लोक अपवादके भयवश सीताका परित्याग कर दिया था ॥१०२।१०३॥ अथवा यदि किसी पवित्र वस्तुका त्याग दे और बादमें ज्ञात हो कि वह शुद्ध है तो उसको फिरसे अङ्गीकार कर लेना चाहिये। यह उपदेश देनेके लिए ही मैंने पूर्वमें त्याग हुई सीताको फिर स्वीकार कर लिया। उसी प्रकार एकपत्नीव्रत, अनेक तरहके राजकार्य अश्वमेध यज्ञ, सदाचार, जप, तप, स्नान, संध्या आदि जितना भी काम हम करते हैं, सो सब लोगोंकी उपदेश देनेके लिए ही कर रहे हैं ॥१०४-१०६॥ वैसे तो हमारी मायाजालसे अलग सदा आनन्दस्वरूप, कर्मसे परे, सदा आनन्दमय, सुखात्मा और समस्त मनुष्योंके सुखदाता मुझ रामके लिए इन सब कृत्योंसे क्या मतलब ? ये सुख दुःख जो बताये, वे भवतारक आधारपर आप लोगोंके कौतुकके लिए कहे हैं, इसमें कोई संशय नहीं है। अपने भक्तके सन्तोषार्थ विशेष-गुणसम्पन्न ये अवतार गिनाये, वास्तवमें मेरे लिए सब अवतार बराबर हैं। किन्तु अपनी बुद्धिसे भली भाँति
सर्गः २१ ] राज्यकाण्डम् ( उत्तरार्द्धम् ) ५२५
सर्गः २१ ] राज्यकाण्डम् ( उत्तरार्द्धम् ) ५२५
विशेषगुणवानुक्तः सन्ति सर्वे समा मम। सम्यग्युद्ध्या विचार्यात्र चरित्रैः सकलैश्वयम् ॥ १०९॥ द्वावतारौ जलचरौ तथा वनचरौ च द्वौ। द्वौ तौ च वल्कलाधारी एको वैश्यश्च गोपकः ॥ ११० । एकस्तु मलिनश्चापि परश्च क्षणिकस्तथा। एवं भूता मन्त्रिपाश्चावतारास्तोषदा न मे ॥ १११। अयं सर्वविशिष्टोऽत्र ह्युपासकजनप्रियः अवतारस्त्वहं वेद्मि सेवनान्मङ्गलप्रदः ॥११३॥ चरित्राण्यतिरम्याणि पातकान्तानि वै मया। कुर्वन्त्यस्मिन्नवतारे श्रवणान्मुक्तिदानि हि ॥११४। सदा जना भजन्त्यत्र ह्यवतारममूं मम। भक्ता येऽस्यावतारस्य ते मेऽतीव प्रियाः सदा ॥ ११५ एवं सर्वमिदं विप्रा आनन्देन मयोदितम्। दोषमारोपयन्त्यस्मिन्नवतारेऽथ ये जनाः ॥११६॥ ते मद्भवेष्या नरकेषु पतंति सह पूर्वजैः। श्रीरामदास उवाच एवमुक्त्वा रामचन्द्रः सम्पूज्य हि मुनीश्वरान् ॥११७। विसृज्य सकलान्सीतां रंजयामास राघवः। एवं शिष्य मया प्रोक्तमवतारप्रवर्णनम् ॥११८ इति श्रीमत्कोटिरामचरितान्तर्गते श्रीमदानन्दरामायणे वाल्मीकीये राज्यकांडे उत्तरार्धे अवतारवर्णनं नाम विंशः सर्गः ॥ २० ।
एकविंशः सर्गः
( रामका अपने दासको वरदान देते हुए दो रूप धारण करना )
श्रीरामदास उवाच
एकदा जानकीं द्रष्टुं सप्तद्वीपांतरस्त्रियः। मुनीनां पार्थिवानां च सुहृदां व्यवसायिनाम् ॥ १ ॥ सामान्यक्षत्रियाणां च वैश्यानां च सहस्रशः। चैत्रस्नानमिषेणैव ह्युद्यद्वाहनसंस्थिताः ॥ २ ॥ दृष्ट्वा समागतास्ताश्च जानकी गजगामिनी। प्रत्युद्गम्यानयामास स्वान्तागारमतिसादरात् ॥ ३ ॥
विचार करके मैं इस निश्चयपर पहुंचा हूं कि समस्त अवतारोंमें यह रामावतार सर्वश्रेष्ठ है । १०७-११० ॥ दो अवतार जलचर हुएके, दो वनचर, दो वल्कलधारी, एक वैश्यवर्णका गायहरू, एक मलिनवंश-वाला और एक क्षणिक ये भूत तथा भविष्यके सारे अवत र मर मनक नहा हैं—इनम मैं प्रसन्न नहीं हूँ ॥१११॥ ॥ ११२ ॥ मै जहांनक जानता हूं, समस्त अवतार म उपासक जनांका प्रिय तथ सेननम मङ्गलप्रद यहा रामावतार है ॥ ११३ ॥ इस अवतारम मॅन जितने कम किय हे व सब अतिशय रम्य, पातकोंका नष्ट करनवाल तथा सुननेस मुक्ति देनवाले हैं ॥ ११४ ॥ अताहा चाहिये कि मर इसा अवत रका भजन कर जो लोग इसकी उपासना करते हैं, वे मुझे सदासे अत्यन्त प्रिय हैं ॥ ११५ ॥ हे विप्रो ! यह सब रहस्य मँन आनन्दक साथ आप लोगोंको सुनाया। जो लोग मेरे इस अवतारम भी दोषारोप करत है, व मेर शत्रु हन्कर अपन पूवर्जाक साथ नरकमें गिरत हैं ॥ ११६ ॥ श्रीरामदास कहत है—इस प्रक रका बात करक रामन उन मुनिपांका पूजन किया और सबको विदाई दी । ११७ ॥ तत्पश्चात् साताको प्रसन्न करनवाली बात करन लग । ह शिष्य ! मैने इस तरह तुम्हारे समक्ष सभी अवतारोंका वणन किया । ११८ । इति श्रीमदानन्दरामायण वाल्मीकीये पं० रामतेज-पाण्डेयविरचित'ज्योत्स्ना'भाषाटीकासहिते राज्यकाण्ड उत्तरार्द्धे अवतारवर्णन नाम विंशः सर्गः । २० ॥
श्रीरामदास कहन लगे-एक बार सीताको देखनके लिये साता द्वीपांका स्त्रियां जिनम मुनियांकी, राजाओं-की, मित्रोंकी, व्यवसायियोंकी ॥ १ ॥ साधारण श्रणके क्षत्रियोंकी तथा वैश्योंका हजारोका संख्यामे नारियां चैत्रस्नानके व्याजसे अनेक प्रकारके वाहनोपर सवार होकर अयोध्यामे आयीं ॥ २ ॥ उन्हें आती देखकर गजके समान मन्दगतिसे चलनेवाली सीता शीघ्र उनके आगे पहुंचीं और आदरके साथ अपनी रंगशालामें ले गयीं ॥३॥
५२६ आनन्दरामायणे [ सर्गः २१
पूजयामास ताः सर्वा नानालङ्कारभूषणैः । ताः सर्वाः पूजयामासुः सीतां सिंहासनस्थिताम् ॥ ४ ॥
दिक्पालकारवस्त्राद्यैर्नानादेशोद्भवैर्वरैः । परिवार्थ ततः सीतां तस्थुः सर्वाः स्त्रियश्च ताः । ५ ॥
श्रुत्वा सीतामुखाद् रामचरित्राणि महत्तरः । तास्तुष्टाः श्रोतुमुद्युक्तास्तत्पाणिग्रहणं शुभम् ॥ ६ ॥
स्मितास्यास्ताः स्त्रियः सर्वास्तदा प्रोचुर्विदेहजाम् स्वत्पाणिग्रहणोत्साहं श्रोतु मिच्छामहे वयम् ॥ ७ ॥
तत्सर्वं विस्तरेणाद्य ब्रूमहेहि जानकि । इतितासां वचः श्रुत्वा लज्जया जानकी तदा ॥ ८ ॥
स्वां सखीं नोदयामास तुलसीं रुक्मभूषिताम् ।
तुलस्युवाच
शृणुध्वं सकला नार्यः पाणिग्रहणमुत्तमम् । ९ ॥
जानक्याः कथयिष्याद्य महामङ्गलदायकम् । वक्ष्योपाद्यं हि संक्षेपाच्छ्रवणाम्पुण्यवर्धनम् । १०॥
साकेताद्रघुनन्दनेन स मुनिर्भ्रात्रा युतेनाश्रमं स्वं गत्वा विनिहत्य राक्षसबलं तेनैव यज्ञं निजम्
संपाद्याथ रथस्थितश्च मिथिलामार्गे हरेरङ्घ्रिभिः संस्पर्शाद्वनकल्मषां समकरोद्भार्यां मुनेर्गाधिजः । ११ ।
गत्वा गाधिजसंयुतश्च मिथिलां भ्रात्रा समागत्यश्चापाधः पतितं निरीक्ष्य च रिपु स्तोपं मुनेराज्ञया ।
तं नत्वा गिरिजेश्वरस्य च धनुः कृत्वा त्रिखण्डं क्षणांन्माताहस्त विसर्जितां निजगले मालां दधौ राघवः १२
बन्धूनां च निजं विधाय मिथिलापुर्यां विवाहान् शुभान् पितृभ्यां सह भार्यया रघुपती राज्ञाऽतिसंपूजितः
त्यक्त्वा तां मिथिलां ययौ निजपुरीं मार्गे क्रुधा निर्गतो दुर्दर्पं जमदग्निजस्य धनुषा मोपाहरल्लीलया १३॥
एवं नार्यश्च सीताया विवाहः कथितो मया । युष्माभिः कौतुकात्पृष्टो यः सर्वमङ्गलप्रदः ।।१४।।
श्रीरामदास उवाच
एवं स्त्रियम ताः श्रुत्वा परमां मुदमाप्नुयुः । ततस्ताः पूजयामासुः पुनः सीतां मुदान्विताः ॥१५।
सीताने अनेक तरहके भूषणोंसे उनकी पूजा की और उन स्त्रियाने भी सिंहासनपर बिठाकर दिव्य अलङ्काराम सीताका पूजन किया। इसके अनन्तर वे सब सीताका चारा ओरस घेरकर बैठ गयीं । ४ । ५ ॥ सीताके मुखसे रामके महत्ता चरित्र सुनकर वे बहुत प्रसन्न हुई और उन्हान साताक मुखस ही सीताका विवाहसम्बन्धी वृत्तान्त सुननेकी इच्छा प्रकट की । ६ । वे मुस्कुराता हुई सातास कहने लगीं कि हम आपके विवाह-समारोहका वृत्तान्त सुनना चाहती हैं । ७ । हे सानि ! वह सारा हाल विस्तारपूर्वक हमको सुनाइए। इस प्रकार उनका प्रश्न सुनकर सीता लज्जायश कुछ नही बोली और अपना सहेली तुलसीको जो कि सुवर्णमय आभूषण पहने बैठी थी, संकेत किया और तुलसी कहन लगा — आप लोग साताक मङ्गलमय विवाहका वृत्तान्त सुनै ॥ ८ ॥ ९ । आप लोगांका प्रसन्न करनक लिए उस महामङ्गलदायी और सुननेसे पुण्य बढ़ाने-वाले विवाहका में संक्षेपमे वर्णन करना हूँ ॥ १० ॥ अयोध्यापुरास विश्वामित्र राम और लक्ष्मणको साथ लिये हुए अपने आश्रम पहुँचे। वहाँ राम लक्ष्मणस राक्षसाका प्रवल सेनाका संहार किया और मुनि विश्वामित्रके यज्ञ कर लेनेके बाद रथपर बैठकर मुनिके साथ दोनों भाई मिथिलाकी ओर चले । रास्तेमे विश्वामित्रने रामके चरणोंका स्पर्श कराकर गौतम ऋषिक पत्नी अहल्याको शापसे मुक्त कराया ॥ ११ ॥ फिर मुनिके साथ जनकपुर पहुँचे । स्वयंवरके समय रामने सभाम मुनि विश्वामित्रका आज्ञासे शिवके धनुषको प्रणाम किया और क्षण भरमें उसे तोड़कर तीन टुकड़े कर डाले । फिर सीताके हाथोकी वरमालाको रामने अपने गलेमें धारण किया ॥ १२ ॥ इसके अनन्तर रामन मिथिलापुरीमे ही अपना और अपने सब भाइयोंका विवाह किया। फिर पत्नी, पिता, माता आदिके साथ जनकसे पूजित होकर राम मिथिलासे अयोध्याको चले। रास्तेमें क्रोधी परशुराम मिले और उनके वैष्णव धनुषको चढ़ाकर रामने उनके दुर्दर्पको दूर कर दिया ॥ १३ ॥ हे नारियो ! तुमने कौतुक वश सीताके जिस सर्वमङ्गलप्रद विवाह-वृत्तान्तको पूछा था, सो मैंने कह सुनाया ॥ १४ ॥ श्रीरामदास कहते है कि इस प्रकार सीताके विवाहका वर्णन सुनकर वे स्त्रियां बहुत
सर्गः २१ ] राज्यकाण्डम् ( उत्तरार्द्धम् ) ५२७
सर्गः २१ ] राज्यकाण्डम् ( उत्तरार्द्धम् ) ५२७
सीतया पूजिताः सर्वास्तां नत्वामन्त्र्य जानकीम्। पंचस्नान मथाप्याय जग्मुः स्वं स्वं स्थलं प्रति ॥१६॥ अथैकदा गुरोरास्याद्भावाग्रे संस्थितो लवः। शृण्वन्पुराणं पप्रच्छ श्रोतॄ सर्वान् ज्ञानान्गुरूम् ॥१७॥ शृण्वे ते प्रष्टुमिच्छामि तन्मे वद मुनीश्वर । पुस्तकेषु च सर्वत्र पत्रे पत्रे पृथक् पृथक् ॥१८॥ एकत्र लिख्यते श्रीति रामेत्येकत्र लिख्यते । किमर्थं धारवैन्तन्मे कथयस्व माम् ॥१९॥ इति तद्वचनं श्रुत्वा गुरुस्तं वाक्यमब्रवीत् । वसिष्ठ उवाच सम्यक् पृष्टं त्वया वत्स लोकसंदेहहन्परम् । २०॥ श्रीरामचरितं पूर्वं व्यासेन मुनिना पृथक् । अष्टादश पुराणानि तथोपपुराणानि च ॥२१॥ कृतान्यन्यैश्च मुनिभिः षट्शास्त्रादीन्यनेकशः । श्रीरामचरितादेव श्लोकमात्रमपीह यत् ॥२२॥ सर्वमस्तीति दृष्ट्वैवमुभयोरेकत्र श्रीति च । विनिश्चयैकत्र रामेति तन्मध्येषु परिलिख्यते ॥२३॥ अनया संज्ञया सर्वे ज्ञास्यन्त्यग्रे जना भुवि । श्रीराम मध्ये लिखितं श्रीरामचरितादिदम् ॥२४॥ कृतमस्ति पृथक् भिन्नं पुरा व्यासादिभिस्त्विति । एतत्सन्कामनाद्वाल सूचनार्थं विलिख्यते ॥२५॥ श्रीरामेति पृथक् पत्रे सर्वत्र जगतीतले । अन्यच्च कारणं वच्मि तच्छृणुष्व प्रियो लव ॥२६॥ अशुद्धं लिखितं पश्चादज्ञानतो भ्रान्तिशोऽपि हि । पत्र तच्चाप्यतिशुद्धं हि भवत्विति मनीषिणा ॥२७॥ श्रीरामेति च सर्वत्र पत्रे पत्रे विलिख्यते । यदङ्कितं श्रीरामेति नाम्ना पत्रं तु लेखकैः ॥२८॥ ज्ञेयं तच्चाति शुद्धं हि गतदोषस्तु लेखकः । सर्वत्र्यत्र जगत्त्यां हि सत्यं लव वदाम्यहम् ॥२९॥ इति श्रुत्वा गुरोर्वाक्यं वसिष्ठं प्रणिपत्य च । लवः स गतसन्देहस्तूष्णीमासीन्मुदान्वितः ॥३०॥ एकदा रघुनाथस्तु मंचकोपरि संस्थितः । मुखात्ताम्बूलस्य रक्तं प्रथमे दोषकारकम् ॥३१॥ त्यक्तुकामो न ददर्श पात्रं निष्ठीवनस्य सः । तस्यांतिके स्थिता दासी नाम्ना वै सुगुणेति च ॥३२॥
प्रसन्न हुईं और उन्होंने फिरस सीताका पूजन किया ॥ १५ ॥ साताने भी फिर उनका पूजन किया और वे सीताको प्रणाम करके और उनसे आज्ञा लेकर पंचस्नान समाप्त हो जानेपर अपने-अपने घर चली गयीं ॥ १६ ॥ इसके बाद एक दिन गुरु वसिष्ठ बड़े पुराणोंकी कथा सुना रहे थे। रामचन्द्रजी और लव भी बैठे हुए थे । कथा सुनते-सुनते लवने सब बातोंको ज्ञान प्राप्त करनेके लिए वसिष्ठसे कहा—॥ १७ ॥ हे गुरो ! मैं आपसे कुछ पूछना चाहता हूँ, सो बताइए । प्रायः ऐसा देखा जाता है कि सब पुस्तकोके पन्ने-पन्नेमें एक ओर 'श्री' और दूसरी ओर 'राम' ऐसा लिखा जाता है। लोग ऐसा क्यों करते हैं? यह कृपया हमें बता दीजिये ॥ १८ ॥ १९ ॥ इस प्रकार लवका प्रश्न सुनकर वसिष्ठने कहा—हे वत्स तुमने बहुत अच्छा प्रश्न किया है। इससे बहुतोंका सन्देह दूर हो जायगा ॥ २० ॥ पहले व्यास मुनिने श्रीरामचन्द्रके चरित्रात्मक अट्ठारह पुराण और अट्ठारह ही उपपुराण बनाये ॥ २१ ॥ उसी तरह और-और ऋषियोंने षट्शास्त्र आदि बनाकर तैयार किये । सब ग्रंथोंके सभी श्लोक श्रीरामचरित्स बने हैं। इसी बातको बतलानेके लिए प्रत्येक पन्नेमें 'श्री' लिखकर 'राम' लिखा जाता है ॥ २२ ॥ २३ ॥ इस संकेतसे संसारके मनुष्य पुस्तक देखकर यह समझेंगे कि ये सब ग्रंथ श्रीरामचरितके अन्तर्गत हैं, हे वत्स ! श्रीराम लिखनेका एक कारण यह है, जो बता चुका । दूसरा भी बतलाता हूँ—हे लव ! सो भी सुन लो ॥ २४-२६ ॥ अज्ञानतासे वा भ्रमवश ग्रन्थमें जो कोई शब्द अशुद्ध लिखा गया हो, वह पन्ना अत्यन्त शुद्ध हो जाय । इस विचारसे भी पन्नेमें लेखकगण श्रीराम लिखते हैं ॥ २७ ॥ २८ ॥ ऐसा करनेसे अशुद्ध भी शुद्ध हो जाता है और लेखकको कोई दोष नहीं लगता। हे लव ! मैं तुमको यह सब सच्ची बातें बतला रहा हूँ ॥ २९ ॥ इस प्रकार समाधान सुनकर लवका सन्देह निवृत्त हो गया और वे चुपचाप बैठ गये ॥ ३० ॥ एक बार राम मंचपर बैठे थे । मुखमें ताम्बूल था । ताम्बूलका प्रथम रस दोषकारक होता है, इस ख्यालसे उन्होंने थूकना चाहा । किन्तु निष्ठीवनपात्र (पीकदान) नहीं दिखायी पड़ा । रामके पास ही खड़ी सुगुणा नामकी दासी रामकी इच्छा
५२८ आनन्दरामायणे [सर्गः २१
तादृशं राममालोक्यं पात्रं दूरं विलोक्य च । कृत्वा पात्रं स्वहस्ताभ्यामंजलावथ तद्ग्रसम् ॥३३॥ रामेण मुक्तमास्याच्च जग्राह वेगतोभृशं । ततः सा प्राशनं रामोच्छिष्टं दासी चकार तत् ॥३४॥ महाप्रसादं तं मत्वा देवालब्धं विचिन्त्य च । तदाऽतितुष्टः श्रीरामस्तस्यै तत्कर्मणाऽब्रवीत् ॥३५॥ वरयस्व वरं दासि यत्ते मनसि वर्तते तद्रामवचनं श्रुत्वा दासी प्राह रघूत्तमम् ॥३६॥ एकपत्नीव्रतं तेऽस्ति सांप्रतं विह जन्मनि जन्मांतरे त्वया संगं वाञ्छामि रघुनायक ॥३७॥ तत्तस्या वचनं श्रुत्वा राघवो वाक्यमब्रवीत् । यदाऽग्रे कृष्णरूपेण गोकुलेऽवतराण्यहम् ॥३८॥ तदा राधेति नाम्नी त्वं गोपिकासु भविष्यसि । तदा मया चिरं क्रीडां त्वं भोक्ष्यसि न संशयः ॥३९॥ सदा ममातिप्रीता त्वं गोपिकासु भविष्यसि । इति दासी रामचन्द्राद्वरं लब्ध्वा तुतोष सा ॥४०॥ अन्यच्छृणु विष्णुदास रामचन्द्रकथानकम् । सम्प्रोच्यते मया तेऽग्रे महत्कौतुककारकम् ॥४१॥ एकदा राघवः श्रीमान्त्सभायामासनोपरि । मन्त्रिभिर्बन्धुभिः पुत्रैर्मन्त्रिभिः पूज्यसंनिधौ ॥४२॥ एतस्मिन्नन्तरे कश्चिद्ब्रह्मचारी समाययौ युवा दण्डधरः श्रेष्ठः कमंडलुकरः शुचिः ॥४३॥ ऐणकृष्णाजिनधरः काषायवसनो व्रती तं दृष्ट्वा राघवः श्रीमानुत्थाय वरासनात् ॥४४॥ प्रत्युद्गम्याथ तं नत्वाऽऽसने समुपवेश्य च । पूजयामास विधिना धेनुमग्रे निवेद्य च ॥४५॥ ततः सम्पूजितं विप्रं राघवो वाक्यमब्रवीत् । अद्य धन्योऽस्म्यहं विप्र यत्ते दर्शनं मम ॥४६॥ कार्यमाज्ञाप्यतां किंचिद्यदर्थं भवनाऽऽगतम् । तद्राघववचः श्रुत्वा ब्रह्मचारी वचोऽब्रवीत् ॥४७॥ वाल्मीकिना प्रेषितोऽहं यस्त्वात्तच्छृणु राघव । चिकीर्षामी महायज्ञं स वाल्मीकिर्महामुनिः ॥४८॥ त्वामाकारयितुं मां स्वानिकटे वरात्मजम् । प्रेषितवानतस्त्वं हि सीतया बन्धुभिः सह ॥४९॥ प्रस्थानं कुरु राजेन्द्र मुहूर्तस्त्वद्य वर्तते । एवं वदति श्रीरामं भूसुरे सदसि स्थिते ॥५०॥
समक्ष गयी, किन्तु पात्र दूर था। इसलिए ग्रासको रोकनेके लिए उसने अपनी अञ्जली फैला दी ॥ ३१-३३॥ रामने भा वह ग्रास उसके हाथम फेंक दिया। दासी उसको लेकर तुरन्त खा गयी। उसने मनम सोचा कि यह महाप्रसाद है और भगवन्न आज मुझे मिल गया है। उसके इस व्यवहारसे राम बडे प्रसन्न हुए और उन्होंने कहा - ॥ ३४। ३५ ॥ अरी दासी तेरा जो इच्छा हो, वह वर मांग ले। रामकी बात सुनकर उसने कहा - इस समय आप एकपत्नीव्रती हैं। इसलिए हे रघुनायक मैं दूसरे जन्मस आपके साथ एकान्त सहवास करना चाहती हूँ। ३६ । ३७॥ उसकी यह बात सुनकर रामने कहा कि अगले जन्मम मैं कृष्णरूपस गोकुलम अवतार लूँगा, तब तुम राधा नामस विख्यात एक गोपपत्नी होओगी। उस समय बहुत दिना तक तुम मेरे साथ क्रीडाका सुख भोगोगी, इसम कोई संशय नहीं है ॥ ३८। ३९ । सूतका सारा गोपियम तुम मुझे भत्रमे प्रिय होओगी। दासी इस तरह रामचन्द्रजीसे वरदान पाकर प्रसन्न हो गया । ४० । हे विष्णुदास रामचन्द्रजीकी एक दूसरी कथा भी मैं तुम्हारे आगे कह रहा हूँ, वह बड़ा कौतुकजनक है। ४१ ॥ एक समय राम भगवान सिंहासनपर भाइयों, पुत्रों तथा मन्त्रियोंके साथ बैठे थे ॥ ४२ ॥ उसो समय एक युवा ब्रह्मचारी दण्ड धारण किये और हाथमें कमण्डलु तथा पवित्र मृगछाला लिये और काषाय वस्त्र धारण किये वहाँ आ पहुंचा। उसे देखते ही श्रीमान् रामचन्द्रजी आसनसे उठ खड़े हुए। थोड़ा आगे बढ़कर उसे प्रणाम किया और एक अच्छे आसनपर बिठलाया। फिर गोदान देकर उन्होंने उसका पूजा का । ४३-४५ ॥ पूजन कर लेनेके पश्चात् रामने कहा-हे विप्र ! आज आपके दर्शन- से मैं अपनेको धन्य समझता हूँ ॥ ४६ । अच्छा, अब आप मुझे वह आज्ञा दीजिए कि जिसके लिए आप यहाँ आये हों। रामकी यह बात सुनकर ब्रह्मचारी कहने लगा । ४७ । श्रीवाल्मीकिजीने मुझे आपके पास भेजा है। वे एक महायज्ञ करना चाहते हैं। इसीलिए आपको बुलानेके लिए मुझे भेजा है। हे राजेन्द्र ! आज बड़ा अच्छा मुहूर्त है। अतएव सीता तथा अपने भ्राताओंके साथ आप शीघ्र प्रस्थान कर दीजिए। इस प्रकार वह
सर्गः २१] गद्यकाण्डम् (उत्तरार्द्धम्) ५२९
समाययौ ब्रह्मचारी द्वितीयो गाधिजाश्रमात् ।
तं दृष्ट्वा पूर्ववद्रामः प्रत्युद्गम्य द्विजोत्तमम् ॥५१॥
आसनेऽन्ये चोपवेश्य पूजयामास सादरम् ।
ततस्तत्पुरतः स्थित्वा स प्रचच्छ रघूत्तमः ॥५२॥
यदर्थं श्रामितोऽसि त्वं तन्ममाज्ञापयन् इतः ।
तद्राघववचः श्रुत्वा ब्रह्मचारी बभाषिवान् ५३।
राम त्वां गाधिजेनार्त्तं प्रेषणाऽस्मि जवेन हि ।
यत्कर्त्तारौ महायज्ञं विश्वामित्रोऽस्ति राघव । ५४ ।
त्वं तेनाकारितश्चासि प्रस्थानं कुरु सत्वरम् ।
ब्रह्मचारिणोस्तद्वाक्यमृषयोः स रघूत्तमः । ५५।
श्रुत्वा विहस्य प्रोवाच द्विताभ्यां वै तथेति च
तदाश्चर्यं जनाः प्रापुः शृण्वन्ते नु परस्परम् ५६।
कथंमयोमयोः सक्तं रामो गच्छति सत्वरौः ।
केचिदूचु गघवाय किमशक्य तथाऽत्र हि । ५७।
यथा स्त्रीणां वने पूर्वं यथाऽस्माकं हि दर्शनम् ।
यथा गतोऽस्ति लङ्कायाः पुनः भरतदर्शने ॥५८
भिन्नरूपेण रामेण सर्वेषामर्पितं पृथक् ।
तद्वदत्रापि द्विविधा भूत्वा गन्ता न तन्मयी । ५९।
किमाश्चर्यमिदं चाद्य किमशक्यं परात्मनि ।
एवं वदत्सु पौरेषु लक्ष्मणं प्राह राघवः । ६०॥
अद्यैवाहं गमिष्यामि मे जनान्तं च बहिः ।
वासो गेहानि नेयानि बहिः सेनां प्रबोधय ॥६१।
आज्ञापनीयं वाद्यानां ध्वनिं कर्तुं हे सेवकान् ।
तद्राघववच श्रुत्वा तथेत्युक्तवां स लक्ष्मणः ॥६२॥
कारयामास वाद्यानां ध्वनिं तूर्णं भृशमान् ।
सँश्च प्रचोदयामास वहिर्वासोगृहाण्यपि ॥६३।
नेतुमाज्ञापयामासुर्देतास्ते निन्युरादरात् ।
ततो रामोऽपि विप्राभ्यां गृहं गत्वा विदेहजाम् ॥६४॥
सर्वं वृत्तं निवेद्याशु कृत्वा विप्रैर्हि भोजनम् ।
सीतां च करिणीपृष्ठे बंधूनाऽऽरोहयन् प्रभुः ॥६५॥
पुष्पके पौरनारीश्च करिण्युर्मिलादिकाः ।
समारोप्य-तुरागमः स्वयं तस्यां गजोपरि । ६६॥
लक्ष्मणाद्या गजेष्वेव ते समारुरुहुस्तदा ।
निनेदुश्चाथ वाद्यानि ननृतुर्नार्योऽपिचः ॥६७॥
ब्राह्मण कह ही रहा था कि इतनेमें एक दूसरा ब्रह्मचारी विश्वामित्रके आश्रमसे आ पहुँचा । पहलेकी तरह रामने उसका भी स्वागत किया । ४८-५१॥ उस एक दूसरे आसनपर बिठाकर श्रीयुत उसको भी उसी तरह पूजा की । इसके अनन्तर उसके भी आगे बैठकर उन्होंने कहा कि जिस कामके लिए आपने कष्ट किया हो, मुझे आज्ञा दीजिए। रामकी बात सुनकर ब्रह्मचारीने कहा -॥ ५२ ॥ ५३ ॥ हे राम ! मुझे विश्वामित्र-जीने आपके पास भेजा है। वे एक महायज्ञ करना चाहते हैं। उसमें उन्होंने आपको बुलाया है, इसलिए आप शीघ्र प्रस्थान कीजिए। रघूत्तम राम उन दोनों ब्रह्मचारियोंके सन्देश सुनकर मुस्कराए ॥ ५४ ॥ ५५ ॥ उन दोनोंसे कहा - अच्छा चलेंगे'। इस बातको सुनकर सभाके लोगोंको बड़ा विस्मय हुआ। वे परस्पर कहने लगे--॥ ५६ ॥ राम इन दोनोंके साथ जाकर कैसे उन दोनों यज्ञोंमें सम्मिलित हो सकेंगे। किसीने कहा कि रामके लिए असम्भव कौन सा काम है, वे क्या नहीं कर सकते ? ॥ ५७॥ जैसे वनमें उन्होंने उन हजारों स्त्रियोंको हजारों रूपोंमें दर्शन दिया था। जिस प्रकार लंकासे लौटकर आनेपर भरत-मिलापके समय प्रत्येक मनुष्यसे मिले थे ॥ ५८ ॥ उसी तरह इस समय भी राम अपना दो रूप बनाकर दोनों जगह चले जायेंगे ॥ ५९ ॥ इसमें आश्चर्य करनेकी बात ही कौन-सी है, जिनका आत्मा इतने ऊँचे दर्जेपर पहुँच गयी है और जो साक्षात् परमात्मा है, उनके लिए असम्भव कोई काम नहीं है। इस तरह लोग आपसमें बातचीत कर रहे थे, तभी रामने लक्ष्मणसे कहा-॥ ६० ॥ लक्ष्मण ! आज ही भोजन करनेके पश्चात् हमलोग बाहर चलेंगे तम्बू कनात आदि भेजवा दो और सेना भी तैयार करवाओ ॥ ६१ ॥ वाद्य बजानेके लिए सेवकोंको आज्ञा दे दो। रामकी आज्ञा सुनकर लक्ष्मणने "एवमस्तु" कहा । ६२ । तत्काल उन्होंने तूर्योको सुदुरी बजानेकी आज्ञा दी। लक्ष्मणके आज्ञानुसार सेवक सब सामान ठीक करने लगे। इसके अनन्तर राम उन दोनों ब्रह्मचारियोंके साथ सीताके महलोंमें गये ॥६३॥ ६४॥ जानकीजी को भी निमन्त्रणका समाचार सुनाया और दोनों ब्राह्मणोंके साथ भोजन किया। फिर बन्धुओंके साथ सीताको हाथीपर सवार कराया। बाकी पुरवासिनी नारियोंको पुष्पक विमानपर एवं ऊर्मिलादिको हाथीपर बिठाया। उन सबको सवारियोंपर बिठाकर स्वयं भी एक हाथीपर सवार हुए और लक्ष्मणादि भी हाथीपर बैठे, इस समय विविध प्रकारके बाजे बजने लगे और
| ५३० | आनन्दरामायणे | [ सर्गः २१ |
|---|
तुष्टुवुर्मार्गगाद्याश्च प्रजगुः सुस्वरं नटाः । एवं प्रशंस्यो रामस्तदा नामोद्ग्राह्याणि सः ॥ ६८ ॥
तां रात्रिं समतिक्रम्य प्रभाते रविनन्दनः । स्नात्वा नित्यक्रियां कृत्वा गजारूढोऽभवत्पुनः ॥ ६९ ॥
क्रोशद्वयं गतो गत्वाऽग्रे द्वौ मार्गौ निरीक्ष्य च । चक्रे वै द्वे निजे देहे चकार रघुनन्दनः ॥ ७० ॥
सदा द्वयोर्मार्गयोश्च गच्छन्तौ सीतया सह । पुत्राद्यैर्बन्धुभिर्युक्तौ द्वौ रामौ सकला जनाः ॥ ७१ ॥
ददृशुः पुष्पकं द्वे च द्वौ जातौ ब्रह्मचारिणौ । मन्त्री विप्रश्चैकः स स्वं गृहं ययौ ॥ ७२ ॥
विश्वामित्राश्रमं चान्यः श्रीरामेण युतः मुदा । वाल्मीकेश्चाश्रितश्चैकः स स्वं गृहं ययौ ॥ ७३ ॥
वाल्मीकेश्छात्र चान्यः श्रीरामेण युतः मुदा । एवं तौ राघवौ तत्र सर्वद्रव्यैर्युतावुभौ ॥ ७४ ॥
द्विजान्वि ददृशुस्तत्र गच्छन्तौ राघवावुभौ । तयोर्मार्गे हि तयोर्मुन्न्योस्तदाश्रमे ॥ ७५ ॥
ससैन्यौ सीतया युक्तौ बन्धुपुत्रवधूर्जनैः । सम्पूज्य मुनिभिर्हृष्टैः प्रत्युत्थानादिपूजितौ ॥ ७६ ॥
तयोर्यागं विधायाथ परितुष्टौ पुनः पुनः । समाजग्मुः श्रीरामौ ससैन्यौ पूर्ववन्मुदा ॥ ७७ ॥
यत्र द्वे निजदेहे वै कृते तत्र रघूत्तमो । समागत्य पुनश्चैकं निजदेहं चकार सः ॥ ७८ ॥
वाल्मीकीयो ब्रह्मचारी विश्वामित्राङ्घ्रिसम्भवः । भिन्नदेहे स्वैकरूपं भजतस्स्म तदा द्विजौ ॥ ७९ ॥
ससैन्यं पुष्पकं चापि बभूवैकं तु पूर्ववत् । ततः श्रीरामचन्द्रश्च विवेश नगरीं निजाम् ॥ ८० ॥
तदा निनेदुर्वादित्राणि ननृतुर्वारयोषितः । पौरनार्यो विमानस्था ववर्षुः पुष्पवृष्टिभिः ॥ ८१ ॥
तुष्टुवुर्मार्गगाद्याश्च प्रजगन्तं भटादयः । एवं नानाकौतुकानि पश्यन्मार्गे शनैः शनैः ॥ ८२ ॥
ययौ निजगृहं रामः सभायां संविवेश ह । सीताऽपि निजगेहं मा प्रविवेशोर्मिलादिभिः ॥ ८३ ॥
एवं भूरूप रामेण कौतुकानि महान्ति च । अमानुषाणि यान्यत्र कृतानि च सहस्रशः ॥ ८४ ॥
वाल्मीकिना विस्तरेण वर्णितानि हि कृत्स्नशः । सारं सारं मया तेभ्यः संगृह्याद्य कथानकम् ॥ ८५ ॥
वेश्यायें नाचने लगीं ॥ ६५-६७ ॥ बन्दीजन रामकी विरुदावली सुनने तथा नटगण मीठे-मीठे स्वरोंमें गाने लगे । इस प्रकार अपने रामभवनमें प्रस्थान करके राम रास्तेमें बने हुए डेरेपर पहुंचे ॥ ६८ ॥ वह रात्रि रामने वहीं बितायी । सवेरे उठे तो स्नानादि नित्यक्रिया को और फिर हाथीपर बैठकर चल दिये ॥ ६९ ॥ दो कोस आगे जानकर जहांसे विश्वामित्र तथा बाल्मीकिके आश्रमके रास्ते अलग होते थे, वहांसे उन्होंने सेना समेत आत्मा दो स्वरूप बना लिया ॥ ७० ॥ उस समय दोनों रास्तेमें राम सेना, सीता तथा पुत्रवधू आदिये युक्त होकर चले। उस समय जितने भी मनुष्य गाय थे, वे सब रामने दो दिखायी दिये ॥ ७१ । पुष्पक विमान भी दो हो गया और दोनों ब्रह्मचारियोंमेंसे एक रामको विश्वामित्रके आश्रमकी ओर ले चला, दूसरा बाल्मीकिके आश्रमको ॥ ७२ । ७३ । उस समय मनुष्यसे लेकर सांपके कुले तक दो-दो होकर दिखाई दे रहे थे। वे लोग उन दो शरीरोंको सब देखकर बड़े विस्मित हुए ॥ ७४ ॥ इस प्रकार वे दोनों राम अपनी-अपनी सेना, सीता और बन्धुओंके साथ दोनों आश्रमोंको चले । जब कि आश्रमपर पहुंचे तो दोनों ऋषियोंने अगवानी करके उनकी पूजा की ॥ ७५ ॥ इस प्रकार पहुंच-पहुंचकर उन दोनोंका यज्ञ समाप्त हो जानेपर फिर वे दोनो राम पहलेकी तरह अयोध्याको लौटे । ७६ ॥ ७७ ॥ जाते समय जिस स्थानपर रामने अपना दो रूप बनाया था, वहां पहुंचकर फिर एक हो गये । विश्वामित्रका ब्रह्मचारी तथा बाल्मीकिका ब्राह्मण ये दोनों भी एक ही एक हो गये । ७८ । ७९ । उसी तरह पुष्पकविमान और सेना भी एक हो गयी। इस प्रकार श्रीरामचन्द्रजी आनन्दपूर्वक अपनी अयोध्या नगरमें प्रविष्ट हुए ॥ ८० ॥ उस समय भी नाना प्रकारके बाजे बजे और वेश्यायें नाचीं । पुरवासियोंने नारियल द्वारा विमानसे रातभर फूलोंकी वर्षा की, बन्दीजनोंने स्तुति की और गानेवालोंने अच्छे-अच्छे राग गाये । इस प्रकार रास्तेमें तरह-तरहके कौतुक देखते हुए धीरे-धीरे ॥ ८१ ॥ ८२ । वे अपने भवनमें गये और प्रणाम परचकर राजसिंहासनपर बैठे । सीता उर्मिला आदिके साथ महलके भीतर गयीं ॥ ८३ ॥ हे शौनक ! रामने संसारमें एकान्तके जिन महान् और अलौकिक कामोंको किया था, उनको बाल्मीकिने विस्तृत वर्णन किया है और मैंने तो उसमेंसे सारभागमात्र लेकर सब कथा सुनायी
सर्गः २१ ] राज्यकाण्डम् (उत्तरार्द्धम्) ५३१
सर्गः २१ ] राज्यकाण्डम् (उत्तरार्द्धम्) ५३१
तवाग्रे कथ्यते शिष्य सङ्क्षेपेणाद्यया प्रभोः । न शक्तोऽहं यदर्थं च रामेणाज्ञापितस्त्वरम् ॥८६॥ वक्तुं स्वचरितं पुण्यं रम्यमानन्ददायकम् । वाल्मीकिश्चरितं रम्यं आवयोः संवादमात्रयोः ॥८७॥ यः पूर्वं विरचितवान् स्वीयकालेऽत्र भूतवत् । यथा रामस्य चरितं पूर्वं रामावतारतः ॥८८॥ एवं संवर्णितं कृत्स्नं गोप्यं यच्च कृतं रहः । न वाल्मीकिप्रभः कश्चित्केवलो भविष्यति ॥८९॥ इति श्रीमत्कोटीरामचरितान्तर्गते श्रीमदानन्दरामायणे वाल्मीकीये राज्यकाण्डेऽत्तराधे रामोत्तरज्ञानं तथा रामादीनां वंद्यकरणं नामैकविंशः सर्गः ॥ २१ ॥
द्वाविंशः सर्गः
(सीता द्वारा टूटा तुलसीपत्र पुनः डालमें जोड़ना)
श्रीरामदास उवाच
इदानीं रामचन्द्रस्य लीलाकौतूहलावहाम् । अन्यद्रम्यं कथ्यते हि मया तच्छृणु सादरम् ॥ १ ॥ एकदा राघवस्तस्थौ सभाशालायां चोपरि । बन्धुभिर्मन्त्रिभिश्चैव पौरैर्जानपदैः सह ॥ २ ॥ पुत्राभ्यां च सुहृद्भिश्च मित्रैर्मन्त्रिजनेः सह । एतस्मिन्नन्तरे भूरिकीर्त्तिना सुहृदा चरैः ॥ ३ ॥ द्राक्षाफलादिभिः पूर्णास्तथा पुष्पैः सुतूलिताः । करण्डिकाः प्रेषिताश्च रम्यार्थे मन्त्रतः ॥ ४ ॥ ताः सर्वा राघवो दृष्ट्वा प्रेषयामास चान्तिके । युक्ता यामविना सीता क्रीडाभवनसंस्थिता मुदा ॥ ५ ॥ दृष्ट्वा करण्डिकाः सन्ति चेत्यभूत्कुतूहला । ततो रामोपलभ्यन्तं दृष्ट्वा पद्मं हि जानकी ॥ ६ ॥ करेणादाय पद्मं च राघवायानर्पणं विना । सा तन्मुगन्ध्यं जिघ्रन्ती वारं वारं मुदान्विता ॥ ७ ॥ काण्डिकां पूर्ववच्च समाच्छाद्य विहस्तया । स्थापयामास गेहेऽथ मोचयित्वा करण्डकाः ॥ ८ ॥ तद्वृत्तं रामचन्द्रोऽथ ज्ञात्वा सभास्थितः । विममर्श विचारं च मनसा मुदान्वितः ॥ ९ ॥ नातश्चेदं कृतं कर्म योग्यं शुचे स्मृतं न हि । घ्राणार्थं मे निवेद्यान्ते कृतं कार्य्यार्थं तथा ॥१०॥
हैं ॥८४॥८५॥ क्योंकि प्रभुन मुझे आज्ञा दी थी कि शीघ्र जा कर कहो। इसलिए भगवान्ने स्वयं मुख कथा सुननेकी आज्ञा की थी। और वाल्मीकिजीका ही जो चरित्र है सिर्फ हम दोनोंके परस्पर सुनानेके लिए भूतकालकी तरह भविष्यका सारा वृत्त पूर्व रामके जन्मसे ही लिख दिया था॥८६-८८॥ वह वर्णन भी इतना अच्छा किया कि रामने जो गुप्त में किया था, वह भी सब लिख दिया। वाल्मीकिके समान न कोई कवि हुआ है न होगा। इस प्रकार आनन्दरामायणान्तर्गत राज्यकाण्डोत्तर-रामोत्तरज्ञान वन्दिकरण नामक इक्कीसवां सर्ग समाप्त हुआ॥२१॥
श्रीरामदासने कहा- अब मैं तुम्हें रामकथा एक दूसरा आनन्द और कौतुकका सुनाता हूँ। उसे आदरपूर्वक सुनो ॥१॥ एक समय रामचन्द्रजी सिंहासनपर बैठे हुए थे। उस समय उनके समस्त भ्राता, मन्त्री, पुरवासी, दोनों पुत्र सम्बन्धी तथा मित्र आदि भी उपस्थित थे। उस समय उनके सुहृद् राजा भूरिकीर्तिने दूतों द्वारा अंगूर आदि विविध प्रकारके फलोंसे भरी हुई बहुमूल्य पेटियां भेजीं ॥२-४॥ उनको देखकर रामने उसे भीतर सीताके पास भेजवा दिया। उस समय सीता अपने सखियोंके साथ क्रीडाभवनमें थीं ॥५॥ उन पिटारियोंको देखा तो बड़ी उत्सुकताके साथ खोल-खोलकर कुछ पिटारियाँ देखीं, किन्तु उनके भीतर कमलका फूल भरा दीख पड़ा ॥ ६॥ तब प्रसन्न मनसे उसने उनमें से एक कमलका फूल निकाला और रामको अर्पण किये बिना ही सूंघ लिया ॥७॥ तदनन्तर पिटारियोंको पहलेकी तरह ठीक करके घरमें रखवा दिया ॥ ८॥ सभा में बैठे-बैठे ही रामको यह बात मालूम हो गयी। उन्होंने बार-बार इसपर विचार किया ॥९॥ तब उन्होंने सोचा कि सीताने यह ठीक नहीं किया, जो मेरे सूंघे बिना ही कमल सूंघ
५३२ आनन्दरामायणे [ सर्गः २२
अग्रेऽप्येवं स्त्रियः सर्वाः करिष्यन्त्यत्र वै भुवि। मत्कार्यदर्शनार्थाय तस्मात्किञ्चित्करोम्यहम् ॥११॥ एवं मनसि निश्चित्य ततः स रघुनन्दनः । हर्षयंश्च गृहं गत्वा पूर्ववज्जानकीं मुदा ॥१२॥ रञ्जयामास विविधैर्नानाच्छाद्यादिकौतुकैः । संप्रदर्श्य पेटिकाश्च सर्वास्तच्चक्रे महन्महः ॥१३॥ आनीय दर्शयामास फलपुष्पादिपूरिताः । रामोऽपि दृष्ट्वा ताः सर्वाः समुद्घाट्य पृथक् पृथक् ॥१४॥ प्रेषयामास भवने गेहेषु दश पञ्च च । फलादीनां पेटिकाश्च नानावाद्यैर्विचित्रिताः ॥१५॥ मातृणां सकलानां च गृहेष्वपि तथा पुनः । गुरुयोः सुहृदां चापि मन्त्रिणां च गृहेस्तथा ॥१६॥ पौराणां चापि गेहेषु सेवकानां गृहेष्वपि । दासीभ्यश्च शुभा दत्त्वा पेटिकाः सप्त पञ्च च ॥१७॥ सीतायै शतशो दत्त्वा मुदा तभ्यो रघूत्तमः। फलानि दश पञ्चाथ स्वयं भुक्त्वा तत परम् ॥१८॥ पद्मादीनि सुपुष्पाणि विभज्य पूर्ववत्पुनः । सीतायै धनशो दत्त्वा स्वयमङ्गीचकार ताम् ॥१९॥ अज्ञात इव तद्वृत्तं गोपयन्मायि चेतसि । अथैकदा जनकजा हरिदिन्यामुपोषणम् ॥२०॥ कृत्वाऽपरे दिने स्नात्वा ययौ वृन्दावनं द्रुतम् । तुलसीं पूजयित्वा तां सा चकार प्रदक्षिणाः । २१॥ एतस्मिन्नन्तरे सीता त्रिगुणाङ्ग श्रमान्विता । त्यक्त्वा प्रदक्षिणामार्गं किंचिदेव चचाल सा ॥२२॥ चलितायाश्च सीतायाः पल्लवेन हि वाससः । पत्रमेकं तुलस्याश्च पपात भुवि वै तदा ॥२३॥ तन्दृष्ट्वा जानकी दृष्ट्वा द्वादश्यां त्रुटितं शुभम् । ज्ञात्वाऽधर्मः कृतश्चेति संप्राप्ताऽऽप्तत्रसा तदा ॥२४॥ ततः सा तत्करेणैव गृहीत्वा पत्रमुत्तमम् । नत्वा वृन्दावनं सीता चिक्षेप पश्चादरात् ॥२५॥ ततः प्रदक्षिणां कृत्वा प्रार्थयित्वा मुहुर्मुहुः । तुलसीं सा ययौ गेहं रञ्जनाय राघवम् ॥२६॥ एतस्मिन्नन्तरे तत्र नारदश्च समाययौ । वीणावाद्यस्वनेनैव कुर्वन्कीर्तनमुत्तमम् ॥२७॥ पालय मां दीनेमिति राघवेति पुनः पुनः । पालय मां दीनेमिति मनुं पञ्चदशाक्षरम् २८॥
लिया । १० । यदि मैं इस समय ना रह जाता हूँ तो सीताके दिखाये हुए मार्गपर चलकर सब स्त्रियाँ ऐसा ही करने लगेंगी। इसलिए मन्ताका हलका करना बचा है । ११ । ऐसा निश्चय करके राम पूर्ववत् सीताके घर पहुंचे ॥ १२ ॥ वहां सदाकी तरह विविध प्रकारके फल-कौतुक करके उन्होंने सीताको प्रसन्न किया। सीताने भी वह सब पिटारियां मँगवाकर उनके आगे रख दीं। वे सब नाना प्रकारके फलों फूलोंसे भरी थीं। रामने भी उन्हें अलग-अलग खोलकर देखा । १३ । १४ । उनमेंसे पन्द्रह पिटारियाँ भाइयोंके यहाँ भिजवा दीं। इसके बाद सब माताओंके पास भेजीं। तथा वैसी ही जोड़ों सुग्रीवादि के, मन्त्रियों, गुरुजनों, पुरवासियों, सबको तथा दासियोंके घर भी पांच सात पिटारियाँ भिजवायीं । इसके अनन्तर सैकड़ों पिटारियां सीताको दीं और उनमेंसे स्वयं भी दस पाँच फल निकालकर खाए ॥ १५ ॥ १८ ॥ इसके बाद कमल आदि श्रेष्ठ-श्रेष्ठ फूलोंका पूर्ववत् विभक्त करके सैकड़ों फूल सीताका दिये और स्वयं भी लिये ॥ १९ ॥ किन्तु सीताने रामकी शपथ दिला दी थी अतः मुंह मूंद लिया था उस बातको जानते हुए भी राम अनजान जैसे बन रहे। इसके अनन्तर एक दिन सीताने एकादशीका व्रत किया २०। दूसरे दिन वे वृन्दावन ( तुलसीका बगीचा ) में गयीं। वहाँ तुलसीकी पूजा करके प्रदक्षिणा करने लगीं ॥ २१ ॥ उस समय एकादशीका व्रत करनेसे उन्हें थकावट-सी लगी थी। उसस प्रदक्षिणाका मार्ग छोड़कर वे दूसरी ओर चलने लगीं ॥ २२ ॥ चलते-चलते सीताके कपड़ेका पल्ला लगनेसे तुलसीका एक पत्र टूटकर पृथ्वीपर गिर पड़ा ॥ २३ ॥ द्वादशीके दिन उस गिरे पत्रको देखकर सीताने सोचा—'ओह ! मैनें बड़ा भारी अधर्म कर डाला' यह सोचकर वे कुछ भयभीता-सी हो गयीं ॥ २४ ॥ इसके पश्चात् सीताने वह पत्र उठा लिया और उसे प्रणाम करके आदरसे उसी वृन्दावनमें फेंक दिया ॥ २५ ॥ ऐसा करनेके बाद प्रदक्षिणा करके बारम्बार प्रार्थना की, फिर महलमें जाकर रामचन्द्रजीका मनोरंजन करने लगीं ॥ २६ ॥ इसी समय वीणा बजाते और हरिकीर्तन करत हुए नारदजी वहाँ आ पहुँचे ॥ २७ ॥ वे आते ही "मुझ दीन-
सर्गः २१] राज्यकाण्डम् (उत्तरार्द्धम्) २५३
कीर्तयामास स मुनिर्वारं वारं मुदान्वितः । कलकण्ठस्वरेणैव महापातकनाशनम् ॥ २९॥
॥ पालय मां दीनं राघव पालय मां दीनम् ॥ इति मन्त्रः
तं मुनिं राघवो दृष्ट्वा प्रत्युद्गम्याथ भक्तितः । नत्वाऽऽसने मणिनये वासयामास सादरम् ॥३०॥
ततः प्रक्षाल्य दम्पती सीतया रघुनन्दनः । धेनुं निवेद्य गायेन्द्रीं पूजयामास तं मुनिपुङ्गवम् ॥३१॥
हेमपात्रं भोजनार्थं मुनेरग्रे निवेश्य च । परिवेशणार्थं श्रीरामः प्राह सीतां जानकीम् ॥३२॥
सीताऽपि कामधेनूत्थपरमान्नानि विगृह्य सा । हेमपात्रे नरोत्कृष्टानानेतुं परिवेशकम् ॥३३॥
कर्तुं कङ्कणमञ्जीरकिङ्किणीनूपुरस्वना । सा ययौ नारदः प्राह श्रीरामवं तदा ॥३४॥
राम राजीवपत्राक्ष नाहं सीतासमर्पितम् । दिव्यमन्नमहं चाद्य करिष्यामि नृपोत्तम ॥३५॥
तन्मुनेर्वचनं श्रुत्वा सीताऽऽसीच्चकिता तदा । प्रहृतं च समादाय भ्रमेण मुन तदा ॥३६॥
पप्रच्छ कारणं व्यग्रः सर्वकर्ता स्वयं प्रभुः । किं कारणं वद मुने किमर्थमनयाऽर्पितैः ॥३७॥
अभुङ्क्त्वं भोजनं नाद्य करोषि मुनिपुङ्गव । इति रामवचः श्रुत्वा नारदो वाक्यमब्रवीत् ॥३८॥
नारद उवाच
सीतयाऽद्य कृतं पापं किन्न वेत्सि नृपै प्रभो । यदि त्वं नैव जानासि तर्हि शृणु वदामि त ॥३९॥
द्वादश्यां तुलसीपत्रमनयाऽद्य निकृन्तितम् । यद्यसत्यं तर्हि पश्य गत्वा वृन्दावने प्रभो ॥४०॥
संक्रमेषु चतुर्दश्योर्द्वादश्योः पानपर्वसु । तुलसीं न हरेन्मर्त्योभृग्वङ्गारकवासरे ॥४१॥
नष्टे सूर्येन्दुग्रहणे प्रसूतावशचे तथा । तुलसीं ये निकृन्वन्ति च्छिन्दन्ति हरेः शिरः ॥४२॥
द्वादश्यां तुलसीपत्रं धात्रीपत्रं तु कार्तिके । लुनाति यो नरो गच्छेन्नारकानतिगर्हितान् ॥४३॥
अकाले तुलसीपत्रं छेदयेत्तपः श्रियः पुमान् । पत्रमेकं ब्रह्महत्यासममाहुर्मनीषिणः ॥४४॥
एवं तु वचनं सर्वमुनिभिर्हि प्रकीर्तितं । पुरुषाणामयं दोषस्तत्र स्त्रीणां कथाऽत्र का ॥४५॥
की रक्षा करो, हे राघव ! मेरा पालन करो" इस महापातक नाशक पञ्चदशाक्षर मन्त्रका सहर्ष उच्चारण करने लगे ॥ २८ ॥ २९ ॥ 'पालय मां दीनम्, राघव पालय मां दीनम्' यह पञ्चदशाक्षर मन्त्रका स्वरूप है । राम नारदको देखते ही उठ खड़े हुए । उन्होंने आगे बढ़कर प्रणाम किया और आसनपर बिठाला । तब सादर पूजन किया ॥ ३० ॥ सीताके साथ रामने मुनिवर पैर धोय और गोदान दिया इसके पश्चात् उनके सामने सुवर्णका पात्र रक्खा और सीतासे परोसनेके लिये साम्प्रत कहा ॥ ३१ ॥ ३२ ॥ सीता भा कामधेनुसे उत्पन्न अच्छे अच्छे मिष्टान्न परोसनेके लिये कङ्कण मञ्जीर तथा नूपुरका ध्वनि करती हुई चलीं। सीताको चलती देखकर नारदने रामसे कहा हे राम ! हे राजन्पद्माक्ष !! मैं आज सीताके हाथसे परोसे हुए दिव्यान नहीं खाऊंगा ॥ ३३-३५ ॥ मुनिकी बात सुनकर सीता घबरा गयी और सब कुछ करनेवाले स्वयं प्रभु राम-ने भी अनजान बनकर विस्मित हो व्यग्रभावसे पूछा-कहो मुनिराज ! आज आप सीताके हाथका अन्न क्यों नहीं ग्रहण करते ? इस प्रकार रामकी बात सुनकर नारदने कहा-॥ ३६-३८ ॥ आज इन्होंने एक बड़ा पाप किया है। सो क्या आपको नहीं मालूम है ? अच्छा मैं ही सुनाता हूं ॥ ३९ ॥ आज द्वादशीको इन्होंने तुलसी-पत्र तोड़ डाला है। यदि आप मेरी बात सच न मानते हों तो स्वयं चलकर देख लीजिये ॥ ४० ॥ संक्रान्ति, चतुर्दशी, द्वादशी, प्रतिदिन सबेरे-सांझके समय, भृगु और मङ्गलके दिन तथा दोपहरके बाद, सूर्य-चन्द्रग्रहणके समय, घरमें सन्तति होनेपर या किसीका देहान्त होनेपर जो लोग तुलसीका पत्र तोड़ते हैं, वे मानो तुलसीका पत्र न तोड़कर भगवान्का सिर काटते हैं ॥ ४१ । ४२ । जो द्वादशीको तुलसीपत्र तोड़ता है या कात्तिकमासमें आंवलेकी पत्तियां तोड़ता है, वह अतिशय निन्दित नरकमें जाता है ॥ ४३ ॥ जो लोग असमयमें तुलसीका एक भी पत्र तोड़ते हैं। विद्वान् लोग ऐसोंको ब्रह्महत्यारा कहते हैं ॥ ४४ ॥ इस प्रकारका वचन समस्त मुनियोंने कहा है। फिर जब पुरुषोंके लिये ऐसा नियम बना हुआ है तो स्त्रियोंके लिये क्या