भारतकोश
श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)

श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)

Srimad Ananda Ramayana Hindi

महर्षि वाल्मीकि / अज्ञात द्वारा

स्रोत: Srimad Ananda Ramayana Complete 9 Kandas with Hindi Translation (उद्गम)

DevanagariHindipublished811 पृष्ठ

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५३४ आनन्दरामायणे [ सर्गः २२


एतन्निमित्तं श्रीराम सीतया परिकीर्तितैः । स्रानभोजन मद्य करिष्यामि नसंशयः ॥४६। तन्मुनेर्वचनं श्रुत्वा राघवः प्राह तं पुनः मुने त्वमेव सीतां मे पूतां कर्तुमिहार्हसि ॥४७। वरदानं व्रतं वाऽपि येन पूता भवेच्छुभाम् । त्वामहं प्रार्थयाम्यद्य स्वीयं पल्लवमुत्तमम् ॥४८। इत्युक्त्वा शिरसा चापि नमस्कृत्य पुनः पुनः । तद्रामवचनं श्रुत्वा नारदो वाक्यमब्रवीत् ॥४९। ब्रह्महत्यादिपापानां निष्कृत्यर्थे मुनीश्वरैः । प्रायश्चित्तानि चोक्तानि संति नानाविधानि च ॥५०॥ द्वादश्यां तुलसीपत्रच्छेदनाद्यप्रशंसये । प्रायश्चित्तं मया नैव दृष्टं रघूत्तमोत्तम ॥५१॥ उपायस्त्वेक एवात्र वर्तते रघुनन्दन । पातिव्रत्यबलाम्भोता पत्रं तत्तुलसीं पुनः ॥५२॥ योजयिष्यति संजोड्य तदि पूता भविष्यति क्षणादेव न सन्देहः सत्यमेत द्वचो मम ॥५३॥ तन्मुनेर्वचनं श्रुत्वा रामः सीतां व्यलोकयत् । तदा सीताऽब्रवीद्वाक्यं शृणु ब्रह्मसुतोत्तम ॥५४॥ अद्याहं योजयिष्यामि पत्रं तज्जलसीं पुनः । पातिव्रत्यबलेनैव तथाद्य पश्य कौतुकम् । ५५॥ इत्युक्त्वा जानकी देवी यन्पात्रमन्तपूर्णकम् । पाकस्थाने पुनर्नीत्वा स्थापयामास वेगतः ।५६॥ ततो वृंदावनं सीता ययौ नूपुरनिश्वना । नारदो रामचन्द्राद्या ययुर्वृन्दावनं प्रति ।५७। तदा ता ऊर्मिलाद्याश्च शषिकाद्याः स्त्रियो ययुः । लक्ष्मणाद्या बंधवश्च कुशश्चाथ लवस्तथा ॥५८॥ तेषां मध्यगता सीता तदा वृंदावनस्थिता । नत्वा तां तुलसीं भक्त्या प्राह वाक्यं मयीयुता ।५९। भो भो तुलसि मद्वाक्यं शृणुष्याद्य सुशोभने । पातिव्रतबलं पूर्ण मयि यद्यस्ति पावनम् ॥६०। तर्ह्यस्य तव पत्रस्य मयि सन्धिरर्भविष्यति । एवमुक्त्वा जानकी मा यात्रन्पश्यन्ति वै पुरः ॥६१। तावत्पत्रं तुलस्यां मत्सन्धि नैव गतं तदा । तदा खिण्णा मा सीता बभूव चकिताऽपि च । ६२ । तदा देवाः सगंधर्वा यक्षा नागाः सकिन्नराः । गुह्यका ऋषयः सर्वे तद्द्रष्टुं कौतुकं ययुः ।६३। एतः सीतां विषण्णां तां दृष्ट्वास नारदो मुनिः । एकांते जानकीं नीत्वा बोधयामास सादरम् ।६४॥


कहना ॥ ४१ ॥ इसी कारण आज व्रतका पारण करके समय में सीताका दर्शन अब नहीं करूंगा ॥ ४६ ॥ इस प्रकार नारदकी बात सुनकर रामने कहा हे मुने ! तब तुम ही सीताको पवित्र कर दो । ४७ ॥ यह वरदान तथा व्रत जिस उपायसे पवित्र हो सके, वैसा कर । एतदर्थ में हाथ जोड़कर प्रार्थना करता हूँ और मस्तक झुकाकर पुनः पुनः नमस्कार करता हूँ । रामका विनय सुनकर नारदने कहा- ॥ ४८ ॥ ४९ ॥ ब्रह्महत्यादि पापोंसे छुटकारा पानेके लिये तो मुनीश्वरोंने अनेक प्रकारके प्रायश्चित्त बतलाये हैं ॥ ५० ॥ किन्तु द्वादशीको तुलसीपत्र तोड़नेसे जो पातक होता है। उसका प्रायश्चित्त तो मैंने कहीं देखा ही नहीं ॥ ५१ ॥ हे रघुनन्दन ! इस विषयमें केवल एक उपाय है । वह यह कि माता अपने पातिव्रत्यके बलसे वह पत्र फिर वृक्षमें जोड दें तो ये क्षणमात्रमें पवित्र हो सकती हैं। इसमें कोई सन्देह नहीं है। मैं जो कह रहा हूँ सो सत्य है ॥ ५२ ॥ ५३ ॥ नारदके ऐसा कहनेपर रामने सीता की ओर देखा । तब सीताने कहा-हे ब्रह्माके पुत्रोमें श्रेष्ठ पुत्र नारद ! ॥ ५४ ॥ अभी मैं आपके सामने ही अपने पातिव्रत्यके बलसे उस तुलसीपत्रको दालमें जोड़ दूंगी आप यह कौतुक देखें ॥५५॥ ऐसा कहकर सीता उस अन्नपात्र वेगके साथ लौटा ले गयी और रख दिया ।५६।। इसके अनन्तर वे वृन्दा- वनमें गयीं । नारद और राम भी वहाँ पहुंचे ॥ ५७ ॥ ऊर्मिलादिक स्त्रियां तथा लक्ष्मणादि बन्धु एवं लव कुश आदि पुत्र भी वृन्दावनमें पहुंचे ॥ ५८ ॥ उन सबके बीचमें सीताने उस तुलसीके वृक्षको प्रणाम किया और भक्तिपूर्वक कहने लगी - ॥ ५९ ॥ हे सुशोभने तुलसि ! मेरी बात सुनो । यदि मुझम पातिव्रतका बल हो तो यह टूटा हुआ पत्र फिर तुम्हारे अङ्गमें जुड़ जाय ऐसा कहकर सीताने सामने पत्र देखा तो वह जुटा नहीं, यों ही पड़ा रहा । उस समय आश्चर्यके साथ-साथ सीताको बड़ा विषाद भी हुआ ॥ ६०-६२ ॥ समस्त देवता, गन्धर्व, यक्ष, नाग, किन्नर, गुह्यक तथा महर्षिगण वह कौतुक देखनेको एकत्रित हो गये थे । ६३ ॥ जब सीताको इस प्रकार कुत्सित देखा तो नारद मुनि उन्हें एकान्तमें ले गये और आदरपूर्वक समझाया । नारदने