श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)
Srimad Ananda Ramayana Hindi
महर्षि वाल्मीकि / अज्ञात द्वारा
स्रोत: Srimad Ananda Ramayana Complete 9 Kandas with Hindi Translation (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें३८ आनन्दरामायणे [सर्गः ४
दर्शनान्मोत्सवांस्तत्र चकार गुरुणा द्विजैः । ततस्ते वटवः सर्वे हाहाकृत्य मुनीश्वरम् ॥ ५७॥ इमं निवेदयामासुः समाधिंविगमे मुनेः । स मुद्गलोऽपि तच्छ्रुत्वा विस्मयेनाब्रवीद्वटून ॥ ५८॥ को लक्ष्मणः किमर्थं कम्प्याज्ञया सोऽहरद्द्रुमम् । विदित्वा सकलं वृत्तमागच्छध्वं त्वरान्विताः ॥ ५९॥ तथेति ते दशरथं गत्वा प्रोचुस्त्वरान्विताः । कस्त्वं किमर्थमानीता वल्ल्यो लक्ष्मणहस्ततः ॥ ६०॥ तान्दृष्ट्वा क्रोधसंयुक्तान् राजा चिन्तायुतोऽब्रवीत् । अहं दशरथो वल्ल्यो भरतार्थे ममाज्ञया ॥ ६१॥ आनीता मुनये सर्वे ब्रूध्वं नतिपुरःसराः । अहमप्यागमिष्यामि मुनिं सांत्वयितुं जवात् ॥ ६२॥ ततस्ते मुनये सर्वं वृत्तान्तमथवर्णयन् । श्रुत्वा गमस्य पितरं क्रोधं संहृत्य वेगतः ॥ ६३॥ दर्शनार्थं मतिं चक्रे तावद्ददृशे नृपः पुरः । दृष्ट्वा करपुटं तं प्रणमंतं नृपोत्तमम् ॥ ६४ ॥ प्रार्थयन्तं समुत्थाय पूजयामास सादरम् । रामाद्या नृपपुत्राश्च कौसल्याद्या नृपस्त्रियः ॥ ६५॥ प्रणम्यथ मुनिं स्तुन्वा तस्थुमुद्गलभार्यया । सुमत्य पूजिताः सर्वा राजदारा विशेषतः ॥ ६६॥ ततो दशरथः प्राह मुनिं स्तुत्वा पुनः पुनः । मयाऽपराधितं राज्ञा क्षम्यतां तत्त्वया मुने ॥ ६७॥ मुनिर्दशरथं प्राह ह्युपकारो महान् कृतः । नोचेत्कथं दर्शनं मे ध्यानस्थस्य सुतस्य ते ॥ ६८॥ भार्यास्य समीपस्थ नृवेषस्य हि मायया । इति तस्य वचः श्रुत्वा दृष्ट्वा तुष्टं मुनीश्वरम् ॥ ६९॥ उवाच नृपतिर्नत्वा किंचित्प्रष्टुमना मुनिम् । ज्ञात्वा नृपस्य स मुनिर्हृद्गतं प्रष्टुकामुकम् ॥ ७०॥ एकांते तुलसीखण्डे नीत्वा तं नृपमेव सः । पप्रच्छ किं ते वाञ्छाऽस्ति वदस्व कथ्यते मया ॥ ७१॥ तमब्रवीद्दशरथः श्रीरामस्य हि भावि यत् । हिताहितं सविस्तारं ज्ञातुमिच्छे मुनीश्वर ॥ ७२ नृपस्य वचनं श्रुत्वा राजानं मुनिरब्रवीत् । मुद्गल उवाच साक्षान्नारायणो विष्णुः सर्वव्यापी जनार्दनः ॥ ७३ ॥
हृाकर रामको हृदयसे लगाया। उस समय उन्होंने आनन्दस गुरु तथा ब्राह्मणो द्वारा अनेक उत्सव कराये। उधर समाधिस निवृत्त होनेपर सब वटुकोंने हाहाकार करके मुनिको सब हाल सुनाया। तब मुद्गल मुनि विस्मित होकर वटुकोंसे कहने लगे— ॥ ५४-५८ ॥ जाओ, यह लक्ष्मण कौन है, किस लिये और किसके कहनस बूटियों सं गया है। शीघ्र इस बातका पता लगाकर आओ ॥ ५९ ॥ 'अच्छा' कहकर उन्होंने दशरथके पास जाकर पूछा कि तुम कौन हो और तुमने लक्ष्मणक द्वारा जड़िय क्यों मंगवायी हैं ? ॥ ६० ॥ उन्हें क्रुद्ध देखकर राजा चिन्तापूर्वक कहने लगे कि मैं राजा दशरथ हूँ, लक्ष्मण मेरे कहनेसे भरतके लिये जड़िये ले आया है। मेरा नमस्कार कहकर मुनिसे यह सब वृत्तान्त कह दें। मैं भी मुनिकंपे समझानेके लिये शीघ्र ही आ रहा हूँ ॥ ६१ ॥ ६२ । लौटकर वटुकन मुनिका राजाका नाम आदि कह सुनाया। रामके पिताका नाम सुना ता मुनिने क्रोधको रोक तथा शीघ्र जाकर राजासे मिलनेका विचार किया ही था कि इतनेमें राजा दशरथ स्वयं आकर सामने खड़े हो गये और हाथ जोड़ प्रणाम करके प्रार्थना करने लगे। तब खड़े होकर मुनिन उनका सादर पूजा की । राम आदि राजार्क पुत्र तथा कौमल्या आदि राजाकी स्त्रियं भी मुनिका प्रणाम करके उनका स्तुति करती हुई खड़ी हो गयीं। मुद्गल मुनिको भार्या सुमतिने विशेषरूपसे राजाकी स्त्रियांका सत्कार किया ॥ ६३-६६ । राजाने बारम्बार स्तुति करके मुनिसे कहा-हे मुनि ! मुझसे जो अपराध हुआ है। उसको क्षमा करें ॥ ६७ । मुनिने महाराज दशरथसे कहा कि नहीं, तुमने मेरा बड़ा भारी उपकार किया है। नहीं तो ध्यानयोग्य और मायासे मनुष्यका रूप धारण किये हुए, सीताके सहित आपके पुत्र र मका दर्शन मुझे कैसे मिलता ? मुनिके वचन सुन तथा उन्हें प्रसन्न देखकर राजाने नमस्कार करके उनसे कुछ पूछना चाहा । इतनेमें मुनि राजाके हृदयकी बात जान गये और एक ओर तुलसीकी झाड़ीमे ले जाकर वे स्वयं राजासे कहने लगे—हे राजन् ! कहो, तुम्हारी क्या पूछनेकी इच्छा है, मैं उसका उत्तर दूंगा । ६८-७१ । राजाने कहा—हे मुनीश्वर ! रामका भविष्य कैसा है ? मैं उसका