भारतकोश
श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)

श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)

Srimad Ananda Ramayana Hindi

महर्षि वाल्मीकि / अज्ञात द्वारा

स्रोत: Srimad Ananda Ramayana Complete 9 Kandas with Hindi Translation (उद्गम)

DevanagariHindipublished811 पृष्ठ

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५३६ आनन्दरामायणे [ सर्ग २२

पातिव्रत्यं सदा स्त्रीभिः पालनीयं विशेषतः । मया ते शिक्षितं सीते मा विषादं भज प्रिये ॥८४॥ इत्याश्वास्य मुहुः सीतां कृत्वा ह्यपदिशङ्किताम् । विसर्जयामास तदा रङ्गाग्रतः सुग्रीवप्रमुखान्हरीन् ।८५। ततः सर्वाङ्गसुन्दरीम् ताञ्श्री परिवेषणम् । वेगाच्चकार मुदिता स्वेदबिन्दूङ्कितानना ।८६। ततः सर्वे व्यमृदंस्तत् भुक्त्वाऽऽचमनमुत्तमम् । ततो मुखवासं ताम्बूलं रामं तुष्टाव नारदः ॥८७॥

श्रीनारद उवाच

धीमन्तं मुनिश्रिञ्जमं जगदण्डं हृद्गतम् सीताऽऽननेन्द्यनयननगराजारामं घनश्यामम् । नागेन्द्रान्तकसिद्धिदं नितान्तं प्रविपन्नपालं रामं त्वां शिष्या मननं प्रणाम्यच्छेदेनमनालम् ।८८। नाना राक्षसदूषनं शरधृतं जलनाथार्चनीमदभसागरबन्धननानाकीतुककनारम् पाँगनन्दननारीतोषससुरापुनमद्रालं रामं त्वां शिरसा मननं प्रणमामिच्छेदितमनालम् ॥८९ श्रीकान्तं जगतीकान्तं स्तुतमद्भक्तं षट्षट्कं सद्गृहदेवप्सितपूरकप्रयासं नृपजाकान्तम् । पूष्णीजपनिधिं मित्रमुनिविश्वादायनमच्छीलं रामं त्वां शिरसा मननं प्रणमामिच्छेदितमनालम् ९० । सीतातोषितविश्वेशं धृतभूमाशं सुरलोकेशं प्रशमितरावणभयमपगतरावणकुलकेशम् । किष्किन्धाकृतसुग्रीवं प्लवगवृन्ताधिपमन्पालं रामं त्वां शिरसा मननं प्रणमामिच्छेदितमनालम् ९१ । श्रीनाथं जगती नाथं जगतानाद्यं नृपतीनाथं भुजंगासुरनिर्जग्गदगन्धर्वाधिकारमन्नाधम् । कोदण्डधृततूणीरन्तिरुपप्रमे कृतभूशालं रामं त्वां शिरसा मननं प्रणमामिच्छेदितमनालम् । ९२ । रामेशं जगतामीशं जम्बूद्दीपेशं नवलोकेंशं वन्दीकृतमन्मथमहर्षितभीतालालितवागीशम् । पृथ्वीसद्दहभूभारं नतयोगौद्र जगतीपालं रामं त्वां शिरसा मननं प्रणमामिच्छेदितमनालम् ॥९३॥

स्थापना करने, सज्जनोंका रक्षा तथा दुष्टोंका विनाश करनेके लिए ही मैने यह अवतार लिया है। स्त्रियोंको अपना दुर्लभे पातिव्रत्य धर्मकी रक्षा करनी चाहिए। यह मैंने तुम्हें उपदेश दिया है। इससे कहीं कुपित न हो जाना ॥८१-८४॥ इस प्रकार वारम्बार सीताको आश्वासन देकर रामने उन्हें फिर हर्षित कर दिया और उन भये हुए हृदयके भयको दूर किया। फिर उन्होंने मद्यपियोंको साथ लेकर मङ्गलमय मद्य। यहाँ मन्त्रीमंण्डलके भाषण परस्पर ॥८५॥ इस अवसर पर महान् भोजन किया। फिर ताम्बूल खाकर नारद रामकी स्तुति करने लगे ॥८७॥ नारदने कहा- मैं उन रामको मस्तक नवाकर प्रणाम करता हूँ जो मुनियों के विश्रामस्थान हैं, नियन्त्रकके हृद्गत हैं, उन का आनन्द देनेवाले, माताको प्रसन्न रखनेवाले, सुन्दर, सनातन, राजा राम, मेघके सदृश श्याम वर्णवाले, नागा आदिके वरदाता, विद्वान् प्रचित्र उन भूपाल रामको, जिनका प्रभाव आप देवताओं तक पहुँचाया गया, को प्रणाम करता हूँ । ८८ ।। अनेक राक्षसोंके बाण लगानेवाले, जलधके आधार, बाणोंके धारक, समुद्रपर सेतु बाँधने और अनेक प्रकारके कौतुक करनेवाले, सुग्रीवादिओको आनन्ददाता, नारियोंके प्रसन्नकर्ता और मध्यम कस्तूरीका तिलक लगानेवाले आप रामको मैं प्रणाम करता हूँ । ८९ ॥ लक्ष्मीके पति, जगत्पति, अच्छे-अच्छे भक्तोंके वन्दित, जिनके स्तुतसे सन्त हैं, जो मागनेपर मनोरथ पूर्ण करनेवाले तथा पृथ्वीकी पुत्री सीताके पति हैं विश्वामित्रकी सृष्टि से जिनका संकोच नष्ट हो गया है, ऐसे महान् सात तालके वृक्षोंको काटने-वाले आप रामको मैं मस्तक नवाकर प्रणाम करता हूँ ॥९०। सीताको प्रसन्न करनेवाले समस्त विश्वके ईश, पृथ्वीके ईश देववृन्दोंके अधिपति, (सुग्रीवको) का भय दूर करनेवाले, रावणके विनाशकारी, रावणके भ्राता विभीषणका लंकाका राज्य देनेवाले, सुग्रीवको किष्किन्धाका अधिपति बनानेवाले, वानरोंके अधिपति सुग्रीवका भली भाँति रक्षण करनेवाले और महान् सात वृक्षोंको काटनेवाले रामको मैं प्रणाम करता हूँ ॥ ९१ ॥ लक्ष्मीके नाथ, जगत्के नाथ, नृपनाथके नाथ, राजाओंके राजा, चित्र, असुर, देवता, पन्नग तथा गन्धर्वोके नायक, धनुष और तरकस लेकर तीव्रगमन महोत्साह से गता राम जिन्होंने महान् तालवृक्षोंको काट गिराया था, मैं उनको प्रणाम करता हूँ ॥ ९२ । ईश, जगत्के ईश, जम्बूद्वीपके ईश, समस्त लोकपालोंके