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श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)

Srimad Ananda Ramayana Hindi

महर्षि वाल्मीकि / अज्ञात द्वारा

स्रोत: Srimad Ananda Ramayana Complete 9 Kandas with Hindi Translation (उद्गम)

DevanagariHindipublished811 पृष्ठ

३८ आनन्दरामायणे [सर्गः ४

दर्शनान्मोत्सवांस्तत्र चकार गुरुणा द्विजैः । ततस्ते वटवः सर्वे हाहाकृत्य मुनीश्वरम् ॥ ५७॥ इमं निवेदयामासुः समाधिंविगमे मुनेः । स मुद्गलोऽपि तच्छ्रुत्वा विस्मयेनाब्रवीद्वटून ॥ ५८॥ को लक्ष्मणः किमर्थं कम्प्याज्ञया सोऽहरद्द्रुमम् । विदित्वा सकलं वृत्तमागच्छध्वं त्वरान्विताः ॥ ५९॥ तथेति ते दशरथं गत्वा प्रोचुस्त्वरान्विताः । कस्त्वं किमर्थमानीता वल्ल्यो लक्ष्मणहस्ततः ॥ ६०॥ तान्दृष्ट्वा क्रोधसंयुक्तान् राजा चिन्तायुतोऽब्रवीत् । अहं दशरथो वल्ल्यो भरतार्थे ममाज्ञया ॥ ६१॥ आनीता मुनये सर्वे ब्रूध्वं नतिपुरःसराः । अहमप्यागमिष्यामि मुनिं सांत्वयितुं जवात् ॥ ६२॥ ततस्ते मुनये सर्वं वृत्तान्तमथवर्णयन् । श्रुत्वा गमस्य पितरं क्रोधं संहृत्य वेगतः ॥ ६३॥ दर्शनार्थं मतिं चक्रे तावद्ददृशे नृपः पुरः । दृष्ट्वा करपुटं तं प्रणमंतं नृपोत्तमम् ॥ ६४ ॥ प्रार्थयन्तं समुत्थाय पूजयामास सादरम् । रामाद्या नृपपुत्राश्च कौसल्याद्या नृपस्त्रियः ॥ ६५॥ प्रणम्यथ मुनिं स्तुन्वा तस्थुमुद्गलभार्यया । सुमत्य पूजिताः सर्वा राजदारा विशेषतः ॥ ६६॥ ततो दशरथः प्राह मुनिं स्तुत्वा पुनः पुनः । मयाऽपराधितं राज्ञा क्षम्यतां तत्त्वया मुने ॥ ६७॥ मुनिर्दशरथं प्राह ह्युपकारो महान् कृतः । नोचेत्कथं दर्शनं मे ध्यानस्थस्य सुतस्य ते ॥ ६८॥ भार्यास्य समीपस्थ नृवेषस्य हि मायया । इति तस्य वचः श्रुत्वा दृष्ट्वा तुष्टं मुनीश्वरम् ॥ ६९॥ उवाच नृपतिर्नत्वा किंचित्प्रष्टुमना मुनिम् । ज्ञात्वा नृपस्य स मुनिर्हृद्गतं प्रष्टुकामुकम् ॥ ७०॥ एकांते तुलसीखण्डे नीत्वा तं नृपमेव सः । पप्रच्छ किं ते वाञ्छाऽस्ति वदस्व कथ्यते मया ॥ ७१॥ तमब्रवीद्दशरथः श्रीरामस्य हि भावि यत् । हिताहितं सविस्तारं ज्ञातुमिच्छे मुनीश्वर ॥ ७२ नृपस्य वचनं श्रुत्वा राजानं मुनिरब्रवीत् । मुद्गल उवाच साक्षान्नारायणो विष्णुः सर्वव्यापी जनार्दनः ॥ ७३ ॥

हृाकर रामको हृदयसे लगाया। उस समय उन्होंने आनन्दस गुरु तथा ब्राह्मणो द्वारा अनेक उत्सव कराये। उधर समाधिस निवृत्त होनेपर सब वटुकोंने हाहाकार करके मुनिको सब हाल सुनाया। तब मुद्गल मुनि विस्मित होकर वटुकोंसे कहने लगे— ॥ ५४-५८ ॥ जाओ, यह लक्ष्मण कौन है, किस लिये और किसके कहनस बूटियों सं गया है। शीघ्र इस बातका पता लगाकर आओ ॥ ५९ ॥ 'अच्छा' कहकर उन्होंने दशरथके पास जाकर पूछा कि तुम कौन हो और तुमने लक्ष्मणक द्वारा जड़िय क्यों मंगवायी हैं ? ॥ ६० ॥ उन्हें क्रुद्ध देखकर राजा चिन्तापूर्वक कहने लगे कि मैं राजा दशरथ हूँ, लक्ष्मण मेरे कहनेसे भरतके लिये जड़िये ले आया है। मेरा नमस्कार कहकर मुनिसे यह सब वृत्तान्त कह दें। मैं भी मुनिकंपे समझानेके लिये शीघ्र ही आ रहा हूँ ॥ ६१ ॥ ६२ । लौटकर वटुकन मुनिका राजाका नाम आदि कह सुनाया। रामके पिताका नाम सुना ता मुनिने क्रोधको रोक तथा शीघ्र जाकर राजासे मिलनेका विचार किया ही था कि इतनेमें राजा दशरथ स्वयं आकर सामने खड़े हो गये और हाथ जोड़ प्रणाम करके प्रार्थना करने लगे। तब खड़े होकर मुनिन उनका सादर पूजा की । राम आदि राजार्क पुत्र तथा कौमल्या आदि राजाकी स्त्रियं भी मुनिका प्रणाम करके उनका स्तुति करती हुई खड़ी हो गयीं। मुद्गल मुनिको भार्या सुमतिने विशेषरूपसे राजाकी स्त्रियांका सत्कार किया ॥ ६३-६६ । राजाने बारम्बार स्तुति करके मुनिसे कहा-हे मुनि ! मुझसे जो अपराध हुआ है। उसको क्षमा करें ॥ ६७ । मुनिने महाराज दशरथसे कहा कि नहीं, तुमने मेरा बड़ा भारी उपकार किया है। नहीं तो ध्यानयोग्य और मायासे मनुष्यका रूप धारण किये हुए, सीताके सहित आपके पुत्र र मका दर्शन मुझे कैसे मिलता ? मुनिके वचन सुन तथा उन्हें प्रसन्न देखकर राजाने नमस्कार करके उनसे कुछ पूछना चाहा । इतनेमें मुनि राजाके हृदयकी बात जान गये और एक ओर तुलसीकी झाड़ीमे ले जाकर वे स्वयं राजासे कहने लगे—हे राजन् ! कहो, तुम्हारी क्या पूछनेकी इच्छा है, मैं उसका उत्तर दूंगा । ६८-७१ । राजाने कहा—हे मुनीश्वर ! रामका भविष्य कैसा है ? मैं उसका

सर्गः ४ ] सारकाण्डम् १९


भूभारहरणार्थाय तत्रापि वरदानतः । अवतीर्णोऽस्ति न्यक्को हि तव पुण्यमहोदयात् ॥७४॥
अधर्मस्य विनाशं च वृद्धिं धर्मस्य सादरम् । निर्दलनं हि दुष्टानां सज्जनानां च पालनम् ॥७५॥
करिष्यति महानेष तव पुत्रो रघूत्तमः । दशवर्षसहस्राणि दशवर्षशतानि च । ७६
करिष्यति महद्राज्यं गते त्वयि दिवं नृप । सप्तद्वीपपतिर्भार्ये भविष्यति नृपो महान् ॥७७॥
द्वौ तौ भविष्यतः पुत्रौ चतस्रश्च स्नुषास्तथा । चतुर्विंशतिपौत्राश्च पौत्र्यस्तु द्वादशैव हि । ७८।
असंख्याताः प्रपौत्राद्या भविष्यान्त सूनस्य ते । कियदिनेय्यं दंडार्ण भोक्तुं हि दंडके ॥७९॥
गमिष्यति ततः पश्चान्महद्राज्यं करिष्यति । तत्तस्य वचनं श्रुत्वा नृपः प्राह मुनिं पुनः ॥८०॥

दशरथ उवाच
का वृंदा कस्य भार्या सा कथं शप्तो हरिस्तया । तन्यत्रं विस्तरेणैव कथयस्व मुनीश्वर ॥८१॥

मुद्गल उवाच
पुरा जलंधरेणामीद्युद्धं श्रीशंकरस्य च । ईशापातिव्रतबलाद्रक्षितं विष्णुना तदा ॥८२॥
ज्ञात्वा तद्दक्षितपथा पार्वत्या घर्षणादिना । जालंधरपुरं गत्वा तद्द्न्यपुटभेदनम् । ८३.
पातिव्रत्यस्य भंगाय वृंदायाश्चाकरोन्मतिम् अथ वृंदारका देवी स्वप्नमध्ये ददर्श ह ॥८४.
भर्तारं महिषारूढं तैलाभ्यक्तं दिगंबरम् । दक्षिणाशागतं मुण्ड तमसाऽप्यावृतं तदा ॥८५।
ततः प्रबुद्धासा बाला सं स्वप्नं स्वं विचिन्तती । कुत्रापि नालभच्छर्म गोपुराट्टालभूमिषु । ८६।
वनः सखीद्वययुता नगरेयानमागता । वनाद्वनान्तरं याता ददर्शातीव भीषणौ ॥८७॥
राक्षसौ सिंहवन्नादौ दंष्ट्रानयनभीषणौ । तौ दृष्ट्वा विह्वलाऽतीव पलायनपरा तदा ॥८८।
ददर्श तापसं शांतं मशिष्यं मौनमास्थितम् ततस्तत्कण्ठम सज्य निउबाहुलती मयात् ॥८९।
मुने मां रक्ष शरणभागतामित्यभाषत । तत्तस्या वचनं श्रुत्वा ध्यान मुक्त्वास वै मुनिः ॥९०।


हित-अहित जानना चाहता हूँ ॥ ७२ ॥ राजाकी बात सुनकर मुनि मुद्गल कहने लगे—साक्षात् नारायण तथा शय्याश्रो जनार्दन विष्णुभगवान् पृथ्वीका भार उतारने तथा पूर्वजन्ममें आपको वरदान देनेके कारण आपके पुण्य-प्रतापसे स्वयं अवतरे हैं। ये अधर्मका नाश करके धर्मकी वृद्धि करेंगे। रामचन्द्रजी दुष्टोंका दलन करके सज्जनोंका पालन करेंगे हे नृप ! आपके देवलोक चले जानेपर ये दस हजार दस सौ वर्ष तक राज्य करेंगे। ये सप्तद्वीपके अधिपति और महान् राजा होंगे ॥ ७३-७७ ॥ इनके दो पुत्र और चार पुत्रवधुएं होंगी। चौबीस पौत्र और बारह पौत्रिए होंगी। आपके पुत्र रामके पश्चात् असंख्य होंगें । कुछ दिनोंके लिए ये दण्डकारण्यमें दंड प्राप्त शास्ता पुडात जायंग उसके बाद विशाल राज्य करेंगे । यह सुनकर राजाने फिर मुनिसे कहा ॥ ७८-८० ॥ राजा दशरथ बोले- वृन्दा कौन थी तथा किसकी स्त्री थी ? उसने भगवान्‌को क्या शाप दिया ? हे मुनीश्वर ! यह सब विस्तारपूर्वक कहें ॥ ८१ । मुद्गल बोले- पूर्वकालमें जलन्धर नामका एक दैत्य था। तृष्णा उसका बड़ी पतिव्रता स्त्री थी। उसके पातिव्रतके बलसे वह शिवजीके साथ युद्ध करके भी नहीं हारा। तब भगवान् विष्णु पार्वतीसे उसका कारण जानकर उनके कथनानुसार जालन्धरपुर गये। वहां धर्मध्वजका भरण करके वृन्दाका पातिव्रत भङ्ग करनेके लिए उन्होंने उसके साथ भोग करनेका विचार किया, तभी वृन्दारवीने स्वप्नमें अपने पति को तेलसे नहाये, नंगे शरीर, भैंसेपर चढ़कर दक्षिण दिशाको जाते, सिर मुड़ाये तथा तमेंसे आच्छादित देखा। जब वह बाला जागी तो स्वप्नपर विचार करने लगी। गोपुर छत तथा अटारी आदिवर उसे कहीं चैन नहीं मिला ॥ ८२-८६ ॥ तब वह अपनी दो सखियोंको साथ लेकर नगरके बाहर बागमें मन बहलाने लगी । वहाँ एकसे दूसरे और दूसरेसे तीसरे वनमें वह जब फिरने लगी, तब उसको भयानक सिंहके समान गर्जन करनेवाले और भयंकर दांत तथा नेत्रवाले दो राक्षस दिखाई दिये । उनका देख तथा विह्वल होकर वह इधर-उधर भागने लगी। उसे वहाँ सहसा शिष्योंसे युक्त एक मौनव्रतधारी शांत तपस्वी दिखायी दिये। तब वह अपनी दोनों भुजारूपिणी

४० आनन्दरामायणे [ सर्गः ४

उन्मील्य नयने वृन्दां हृदि दृष्ट्वाऽब्रवीद्गुरुः । तिष्ठ त्वं बालिके ह्यत्र मा भयं कुरु सर्वथा ॥९१॥
इत्युक्त्वा पुरतो दृष्ट्वा राक्षसौ मुनिसत्तमः । निर्भर्त्सयन्तौ हुंकारैः क्रोधेन महता वृतः ॥९२॥
तौ तहुंकारस्रस्तौ पलायनपरौ तदा । तत्सामर्थ्यं मुनेर्दृष्ट्वा सा विस्मयावृता ॥९३॥
प्रणम्य दण्डवद्भूतौ मुनिं वचनमब्रवीत् ।
वृन्दोवाच
रक्षिताऽद्य त्वया घोराद्भयादस्मान्कृपानिधे । ९४॥
किंचिद्विज्ञप्तुमिच्छामि कृपया तद्वदस्व यत् । जलंधरो हि मे भर्ता रुद्रं योद्धुं गतः प्रभो ॥९५॥
स तत्रास्ते कथं युद्धे तन्मे कथय सुव्रत । मुनिस्तद्वाक्यमाकर्ण्य कृपयोर्ध्वमवैक्षत ॥९६॥
तावत्कपा समायातौ तं प्रणम्याग्रतः स्थितौ । उत्तमाङ्गाभूलतासंज्ञाप्रयुक्तौ भगनांतरात् ॥९७॥
गत्वा क्षणाद्गोदारस्य वानरावग्रतः स्थितौ । शिरःकरद्वयञ्चैव दृष्ट्वाऽन्विततनयस्य सा ॥९८॥
पपात मूर्च्छिता भूमौ भर्तृव्यसनदुःखिता । कमंडलुजलैः सिक्त्वा मुनिनाऽऽश्वासिता तदा ॥९९॥
रुदित्वा सुचिरं वृन्दा तं मुनिं वाक्यमब्रवीत् ।
वृन्दोवाच
कृपानिधे मुनिश्रेष्ठ जीवयैनं मुने प्रियम् ॥१००॥
त्वमेवास्य पुनः शक्तो जीवनाय मदो दम ।
मुनिरुवाच
नायं जीवयितुं शक्यो रुद्रेण निहतो युधि ॥१०१॥
तथापि स्वकृपाविष्टः पुनः संजीवयाम्यहम् । इत्युक्त्वान्तर्दधे यावत्तावत्सागरनन्दनः ॥१०२॥
हृदाश्लिष्य तद्वक्त्रं चुचुंब प्रीतमानसः । अथ वृन्दाऽपि भर्तारं दृष्ट्वा हर्षितमानसा ॥१०३॥
रेमे तद्वनमध्यस्था तद्युक्ता बहुवासरम् कदाचित्सुरतास्यान्ते दृष्ट्वा विष्णुं समेव हि ॥१०४॥

लगाम् उनके गलम डालकर भयभीतभावसे कहने लगी हे मुने ! आपकी शरणमें आया हुई मुझ अबलाकी रक्षा करिए । उनके इस आर्त बचनको सुना तो ध्यान छोड़कर मुनिने उसे अपने हृदयसे लिपटी हुई पाया । तब वे उससे कहने लगे-बालिके ! तुम यहीं निर्भय होकर रहो । ॥८-९१ ॥ उसे इस प्रकार समझाकर मुनिश्रेष्ठने डराने तथा हुंकार करते हुए उन दोनों राक्षसोंको अपने सामने देखा तब क्रुद्ध होकर वे भी हुंकार करने लगे । उनके हुंकारसे त्रस्त होकर वे दोनों राक्षस भाग गये मुनिके इस अद्भुत सामर्थ्यको देखा तो वृन्दा आश्चर्यचकित होकर भूमिपर दण्डवत् प्रणाम करके कहने लगी, वृन्दा बोली हे कृपानिधे ! मुझ नापन इस घोर संकटसे बचा लिया । अब मै आपसे कुछ पूछना चाहती हूँ । सो कृपा करके कहिये । हे प्रभो ! मेरा पति जलंधर शिवजीसे युद्ध करने गया है । हे सुव्रत ! वह वहाँ किस दशामें है, यह मुझे बताइए । मुनिने उसको बात सुनकर कृपापूर्वक ऊपरकी ओर देखा तो ऊपरसे दो बन्दर आये और मुनिको प्रणाम करके सामने खड़े हो गये । उनके हाथों में वृन्दाने अन्चितनय जलन्धरका कठा सिर, हाथ तथा धड़ देखा । यह देखनेके साथ ही वह पतिवियोगके दुःखसे दुःखित तथा मूर्च्छित होकर धरतीपर गिर पड़ी। तब मुनिने उसने मुँहपर कमण्डलुका जल छिड़का और सचेत करके शांत किया ॥ ९२-९९ ॥ बहुत समय तक रोनेके वाद वृन्दा कहने लगी – हे कृपानिधे ! हे मुनिश्रेष्ठ ! आप मेरे प्रिय पतिको जीवित कर दें ॥ १०० ॥ मेरी समझमें आप ही इसको जिलानेमें समर्थ हैं। मुनि बोले - युद्धमें शिवजीके द्वारा निहत जलन्धरको जीवित करना असम्भव है । फिर भी तुमपर दया करके मै इसे जीवित करता हूँ। ऐसा कहकर वे अन्तर्धान हो गये। इतनेमें सागरनन्दन जलन्धर प्रगट हो गया और आनन्दसे वृन्दाका आलिङ्गन करके मुख चुम्बन करने लगा। वृन्दाने भी अपने पतिको देखा ही प्रसन्न होकर उस वनमें बहुत दिनोंतक उसके साथ रमण करती रही । एक दिन सम्भोगके अनन्तर उसी जलन्धरको विष्णु के रूप में

सर्गः ४ ]

सर्गः ४ ] सारकाण्डम् ४१

निर्मर्त्स्य क्रोधसम्पृक्ता वृन्दा वचनमब्रवीत् ।

वृन्दोवाच

तव ज्ञानं हरे शीलं परदाराभिगामिनः ॥१०५॥ त्वं ज्ञातोऽसि मयाऽप्यद्य मायावी प्रच्छन्नतामसः । यौ त्वया मायया द्वौ तौ स्वकीयौ दर्शितौ मम ॥१०६॥ तावेव राक्षसौ भूत्वा तव भार्यां विनेष्यतः । जयविजयनामानौ ज्ञातौ कृत्रिमरूपिणौ ॥१०७॥ त्वं चापि भार्यादुःखार्तो वने करिष्यह्यवशान् । अत्र सर्वेश्वरोऽपि त्वं यत्ते शिष्यौ ममागता ॥१०८॥ पुण्यशीलसुशीलौ तौ कपिरूपधरावुभौ । अतस्ते वानरैग्मस्तु संगतिर्दण्डके वने ॥१०९॥ तद्रूपधरः शिष्यो यस्तार्योऽत्रेति वोधयन् । इत्युक्त्वा सा तदा वृन्दा प्रविवेश हुताशनम् ॥११०॥ ततो जालंधरो दैत्यो निहतो युधि शंभुना । तस्माद्राजंस्तदानीं तौ कुम्भकर्णदशाननौ ॥१११॥ जातौ सागरमध्ये तौ लङ्कायामधुना स्थितौ । नीत्वा जनकजां बत्लां पंचवर्षांस्तु मातृवत् ॥११२॥ पालयित्वाऽथ षण्मासात् रामबाणान्मरिष्यति । रामोऽपि वालिनं हत्वा सुग्रीवेण समन्वितः ॥११३॥ शिलाभिः सागरं बद्ध्वा सीतामादाय यास्यति । यानापत्यविलासांश्च सप्तद्वीपप्ररक्षणम् ॥११४॥ करिष्यति दयितया बंधुभिश्च यथामुखम् । इदं गोप्यं त्वया राजन् कथनीयं न कुत्रचित् ॥११५॥

श्रीशिव उवाच

इत्युक्त्वा मुद्गलः सर्वं भावि रामस्य कौतुकात् । चरित्रं दर्शयामास यदा यद्यत्कारिष्यति ॥११६॥ तच्छ्रुत्वा नृपतिः श्रुत्वा तुष्टः पप्रच्छ तं पुनः । पूर्वजन्मनि कश्चाहं किं मया सुकृतं कृतम् ॥११७॥ तन्मे वद मां ब्रह्मन् यस्माज्जातो हरिः सुतः । मम साक्षाद्रामचंद्रो लक्ष्मीः सीता म्भूत्स्नुषा ॥११८॥ इति तस्य वचः श्रुत्वा नृपमाह पुनर्मुनिः ।

मुद्गल उवाच

आसीन्मन्थाद्रिविषये करवीरपुरे पुरा ॥११९॥ ब्राह्मणो धर्मवित्कश्चिद्धर्मदत्त इति श्रुतः । विष्णुव्रतकरः सम्यग्विष्णुसूपूजारतः सदा ॥१२०॥

दशा ता क्रुद्ध होकर धिक्कारती हुई वृन्दा बोली-हे हर ! तुम्हारे इस परस्त्रीगमनरूपी व्यवहारको धिक्कार है ॥१०५॥ मैंने अब जाना कि तुम मायावी तथा बनावटी तपस्वी हो। तुमने अपने निजी दो दूतोंको वानर-रूपमें मुझे दिखलाया था, वे ही दोनों राक्षस होकर तुम्हारी स्त्रीका हरण करेंगे। वे दोनों कृत्रिमरूपधारी जय विजय तुम्हारे पाखंड थे ॥१०२-१०७॥ सर्वेश्वर होनेपर भी तुम स्त्रीके वियोगसे दुःखी होकर वानरोंके साथ वनमें चक्कर लगाओगे। तुम्हारे वे दोनों पुण्यशील-सुशील शिष्य जो वानर बनेंगे। उनमेंसे तार्य नामका शिष्य बहुरूप धारण करेगा। और भी बहुतसे वानर दण्डकवनमें तुमको मिलेंगे। इतना कहकर वृन्दा अग्निमें प्रविष्ट हो गयी ॥१०८-११०॥ इस प्रकार वृन्दाका पातिव्रत खण्डित होनेके बाद जलन्धर वास्तविकरूपमें शंभुके द्वारा मारा गया। हे महाराज दशरथ ! इस शापके कारण इस समय रावण कुम्भकर्ण जन्म लेकर समुद्रके बीच लङ्कामें निवास करते हैं। वे जबरदस्तीसे जनककी पुत्री सीताको ले जाकर छः मास तक माताकी तरह रक्षण करनेके पश्चात् रामके बाणोंसे मारे जायेंगे। राम भी वालीको मारकर सुग्रीवके साथ पत्थरोंसे समुद्रको बाँध तथा उस पार जाकर सीताको ले आयेंगे। पश्चात् प्राणप्रिया सीता तथा बन्धुओंके साथ राम सौख्यान्तःकरणका विलास करते हुए सप्तद्वीपोंकी रक्षा करेंगे। हे राजन् ! यह गोप्य बात किसीको न बतलाइएगा ॥१११-११५॥ श्रीशिवजी बोले-हे पार्वती ! इस प्रकार मुद्गलने रामका समस्त भावी चरित्र बता दिया ॥११६॥ इन सब बातोंको सुन तथा प्रसन्न होकर राजा दशरथने फिर पूछा कि मैं कौन था और मैंने कौनसे सुकृत किये थे कि जिससे साक्षात् भगवान् रामचंद्रजी मेरे पुत्र बने तथा साक्षात् लक्ष्मी सीता होकर मेरी पुत्रवधू हुईं। हे ब्रह्मन् ! यह सब हाल मुझे कह सुनाइये ॥११७॥११८॥ यह सुनकर मुद्गल मुनि राजासे फिर कहने लगे। मुनि बोले-हे राजन् ! सह्याद्रिपर करवीरपुरमें परम धर्मज्ञ धर्मदत्त नामसे विख्यात एक ब्राह्मण

४२आनन्दरामायणे[ सर्गः ४

द्वादशाक्षरविद्यायां जपनिष्ठोऽनिशंक्रियः। कदाचित्कार्तिके मासि हरिजागरणाय सः ॥ १२१॥ रात्र्यां तुर्यावशेषायां जगाम हरिमन्दिरम् । हरिपूजोपकरणान् प्रगृह्य व्रजता तदा ॥ १२२॥ तेन दृष्टा समायाता राक्षसी भीमनिःस्वना। वक्रदंष्ट्रा ललज्जिह्वा विनग्ना रक्तलोचना ॥ १२३॥ दिगंबरा शुष्कमांसा लंबोष्ठी घर्घरस्वना । तां दृष्ट्वा भयसंत्रस्तः कंपितावयवस्तदा ॥ १२४॥ पूजोपकरणं सर्वः पयोमिश्राह्नदलात् । संस्मृत्य यद्धरेर्नाम तुलसीयुक्तवारिणा ॥१२५॥ मोहमद्वाग्णि तस्मात्तत्पापं लयमागतम् । अथ संस्मृत्य सा पूर्वजन्मकर्मविपाकजम् ॥ १२६॥ स्वां दशामब्रवीत्तीव्रं दंडवच्च प्रणम्य सा ।

कलहोवाच
पूर्वकर्मविपाकेन दशामेतां गताऽस्म्यहम् ॥१२७॥
मन्कथं तु पुनर्विप्र याम्यहं गतिमुत्तमाम् ।

मुद्गल उवाच
तां दृष्ट्वा प्रणतामार्ता वदमानां स्वकर्म सा ॥१२८॥
अतीव विस्मितो विप्रस्तदा वचनमब्रवीत् ।

धर्मदत्त उवाच
केन कर्मविपाकेन त्वं दशामीदृशीं गता ॥ १२९॥
कुतः प्राप्ता च किंशीला तत्सर्वं विस्तराद्वद ।

कलहोवाच
सौराष्ट्रनगरे ब्रह्मन् भिक्षुनामाऽभवद्द्विजः ॥१३०॥
तस्याहं गृहिणी भद्रात् कलहाख्याऽतिनिष्ठुरा । न कदाचिन्मया भर्तुर्वचसाऽपि शुभं कृतम् ॥ १३१॥
नार्पितं तस्य मिष्टान्नं भर्तुर्वचनभंगया । पाककाले यथा नित्यं यद्यच्चान्नं मनोरमम् ॥ १३२॥
तत्तत्पूर्वं स्वयं भुक्त्वा पश्चाद्भर्त्रे निवेदितम् । एकदा स पतिर्मित्रं मम वृत्तं न्यवेदयत् ॥ १३३॥
नैव शृणोति मे पत्नी मद्वाक्यं किं करोम्यहम् । तेन श्रुत्वा तु सकलं शृण संचित्य वै हृदि ॥१३४॥
उवाच मन्पतिं किंचिद्युक्तिं नां ते रटाम्यहम् । निषेधोक्त्या यद्वस्त्वं गृहिणी सा करिष्यति ॥ १३५॥

रहता था वह विष्णुके व्रतोंको करनेवाला, भली भाँति विष्णुपूजामें रत, सदा बारह अक्षरके मन्त्र ( ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ) के जपमे निष्ठा रखनेवाला तथा अभ्यागतोंका प्रेमी था । एक बार वह कार्तिक-में रात्रिजागरण करके चौथे प्रहर पूजाकी सामग्री लेकर हरिमन्दिरमें जा रहा था कि रास्तेमें सहसा उसने एक भयानक थरथर शब्द करती हुई, टेढे दाँतोवाली, जीभको हिलाती, नितान्त नग्न लाल नेत्रोंवाली, जिसके शरीरका सर्व माँस सूख गया था— ऐसी लम्बे होठों और नग्न शरीरवाली एक राक्षसीको आते देखा । उसको देखकर ब्राह्मण भयसे काँप उठा । तब वह समस्त पूजाकी सामग्री तथा जल आदि फेंक-फेंककर उसको मारने लगा । वह नारायणका नाम लेता हुआ उसके ऊपर तुलसीपत्र तथा जल फेंकता जाता था । बस, इसीसे अनायास उस राक्षसीके सब पाप घुल गये और उसको पूर्वजन्मके कर्मोंका स्मरण हो आया ॥ ११८-१२६ ॥
तब वह ब्राह्मणको दंडवत् प्रणाम करके कहने लगी । कलहा बोली— हे विप्र ! मैं पूर्वजन्मके कर्मोंके फलस्वरूप इस दशाको प्राप्त हुई हूँ । हे ब्रह्मन् ! सौराष्ट्रनगरमें भिक्षुनामका एक ब्राह्मण रहता था । मैं उसकी कलहा नामकी बड़ी निष्ठुर स्त्री थी । मैने कभी वचनसे भी पतिकी भलाई नहीं की ॥ १२७-१३१ ॥ रसोईमें कभी मैं मिष्टान्न बनाती तो पतिसे झूठा बहाना करके तथा उसकी बात टालकर मिठाई नहीं देती थी। भोजनके समय प्रतिदिन जो जो अच्छी चीज बनाती पहिले उसको मैं खा लेती थी तब पतिको देती थी। एक दिन मेरे पतिने जाकर अपने एक मित्रसे कहा कि मेरी स्त्री मेरी बात नहीं मानती । मैं क्या करूँ ? उसके

[ अ० ४ ] उत्तरखण्डम् ४१

तद्वाक्येन कृतार्थोऽहं यन्मुनिश्रेष्ठ दर्शितम् । तथैव मित्रवाक्येन गृहमेत्य पतिर्मम ॥१३६॥
मामाह ह्यटने प्राप्ते भोजनार्थं समाह्वय । मम मित्रं महद् रूपं तच्छ्रुत्वा स्वपतेर्वचः ॥१३७॥
तदा मन्दधियोक्तः स मित्रं ते साधुसम्मतम् । ममाह्वयाम्यद्यभोज्यार्थमथैनं ब्राह्मणोत्तमम् ॥१३८॥
ततो मया समाहूतः स्वयं गत्वा पतेः सखा । उत्सृज्य निषेधोक्त्या कार्यमप्याययन्मतिः ॥१३९॥
एकदा स पितुःश्राद्धा ह्ययाहू. स्वपतिर्मम । मामाह दयिते श्राद्धं न करिष्याम्यहं पितुः ॥१४०॥
तद्वाक्यं स्वपतेः श्रुत्वा मया विप्रा निमन्त्रिनाः श्या धिक् धिक् कृतो मर्ता कथं श्राद्धं करोषि न १४१॥
दोषमं न जानामि का गतिस्ते भविष्यति ततः पुनः स मामाह पक्वान्नश्च मा कुरु ।१४२॥
एवं निमंत्रयस्वैकं मा विस्तारं कुरु प्रिये । तत्तस्य वचनं श्रुत्वा मयाऽष्टादश भूसुराः ॥१४३॥
निमन्त्रितास्तु श्राद्धार्थं पक्वान्नानि कृतानि हि ततः पुनः स मामाह प्रिये शृणु वचो मम ॥१४४॥
अद्य माहार्हता मिष्टं पाक् भुक्त्वा ततः परम् । स्त्रीपोच्छिष्ट स्वयं विप्रान् परिवेषणमाचर ॥१४५॥
तन्मया कथितं श्रुत्वा स पतितिष्कृतः पुनः कथमादौ स्वयं भुक्त्वा पश्चाद्विप्रान्समर्पयेत् ॥१४६॥
एवमेवं निषेधोक्त्या श्राद्धं सांगं चकार सः । पिण्डदानादिकं कृत्वा मामाह स पतिः पुनः ॥१४७॥
अहभोराषण व्यथ करिष्यामि न संशयः । तत्तस्य वचनं श्रुत्वा मिष्टान्नेन स भोजिनः ॥१४८॥
नतो दैववशाद्भूत्वा विस्मृत्य प्राह मां पुनः । नान्दी पिण्डान् क्षिपेदाप प्रशौचे परमादरात् ॥१४९॥
ततो मया शौचकूपे नीत्वा पिण्डा विसर्जिताः । ततः खिन्नमना विप्रो हाहेत्युक्त्वा स्थितोऽभवत् १५०
उत्तोलितेत्य मामाह पिण्डान्मा त्वं बहिः कुरु । उत्तोलार्य शौचकूपे मया पेडा बहिः कृताः ॥१५१॥
मनः पुनः स मामाह पिण्डान्तीर्थे क्षिपस्व मा । तदा तीर्थे मया क्षिप्तास्ते पिण्डाः परमादरात् ॥१५२॥

वचन यह सुनकर उसने विचार किया ॥ १३०--१३४ ॥ तदनन्तर उसके घर पतिरस का कुछ कहा था,
** मैं कहता हूँ । उधर कहा हे मित्र ! तुम अपना स्वास उल्टा बात कहा करो, तब वह तुम्हार मना किये
** कामक अवश्य करेगी और तुम्हारा अभीष्ट सिद्ध होगा । मित्रका बात सुन तथा 'बहुत अच्छा कह कर
मेरा पति घरपर आया ॥ १३५ ॥ १३६ । वह मुझसे कहन लगा-हे प्रिये ! इस मित्रको तुम कभी भोजनके लिये
न बुलाना ॥१३७॥ यह बड़ा दुष्ट है । पतिके इस वचनको सुनकर मैने कहा कि तुम्हारा मित्र ब्राह्मणों श्रेष्ठ
तथा बड़ा सज्जन है। उसको मैं आज हीभोजनके लिये बुलाता हूँ ॥ १३७॥ १३८ ॥ तब मैं स्वयं जाकर पतिके
मित्रको बुला लायी । इसप्रकार मेरा पति विपरीत कहनेपर ही काम बन आया ॥ १३६ ॥ एक दिन मेरा पति अपने
पिताकी श्रद्धतिथि जानकर कहने लगा हे दयित ! मै आज अपने पिताका श्राद्ध नहीं करूँगा ॥ १४० ॥
यह सुनकर मैंने उसके कहनेके प्रतिकूल इष्टपुट ब्राह्मणोंको निमन्त्रण दे दिया और पतिसे कहा कि तुमको धिक्कार
है जो अपने पिताका श्राद्ध भी नहीं करते ॥ १४१॥ तुम पुण्य पापको नही जानते । इसलिय न जाने तुम्हारी
क्या गति होगी । तब उसने कहा कि यदि करना ही है तो केवल एक ब्राह्मणको निमन्त्रण देना अधिक
झगड़ा नही बढ़ाना । पकवान-मिठाई आदिमे व्यर्थ खर्च नहीं करना । यह सुनकर मैने एक साथ अठारह ब्राह्म-
णोंको निमन्त्रण दे दिया । श्राद्धके लिये अनेक प्रकारके पक्वान बनाये । फिर पतिने मुझसे कहा कि आज तुम
अपने कर साथ मिष्टान्न भोजन करके बादमे अपना जूठा भोजन ब्राह्मणोको परोसना ॥ १४२-१४५ ॥ यह सुन-
कर मैने पतिको धिक्कारा और कहा कि तुमको धिक्कार है। पहिले स्वयं खाकर पश्चात् ब्राह्मणोंका भोजन करानेके
योग्य कहते हो ? ॥ १४६ ॥ इस प्रकार विपरीत कथनसे पतिने मेर द्वारा विधिवत् श्राद्ध करवाया, पिण्डदान
आदि करके फिर उन्होंने मुझसे कहा-॥ १४७ ॥ मैं आज कुछ भी न खाकर उपवास करूँगा । यह सुनकर
मैंने उन्हे खूब मिष्ठान्न खिलाया ॥ १४८ ॥ बादमे दैववशात् भूलकर पतिने मुझसे कहा कि इन पिण्डोको
तुम अत्यंत प्रेमसे किसी पवित्र तीर्थके अन्दर फेंक आओ ॥ १४९ ॥ यह सुनकर मैने उन पिण्डोको ले जाकर पाखाने-
में डाल दिया । यह देखा तो वह विप्र हाय-हाय करने लगा ॥ १५० ॥ अनन्तर सोचकर मुझसे कहा कि
हाहा, पाखानेसे पिडोंको बाहर न निकालना । तब शौचकूपमे उतरकर मैने उन पिडांका निकाल लिया

४५ आनन्दरामायणे [ सर्गः ४

एवं मया कदा भर्तुर्वचनं न कृतं तदा । कलहप्रियया नित्यं मय्युद्विग्नमना यदा ॥१५३॥ परिणेतुं ततोऽन्यां वै मनश्चक्रे पतिर्मम । ततो विषं समादाय प्राणस्त्यक्तो मया द्विज ॥१५४॥ अथ बद्ध्वा वध्यमानां मां निन्युर्यमकिंकराः । यमश्च मां तदा दृष्ट्वा चित्रगुप्तमपृच्छत ॥१५५॥

यम उवाच अनया किं कृतं कर्म फलं शुभमथाशुभम् । प्राप्नोत्येषा च तत्कर्म चित्रगुप्तावलोकय ॥१५६॥

कलहोवाच चित्रगुप्तस्तदा वाक्यं मन्दंस्मयंस्तमुवाच ह ।

चित्रगुप्त उवाच अनया तु शुभं कर्म कृतं किंचिन्न विद्यते ॥१५७॥ मिष्टान्नं भुज्यमानेयं न भर्त्रे तदर्पितम् । अथ बगुलीयोन्यां स्वनिष्ठायाञ्च तिष्ठतु ॥१५८॥ पतिं दृष्ट्वा सदा रुष्टा नित्यं कलहकारिणी । विष्ठाश शूकरीयोन्यां तस्मात्तिष्ठत्वियं यम ॥१५९॥ पाकभांडे सदा भुंक्ते गुप्तं चैका यतस्ततः । तस्माद्दोषाद्बिलाडाङ्गेष्ववजातान्यभक्षिणी ॥१६०॥ भर्त्तारमपि चोद्दिश्य ह्यात्मघातः कृतोऽनया । तस्मात्प्रेतशरीरेऽपि तिष्ठत्वेकाऽविनिंदिता ॥१६१॥ अतश्चैषा मरुद्देशे प्रापितव्या ह्यमेश्चरैः । तत्र प्रेतशरीरस्था चिरं तिष्ठत्वियं ततः ॥१६२॥ ऊर्ध्वं योनित्रयं चैषा भुङ्क्त्वशुभकारिणी ।

कलहोवाच ततो दूतैः प्रापिताऽहं मरुद्देशे क्षणाद्द्विज ॥१६३॥ दत्त्वा प्रेतशरीरं मां गतास्ते स्वस्थलं प्रति । साऽहं पंचदशाब्दानि प्रेतदेहे स्थिता किल ॥१६४॥ क्षुत्तृड्भ्यां पीडिताऽत्यर्थं दुःखिता स्वेन कर्मणा । ततः क्षुत्पीडिता नित्यं शरीरं वणिजस्त्वहम् ॥१६५॥ प्रविश्य दक्षिणे प्राप्ता कृष्णावेण्यास्तु संगमे । तत्राऽहं मन्निता यात्रास्वावलस्य शरीरतः ॥१६६॥ उग्रविष्णुगणैर्दूरमपाकृष्टा बलादहम् । ततः क्षुत्क्षामया दृष्टो भ्रमन्त्या त्वं मया द्विज ॥१६७॥


॥ १५३ ॥ फिर पतित कहा—देखा, कहीं इनको किसा ताड़न न डालना । तब प्रेत ने जाकर उस पिंडोका बड़े आदरपूर्वक सायंकाल डाल दिया ॥ १५४ ॥ इस तरह मुझ कलहप्रियाने जब कभी भी पतिका सीधा तौरपर कहा हुआ काम नहीं किया, तब दुःखित होकर उसने अपना दूसरा ब्याह करना निश्चित किया । हे द्विज ! तब मैने जहर खाकर अपने प्राण त्याग दिये ॥ १५३ ॥ १५४ ॥ तब यमदूत मुझे बाँधकर यमराजके पास लेगये । यमराज मुझे देखकर चित्रगुप्तसे कहने लगे ॥ १५५ ॥ यमराजने कहा—चित्रगुप्त देखो, इसने अच्छा कर्म किया है या बुरा, जिससे इसको वैसा ही फल दिया जाय ॥ १५६ ॥ कलहा कहन लगा—यह सुनकर चित्रगुप्त मुसकमुकात हुए कहने लगे कि इसने तो कोई अच्छा कर्म कभी किया नहीं। यह मिष्टान्न बनाकर खाती थी परन्तु अपने पतिको नहीं देती थी। इसलिये यह बगुलीकी योनिम जाकर अपना ही विष्ठा खानकाश्ये वणिंगा बने प्रतिदिन झगड़ा एव पातक द्वेष करनेके कारण यह विष्ठा भक्षण करनेवाली शूकरयोनिम पैदा हो। हे यम इधर-उधर छिपकर भोजन बनानेके पात्रमे अकेला ही खान्वाली यह बिल्ली बन ॥१५७ १६०॥ पातक उद्देश्य इसने आत्मघात किया है। इस कारण यह अविनिन्दित प्रेतयोनिमे अकेली रहे ॥ १६१ ॥ हे यम ! इसम दूतोंके द्वारा मरुद्देशमे भेज देना चाहिये, वहाँ जा नया प्रेत बनकर यह बहुत काल पर्य्यन्त निवास कर ॥ १६२ यह पापिनी उपर्युक्त सभी योनियोंको भोगे। कलहा बोली-हे द्विज ! तब यमदूतोन क्षण ही भरम मुझे मरुद्देश पहुंचा दिया ॥ १६३॥ यहाँ प्रेतयोनिमें डालकर वे अपने स्थानको चले गय। मै पन्द्रह वर्ष तक प्रेतयोनि रही ॥ १६४ ॥ अपने किये हुये कमोके अनुसार मै सदा भूख-प्याससे अत्यन्त दुःखिनी रहने लगी। इस प्रका नित्य भूखस पीडित हो एक बनियके देहम पैठकर मै दाक्षणम कृष्णा-वेणाक संगमपर आयी। वहाँ आत्म प्रिय तथा विष्णके गणान मुझे बरबस उस वणिक्के शरीरसे अलग करके दूर भगा दिया। तदनन्तर हे द्विज

सर्गः ५] | सारकाण्डम् | ४५

सर्गः ५] | सारकाण्डम् | ४५

त्वद्धस्ततुलसीवारिसंस्पर्शाद्गतपातका । तत्कृपां कुरु विप्रेन्द्र कथं मुक्ता भवाम्यहम् ॥१६८॥ योनित्रयादग्रभावादस्माच्च प्रेतभावतः । मामुद्धर मुनिश्रेष्ठ त्वामहं शरणं गता १६९॥ इत्थं निशम्य कलहावचनं द्विजश्च तत्पापकर्ममयविस्मयदुःखयुक्तः । तद्ग्लानिदर्शनकृपाचलचित्तवृत्तिश्चिन्त्या चिरं सुवचनं निजगाद दुःखात् ॥१७०॥ इति श्रीमत्कोटिरामचरितान्तर्गते श्रीमदानन्दरामायणे वाल्मीकीये सारकाण्डे वृन्दाशापकलहाख्यानं नाम चतुर्थः सर्गः ॥ ४ ॥


पञ्चमः सर्गः

( धर्मदत्त द्वारा कलहाका उद्धार )

धर्मदत्त उवाच विलयं यांति पापानि तीर्थदानव्रतादिभिः । प्रेतदेहे स्थितायास्ते तेषु नैवाधिकारिता ॥१॥ त्वद्ग्लानिदर्शनादस्मात् खिन्नं च मम मानसम् । नैव निर्वृतिमायाति त्वामनुद्धृत्य दुःखिताम् ॥२॥ पातकं च त्ववान्त्युग्रं योनित्रयविपाकजम् । नैवान्यैः क्षीयते पुण्यैः प्रेतत्वं चातिगर्हितम् ॥३॥ तस्मादाजन्मजनितं यन्मया कार्त्तिकव्रतम् । तत्पुण्यस्यार्धभागेन सद्गतिस्त्वमवाप्नुहि ॥४॥ कार्त्तिकव्रतपुण्येन न साम्यं याति सर्वथा । यज्ञदानानि तीर्थानि व्रतान्यपि ततो ध्रुवम् ॥५॥

मुद्गल उवाच इत्युक्त्वा धर्मदत्तोऽसौ पावनामभ्यषेचयत् । तुलसीमिश्रतोयेन श्रावयन् द्वादशाक्षरम् ॥ ६ । तावत्प्रेतत्वनिर्मुक्ता ज्वलदग्निशिखापमा । दिव्यरूपधरा जाता लावण्येन यथोर्वशी ॥७.। ततः सा दंडवद्भूमौ प्रपनाम यदा द्विजम् । उवाच सा तदा वाक्यं हृष्टगद्गदभाषिणी ॥८॥

कलहोवाच त्वत्प्रसादाद्द्विजश्रेष्ठ विमुक्ता निरयादहम् । पापाब्धौ मज्जमानायास्त्वं नौभूतोऽसि मे ध्रुवम् ॥९॥

भूखों मरती एवं भ्रमण करतो हुई मैंने यहाँ तुमको देखा । १६५-१६७॥ यहाँ तुम्हारे हाथका जल तथा तुलसीसे मेरे सब पाप दूर हो गये हैं। इस कारण हे विप्रेन्द्र ! अब ऐसी कृपा करो कि जिससे भावी तीन योनियोंसे मेरी मुक्ति हो जाय। हे मुनिश्रेष्ठ मैं तुम्हारी शरणमें आयी हूँ। तुम मेरा इस प्रेतयोनिसे भी उद्धार करो। ब्राह्मणने कलहाके वृत्तान्तको सुना तो उसके पापकर्मस भय विस्मय तथा दुःखसे इस और उसकी इस ग्लानिपूर्ण दशाको देखकर कृपासे चञ्चलचित्त हो और बहुत देरतक सोचकर दुःखस इस प्रकार सुन्दर वचन कहना आरम्भ किया ॥ १६८-१७०। इति श्रीमत्कोटिरामचरितान्तर्गते श्रीमदानन्द-रामायणे वाल्मीकीये 'ज्योत्स्ना' भाषाटीकायां सारकाण्डे वृन्दाशापकलहाख्यानं नाम चतुर्थ सर्गः ॥ ४ ॥

धर्मदत्त बोले—तीर्थ, दान तथा व्रतके द्वारा पाप क्षीण होते हैं, परन्तु प्रेतशरीरमें रहनेसे तुम्हारा उनपर अधिकार नहीं है ॥ १ ॥ तुम्हारी इस दुर्दशाको देखकर मेरा मन बहुत दुःखी हो रहा है। जबतक तुम्हारा इस दुःखसे उद्धार न होगा, तबतक मुझको शान्ति नहीं मिलेगी । २ ॥ यह नीच प्रेतत्व और तीन योनियोंको भोगानेवाला तुम्हारा महान् पाप साधारण पुण्योंसे क्षीण न होगा । ३ ॥ इस कारण जन्मसे लेकर अबतक किये हुए अपने कार्त्तिकव्रतके पुण्यका आधा भाग मैं तुमको देता हूँ। उससे तुम सद्गतिको प्राप्त होओगी ॥ ४ ॥ कार्त्तिकव्रतके पुण्यके समान यज्ञ-दान-तीर्थ आदि कोई भी नहीं हो सकता' यह बात निश्चित है ॥ ५ ॥ मुनि मुद्गल कहने लगे—हे राजन् ! इतना कहकर धर्मदत्तने ज्यों ही उसके ऊपर तुलसीदल तथा जल छिड़ककर द्वादश अक्षरोंका मंत्र सुनाया। त्यों ही प्रेतयोनिसे मुक्त होकर वह जलती हुई अग्निकी लपटके समान दिव्य रूप धारण करके उर्वशीके सदृश सुन्दर स्त्री बन गयी ॥ ६ । ७ ॥ तब वह ब्राह्मणके चरणोंको दण्डवत् प्रणाम करके सहर्ष गद्गद वाणीसे कहने लगी ॥ ८ ॥ कलहा बोली—हे द्विजोमें श्रेष्ठ द्विज ! आपकी कृपासे मैं नरकमें जानेसे बच गयी। पापसमुद्रमें डूबती हुई मुझ पापिनीको बचाकर आपने

९६आनन्दरामायणे[सर्गः ५

मुद्गल उवाच

इत्थं सा वदती विप्र ददर्शाकाशसंप्लवम् । विमानं सुन्दरं शुभ्रं विष्णुरूपधरैर्नरैः ॥१०॥
अथ सा तद्विमानस्थैर्विमानं काशिसंनिभा । पुण्यशीलसुशीलाभ्यांस्तरो गणसेविता ॥११॥
तद्विमानं तदाऽऽपश्यद्व्रतदंतः सविस्मयः । पपात दण्डवद्भूमी दृष्ट्वा तौ पुण्यरूपिणौ ॥१२॥
पुण्यशीलसुशीलौ च समुत्थाप्याथतं द्विजम् । समभ्यनन्दयन् वाणीं प्रोचतुर्धर्मसंयुताम् ॥१३॥

गणावूचतुः

साधु साधु द्विजश्रेष्ठ यस्त्वं विष्णुरतः सदा । दीनानुकंपी धर्मज्ञो विष्णुव्रतपरायणः ॥१४॥
श्रावस्त्यास्त्वया होमकृत् कार्त्तिकव्रतम् । तत्र तस्यार्धदानेन पुण्यं द्विगुण्यमागतम् ॥१५॥
सम्पुष्टस्यार्धभागेन यदस्याः पूर्वकर्मजम् । जन्मान्तरशतोद्भूतं पापं तद्विलयं गतम् ॥१६॥
स्नानेनैव गतं पापं यदस्याः पूर्वकर्मजम् । हरिजाग्रत्त्वांरीश विमानेदमहागतम् ॥१७॥
वैकुण्ठं नीयते साधो नानाभोगयुता त्वियम् । दीपदानभवैः पुण्यैस्तैजसं रूपमाथिता ॥१८॥
तुलसीपूजनार्थश्च कार्त्तिकव्रतकैः शुभैः । विष्णुसान्निध्यगा जाता त्वया दत्तः कृपानिधे ॥१९॥
त्वमप्यस्य भवस्यान्ते भार्यया सह यास्यसि । वैकुण्ठभुवनं विष्णोः सान्निध्यं च सरूपताम् ॥२०॥
ते धन्याः कृतपुण्यास्ते तेषां च सफलो भवः । यैरेकचित्तवृत्तिनो विष्णुर्भक्त्या त्वया यथा ॥२१॥
सम्यगारराधितो विष्णुः किं न यच्छति देहिनाम् । औत्तानपादिर्वैनेय ध्रुवत्वे स्थापितः पुरा ॥२२॥
यन्नामस्मरणादेव दन्तिनो यान्ति सद्गतिम् । ग्राहगृहीतो नागेन्द्रो यन्नामस्मरणाद्युग ॥२३॥
विमुक्तः संनिधिं प्राप्तो जानीह्य जयसंज्ञकः । ग्राहोऽप्य विजयो जाम्ता श्रीविष्णोश्चितनादभूत् ।
एतन्मवाऽर्चिता विष्णुस्तत्सान्निध्यं प्रदास्यति । बह्वन्यदग्मष्ट्राणि भार्याद्वययुतस्य ते ॥२४॥


भावका काम किया है ॥ ९ ॥ मुद्गल मुनि कहने लगे कि इस प्रकार कह ही रही थी कि आकाशमार्गमे विष्णुरूपधारी गणांसे युक्त एक सुन्दर विमान उतर रहा है ॥ १० ॥ बादम विमानमे बैठे हुए पुण्यशील तथा सुशीत आदिने काशीका विमानपर बैठा लिया और मणगण उनका सेवा करने लगे ॥ ११ ॥ व्रतदत्तको वह विमान देखकर बडा आश्चर्य हुआ और उसने पुण्यवान् तथा पुण्यरूपित मुनीशको देखकर उसके चरणाम दण्डवत् प्रणाम किया ॥ १२ ॥ उन दोनोंने भी उस विप्रको उठाकर तथा अभिनन्दन करके धर्मयुक्त वाणीमे कहा ॥ १३ ॥ गण कहने लगे — हे द्विजश्रेष्ठ बहुत-बहुत, तुम धन्य हो। तुम दीनांपर दया करते हो, धर्मका जानने हो और सदा विष्णुभक्तिम रत रहत हुए विष्णुके व्रतमे तत्पर रहते हो ॥ १४ ॥ तुमने जो वैश्वानस ही कार्त्तिकमासका व्रत करके आज उस पुण्यका आधा फल दान दिया है, इससे तुम्हारा पुण्य दुगुना हो गया है ॥ १५ ॥ तुम्हारे आज पुण्यसे इसके सैकड़ो जन्मके पापकर्मोंका नाश हो गया ॥ १६ ॥ तुम्हारे कराये हुए हरिव्रतोद्युक्त जलके स्नानसे ही इसके पूर्वमे किये हुए सब पाप दूर हो गये हैं। अब दिव्य-जागरणके पुण्यसे इसके लिए यह विमान आया है ॥ १७ ॥ हे साधो! तुम्हारे दानके पुण्यसे इस तेजस्वी रूप धारण करनेवालीको हम विविध सुख भोगनेके लिए वैकुण्ठ ले जा रहे हैं ॥ १८ ॥ हे कृपानिधे ! तुम्हारे दिये हुए तुलसीपूजन तथा कार्त्तिकव्रतके पुण्यसे यह विष्णुभगवान्‌के सान्निध्यको प्राप्त हुई है ॥ १९ ॥ तुम भी इस जन्मके अन्तमे स्त्रीसहित वैकुण्ठमे जाकर विष्णुके सान्निध्य तथा सरूपताको प्राप्त होगे ॥ २० ॥ हे व्रतदत्त ! वे लोग धन्य हैं और वह धर्मात्मा तथा सफ़ल जन्मवाले हैं, जिन्होंने कि तुम्हारी तरह विष्णुकी आराधना की है ॥ २१ ॥ सम्यक्भाँति पूजित विष्णुभगवान् मनुष्योंको क्या नहीं देते ? उत्तान पूर्वसमयमें राजा उत्तानपादके पुत्रको ध्रुवपदपर स्थापित किया ॥ २२ ॥ जिनके नामस्मरणमात्रसे ही मनुष्य सद्गतिको प्राप्त हो जाता है । प्राचीन समयमे मकरसे पकड़ा हुआ गजेन्द्र जिसके नामका स्मरण करके मुक्त होकर विष्णुके सान्निध्यको प्राप्त हुआ और जय नामका द्वारपाल बना। ग्राह भी विष्णुका चिन्तन करके विजय नामका द्वारपाल बना था ॥ २३ ॥ २४ ॥ इसी प्रकार तुमने भी विष्णुभगवान्‌का पूजन किया है।

सर्गः ५ ] सारकाण्डम् ४७

सर्गः ५ ] सारकाण्डम् ४७

ततः पूर्णे वर्षे प्राप्ते यदा यास्यसि भूतलम् । सूर्यवंशेऽद्भुतो राजा विख्यातंस्त्वं भविष्यसि ।।२६।। नाम्ना दशरथस्तत्र भार्याद्वययुतः पुमान् । तृतीयेयं तदा भार्या पुण्यश्लेषार्धभागिनी ।।२७।। कलहा कैकेयी नाम्नी भविष्यति न संशयः । तत्रापि तव सामीप्यं विष्णुर्दास्यति भूतले ।।२८।। आत्मानं तव पुत्रत्वं प्रकल्प्यामत्कार्यकृत् । रामनाम्ना रावणादीन् हत्वा राज्यं करिष्यति ।।२९।। तवाजन्मव्रतादस्माद्विष्णोस्तुष्टिकरात्परम् । न यज्ञा न च दानानि न तीर्थान्यधिकानि वै ।।३०।। अतस्त्वमग्रेऽपि धर्मज्ञ नित्यं विष्णुव्रते स्थितः । त्यक्तमात्सर्यदम्भोऽपि भव त्वं समदर्शनः ।।३१।। कार्तिके माधवे माघे चैत्रे मन्मथतुष्टये । प्रत्यब्दं त्वं धर्मदत्त प्रातःस्नायी सदा भव ।।३२।। एकादशीव्रते निष्ठ तुलसीवनपालकः । ब्राह्मणानपि गाश्चापि वैष्णवांश्च सदा भज ।।३३।। मसूरिकास्तालाबुं वृन्ताकादीनि खाद मा । एवं त्वमपि देहान्ते तद्विष्णोः परमं पदम् ।।३४।। प्राप्स्योषि धर्मदत्त त्वं तद्भक्त्यैव यथा वयम् । पुण्यशीलसुशीलाख्यौ जयश्च विजयस्तथा ।।३५।। धन्योऽसि विप्रार्थ्य यतस्त्वयैतद्व्रतं कृतं तुष्टिकारं जगद्गुरोः । यदर्थमोघात्फलमन्मुरारेः प्रणीषतेऽस्माभिरियं सलोकताम् ।।३६।।

मुद्गल उवाच

इत्थं तौ धर्मदत्तं तमुपदिश्य विमानगौ । तया कलहया सार्द्धं वैकुण्ठभवनं गतौ ।।३७।। धर्मदत्तोऽप्यसौ राजन् प्रत्यब्दं तद्व्रते स्थितः । देहान्ते परमं स्थानं भार्याभ्यामन्वितोऽन्वगात् ।।३८।। बहून्यब्दसहस्राणि स्थित्वा वैकुण्ठसद्मनि । ततः पुण्यक्षये जाते जातोऽमित्वं नृपो महान् ।।३९।। त्रिभिः स्त्रीभिर्दशरथ ते विष्णुः पुत्रतां गतः । शमोऽथ लक्ष्मणः शेषो भरतोऽब्जोऽरिमर्दनः ।।४०।। एवं सर्वं मयाऽऽख्यातं यथा पृष्टं त्वया मम । धन्यस्त्वं यस्य तनयः साक्षात्न्नारायणोऽभवत् ।।४१।।


इसलिए तुम भी दोनों स्त्रियोंके साथ कई हजार वर्ष पर्यन्त उनके सान्निध्यको प्राप्त होओगे ॥ २५ ॥ तत्पश्चात् पुण्य क्षीण होनेपर जब तुम पुनः पृथ्वीपर आओगे, तब सूर्यवंशमें बड़े प्रख्यात राजा बनोगे ॥ २६ ॥ दोनों स्त्रियां तुम्हारे साथ रहेंगी और तुम श्रीमान् दशरथ नामके राजा बनोगे। उस समय यह आध पुण्यकी भागिनी कलहा निःसन्देह कैकेयी नामकी तुम्हारी तीसरी स्त्री होगी। वहाँ पूर्वापर भी भगवान् सदा तुम्हारे सन्निकट रहेंगे ॥ २७ । २८ ॥ वे प्रभु देवताओंका कार्य साधन करनेके लिए अपने आपको तुम्हारा पुत्र बनावेंगे तथा रामनाम धारण करके रावण आदिको मारकर राज्य करेंगे ॥ २९ ॥ विष्णुको प्रसन्न करनेवाले तुम्हारे जन्मसे लेकर किये हुए इस व्रतसे बढ़कर कोई यज्ञ, दान तथा तीर्थ आदि नहीं हैं। ३०॥ इस कारण आगे भी तुम धर्मज्ञ, नित्य विष्णुक व्रतमें स्थित और मात्सर्य दम्भ आदिसे रहित होकर समदर्शी बनो ॥ ३१ ॥ हे धर्मदत्त ! प्रतिवर्ष कार्तिक, वैशाख, चैत तथा माघ इन चारो महीनोंमें प्रातःकाल स्नान करके तुम एकादशीका व्रत और तुलसीका पूजन करो ब्राह्मण, गौ तथा वैष्णवभक्तोंकी सेवामें तत्पर रहा करो ॥ ३२ । ३३॥ मसूर, सोवीर तथा बैंगन आदिका खाना छोड़ दो। हे धर्मदत्त ! ऐसा करनेसे तुम भी जय-विजय तथा पुण्यशील-सुशील आदि हम लोगोंकी तरह विष्णुके उस परम पदको उनकी भक्तिभावसे ही प्राप्त होजाओगे ॥ ३४ । ३५ ॥ हे ब्राह्मणश्रेष्ठ ! तुम धन्य हो क्योंकि तुमने जगद्गुरु विष्णुको सन्तुष्ट करनेवाला यह व्रत किया है, जिसके अमोघ पुण्यफलके प्रभावसे हमलोग भी मुरारि भगवान्की सलोकताको (समानलोकको) प्राप्त हुए हैं ॥ ३६ ॥ **मुद्गल बोले—**इस प्रकार वे दोनों धर्मदत्तको उपदेश दे तथा विमानमें बैठकर कलहाके साथ वैकुण्ठधामको चले गये ॥ ३७॥ हे राजन् ! वह धर्मदत्त भी प्रतिवर्ष उस व्रतको करके देहान्त होनेके बाद दोनों स्त्रियोंके साथ परमपदको प्राप्त हुआ ॥ ३८ ॥ बहुत वर्षों पर्यन्त वैकुण्ठ-धाममें रहकर पुण्यक्षय होनेके बाद यहाँ आकर वही तुम इतने बड़े राजा बने हो ॥ ३९ ॥ तुम अपनी तीनों स्त्रियोंके साथ यहाँ आये। विष्ण भगवान् तुम्हारे पुत्र राम बने, शेष लक्ष्मण बने, ब्रह्मा भरत बने तथा चक्र शत्रुघ्न बना ॥ ४० ॥ जो तुमने पूछा था, वह सब मैंने तुमको कह सुनाया। तुम धन्य हो। क्योंकि साक्षात् नारायण तुम्हारे पुत्र हुए हैं ॥ ४१ ॥ श्रीशिवजी

४८ आनन्दरामायणे [ सर्गः ५

इत्युक्त्वा नृपतिं पूज्य विससर्ज मुनिसत्तमः । आलिंग्य रामं सौमित्रि मेने च कृतकृत्यताम् ॥४१॥
तदा राजा स्वसैन्येन महता हर्षसमन्वितः । अयोध्यां प्रययौ द्रष्टुं गोपुशालमवेक्षिताम् ॥४२॥
नृपस्यागमनं ज्ञात्वा मन्त्रिणः परया मुदा । पताकातोरणाद्यैश्च दिव्यचन्दनसेचनैः ॥४३॥
नगरीं भूषयित्वा ते नृत्यवाद्यादिमंगलैः । निर्गताः सम्भ्रमात्तूर्णं गच्छन्तं नगरीं प्रति ॥४४॥
गम्यमानममात्याय गोपुशाङ्गलपंक्तिषु । कट्यां विधाय बाह्वग्रं स्त्रियः स्थित्वा निजं करैः ॥४५॥
सुवर्णकुसुमाद्यैश्च वर्षैः पुष्पववृष्टिभिः । काश्चिन्मार्गोपरि स्थित्वा कंचरीपादिदर्शकैः ॥४६॥
आर्तिक्याद्यैश्च राजानं सगर्भ शांतिकारकःै । पूजयन्ति स्म ताः सर्वा राजमार्ग पृथक् पृथक् ॥४७॥
एवं नानामृदंगहैनर्तकीभिश्चिताप्सु । दृश्यमाना विलोकैश्च गायकानां च गायनैः ॥४९॥
सौधोद्भवरवाद्यैश्च स्त्रीमुक्तपुष्पवृष्टिभिः । ययौ स्वशिबिरं राजा वीज्यमानः सुचामरैः ॥५०॥
सम्पूज्य जनकस्यापि भ्रातॄनलंकारवाहनेः । सन्तर्क्य योजनाद्यैश्च प्रेषयामास मैथिलम् ॥५१॥
एवं सर्वोत्सवेषु जनको वार्षिकेषु सः । निनाय मिथिलां राममनुभिः पार्थिवेन च ॥५२॥
उत्सवान्तः पूज्य तोषयामास राघवम् । रामोऽपि रमयामास लीलाभिर्नृपतिं तदा ॥५३॥
प्राप्तं षष्ठमिदं तेजञ्छ्री श्रीराघवस्य लक्ष्मणा । लग्नाभिषेकाद्वादशे वर्षे रजोधूता बभूव ह ॥५४॥
तद्वार्तां जनकः श्रुत्वा परमेष्ठिम॑मन्त्रिभिः सह । अयोध्यागमच्छीघ्रं राजा प्रत्युज्जगाम तम् ॥५५॥
परस्परं समालिङ्ग्य साकेतमिथिलाधिपौ । नृत्यवाद्यमहोत्साहैर्योध्यौ विविशुः सुखम् ॥५६॥
ततो महासभामध्येनानामण्डपपोरणैः । कदलीस्तंभमालाभिरिक्षुदंडैः सुचामरैः ॥५७॥
चतुर्द्वारैर्मण्डपैश्च घटाघोषैः सददैर्ध्वजैः । किंकिणीजालघोषैश्च विश्रान्तीवरराजिभिः ॥५८॥


बोले कि ऐसा कहकर मुनिने राजाकी पूजा की और सब विदा किया । राम लक्ष्मणका आलिङ्गन करके उन्होंने अपनेको कृतकृत्य समझा ॥४१॥ तब राजा दशरथ अत्यन्त हर्षित अपनी सेनाके साथ पुरद्वार तथा अटरियोंमे लगे हुए रमणीक अयोध्यापुरीको गये । ४२ ॥ राजाका आगमन सुनकर मन्त्रियोंने तथा पुरवासियोंने पताकाओं तथा तोरणोंसे नगरको सजा मया मण्डपोंपर चन्दन छिड़कवाकर नृत्य और मांगलिक बाजे बाजनेके साथ मुष्टाव राजाको नगरके ले अया ॥४३॥४४॥ गमको आया जानकर स्त्रियं अपने बाल्मोंका कप्परपर उठाकर पुरद्वार तथा अटरियोंका अमियोंपर जाकर खड़ा हो गयीं और अपने हाथस उनपर सुवर्ण-पुष्पोंकी वृष्टि करने लगीं । कुछ स्त्रियों मार्ग से आग मागलिक कलश और कुछ मांगलिक दीप लेकर रास्ते में सामने खड़ी हो गयीं और वह राजमार्गमे जगह-जगह ऋत्विकाम अपनी आदिस रामके सहित राजाकी पूजा करने लगीं ॥४५-४८॥ इस प्रकार अनेक मृदङ्गराम युक्त वेश्याओंके नृत्य तथा नगाड़ोंके शब्दों एवं गायकोंके गानाके साथ अवलोक डरनेवाले स्त्रियों डंग को दया पुष्पवृष्टिम आच्छादित तथा सुन्दर चमरौँसे वीज्यमान हुए राजा दशरथ अपने शिविरम गये ॥४९॥५०॥ तदनन्तर वस्त्र, अलङ्कार, अश्वगजादि वाहन तथा भोजन आदिसे राज जनकक मन्त्रियोंका सत्कार करके उन्हें मिथिला भेज दिया ॥५१॥ इस प्रकार राजा जनक प्रत्येक वार्षिक उत्सवमें रामको उनकी माताओं तथा राजा दशरथको मिथिलापुरीमें बुलाते थे ॥५२॥ राजा जनक रामको सदा सन्तुष्ट रखनकी चेष्टा करत थ । राम भी अनेक लीलाओं द्वारा राजाको आनन्दित करते थे, सुन्दरी तथा शुभा जानकी रामसे छः महीना छोटी थी। विवाहके ग्यारहवें वर्षमें वे रजस्वला हुईं ॥५३॥५४॥ यह समाचार सुनकर राजा जनक अपनी स्त्रियों तथा मन्त्रियोंके साथ अयोध्या गये। राज दशरथने भी उनका अगवानी की ॥५५॥ अयोध्यापति तथा मिथिलाधिपति दोनों परस्पर जी भरकर गले मिले। सदनन्तर नृत्य वाद्य आदि उत्सवपूर्वक सुखस अयोध्यामें प्रविष्ट हुए ॥५६॥ पश्चात् विविध मण्डपों, तोरणों, केलके स्तम्भों, पुष्पोंकी मालाओं, ईखके दण्डों, चामरों, चार दरवाजेवाले मण्डपों, घण्टा-घड़ियालके शब्दों, छोटी-छोटी घंटियोंके समुदायके शब्दों, शीशी, चंदोवों तथा दीपपंक्तियों द्वारा

सर्गः ५ ] सारकाण्डम् ४९


वसिष्ठो मुनिभिः सार्द्धं गर्भाधानविधिं शुभम् । कारयामास रामेण सीतयाश्चातिहर्षितः ॥५९॥

ततो वस्त्रालङ्कारैर्जनको नृपतिं मुदा । पूजयामास सब्रातं स्नुषापुत्रसमन्वितम् ॥६०॥

मासमेकमतिक्रम्य ययौ स्वंनगरं सुखम् । रामोऽपि सीतया सार्द्धं नानाभोगान्मुहुन्मुदान् ॥६१॥

बुभुजे हेमरत्नौघनिर्मितेषु गृहेषु सः । कस्तूरीकुङ्कुमालिप्तो रामयोर्जनितः सुखम् ॥६२॥

एवं तासां नृपसुतपत्नीनां च पृथक् पृथक् । यथाकाले विधानेषु गर्भाधानादिकेषु च ॥६३॥

आगत्य जनकश्चक्रे नानारत्नांशुकादिभिः । अयोध्यानगरीयं वै वाद्यघोषो गृहे गृहे ॥६४॥

मङ्गलानि च सर्वत्र न कुत्राप्यप्यमङ्गलम् । न दरिद्रो क्षुधा नार्त्तो नाऽऽधिव्याधिप्रपीडितः ६५।

गवादिभिश्चतुर्भिर्येपृथग्भिन्नदशारथम् । पृथग्गेहेषु भार्याभिर्गार्हस्थ्यमध्वनुष्ठितम् ॥६६।

रामः प्रातः समुत्थाय कृतशौचादिक्रियः । आरुह्य शिबिकां दिव्यां स्नानार्थं सरयू नदीम् ॥६७॥

गत्वा कूले वाहनादि विसृज्य रघुनन्दनः । गरुडस्याग्रतः पावनार्थं सरय्वाः पुलिनं मुदा । ६८।

सविधिर्विहितो गत्वा नत्वा तां सरयूनदीम् । स्नात्वा नित्यविधिं कृत्वा ब्राह्मणैः परिवारितः । ६९॥

दत्त्वा दानान्यनेकानि गोधून्याम्बरादिभिः । संपूज्य सरयू पुण्यां ब्राह्मणान् पूज्य सादरम् । ७०॥

ययौ रथे समारूह्य शुक्लवस्त्रनयोधितम् । हयैर्मनोजवाऽश्वैश्च सर्वतः परिवेष्टितम् ॥७१॥

पट्टकूलादिवसनैर्वरंगच्छंश्चादितं शुभम् । राजितारं भार्गवता सुखात्नेन प्रबोदितम् ॥७२॥

किङ्किणीजालसम्भिन्नैर्घण्टाभिर्निनादितम् । रुक्मदण्डधरैर्दृप्तैरग्रे दर्शितसम्पथम् ॥७३॥

पथि पौरजनैः सर्वैरर्चितः पुष्पवृष्टिभिः । प्राप स्वाय गृहं रामः सूर्यकोटिसमप्रभम् ॥७४॥

अवतीर्य रथाद्रामः पादयोर्धृत्य पादुके ददर्श सीतामदनपादाभ्यामाचमनां गृहम् ॥७५॥

गत्वाऽग्निहोत्रशालायां सीतयाऽऽसनमास्थितः । वाग्दौत्रादार्श्विना वह्निं हुत्वा ततः परम् । ७६॥


महान् उत्सवके साथ गुरु वसिष्ठने मुनियोंको साथ लेकर प्रसन्नचित्त सीतासहित रामका शुभ गर्भाधान-संस्कार किया । ५९-६० ।। तदनन्तर राजा जनकने स्त्रियों युक्त तथा पुत्रवधुओं सहित राजा दशरथको वस्त्र-अलङ्कार आदिसे प्रसन्नतापूर्वक पूजा क० ।। ६० ।। इस प्रकार एक मास अयोध्यामें रहकर आनन्दसे वे अपने नगरको लौट गये । राम भी सीताके साथ सुवर्ण-रत्नों आदिसे निर्मित भवनोंमें अनेक प्रकारके भोगोंको भोगते तथा उस समय रामके वदनपर सुगन्धित केशर लगा हुआ था ॥ ६१ ॥ ६२ ।। इसी प्रकार प्रत्येक राजपुत्रका व्याह गर्भाधानादिकालीन आनन्द राजा जनकने विशेष उत्सव किये और अयोध्या नगरीमे घर-घर बाजे बजे । ६३ । ६४ । सारी अयोध्या मङ्गलमयी हो गयी। कहीं भी अमङ्गलका नाम न था। उस समयमें कोई दरिद्र, ऋणी, मानसिक तथा शारीरिक दुःखसे पीडित नहीं था ।। ६५ । पश्चात् राम आदि चारों भाई अपना-अपना गिरोह हाय अलग-अलग महलोंमें गृहस्थधर्मका पालन करने लगे ।। ६६। राम प्रतिदिन प्रातः उठते तथा शौचादि कृत्यसे निवृत्त हो दिव्य पालकीपर सवार होकर स्नान करनेके लिये सरयू नदीपर जाते थे। सवारी आदिको किनारे छोड़ आनन्दसे सरयूको पवित्र करनेके लिये बालूकापर होत हुए वहीं जाते थे । ६७ ॥ ६८ ।। विधि पूर्वक सहित होकर वे सरयू नदीको नमस्कार करके स्नान तथा नित्यकर्म करते और ब्राह्मणोंका गौ भूमि, धान्य तथा सुवर्ण आदिका दान देकर पवित्र सरयू और ब्राह्मणोंकी सादर पूजा करते थे । ६९ . ७० ।। तदनन्तर सोनेके वचनोंसे बँधे हुए सुवर्णके कलगी जडितोंसे युक्त रेशम तथा मखमलके मुख्य वस्त्र द्वारा चारों ओरसे आच्छादित एवं वायुके वेगसे प्रेरित अति शोभन रथपर सवार होकर लौटते थे ॥ ७१ ॥ ७२ ॥ घुंघुरूंकी आवाजों तथा घण्टियोंके शब्दसे मण्डित उस रथके आगे सोनेकी छडियोंवाले छडीदार दौड़कर मार्ग दिखलाते चलते थे । ७३ ॥ रास्तेमें शिष्यों द्वारा पूजित तथा पुष्पवृष्टिसे आच्छादित राम करोड़ों सूर्यके समान प्रभावसम्पन्न अपने गृहमें पधारते ७४ जहाँ रथसे उतरकर चरणपादुका हाथ में पहिनकर चरण धरते। यहाँ सीताजी सदा उन्हें पवित्र तथा हाथ मुँह धोनेका जल देती थी । ७५ । पश्चात् सीता समेत राम अग्निहोत्रशालामें जा तथा आसनपर बैठकर अग्निहोत्रकी विधिसे अग्निमें हवन

५० आनन्दरामायणे [ सर्ग ५

स्फटिकस्य च लिङ्गस्य कर्ममार्गं यथाविधि । लोकानां शिक्षणार्थाय कृत्वा पूजनकन्त्वभूत् ॥७७॥ जानक्या दत्तपक्कान्नैर्नैवेद्यादि समर्प्य च । ब्राह्मणान्पूज्य दारांश्चन्तोष्य दृष्ट्वा तदाशिषः ॥७८॥ तुलसीं च गुरुं धेनुमश्वत्थं मुनिपादपम् । पूजयित्वा रविं देवं ब्रह्मयज्ञं विधाय च ॥७९॥ गुरोर्मुखाच्च पौराणीं कथां श्रुत्वा तु सीतया । गुरुं पुनः प्रपूज्याथ बन्धुभिः परिवेष्टितः ॥८०॥ प्रातराशं मृदुः पत्न्या ब्राह्मणैः परिवेषितः । नारिकेलकपित्थाम्रगुळभाण्डाम्लदधिभिः ॥८१॥ सजंब्रिक्षीपसंयवैः पक्वान्नैर्नूतनाशनैः । उपहारं मुखे कृत्वा ताम्बूलं परिगृह्य च ॥८२॥ दिव्यवस्त्राणि संगृह्य रङ्ग्याऽऽदर्शं निजं मुखम् । निरीक्ष्यैनाथ वैदेह्याऽऽरुह्य स्यन्दनमुत्तमम् ॥८३॥ वेष्टिता मन्त्रिदूताद्यैस्तूर्यध्वनिनुरःसरम् । मातृगेहं ततो गत्वा ताः प्रणम्यावेति मनः ॥८४॥ मध्या प्रदक्षिणां कृत्वा गत्वा गजगृहं ततः । सिंहासनस्थं राजानं नत्वा स्थित्वा तदाज्ञया । ८५॥ योजयामासत्यानेकानि कृत्वा गङ्गां विसर्जितः । ययौ स्यन्दनमारुह्य नृपं नत्वा पुनः पुनः ॥८६ । तूर्यगीतनिनार्दैश्च नर्तनैर्वारयोषिताम् । ययौ स्वीयं गृहं रामः स्यन्दनादवरुह्य च ॥८७॥ भूमिजादत्तपादाद्याचमनाद्यामनादिकम् । गृहीत्वा तद्धडिम्बौघा कृतं चेष्टां न्यवेदयन् ॥८८॥ सर्वं वृत्तं कौतुकेन हास्यगीतादिमङ्गलैः । रमयित्वा भूमिकन्यां दिव्यवस्त्रादिभूषिताम् ॥८९॥ ततो मध्याह्नसमये सय्यां वाऽथ सखीवृतेः । स्नात्वा माध्याह्निकं कर्म सकलं रघुनन्दनः ॥९०॥ नित्यं यत्राकरोत्स्नानं सरयूनिर्मले जले । तदाख्याऽऽभूत्तत्तीर्थे रामतीर्थमिति स्फुटम् ॥९१॥ तद्विष्टस्यानं त्रिशुबने चैत्रमासि विशेषतः । माध्याह्निकं च सप्ताद्यं ब्राह्मणैर्मित्रादिभिः ॥९२॥ इष्टैः सुवर्णपात्रेषु षिवडान्ने घृतेषु च । परिष्कृतेषु जानक्या सीतया गनिलक्षणान् ॥९३॥ कनककणमञ्जीरकिङ्किणीनपुरैरपि । नटन्त्य भोजनं चक्रे राघवो हर्षपूरितः ॥९४॥ करशुद्धिं विधायोच्चै भुक्त्वा ताम्बूलमुत्तमम् । ततः द्यूतपदं गत्वा निद्रां कृत्वा तु सीतया ॥९५॥

करते थे ॥ ७६॥ स्फटिकका कर्म करना यथार्थ उपलब्ध कर ... ने इसलिये शिवलिङ्गका पूजन करना और सीताके दिये हुए पक्वान्नादिकोंका भोग लगाते थे । तदनन्तर ब्राह्मणोंको प्रसन्न करके उन्हें दान आदिके द्वारा सन्तुष्ट करके उनका अनेक आशीर्वाद लेते थे ॥७७-७८॥ तदनन्तर तुलसी, गुरु, गौ, पीपल, शमी तथा सूर्यदेवकी पूजा और ब्रह्मयज्ञका विधान करके मादिके साथ गुरुमुखसे पौराणिक कथा सुनते थे फिर गुरुकी पूजा करके पश्चात् परिजन, बान्धवोंसे युक्त तथा बन्धुओंके साथ भोजन करते थे, जिसमें नारियल, कपित्थ, जामुन, अनार, खजूर, मट्ठा, दाल, आंवले और विविध प्रकारके पक्वान्नमें खीरवर भोजन करते थे ॥ ७९-८२॥ तत्पश्चात् दिव्य वस्त्र धारण करके शीशेमें मुख देख वैदेहीके सहित उत्तम रथपर चढ़ मन्त्री, दूत और मन्त्रिगणके साथ में भेरी आदि वाद्योंके साथ माताके महलमें गये और भूमिपर गिरकर उन्हें प्रणाम करते थे ॥८३-८४॥ फिर दाहिने आकर प्रदक्षिणा कर के राजा दशरथके महलमें जाते और वहां सिंहासनपर बैठे हुए राजाको प्रणाम करके उनका आज्ञासे बैठ जाते थे ॥ ८५ ॥ तब तदनन्तर राजसम्बन्धी अनेक कार्योंको समाप्त करके राजा उनको लौटा देते थे। तब फिर राजाको प्रणाम करके और रथपर सवार हो जाते रास्ते में तथा नाचनेके छन्दोंको सुनते हुए चले जाते तब रथसे उतरकर अपने घरमें जाते और सीताके हाथों प्रदत्त जलसे पाद हाथ मुंह आदि धोकर जो कुछ कार्य कर आये थे, वह सब सीताको कह सुनाते ॥ ८६-८८ ॥ पश्चात् दिव्य वस्त्रांग भूषित सीताको सुन्दर हास्यगान आदिके द्वारा प्रसन्न करते थे ॥ ८९ ॥ इसके बाद राम दोपहरको सरयू या घर ही में स्नान करके मध्याह्न कृत्य करते थे ॥ ९०। जिस जगह वे नित्यप्रति स्नान करते थे, उस स्थानका नाम रामतीर्थ पड़ गया ॥ ९१ ॥ तीनों लोक में वह स्थान प्रसिद्ध हो गया। विशेष करके चैत्रमासमें उसका बड़ा माहात्म्य है। मध्याह्नकृत्य करनेके बाद ब्राह्मणों, पण्डितों तथा मित्रजनोंके साथ नियत आदर रखते हुए सुन्दर परिष्कृत सुवर्णपात्रोंमें अन्नशालिदाली तथा जिनके अङ्ग-प्रत्यङ्गमें कंकण, झांझर, नूपुर और करधनी आदि गहने बज रहे थे, ऐसी सीताके साथ रघुपति राम हर्षपूर्वक भोजन करते थे ॥ ९२-९४॥ पश्चात् हाथ धो

सर्गः ५ ] सारकाण्डम् ५१

सर्गः ५ ] सारकाण्डम् ५१

पुनर्वस्त्राणि सम्धाय सुवस्त्रांश्च सदारकम् । धनुर्बाणं करं कृत्वा गथे पञ्चाऽथ बन्धुभिः ॥९६॥
मृगागमौद्यानकं दौरं दृष्ट्वा तु कातुकं च । वीक्ष्य पर्वतनद्यग्न्यां स्वार्थं गृहं पुनः ॥९७॥
सायंमध्यादि मरुत्वं पुनर्नुत्वा महेश्वरम् । शंभुं भक्त्या पुनः पूज्य कृत्वा चैवापहारकम् ॥९८॥
रत्नकांचनमणिस्वर्निर्मितं मञ्चके वरं । दिव्यप्रासादमध्यं च सीतया रघूनायकः । ९९
रात्र्यगातां विनोदेन्योन्या चक्रे ततः परम् । एव नानासमुत्सहैर्दिनेनायारुमनाः सुखम् ॥१००
एकदा राघव राजा ज्ञात्वा मुद्रलयस्ततः । वावष्टककरतश्चापि यत्रत्वं व्याप्यमानुषः ॥१०१॥
साक्षात्तनारायणं विष्णुं मन्वानुच रहः स्थितं । पप्रच्छ विनयेनैव हृदि भयं विधाय च । १०२।
राम नारायणस्त्वं हि भूभारहरणाय च । मत्तो जातोऽसि नै लोका वदन्त्यज्ञानबुद्धयः ॥१०३॥
अतः पृच्छामि ते राम म यया मोहितस्त्वहं । किंचिज्ज्ञानापदेशेन नामयाज्ञानजा मतिम् । १०४।
रागबन्धादिगेहेषु व्यथा नैवोपशाम्यति । तन्निपुत्वचनं श्रुत्वा गजानं रामनोऽब्रवीत् । १०५।

श्रीराम उवाच
शृणु राजन् प्रवक्ष्यामि तव ज्ञानार्थमुत्तमम् । शृणोतु मम मातेयं कौशल्याऽपि तव प्रिया ॥१०६॥
नश्वरं भासते चेतद्विद्य मायाद्भवं नृप । यथा शुक्तौ रौप्यभानः कामभूम्या जलस्य च ॥१०७॥
यथा रज्जौ सर्पभासो मृगतोये जलस्पृहा । तद्वदात्मनि भासोऽय कल्प्यते नश्वरोऽबुधैः १०८॥
अज्ञानादिभिर्नान्यं मन्यते न तु पण्डितैः । आत्मा शुद्धो निर्व्यतीकः सच्चिदानन्दलक्षणः । १०९।
यस्याऽज्ञानेन विधेशा ब्रह्माद्याः सकला वयम् । स्थिति-त्पत्तिविनाशार्थं नानारूपाणि मायया । ११० ।
धार्यंते नटवद्राजन्न लेपामक्त एव सः । यथा पत्रं न स्पृशति जलं मायो तथा नरुः ॥१११॥
आत्मा नित्यो न स्पृशति परमानन्दरिग्रहः । देहागारसुतस्त्रीषु मामकेति च या मतिः ॥११२॥


वस्त्र सम्भालकर भोजन दसरथके बाद साताके साथ आराम करते थे ॥ ९५ ॥ फिर वस्त्र पहिन तथा नाना ग्राम अनुप ज्ञान नगर बन्धुओंके साथ रथपर सवार होकर उद्यान, वन तथा बाका दृश्य, अनेक गान सुनन तथा नाच देखते हुए पुन अपने घर आ सायंमध्यादि नित्य कर्म करते और यथाविधि स्नान करके अनिश शिवजीका पूजा करते थे सायंकालका भोजन कर रत्नकाञ्चन तथा माणिक्यके सुन्दर शय्यापर दिव्य महलमे सीताके साथ हरवखत तथा विनोदपूर्वक शयन करते थे । इस प्रकार नानाप्रकारके सुखपूर्वक बारह वर्ष बीते गये ॥९६-१००। एक समय मुनि मुकुद तथा मुंड वासिष्ठक कह दि- और समझ कर वशिष्ठका दोष राजा दशरथने रामका साक्षात् नारायण समझकर एकान्तमें बुलाकर और भय स्वभाव तथा विनयपूर्वक कहने लगे-॥ १०१ ॥ १०२ ॥ हे राम ! तुम साक्षात् नारायण हो, तुमने भूमिके भार हरण करनेके लिए मेरे घर अवतार लिया है, ऐसा अज्ञानयुक्त बुद्धिवाले लोग कहते हैं। इस कारण हे राम ! तुम्हारी मायासे मोहित मैं प्रार्थना करता हूँ कि तुम ज्ञानका उपदेश देकर मेरा अज्ञान दूर कर दो ॥ १०३ । १०४॥ स्त्री, पुत्र एवं गृह आदिम अनुरागके कारण मेरी बुद्धि कभी शान्ति तथा सुखका अनुभव नहीं करती। पिताके इस वचनको सुनकर राम राजा दशरथसे बोले ॥१०५॥ श्रीरामने कहा- हे राजन् ! मैं आपका अज्ञाननाशके लिए उत्तम उपदेश देता हूँ। उसे आप तथा आपकी प्राणप्रिया और मेरी माता कौसल्या भी श्रवण करें सुनें ॥ १०६ । हे नृप ! मायासे उत्पन्न यह समस्त संसार आत्ममय उसी प्रकार सून भासित होता है जैसे कि सीपीमें चाँदी, रेतामें जल, रज्जुमें सांप तथा धूपमृगतृष्णाका सलिल भासित होता है। अज्ञानी लोग इस आत्म सत्ता को भिन्न तथा अनाश्वर समझते हैं, परन्तु पण्डित लोग तो इससे विपरीत ही मानते हैं। उनके मतमें आत्मा शुद्ध, नित्य तथा सच्चिदानन्दरूप है ॥ १०७ ॥ १०८। उनके अज्ञामात्रसे समस्त विश्वके स्वामी ब्रह्मादि तथा हम सब प्राणी मायाके अधीन होकर जगत्का स्थिति उत्पत्ति तथा विनाशके लिये नटकी तरह विविध रूपोंको धारण करते हैं किन्तु आत्मा स्वयं जिसमें आसक्त नहीं होता। जिस प्रकार कमल-पत्र जलका स्पर्श नहीं करता उसी प्रकार अमल, नित्य और परम आनन्दस्वरूप आत्मा भी मायासे निर्लिप्त

५२ आनन्दरामायणे [ सर्गः ५

उपसंहृत्य बुद्ध्या मन्मयं ब्रह्मणि क्षिपेत् । यद्यत्कर्मावसानेऽथ तन्मन्मत्तोऽभवत्स्मरेत् ॥११३॥
एवं त्वं सर्वभावेन मुच्यसे भवसंकटात् । सत्यं शौचं दया शांतिः क्षमा चेन्द्रियनिग्रहः ॥११४॥
अहिंसा मत्पदद्वन्द्वमार्गालोकनमेव च । इत्याद्या ये गुणांस्तांस्तान् भजस्व निरन्तरम् ॥११५॥
शौर्यं द्यूतं विवादं च मात्सर्ये दंभमेव च । द्रोहेर्ष्यासंश्रयं चैव लोकनिन्द्यप्रवर्तनम् ॥११६॥
संतविप्रसतां चैव भक्तानां मानभंजनम् । निंदा पैशुन्यनृशंसं त्यज दूरं स्वतो नृप ॥११७॥
एवं मया नृपश्रेष्ठ पूर्वत्वं यत्कृतं मम । जन्मज्ञानोपसम्पन्नोऽहं कौशल्यायां नृपोद्भव ॥११८॥
यन्मया कथितं चैतदज्ञानमलनाशनम् । गोपनीयं प्रयत्नेन त्वयेदं न कुत्रचित् ॥११९॥
तद्रामवचनं श्रुत्वा नष्टमोदस्ततो नृपः । सञ्जातपरितोषस्तु रोमांचितवपुस्ततः ॥१२०॥
प्रणनाम राघवस्य पादौ दृढभावतः । ततो रामः पुनः प्राह पितरं निर्मलाशयम् ॥१२१॥
नेदं वाच्यं त्वया राजन् वदनादि शिशुं प्रति । मायया मानवेषस्य मम उपहासकारणात् ॥१२२॥
मन्मयं च मां नित्यं भज भावेन सादरम् । मयि न्यस्ते महन्प्राणो मयि भक्तिं दृढां कुरु ॥१२३॥
इत्युक्त्वा पितरौ नत्वा गृहाद्याज्ञां तयोः प्रभुः । ययौ सभगवद्रूपः श्रीरामः स्वनिकेतनम् ॥१२४॥
कदा मातुर्गृहं गत्वा सीतया भोजनं व्यधात् । कदा भ्रातृगृहेष्वेव कदा पर्यंक पितुः स्वयम् ॥१२५॥
कदा दशरथं तातं भोजनार्थं निजे गृहे । भार्यापुत्रादिसंयुक्तं षड्रसैर्विप्रैः समन्वितम् ॥१२६॥
हृष्टो रामः समाहूय भोजयामास सादरम् । श्रीरामदर्शनार्थं ते तपोवननिवासिनः ॥१२७॥
अयोध्या नगरीमेत्य द्वारपालैरनिवारिताः । शतशः प्रत्यहं रामं दृष्ट्वा स्तुत्वा पुनः पुनः ॥१२८॥
आतिथ्यं रघुनाथस्य गृहीत्वा तुष्टमानसाः । सपद्मनादनाम्यैव रथन्त्या पुष्पकादिभिः ॥१२९॥
रमयित्वा सप्ताहादिं जग्मुः स्वं स्वं मदाश्रमम् । यत्र यत्र हि संपश्येत्प्रीत्या लीलां विदेहजा ॥१३०॥

रहते हैं। उपसंहृत्य उस ब्रह्म का विचार करके जब तक ब्रह्म का ज्ञान न हो जाय, समस्त वासनाओंको छोड़-
कर यह जो दृश्यमान संसार है उसको चिद्धन ब्रह्ममें अर्पित कर, यह सब जान गया और ईश्वरको सबमें
व्याप्त देखकर आप इस भवसङ्कटसे मुक्त हो जायेंगे, हे राजन् ! पहिले आप सत्यभाषण, पवित्रता, दया
शान्ति, क्षमा, इन्द्रियनिग्रह, अहिंसा, अमल ज्ञान तथा हमारे स्वरूप के दर्शन आदि गुणोंका निरन्तर धारण
करें ॥ १०६-११५ ॥ हे नृप ! मार, जुआ, द्यूतो, परिवाद, ममता, द्रोह, मद, काम, अन्य निन्द्यवान् कामके
दृष्टान्त, संत-विप्र-साधु-सज्जनोंके धार्मिक कार्योंका भंजन, निन्दा और चुगलखोरी आदिको अपने चित्तसे दूर कर दें
॥ ११६ व ११७ ॥ हे नृप ! आपने पूर्वजन्ममें जो कुछ पूजन, गुणगान किया था। इसी कारण से आपके
द्वारा कौशल्याके गर्भसे पुत्ररूपमें जन्मवान् हुआ हूँ ॥११८॥ यह जो मैंने आपको अज्ञानरूपी मल नष्ट करने-
वाला उपदेश दिया है, उसे आप अपने मनमें ही गोपनीय रखना किसीसे कहिएगा नहीं ॥ ११९ ॥ रामके इस
उपदेशको सुनते ही राजाके मनका मायाकृत मोह दूर हो गया और वे इस समय परिपूर्ण तथा रोमांचित शरीर
होकर हर्षातिरेकसे राजा दशरथने रामके चरणोंको वन्दन किया । इस प्रकार निर्मल हृदयवाले पितासे
राम फिर कहने लगे - ॥ १२० ॥ १२१ ॥ हे राजन् ! मुझको प्रणाम करना आपका उचित नहीं है। मायासे
मनुष्यदेहधारी मेरा इससे उपहास होगा। इस कारण आप सदा आदरभावसे मनमें ही मेरा भजन किया
करें। मन तथा प्राणको मुझे अर्पण करके मेरी दृढ़ भक्ति करें ॥ १२२ ॥ ऐसा कह तथा माता पिताकी
आज्ञा लेकर श्रीरामने उनको नमस्कार किया और सादर सवार होकर अपने भवनको चले गये ॥ १२४ ॥
वे सीताके साथ कभी माताके महलमें आकर भोजन करते, कभी भाइयोंके भवनमें और कभी पिताके साथ
पंक्तिमें बैठकर भोजन करते थे। कभी स्त्रियों पुत्रों ब्राह्मणों तथा नागरिकोंके साथ पिता दशरथको अपने भवनमें
बुलाकर सादर हर्षपूर्वक भोजन कराते थे। प्रतिदिन सैकड़ोंकी संख्यामें वनवासी मुनिजन भी श्रीरामचन्द्रका
दर्शन करनेके लिये अयोध्या आते रहते थे। वे बिना रोकटोक भीतर जाकर रामका दर्शन तथा स्तुति करके
और रामके द्वारा किये हुए सत्कारको ग्रहण करके प्रसन्नतापूर्वक पाँच-सात दिन वहीं रहकर अपने-अपने

सर्गः ६ | सारकाण्डम् | ५३

तत्तच्चकार सा साध्वी हास्यक्रीडासनादिकम्। विवाहानन्तरं रामः समा द्वादश सीतया ॥१३१॥ रमयामास साकेते महाक्रीडापुरःसरम्। सहस्रवर्षविज्ञेयं श्रेष्ठं वर्षं कृते युगे ॥१३२ शतवर्षञ्च त्रेतायां द्वापरे दशवर्षजम्। कलेर्मासेन बोद्धव्यं शून्यद्वयान्त्रिदिकक्रमात् ॥१३३॥ एवं श्रीरामचन्द्रेण भोगा भुक्ताः सुरोपमाः। यस्मिन् ऋतौ च यद्रूपं फलपुष्पादिकं शुभम् ॥१३४॥ तत्स्र्वं सर्वदेशमात्रासे साकेतमवस्थिते। अनावृष्टिर्न वै कुत्र तस्कराणां भयं न हि ॥१३५ हिंस्रादीनां भयं नासीदयोध्याविषये प्रिये। युधाजित्नाम कैकेयीभ्राता मग्नमातुलः ॥१३६॥ निनाय भरतं स्वीयराज्ये शत्रुघ्नसंवृतम्। कौतुकेन नृपं पृष्ट्वा कैकेयीं प्रणिपत्य च ॥१३७॥ एवं रामस्य माहात्म्यं बाल्यत्वेऽपि सुखावहम्। ये शृण्वन्ति नरा भक्त्या न तेषामस्त्यमङ्गलम् ॥१३८। एवं यथा त्वया पृष्टं तथा सर्वं मयोदितम्। रामेण चरितं यच्च नृणां माङ्गल्यदायकम् ॥ १३९। एवं गिरीन्द्रजे प्रोक्तं बाललीलादिकौतुकम्। रामचन्द्रस्य संक्षेपात्तत्र प्रीत्यै सुखावहम् ॥१४०॥

इति श्रीशतकोटिरामचरितान्तर्गते श्रीमदानन्दरामायणे वाल्मीकीये सारकाण्डे
रामदिनचर्यावर्णनं नाम पञ्चमः सर्गः ॥ ५ ॥


षष्ठः सर्गः

( रामका दण्डकवनमें प्रवेश )
श्रीशिव उवाच

एवं त्रेतायुगे रामं नगर्यां सीतया सुखम्। क्रीडतं नारदोऽभ्यैद्दे ययावाकाशवर्त्मना ॥१॥ अथ रामो मुनिं पूज्य सीतया लक्ष्मणेन च। शुश्राव वचनं तस्य सुरैर्विज्ञापितं च यत् ॥२॥ निहत्य रावणं युद्धे ततो राज्यं कुरुष्व हि। अंगीकृत्य रघुश्रेष्ठस्तं मुनिं च व्यसर्जयत् ॥३॥ अथ रामोऽब्रवीत्सीतां मम राज्याभिषेचनम्। कर्तुकामोऽस्ति तत्प्राप्तं विघ्नमुत्पाद्य दण्डकम् ॥४॥


आश्रमको चले आते थे । जो काम करनेसे राम प्रसन्न होते थे, पतिव्रता सीता उन-उन हास्य-क्रीड़ा तथा आसनादिका विधान करती थीं । विवाहके बाद रामने बारह वर्ष तक सीताके साथ अयोध्यामे आनन्दपूर्वक विलास किया । कलियुगके हजार वर्षोंके बराबर सत्ययुगका एक वर्ष जानना चाहिये । कलियुगके सौ वर्षोंके बराबर त्रेतायुगका एक वर्ष और कलियुगके बारह वर्षके बराबर द्वापरका एक वर्ष होता है ॥१२५-१३३॥
इस प्रकार श्रीरामचन्द्रने बारह वर्ष तक देवताओंके योग्य भोगोका भोगा। रामचन्द्रजीके अयोध्यामे रहत समय जिस ऋतुमे जो पुष्प-फल आदि होना चाहिए, वह सब नियमसे उत्पन्न हुआ करते थे। कभी अनावृष्टि नहीं हुई और चोरोका भय नहीं रहा । हे प्रिये पार्वती ! उस राज्यमे कभी किसीको हिंसक पशुओका भय नहीं हुआ । एक दिन युधाजित् नामक कैकेयीका भाई तथा भरतका मामा वहा आया और राजासे पूछतया कैकयीको मनाकर शत्रुघ्नसहित भरतको अपने राज्यमे ले गया । ॥१३४-१३७ ॥ बाल्यावस्थासे ही मङ्गलस्वरूप तथा सुखदायक रामके चरित्रको जो मनुष्य भक्तिभावसे सुनता है उसका कभी अमङ्गल नहीं होता । १३८॥
इस प्रकार मनुष्यमात्रके लिए कल्याणकारी श्रीरामचन्द्रका चरित्र मैने तुमको कह सुनाया ॥ १३९॥ १४०॥
इति श्रीशतकोटिरामचरितान्तगते श्रीमदानन्दरामायणे वाल्मीकीये बाळचरित्रे भाषाटीकाया सारकाण्डे रामदिनचर्य्यावर्णनं नाम पञ्चमः सर्गः ॥ ५ ॥

श्रीशिवजी बोले—इस तरह अयोध्या नगरीमें सुखपूर्वक सीताके साथ क्रीडा करते हुए रामके पास बारहवें वर्षमें एक दिन आकाशमार्गसे नारद मुनि पधारे , १ ॥ सीता तथा लक्ष्मणके साथ रामने मुनिकी पूजा की और उनके मुखसे देवताओंका यह संदेश सुना कि आप पहले रावणको मारकर पश्चात् राज्य करें रघुश्रेष्ठ रामने भी 'बहुत अच्छा' कहकर उन्ह विदा किया ॥ २ ॥ ३ ॥ तदनन्तर राम सीतासे कहने लगे-हे सीते

५४आनन्दरामायणे[ सर्गः १

गच्छामि रावणादीनां वधार्थं लक्ष्मणेन च । अयोध्यायां वसञ् त्वं कौसल्यां पार्थिवं भज ॥५५॥ तद्भार्यावचनं श्रुत्वा प्रणिपत्य रघूत्तमम् । उवाच मधुरं वाक्यं वनं मां त्वं नय प्रभो ॥५६॥ कारणान्यत्र त्रीणि मन्ति तानि वदाम्यहम् । मन्वन्वय प्रयाणं मे दण्डके हि त्वया सह ॥५७॥ वनप्रवासे मामाह भर्त्रा च मन्वयाद्विजः । बान्धवे कन्यका मे दृष्टा कश्चिद्द्विजप्रणीः ॥५८॥ अन्यन्मन्वन्तरं पूर्वं सुरेन्द्रापि मयाऽदितम् । यदा चार्त्तारिकं प्राप्तः यज्जितुं त्वं समागतः ॥५९॥ चतुर्दश वत्सरानि मुनिवृत्त्यनुवर्तिनी । त्रिषष्टिव्याख्यावहेह धनुः सज्जं करोम्यहम् ॥६०॥ मन्यन्य कुरु मद्वाक्यं प्रयणाद्दण्डक मया । अन्यच्छ्रुत मया पूर्वं रामायणमनुत्तमम् ॥६१॥ तत्र मीतां विना रामो न गतोऽस्ति हि दण्डकम् तस्मात्त्वं मां गृहीत्वा दण्डकं नेतुमर्हसि ॥६२॥ तन्सीतावचनं श्रुत्वा दर्शयित्वापि रघूद्वहान् । विहस्य राघवः अत्मान् समालिंग्य विदेहजाम् ॥६३॥ अथ राजा दशरथः श्रीरामस्याभिषेचनम् यौवराज्यपदे कत्तुमुद्युक्तः प्राह वै गुरुम् ॥६४॥ यौवराज्यपदे राममभिषेकं त्वमाहर । तद्वाजवचनं श्रुत्वा गुरुर्दशरथ नृपम् ॥६५॥ कौसल्यागृहमापीय बोधयामास वै रहः । राजन शृणु त्वं कौसल्यासुमित्रं शृणुतं त्रियमे ॥६६॥ रावणस्य वधार्थं हि रामः श्री दारक वनम् । गमिष्यति लक्ष्मणेन सीतया कैकयीवशात् ॥६७॥ तस्मात्प्रमत्रमवनूपौ सभागनाभिषेकितुम् । कारयस्व सुमन्त्रेण समाहूय नृपादिकात् ॥६८॥ श्रीरामविरहाद्द्वाजन् ब्राह्मणस्यापि शापतः । अचिरादेव स्वर्लोकं त्वं यास्यसि पार्थिव ॥६९॥ कौसल्येथ रामराज्योत्सवं पश्यतु वै पुनः । स्वर्गस्थाद्विमानस्थस्त्वं पश्यसि महोत्शवम् ॥२०॥ दुर्लंघ्या भाविनी रेखा ब्रह्मादीना सुरोत्तम । इति श्रुत्वा गुरोर्वाक्यं तेन राजा सभां ययौ ॥२१॥ रामराज्याभिषेकाय समारब्धंकरेन्मुदा । दूतात्कारयामास नृपान् दशरथस्तदा ॥२२॥

पिताजी मेरा राज्याभिषेक करना चाहते हैं, परन्तु मैं उनम विघ्न खड़ा करके रावण आदिका नाशके लिए लक्ष्मणके साथ दण्डकारण्य जानेको तैयार हूँ। तुम यहाँ रहकर माता कौशल्याका और महाराजकी सेवा करना ॥ ५५ ॥ रामका यह वचन सुनकर सीताजीने उनके चरण पर गिर पडी और वह मधुर वचन बोली—हे प्रभो ! मुझे भा अपने साथ वनको ले चलिए । ५६ ॥ इसमें तीन कारण हैं। उन्हें मैं बताती हूँ। एक तो यह कि बाल्यकालमें मेरे हाथको देखकर एक ब्राह्मणने कहा था कि तुम अपने पतिके साथ वनवास करोगी। सो आपका साथ वनमें जानेसे उस ब्राह्मणका व्रीत सत्य हो जायगा ॥ ५७-५८॥ दूसरा कारण यह है कि जब आप सभाके बीच स्वयंवरके समय धनुष चढाने चले थे, तब मैंने देवताओंसे प्रार्थना की थी—हे देवताओं ! यदि राम धनुष चढा लें तो चौदह वर्ष तक मुनिवृत्ति धारण करके वनमें विचरण करूँगी ॥ ६० ? ६० ॥ अतएव आप मुझे वनमें ले जाकर मेरी प्रार्थनाको भी सच्चा बनाएँ । तीसरा कारण यह है कि मैंने सर्वोत्तम रामायण महाकाव्य में सुना है कि सीताके बिना राम अबतक कभी वनमें नहीं गये । सो आपको मुझे दण्डकारण्यम साथ ले चलना चाहिये ॥ ६१ । ६२ ॥ सीताके वचन सुनकर रामने उनको आलिङ्गन करके "तथास्तु" कहा ॥ ६३ । इधर राजा दशरथने रामका युवराजपदपर अभिषेक करनेका निश्चय करके गुरु वशिष्ठसे कहा कि आप श्रीरामका युव राजपदपर अभिषेक करें। इस बातको सुनकर वे राज दशरथको कौशल्याके भवनमें ले आये और एकान्तमें कहने लगे— । ६४-६६ ॥ हे राजन् ! आप तथा यह कौशल्या और सुमित्रा मेरे कथनको सुनें। राम कैकेयीके वशस सीता तथा लक्ष्मणके साथ लेकर रावणको मारनेके लिए कल ही दण्डकवन चले जायँगे ॥६७॥ इसलिए प्रजाजनकी तरह आप चुपचाप रामका अभिषेक करनेके लिए सुमन्त्रको कहकर सब सामग्री मंगवाइए और समस्त राजाओंको निमन्त्रित कीजिए ॥ ६८ ॥ हे पार्थिव ! श्रीरामके विरह तथा ब्राह्मणके शापसे आप शीघ्र स्वर्ग सिधारेंगे । ६९ ॥ बादमें कौशल्या रामके राज्यात्सवको देखेंगी और स्वर्गीय विमानमें बैठकर आप अन्तरिक्षसे वह उत्सव देखेंगे ॥ २० ॥ हे नरोत्तम ! भविष्यकी रेखा ब्रह्मादिकोंके लिए भी दुल्लङ्घीय होती है। गुरु वशिष्ठका यह वचन

[ सर्गः ६ ] सारकाण्डम् ५५

कपीश्वराः समायान्तु नानाश्रमनिवासिनः । नगरीं शोभायामासुर्नानाचित्रध्वजैरलंैः ॥ २३ ॥ पताकाभिर्मनोज्ञाभिश्च हेमदण्डैर्मनोरमैः । सुगन्धारूपामशाम सुगन्धं रूपमाविशम् ॥ २४ ॥ यः प्रमाणे मध्यदेशे कन्यकाः स्वलंकृतिः । तिष्ठन्तु षोडश गजाः स्वर्णदण्डैर्विभूषिताः ॥ २५ ॥ चतुर्दन्तः समायातु ऐरावतकुलोद्भवः । नानातीर्थोदकैः पूर्णाः स्वर्णकुम्भाः सहस्त्रशः ॥ २६ ॥ स्थाप्यन्तां तत्र वैदूर्यचामराणि छविानि च । श्वेतच्छत्रं रत्नदण्डं मुक्तामणिविराजितम् ॥ २७ ॥ दिव्यमाल्यानि वस्त्राणि दिव्याान्याभरणानि च । मुनयः संस्कृतास्तत्र तिष्ठन्तु कुशपाणयः ॥ २८ ॥ नर्तक्यो वारमुख्याश्च गायका वैदिकास्तथा । नानावादित्रकुशला वादयन्तु नृपांगणे ॥ २९ ॥ हस्त्यश्वपदरक्षातां बहिस्तिष्ठन्तु मायधुाः । नगरे यानि तिष्ठन्ति देवनायतनानि च ॥ ३० ॥ तेषु प्रवर्त्यतां पूजा नानावैलिभिरुहृताः । राजानः शीघ्रमायान्तु नानोपायनपाणयः ॥ ३१ ॥ इत्यादिश्य वसिष्ठस्तु रथेन रघुनन्दनम् । गत्वा सम्मानितस्तेन सर्वं वृत्तं न्यवेदयत् ॥ ३२ ॥ निमित्तमात्रस्त्वं राम श्वो गमिष्यसि दण्डकान् । चतुर्दश समास्तत्र स्थित्वा महत्य खरवधम् ॥ ३३ ॥ बंधुना सीतया सार्धं ततो राज्यं करिष्यसि । लौकिकं शास्त्रमान्दव्यं स्त्रीकुरुष्व पितुर्वचः । ३४ ॥ अद्य त्वं सीतया सार्धमुपवासं यथाविधि । कृत्वा शुचिर्भूमिदायी भव राम जितेन्द्रियः ॥ ३५ ॥ इत्युक्त्वा रथमूहूढो दृष्ट्वा रामं सलक्ष्मणम् । जानकीं चापि स गुरुर्ययौ राजगृहं पुनः ॥ ३६ ॥ कौसल्या च सुमित्रा च रामराज्याभिषेचनम् । मुखांग्रपं श्रुत्वा भ्रातृरोगस्थान्स्नेहमन्वितौ ॥ ३७ ॥ चक्रतुः पूजनं देव्यास्तदिष्टोपशमस्पृहे । बलिदानैः शांतिपाठैर्मुनिष्टदममन्विते । ३८ । अथापरूहे संधभ्या दास्या पुत्री तु मंथरा । शोभितां नगरीं दृष्ट्वा पृष्ट्वा वृद्धां पथि स्थिताम् ॥ ३९ ॥

सुनकर राजा दशरथ सनाथ हुए ॥ २१ ॥ वदा मन्त्राय नामक राज्याभिषेकक वास्ते सब सामग्री जुटवायी और प्रसन्नतापूर्वक दूतका भेजकर राजाज्ञाका सम्भाषण कराया ॥ उस समय आश्रमोंमे रहनेवाले अनेक कपीश्वर भी वहाँ आ पहुंचे। उन्होंने चित्र विचित्र ध्वजा, पताका और लाउगोंसे नगरीको सजाया। स्थान स्थानपर उत्तम तथा मनोहर मण्डप सजाय स्थापित किये गये। उस देखि में मन्त्री मण्डलोको आज्ञा दी कि सबही ही सुगन्धक बस्तूरियोंसे अलंकृत कराओ और सब वार वारांगना रंगारत जुल्प्य उत्तम भूषण तथा जो अढिस अनुकूल सांगोके इर्य मध्यस्थलपर उपस्थित रहन चाहिये। वहां अनेक तीर्थोंके जलसे परिपूर्ण घट रक्खे ॥ २२-२६ ॥ तज था नौ वांधवबर, मन्त्री और मणिशाम सुशोभित रत्नजटित दण्डवाला श्वेत छत्र सुन्दर मालायें, सुन्दर वस्त्र तथा दिव्य आभूषण भी तैयार रहे। स्नान आदि संस्कारोंसे मस्कृत मुनोजन हाथमे कुशा लिये हुए तैयार रहें ॥ २७ ॥ २८ ॥ नर्तकियाँ, वेण्यायें, गायक, वेदघोष करनेवाले विप्र तथा नाना प्रकार बाजा बजानेमें कुशल शिल्प मिलकर राजमहलके सामने गाना-बजाना प्रारम्भ कर दें ॥ २९ ॥ हाथी, घोडे, रथ और पैदल सेना कवच धारण करके बाहर खड़ी रहे। नगरमें जहाँ जहाँ देवालय हैं, वहाँ-वहाँ अनेक सामग्रियोंसे प्रेमपूर्वक पूजा का जाय और सब राज भेंट लेकर उपस्थित हों ॥ ३० ॥ ३१ ॥ इस प्रकार कहकर वशिष्ठ रथपर सवार हुए और रघुनन्दन रामके पास गये। रामने उनका आदरपूर्वक आसन दिया तब मुनि ने उन्हें सब वृत्तान्त सुनाते हुए कहा - ॥ ३२ ॥ हे राम ! तुम निमित्तमात्र हो। कल तुम दण्डकवनको चले जाओगे। वहाँ चौदह वर्ष रहकर राक्षसोंको मारोगे। उसके पश्चात् भाई लक्ष्मण तथा सीताके साथ प्रसन्नतापूर्वक राज्य करोगे। अतएव शास्त्रव्यवहार निभानेके लिए पिताके वचनको मान लो ॥ ३३ ॥ ३४ ॥ आज तुम सीताके साथ पवित्रतापूर्वक विधिवत् फलाहारस रहो और भूमीपर शयन करो ॥ ३५ ॥ ऐसा कह वशिष्ठ राम-लक्ष्मण तथा सीता से मिलकर गुरुदेव रथपर सवार हुए और वहाँसे राजमहलको चल दिये ॥ ३६ ॥ तदनन्तर कौसल्या और सुमित्रा गुरुदेवके मुखसे रामके राज्याभिषेककी आज्ञा सुनकर भी स्नेहवश वियोगकी उत्कण्ठी इच्छासे मुनियोंकी मण्डली समेत पूजाद्रव्यो तथा शान्तिपाठोंसे देवीका पूजन करने लगीं ॥ ३७ ॥ ३८ ॥ इसके पश्चात् छतपर चढ़ी दासीपुत्री मंथराने नगरको सुशोभित देखकर रास्तेकी एक बुढ़ियासे इसका

५६ आनन्दरामायणे [ सर्गः ६

श्रुत्वा श्रीरामगभ्भ्यार्थं ययौ वेगेन कैकयीम् । सर्वं वृत्तं निवेद्याथ तूष्णीमासीत्तदा क्षणम् ॥४०॥
तच्छ्रुत्वा कैकयी चापि तस्मै भूषणमर्पयत् । एतस्मिन्नन्तरे वाण्या देववाक्यानुमोदिता ॥४१॥
मन्था दृष्ट्वा तु कैकेयीं मन्थेर्येन्याह सा पुनः । मूढे कथंन्व तुष्टाऽसि हतभाग्याऽसि वेद्यहम् ॥४२॥
रामे राज्यपदं प्राप्ते कौसल्यायाश्च कैकयि । दासी भविष्यसि त्वं हि अतो मद्वचनं कुरु ॥४३॥
वरणं न्यासभूतेन राज्यं श्रीभरताय हि । नृपं प्रार्थय रामस्य द्वितीयेन वरेण च ॥४४॥
दंडकारण्यगमनं चतुर्दश समाः वदा । क्रोधागारं प्रविश्याद्य कुरुष्व यन्मयेरितम् ॥४५॥
तन्मन्थरोक्तं स्वहितं मन्त्वा सापि तथाऽकरोत् । मोहिता मायविवेकन श्रीरामवृत्तरेच्छया ॥४६॥
ततो निशायां राजा मा ज्ञात्वा कोधगृहास्थिता । गत्वा तत्र नृपः शीघं ददर्श कैकयीं तदा ॥४७॥
विकीर्यमाणकेशां तां त्यक्ताऽलङ्करणमदनाम् । भूमौ शयाना तां दृष्ट्वा ज्ञात्वा तस्या मनोरथम् ॥४८॥
रामाय दंडकारण्यं यैवराज्यं सुताय च वराभ्यां याचितं ज्ञात्वा हेत्युक्त्वा मूच्छितोऽभवत् ॥४९।
पश्चात् तन्मुखवेगो वृत्तं श्रुत्वा नृप ययौ । कैकेयी मन्त्रिणा पृष्टा सुमंत्रं प्राह सा तदा ॥५०॥
श्रीमानयश्व श्रीरामं द्रष्टुं न वांछते नृपः सोऽप्याह गतं नृपतेमपृष्ट्वा नानयाम्यहम् ॥५१॥
तदा शनैर्नृपः प्राह शीघ्रमानय राघवम् । सुमंतोऽप्यानयामास राघव पार्थिवाज्ञया ॥५२॥
तता रामो नृप गत्वा श्रुत्वा कैकेयजागिग । आत्मानं दंडके वास वरदानं पितुः पुरा ॥५३॥
तथेत्यांगीचकारार्थ नृपं वचनमब्रवीत् । ता ते शोकोऽस्तु हे तात बैह गच्छामि दण्डकान् ॥५४॥
तद्रामवचनं श्रुत्वा हाहेत्युक्त्या नृपोऽब्रवीत् मा विहाय कथं घोरं विपिनं गन्तुमिच्छसि ॥५५॥
तस्य तद्वचनं श्रुत्वा सांत्वयामास राघवः । अहं प्रतिज्ञां निस्तीर्य शीघ्रं यास्यामि ते गृहम् ॥५६॥


• ० पृष्ठा • ३९॥ उनके मुखसे समग्र राज्याभिषेकका नाम सुनकर वह शीघ्र कैकयीके पास गयी और सब वृत्तांत सुनाकर क्षण भर चुपचाप रहगयी ॥ ४० ॥ इसके बाद सुनकर कैकेयीने उसको अपना एक आभूषण दे दिया। इतनेमें देववाणीद्वारा प्रेरणा तथा मन्थराकी मतिमें प्रवेश कराकर उस डराती हुई कहने लगी अरे मूढ़े! गामके राज्याभिषेकका समाचार सुनकर तू प्रसन्न क्यो हुई? ऐसा ज्ञात होता है कि तेरा भाग्य नुक्सान हो गया है। यदि रामको राज्य मिल गया तो आ कैकयी ! बहा कौसल्याकी दासी बनना पडेगा। इस कारण जा मै कहूँ, वैसा कर ।। ४१॥ ४२॥ अपने पति राजा दशरथके पास जाकर रखे हुए दो वरोंमेंसे एकत्र द्वारा तू भरतके लिये राज्य माँग और दूसरे वरके द्वारा चौदह वर्षके लिए रामका पैदल दण्डकारण्यगमन माँग तू अभी कोपभवनमें चली जा ॥ ४३-४५ ।। उसने भी श्रीरामचन्द्र तथा देवताओकी इच्छासे और अविवेकके कारण मोहित मन्थराके उस कथनको अपना हितकारक समझकर वैसा ही किया ।। ४६ ।। सायंकालके समय जब राजाको ज्ञात हुआ कि कैकेयी कोपभवनमें है, तब वे उनक पास गये और देखा कि कैकेयी सिरके बाल खोले, भूषण तथा वस्त्रांको फेंककर धरणीपर पडी हुई है पश्चात जब राजा दशरथने उसका अभिप्रायको जाना तो उक्त कथनानुसार दो वरोंप्रथम एक द्वारा रामका दण्डकारण्यवास और दूसरके द्वारा भरतको यौवराज्य दानका दाल स्वीकार करके मूच्छित हो गये ॥ ४७-४९ । प्रातः काल मंत्री सुमंत्र इस वृत्तान्तको सुनकर राजाके पास गये सुमन्त्रके पूछनेपर कैकयीने कहा ॥ ५० ॥ राजा रामको देखना चाहते हैं। जाओ, उन्हें यहाँ बुला लाओ। सुमन्त्रने कहा कि राजासे बिना पूछे मै रामको यहाँ नहीं ले आ सकता ॥ ५१ । तब राजाने धीरेसे कहा कि 'रामको शीघ्र ले आओ।' सुमंत्र भी महाराजकी आज्ञासे शीघ्र रामको ले आये ।। ५२ ।। रामने राजाके पास आकर कैकेयीकी वाणीसे अपने दण्डकारण्यवास तथा पिताका पूर्वकालमें वरदान देनेका हाल सुना तो 'तथास्तु' कहकर स्वीकार किया उन्होंने राजासे कहा--हे तात ! आप शोक न करे, मै अभी दण्डकारण्य जाता हूँ ।। ५३ ।। ५४ ।। रामका वचनसुनकर राजा दशरथ कहने लगे - हे राम ! मुझको छोडकर तुम बनमें कैसे जाओगे ? ॥ ५५ । पिताके इस करुण वचनको सुनकर राम उन्हें

सर्गः ६ ] उत्तरकाण्डम् ५७

सर्गः ६ ] उत्तरकाण्डम् ५७

इदानीं गन्तुमिच्छामि व्येतु मातुश्च हृत्क्षपः । मातरं च समाश्वास्य सानुनीय च जानकीम् ॥५७॥ अगत्य पादौ वन्दित्वा तव यास्ये सुखं वनम् । इत्युक्त्वा तौ परिक्रम्य मातरं द्रष्टुमाययौ ॥५८॥ नत्वा स्वमातरं रामः समाश्वास्य पुनः पुनः । नत्वा प्रदक्षिणीकृत्या तामामन्त्र्य ययौ गृहम् ॥५९॥ सर्वं वृत्तं तु सीतायै कथयामास राघवः । सीतया लक्ष्मणेनापि वनं गन्तुं पुनः पुनः ॥६०॥ प्रार्थितश्च तथेत्युक्त्वा त्याजयामास राघवः । सर्वस्वं ब्राह्मणेभ्योऽदात् सीतयाऽभिसमन्वितः । ६१॥ पद्भ्यामेव शनैर्भ्रात्रा ययौ रामो नृपान्तिकम् । गच्छन्तं पथि श्रीरामं पद्भ्यां दृष्ट्वा पुरौकसः । ६२॥ परस्परं ते चूचे अज्ञा व्याकुलमानसाः । तद्दृष्ट्वाऽथान वामदेवः कथयामास सादरात् । ६३। नारदागमनं रामप्रतिज्ञां रावणस्य च । वधादिकं सविस्तारं विष्णु मनुष्यरूपिणम् ६४। पौराः श्रुत्वा गतक्लेशा बभूवन्पवित्रमन्धिताः ततो गत्वा नृपं रामः कैकेयीं वाक्यमब्रवीत् । ६५। अम्बागतोऽहं विपिनं गन्तुं ज्ञां दातुमर्हसि । ततः सा वल्कलादीनि ददौ रामादिकांस्तदा । ६६ रामस्तान् परिधायाथ स्वयं मात्रावशिक्षयत् । तद्दृष्ट्वा कैकेयीं प्राह गुरुः कोपेन मन्मथन् । ६७॥ अहे पापिनि दुर्वृत्ते राम एव त्वया वृतः वनवासाय दुष्टे त्व सीतार्थे कि प्रदास्यसि । ६८॥ इत्युक्त्वा दिव्यरत्नाणि सीताय व गुरूर्ददौ । राजा दशरथोऽप्याह सुमन्त्रं रथमानय ॥६९॥ रथमारुह्य गच्छन्तु वनं वनचरप्रियाः रामः प्रदक्षिणं कृत्वा पितरौ रथमRUhet ॥ ७०॥ मातत्रा लक्ष्मणेनाथ चोदयामास सारथिम् । कौसल्यां च सुमित्रां च तातमाश्वास्य वै पुनः । ७१॥ समाश्वास्य जनान् सर्वान्नममानीन्मापयौ । माघमासे सिते पक्षे पञ्चम्यां परमेऽहनि । ७२। प्राप्ते द्वादशमे वर्षे राघवाय महात्मने । आयातद्वनप्रयाणं हि सपूर्णांस्तममानटम् ॥७३॥


सान्त्वना देने ... कि मैं आपकी प्रतिज्ञा पूरी करके ... लौट जाऊंगा ॥ ५६ ॥ परन्तु इस समय तो मैं जाना ही चाहता हूँ। जिससे कि माता कैकेयीके हृदयका शोक दूर हो सके। माताको आश्वासन दे तथा सीताको समझाकर ये आ रहा हूँ। तब आपके चरणोंको प्रणाम करके सुखसे वनको प्रस्थान करूँगा। यह कहकर राम उन दोनोंकी परिक्रमा करके शांत करनेके लिये माता कौशल्याके पास गये ॥ ५७ ॥ ५८ ॥ माताको नमस्कार करके बार बार समझाया और प्रदक्षिणा करके उनकी आज्ञा ले अपने महलमें गये ॥ ५९ ॥ वहाँ जाकर श्रीरामने सीताको सम्पूरन वृत्तान्त कह सुनाया। जब सीता और लक्ष्मण बारम्बार अपने साथ वनमें ले चलनेकी प्रार्थना की, तब 'अवश्य' कह तथा शीघ्र ब्राह्मणोंको सर्वस्व दान देकर सीता तथा अग्निको साथ लेकर भाई लक्ष्मणके साथ पैदल ही राजाके पास आये । रास्तेमें पुरवासीजन रामको पैदल आते देख तथा एक दूसरेसे सब वृत्तान्त जानकर बड़े चिन्तातुर हुए । तब वामदेव मुनिने प्रेमसे उन लोगोंको नारदका आगमन, रामकी प्रतिज्ञा, रावणका वध तथा विष्णुका मनुष्यरूप धारण करना आदि वृत्तान्त विस्तारसे कह सुनाया ॥ ६०-६४ ॥ राग्रेण सर्व पुरवासीजन उनकी यह बात सुनकर शान्त हो गये । रामने राजाके पास जा तथा उन्हें नमस्कार करके कैकेयीसे कहा ॥ ६५ ॥ हे अम्ब ! मैं वन जानेके लिए तयार हो गया हूँ। आप मुझे आज्ञा दें । तब उसने राम सीता तथा लक्ष्मणको पहिननेके लिये वल्कल वसन दिये ॥ ६६ । राम स्वयं उन परिधानकर सीताका वल्कल पहिनना सिखलाने लगे । यह देखकर मुनि वसिष्ठ क्रुद्ध होकर कैकेयीको धमकाते हुए कहने लगे-॥ ६७ । अरे पापिनि ! अयि दुर्वृत्ते ! तूने केवल रामके वनवासका वर माँगा है। तब सीताको पहिननेके लिये वल्कल क्यों देती है ? ॥ ६८ ॥ यह कहकर सीताके लिये उन्होंने दिव्य वस्त्र दिये। राजा दशरथ बोले-हे सुमन्त्र ! रथ ले आओ। उस रथपर सवार होकर वनचरोंके प्रिय ये तीनों वनको जायँगे । बादमें रामने माता पिताकी प्रदक्षिणा की और माता तथा लक्ष्मणको साथ लेकर रथपर सवार हुए । तब सुमन्त्रको रथ चलानेकी आज्ञा दी कौसल्या, सुमित्रा, पिता तथा अन्य जनोंको आश्वासन देकर राम चल पड़े और शीघ्र ही तमसा नदीके तीरपर जा पहुँचे । बारहवें वर्षके माघ शुक्ल पञ्चमीकी शुभ तिथिको महात्मा रामने अपने नगरसे चलकर तमसाके किनारेकी ओर प्रयाण किया था