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श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)

Srimad Ananda Ramayana Hindi

महर्षि वाल्मीकि / अज्ञात द्वारा

स्रोत: Srimad Ananda Ramayana Complete 9 Kandas with Hindi Translation (उद्गम)

DevanagariHindipublished811 पृष्ठ

५३६ आनन्दरामायणे [ सर्ग २२

पातिव्रत्यं सदा स्त्रीभिः पालनीयं विशेषतः । मया ते शिक्षितं सीते मा विषादं भज प्रिये ॥८४॥ इत्याश्वास्य मुहुः सीतां कृत्वा ह्यपदिशङ्किताम् । विसर्जयामास तदा रङ्गाग्रतः सुग्रीवप्रमुखान्हरीन् ।८५। ततः सर्वाङ्गसुन्दरीम् ताञ्श्री परिवेषणम् । वेगाच्चकार मुदिता स्वेदबिन्दूङ्कितानना ।८६। ततः सर्वे व्यमृदंस्तत् भुक्त्वाऽऽचमनमुत्तमम् । ततो मुखवासं ताम्बूलं रामं तुष्टाव नारदः ॥८७॥

श्रीनारद उवाच

धीमन्तं मुनिश्रिञ्जमं जगदण्डं हृद्गतम् सीताऽऽननेन्द्यनयननगराजारामं घनश्यामम् । नागेन्द्रान्तकसिद्धिदं नितान्तं प्रविपन्नपालं रामं त्वां शिष्या मननं प्रणाम्यच्छेदेनमनालम् ।८८। नाना राक्षसदूषनं शरधृतं जलनाथार्चनीमदभसागरबन्धननानाकीतुककनारम् पाँगनन्दननारीतोषससुरापुनमद्रालं रामं त्वां शिरसा मननं प्रणमामिच्छेदितमनालम् ॥८९ श्रीकान्तं जगतीकान्तं स्तुतमद्भक्तं षट्षट्कं सद्गृहदेवप्सितपूरकप्रयासं नृपजाकान्तम् । पूष्णीजपनिधिं मित्रमुनिविश्वादायनमच्छीलं रामं त्वां शिरसा मननं प्रणमामिच्छेदितमनालम् ९० । सीतातोषितविश्वेशं धृतभूमाशं सुरलोकेशं प्रशमितरावणभयमपगतरावणकुलकेशम् । किष्किन्धाकृतसुग्रीवं प्लवगवृन्ताधिपमन्पालं रामं त्वां शिरसा मननं प्रणमामिच्छेदितमनालम् ९१ । श्रीनाथं जगती नाथं जगतानाद्यं नृपतीनाथं भुजंगासुरनिर्जग्गदगन्धर्वाधिकारमन्नाधम् । कोदण्डधृततूणीरन्तिरुपप्रमे कृतभूशालं रामं त्वां शिरसा मननं प्रणमामिच्छेदितमनालम् । ९२ । रामेशं जगतामीशं जम्बूद्दीपेशं नवलोकेंशं वन्दीकृतमन्मथमहर्षितभीतालालितवागीशम् । पृथ्वीसद्दहभूभारं नतयोगौद्र जगतीपालं रामं त्वां शिरसा मननं प्रणमामिच्छेदितमनालम् ॥९३॥

स्थापना करने, सज्जनोंका रक्षा तथा दुष्टोंका विनाश करनेके लिए ही मैने यह अवतार लिया है। स्त्रियोंको अपना दुर्लभे पातिव्रत्य धर्मकी रक्षा करनी चाहिए। यह मैंने तुम्हें उपदेश दिया है। इससे कहीं कुपित न हो जाना ॥८१-८४॥ इस प्रकार वारम्बार सीताको आश्वासन देकर रामने उन्हें फिर हर्षित कर दिया और उन भये हुए हृदयके भयको दूर किया। फिर उन्होंने मद्यपियोंको साथ लेकर मङ्गलमय मद्य। यहाँ मन्त्रीमंण्डलके भाषण परस्पर ॥८५॥ इस अवसर पर महान् भोजन किया। फिर ताम्बूल खाकर नारद रामकी स्तुति करने लगे ॥८७॥ नारदने कहा- मैं उन रामको मस्तक नवाकर प्रणाम करता हूँ जो मुनियों के विश्रामस्थान हैं, नियन्त्रकके हृद्गत हैं, उन का आनन्द देनेवाले, माताको प्रसन्न रखनेवाले, सुन्दर, सनातन, राजा राम, मेघके सदृश श्याम वर्णवाले, नागा आदिके वरदाता, विद्वान् प्रचित्र उन भूपाल रामको, जिनका प्रभाव आप देवताओं तक पहुँचाया गया, को प्रणाम करता हूँ । ८८ ।। अनेक राक्षसोंके बाण लगानेवाले, जलधके आधार, बाणोंके धारक, समुद्रपर सेतु बाँधने और अनेक प्रकारके कौतुक करनेवाले, सुग्रीवादिओको आनन्ददाता, नारियोंके प्रसन्नकर्ता और मध्यम कस्तूरीका तिलक लगानेवाले आप रामको मैं प्रणाम करता हूँ । ८९ ॥ लक्ष्मीके पति, जगत्पति, अच्छे-अच्छे भक्तोंके वन्दित, जिनके स्तुतसे सन्त हैं, जो मागनेपर मनोरथ पूर्ण करनेवाले तथा पृथ्वीकी पुत्री सीताके पति हैं विश्वामित्रकी सृष्टि से जिनका संकोच नष्ट हो गया है, ऐसे महान् सात तालके वृक्षोंको काटने-वाले आप रामको मैं मस्तक नवाकर प्रणाम करता हूँ ॥९०। सीताको प्रसन्न करनेवाले समस्त विश्वके ईश, पृथ्वीके ईश देववृन्दोंके अधिपति, (सुग्रीवको) का भय दूर करनेवाले, रावणके विनाशकारी, रावणके भ्राता विभीषणका लंकाका राज्य देनेवाले, सुग्रीवको किष्किन्धाका अधिपति बनानेवाले, वानरोंके अधिपति सुग्रीवका भली भाँति रक्षण करनेवाले और महान् सात वृक्षोंको काटनेवाले रामको मैं प्रणाम करता हूँ ॥ ९१ ॥ लक्ष्मीके नाथ, जगत्के नाथ, नृपनाथके नाथ, राजाओंके राजा, चित्र, असुर, देवता, पन्नग तथा गन्धर्वोके नायक, धनुष और तरकस लेकर तीव्रगमन महोत्साह से गता राम जिन्होंने महान् तालवृक्षोंको काट गिराया था, मैं उनको प्रणाम करता हूँ ॥ ९२ । ईश, जगत्के ईश, जम्बूद्वीपके ईश, समस्त लोकपालोंके

सर्गः २२ ] राज्यकाण्डम् ( उत्तरार्द्धम् ) ५३७

सर्गः २२ ] राज्यकाण्डम् ( उत्तरार्द्धम् ) ५३७

विद्रूपं जितभूरूपं नतसद्दिक्पं नतमद्रूपं सप्तद्वीपजवर्षजकामिनिसन्नीराजितपृथ्वीपम् । नानापार्थिवनानौपायनमभ्यर्चिततोषितमद्रूपं रामं त्वां शिरसा सततं प्रणमामि च्छेदितसप्ततालम् ॥९४॥ सत्सेव्यं मुनिभिर्गेयं कविभिः स्तुत्यं हृदि संधार्यं नानापण्डिततर्कपुराणजवाक्यादिकृतसत्काव्यम् । साकेतस्थितकौसल्यासुतगन्धाद्यङ्कितमद्भालं रामं त्वां शिरसा सततं प्रणमामि च्छेदितसप्ततालम् ॥९५॥ भूपालं घनसन्नीलं नृपसद्बालं कलिमञ्जालं सीताजानिवरोत्पललोचनमन्त्रीमोचितसत्कालम् । श्रीमतीवरुतोपाय्यास्वादनसम्यक्शिक्षितसत्कालं रामं त्वां शिरसा सततं प्रणमामि च्छेदितसप्ततालम् ९६॥ हे राजन् नवभिः श्लोकैर्भुवि पापघ्नं नवकं रूपं मे बुद्धया कृतमुत्तमन्तनमेतद्राघव मन्वीनाम् । स्त्रीपौत्रान्नादिकक्षेमप्रदमस्मन्मन्दरदक्षालं रामं त्वां शिरसा सततं प्रणमामि च्छेदितसप्ततालम् ॥९७॥

श्रीरामचन्द्र उवाच

एवं स्तुत्वा रमानायं राघवं भक्तवत्सलम् । प्रणम्याज्ञां प्रभोः प्राप्य प्रययौ नारदो मुदा ॥९८॥ अमरा मुनयः सर्वे जग्मुस्ते स्वस्थलानि वै । एवं श्रीरामचन्द्रेण नररूपधरेण च ॥९९॥ कौतुकानि विचित्राणि कृतानि जगतीतले । कस्तान्वत्र क्षमो वक्तुं विस्तरेण द्विजोत्तम ॥१००॥ तेषु यद्यद्राघवेण स्मारितं स्निह वै मम । तत्प्रकथ्यते शिष्य तवाग्रे राघवोत्तम ॥१०१॥

इति श्रीशतकोटिरामचरितान्तर्गते श्रीमदानन्दरामायणे वाल्मीकीये राज्यकाण्डे उत्तरार्द्धे सीतया तुलसीपत्रप्रसाधनं नाम द्वाविंश सर्ग ॥ २२ ॥


प्रभु वाल्मीकिसे नमस्कृत, प्रसन्न सीताके द्वारा लालित, दानीश पृथ्वीश, भ्रमरहारी, योगीन्द्राम नमस्कृत, जगतोके पालक और विशाल तालवृक्षोको काट गिरानेवाले रामको मैं मस्तक झुकाकर प्रणाम करता हूँ । ९३ । विद्रूप, अच्छे-अच्छे राजाओको भी परास्त करनेवाले, अच्छे-अच्छे दिक्पालानसे नमस्कृत, बड़े-बड़े राजाओसे नमस्कृत, सप्तद्वीप तथा समस्त देशम उत्पन्न नारियोंसे नीराजित, पृथ्विके पालक, अनेक राजाओके द्वारा अनेक प्रकारके उपहार देकर प्रसन्न किये गये राजा राम जिन्होंने विशाल तालके वृक्षोको काट गिराया था, उन रामको मैं मस्तक झुकाकर प्रणाम करता हूँ ॥ ९४ ॥ जो मुनियोंके सेव्य, मत्रियोंमें गेय, हृदयमें धारण करने योग्य, अनेक पंडितों द्वारा विविध प्रकारके तर्क पुराण तथा काव्योमें संस्कृत एवं साकेत-निवासिनी कौसल्याके पुत्र हैं और गन्धादि द्रव्योंसे जिनका मस्तक अर्चतस है, सात तालके वृक्षोको काट गिरानेवाले आप रामको मैं मस्तक झुकाकर प्रणाम करता हूँ ॥ ९५ । भूपाल, मेघके समान श्यामस्वरूप, महाराज दशरथके अच्छे पुत्र, पापोंके लिए कालस्वरूप सीतापति, सुन्दर, कमलकी नाईं वालोवाले प्रबल कामके जालसे अपने मन्त्राको तत्काल छुड़ानेवाले पतिको बिना अर्पण किये कमलका फूल सूंघ लेनेपर सीताको भलीभांति शिक्षाके दाता, विशाल तालके वृक्षोंको काट गिरानेवाले उन रामको मैं मस्तक झुकाकर प्रणाम करता हूँ ॥ ९६ ॥ हे राजन् संसारके दायिनांका पाप नष्ट करनेवाले इन नौ श्लोकोंसे मैंने अपनी बुद्धिके अनुसार आपकी स्तुति का है। मेरे वरदानसे यह स्तुति स्त्री-पुत्र आदि सब वस्तुओंको देनेवाली होगी। विशाल तालके वृक्षोका भेदन करनेवाले रामको मैं मस्तक झुकाकर प्रणाम करता हूँ ॥ ९७ ॥ श्रीरामदासने कहा— इस प्रकार भक्तवत्सल, रमानाथ, राघव, रामचन्द्रकी स्तुति करके और उनसे आज्ञा लेकर नारदजी प्रसन्नतापूर्वक यहाँसे विदा हुए ॥ ९८ ॥ तब सब देवता तथा मुनिगण भी अपने-अपने स्थान-को चले गये । नररूपधारी रामचन्द्रने ऐसे-ऐसे कितने ही कौतुक किये हैं। हे द्विजोत्तम ! विस्तारपूर्वक उनका वर्णन करनेके लिए इस संसारमें कौन समर्थ हो सकता है ? ॥ ९९ ॥ १०० । उन चरित्रामेसे स्वयं रामचन्द्रजीने जो जो चरित्र हमें स्मरण कराया है वह-वह उन्हींकी आज्ञासे मैंने तुम्हारे आगे कहा है ॥ १०१ ॥ इति श्रीशतकोटिरामचरितान्तर्गते श्रीमदानन्दरामायणे पं० रामतेजपाण्डेयकृत'ज्योत्स्ना'भाषा-टीकासहिते राज्यकाण्डे उत्तरार्द्धे द्वाविंशः सर्गः ॥ २२ ॥

५३८आनन्दरामायणे[ सर्गः १३

त्रयोविंशः सर्गः

(आनन्दरामायणकी महिमा)

श्रीरामदास उवाच

अथ रामः स वैदेह्या पञ्चभिस्तनयादिभिः । चकार राज्यं धर्मेण लोकवन्द्यपदाम्बुजः । १ ।
एतस्मिन्नन्तरेऽयोध्यापुर्यां श्रीरघुनायकम् । नत्वैकदाऽब्रवीद्दूतो हे राम कञ्जलोचन ।। २ ।।
करोमि तव सेवां न तपश्चर्यां करोम्यहम् । ददस्वाज्ञां मम त्वं हि गच्छामि निजमन्दिरम् ।। ३ ।।
तथेति राघवेणोक्तः स ययौ निजमन्दिरम् । तत्र गत्वा शुचिर्मन्वाऽऽनन्दरामायणं शुभम् ।। ४ ।।
पठित्वा नवरात्रं तु ततस्तूर्णं बहिर्ययौ । एतस्मिन्नन्तरे एकदेशे पौरा मृतं नृपम् ।। ५ ।।
दृष्ट्वा तस्य सुतं बालं तान्वा कर्तुं हि मन्त्रिणम् । चक्रिरे निश्चयं तत्र केचिद्दुष्टगुणं शुभः ।। ६ ।।
केचिद्दुष्टगुणं नैष कार्यो मन्त्री खलस्त्वयम् । एवं विवदमानास्ते चक्रुर्वै निश्चयं तदा ।। ७ ।।
करिणी निजशुण्डाग्रमालया यं वरिष्यति । सोऽस्तु मन्त्री निश्चयेन ततस्तां करिणीं वरैः ।। ८ ।।
वस्त्रालङ्कारभूषाद्यैः शोभयामासुरादरात् । तत्तुण्डायां रत्नमालां दत्त्वा तां मुमुचुस्तदा ।। ९ ।।
ततस्ते नववाद्यानि वाद़यामासुरादरात् । तदा सा करिणा ग्रामाद्बहिस्तूर्णं ययौ शनैः ॥१०॥
अयोध्यायाः पश्चाद्योध्यां ययौ देशान् विलङ्घ्य सा । तन्पृष्ठे सकलाः पौरा नानाव्याहनमस्थिताः ॥११॥
ययुस्तूर्णं कौतुकेन कोटिशो मुदिताननाः । ततः सा कारिणी गत्वाऽयोध्यां दृष्ट्वा स्थितं तदा ।। १२ ।।
तं दूतं वरयामास येन पारायणं कृतम् । आनन्दरामचरितस्याहो तन्कौतुकं महत् ।। १३ ।।
बभूव सकलान् लोकान् ततस्तं माल्याङ्कितम् । करिण्या मन्त्रिणं चक्रुस्ते पौरा ये समागताः ।। १४ ।।
तं निन्युः करिणीमस्थं पत्नीपुत्रसमन्वितम् । स्वदेशे मन्त्रिणं चक्रुस्तदद्भूतमिवाभवत् । १५ ।।


श्रीरामदास कहने लगे—इसके अनन्तर सहाससे वन्दित राम जब सीता, पुत्रों और भ्राताओंके साथ धर्मपूर्वक राज्य कर रहे थे । १ ॥ उसी समय एक दूतने अयोध्यापुरीमें रामके पास आकर कहा कि हे कमललोचन राम ! अब आपकी सेवा न करके मैं तपस्या करना चाहता हूँ । मुझे आज्ञा दीजिए तो अपने घर जाऊँ ॥ २ ॥ ३ ॥ रामने उसकी प्रार्थना स्वीकार कर ली और वह अपने घर चला गया । वहाँ पवित्र मनसे उसने नौ रात्रि तक इस कल्याणदायक आनंदरामायणका पाठ किया और बादमें घरके बाहर निकला उसी समय एक देशका राजा मर गया था ॥ ४ ॥ ५ ॥ उसका पुत्र बालक था। सो उसके लिये किसीको मंत्री बनानेकी आवश्यकता पड़ी। अब पुरवासियोंमें मंत्रणा होने लगी कि किसको मंत्री बनाया जाय । कोई किसीको कहता कि अमुक मनुष्य अच्छा है, उसे मंत्री बना दिया जाय । किन्तु उसकी बात काटकर दूसरा कहता कि नहीं, वह बड़ा दुष्ट है । उसे मंत्री नहीं बनाया जा सकता । इस तरह परस्पर झगड़ा करते-करते यह निश्चय हुआ कि ॥ ६ ॥ ७ ॥ राजाकी हथनी अपनी सूँड़में माला लेकर जिसके गलेमें डाल दे वही व्यक्ति राजकुमारका मंत्री बनाया जाय । तदनुसार अच्छे-अच्छे वस्त्र-आभूषण आदि पहिनाकर हथितीको सुसज्जित किया गया और उसकी सूँड़में एक माला देकर उसे छोड़ दिया ॥ ८ ॥ ९ ॥ इसके बाद वे लोग हर्षसे बाजे बजाने लगे । वह हथिती धीरे-धीरे नगरसे बाहर निकली ॥ १० ॥ वहाँसे चलकर वह अयोध्या पहुंची । उसके पीछे अनेक प्रकारके वाहनोपर सवार होकर नागरिक लोग भी कौतुकवश बड़े वेगके साथ प्रसन्न मनसे अयोध्या तक चले आये । उस हथितीने बाजारमें खड़े उस मनुष्यके गलेमें माला डाल दी जिसने नौ रात तक आनंदरामायणका पाठ किया था । इन लोगोंके लिये यह एक असाधारण कौतुककी बात हुई ॥ ११-१३ ॥ तब माला पहिने हुए उस दूतको लोगोंने राजकुमारका मंत्री चुन लिया । उसी हथितीपर बिठाकर पत्नी-पुत्र समेत उसे अपने देश ले गये और राजकुमारके

सर्ग २३ ] राज्यकाण्डम् (उत्तरार्द्धम्) ५३९

सर्ग २३ ] राज्यकाण्डम् (उत्तरार्द्धम्) ५३९

तः परस्परं श्रुत्वा राजदूताः सहस्रशः । नानादेशेषु सर्वत्र वार्तेनेऽपि तदा सुता ॥१६॥ राजसेवां परित्यज्य अगमंस्ते स्वगृहाणि हि । ततः सर्वे स्वगृहेष्वानन्दरामायणस्य च ॥१७॥ केचित्पारायणं चक्रुः केचित्छ्रवणं मुदा । कचित्पठनं राजन् केचिच्चक्युश्च कीर्तनम् ॥१८॥ केचिच्चक्युश्च व्याख्यामेवं तन्निष्टमानसाः । बभूवुः सकला दूताः कोटिशो जगतितले ॥१९॥ तदा केन धनं लब्धं केन लब्धं महद्धनम् । केन राजपदं लब्धं केन लब्धं गृहं वरम् ॥२०॥ केन ग्रामाधिकारश्च केन लब्धा कपिर्बरा । केन वृत्तिः शुभा लब्धा केन स्वर्गे मनोरथः ॥२१॥ केन लब्धं तु पाताल केनांशा विविधाः शुभाः । लब्धं कैश्चिन्मखपदं लब्धं स्वर्गे मनोरथम् ॥२२॥ केचिदिन्द्रपदं प्राप्ताः केचिदग्निपुरं गताः । केचिद्ये धर्मराजस्य लोकं वा निर्ययुस्त्वपि ॥२३॥ वरुणस्याथ वायोश्च कुबेरस्येश्वरस्य च । लोकान् जग्रमुस्तदा दूतास्तद्गुताभिकामवत् ॥२४॥ केचिन्जाम्बूपदलोकं केचित्सुवपदं गताः । केचिते ब्रह्मलोकं च वैकुण्ठं चापि केचन ॥२५॥ एवं यथा यस्य पुण्यं दूतस्यान्यजनस्य च । आनन्दरामचरितपाठश्रवणतश्चभूत् ॥२६॥ तथा तस्य गतिर्जाता सर्व एवातरातले । तदा कोऽपि न राज्याद्योदूतो देशान्तरेष्वपि ॥२७॥ त्यक्त्वा सेवां समस्ताश्च राजरस्याथ ते गताः । रामं दृष्ट्वा गताः केचिदपृष्ट्वैव गताः परे ॥२८॥ एवं सर्वत्र देशेषु दूताभावोऽभवत्तदा । एकदा राघव द्रष्टुं गन्तुं सर्वे नृपास्तथाः ॥२९॥ सैन्यान्याज्ञापयामासु र्स्थानानि तु पृथक्पृथक् । तदा कुत्रापि सैन्यानि ददृशुर्न नृपासमाः ॥३०॥ आः किमेतदिति प्रोक्तवास्त्वहूद्भिः सुतादिभिः । दद्युस्ते राघवं द्रष्टुं विस्मयाविष्टमानसाः ॥३१॥ तावागतान्नृपान् ज्ञात्वा नान्पुरा गन्तुमादरात् । आकारयन्स्वसैन्यानि न तदा प्राप लक्ष्मणः ॥३२॥


मन्त्रियेश्वर बिदा किया। यह घटना एक अद्भुत प्रकारका घट गया ॥ १४ ॥ व १५ ॥ फिर क्या था, जब रामके दूतोंका यह खबर मिला तो सब राजपुत्र तथा अन्यान्य दूतगण दूताङ्ग दूत प्रसन्नतापूर्वक अपना अपना नौकरी छोड़कर घर चले गये। परस्पर पूछकर आनन्दरामायणका पाठ करना प्रारम्भ किया ॥ १६ ॥ १७ ॥ कुछ इसे दूसरेके मुखसे सुनने लगा, कुछ इसका पारायण करने लगे और कुछ लोग इसके संकीर्तनमें लग गये ॥ १८ ॥ कुछ लोग इसकी व्याख्या करने लगे और कुछन लोग आत्म भावना चित्तवृत्ति हटाकर इसी आनन्दरामायणमें लगा दी। इस तरह राजमज छोड़कर आनन्दरामायणका आधार रखनेवालोंकी संख्या संसारके कण्टाकके समान हो गयी ॥ १९ ॥ ऐसा प्रभाव हुआ कि फल मिला, कुछ बहुत अधिक सम्पदा मिली, किसीको राज्यपद प्राप्त हुआ और किसका उच्चकोटिका घर मिला ॥ २० ॥ कुछका ग्रामका अधिकार मिला, किसको अच्छी सती मिली, किसीको सुन्दर आजीविका मिली और जिसका मनोरथ स्वर्गलोक प्राप्त हुआ ॥ २१ ॥ किसको पाताललोक मिला और कुछ लोगोंको विविध प्रकारके अच्छे अच्छे लोक प्राप्त हुए और कुछ लोगोंको सूर्यलोक मिला ॥ २२ ॥ कुछ लोगोंको इन्द्रपद प्राप्त हुआ, कुछ अग्निदेवताका रूप, कुछ धर्मराजके लोक तथा कितने ही लोग निर्ऋतिदेवका लोक बन गये ॥ २३ ॥ कुछ वरुणलोकका, कुछ वायुलोकका, कुछ चन्द्रलोकका, कुछ सूर्यलोककी, कुछ ब्रह्मलोकका तथा कुछ लोग वैकुण्ठलोकमें जा पहुंचे ॥ २४ ॥ २५ ॥ इस तरह आनन्दरामायणके पाठसे उन दूतों तथा अन्य लोगोंको भी वे ही लोक प्राप्त हुए, जिनका जैसा पुण्य था। इस प्रकार पृथ्वीलोकमें सबका शुभ गति प्राप्त हुई। उस समय अयोध्या तथा देशान्तरमें भी कोई सिपाही नहीं रहा ॥ २६ ॥ २७ ॥ सब रामके यहां सेवा त्याग हटाकर चले गये थे। उनमेंसे कुछ लोग तो रामसे पूछकर गये थे, कुछ बिना पूछे-जांचे ही चले गये ॥ २८ ॥ इस तरह उस समय सारा देश दूतविहीन हो रहा था। एक बार संसारके जितने अच्छे-अच्छे राजे थे, वे सब रामचन्द्रजीके दर्शनमें जानेके लिये तैयार हुए। उन्होंने जब साथ चलनेके लिए सेना बुलायी तो पता चला कि सेना है ही नहीं ॥ २९ ॥ ३० ॥ यह खबर पाकर राजा लोग कहा-आहू, यह क्या हुआ, विस्मितभावसे वे अपने-अपने मित्रों और पुत्रोंको साथ लेकर अयोध्या आये ॥ ३१ ॥ जब श्रीरामके सन्मुखका यह सम्बाद मिलना

५४० आनन्दरामायणे [ सर्गः १३

ततो निवेदयामास तद्वृत्तं राघवाय सः । तच्छ्रुत्वा राघवोऽप्यासीद्विस्मयाविष्टमानसः ॥३३॥ सुहृज्जनैर्युतं बन्धुं लक्ष्मणं प्रेष्य पार्थिवान् । स्वपुरीमानयामास ते नेमु रघूनायकम् ॥३४॥ ततस्ते नृपशुः सदसि सेनात्तृत्तं न्यवेदयन् । रामोऽपि कथयामास स्वसेनात्तृत्तमादरात् ॥३५॥ तदा विहस्य श्रीरामः समाहूय निजं गुरुम् । पृष्टवान्मम सैन्यानि नृपाणां चापि वै गुरो ॥३६॥ किं जातानि क्व वै सन्ति तद्वदस्व सविस्तरम् । तद्रामवचनं श्रुत्वा कृत्वा ध्यानं क्षणं गुरुः ॥३७॥ तदा प्राह महामन्त्री विहस्य रघुनन्दनम् । राम राम महाबाहो सर्वं वेत्सि त्वमेव हि ॥३८॥ यदि पृच्छसि मां राम तर्हि सर्वं वदाम्यहम् । शतकोटिमितं रामचरितं तव पावनम् ॥३९॥ वाल्मीकिना कृतं पूर्वं तन्मध्ये रघुनन्दन । आनन्दरामचरितं नवकाण्डसमन्वितम् ॥४०॥ तस्य श्रवणपाठाद्यैः सर्वसैन्येषु ये नराः । ते गतास्त्वत्पदं केचित्केचित्श्लोकोक्तरादिषु ॥४१॥ न संति भुवि सैन्यानि सत्यं राम वचो मम । नवकाण्डमितं तच्च रम्यमानन्ददायकम् ॥४२॥ तस्यैकश्रवणादिद्धि फलं रघुकुलोद्भव । येन ते हीनजातित्वा दृप्ताश्च मुक्तिगामिनः ॥४३॥ सारकाण्डश्रवादेव संसारात्मुच्यते नरः । यात्राकाण्डेन यात्राणां लभ्यते मानवैः फलम् ॥४४॥ यागकाण्डेन यज्ञानां लभ्यते फलमुत्तमम् । विलासकाण्डश्रवणादप्सरोभिर्नमोदने ॥४५॥ जन्मकाण्डेन चाप्नोति नरः पुत्रादिमंततिम् । विवाहकाण्डश्रवणाद्भुवि रम्यां स्त्रियं लभेत् ॥४६॥ राज्यकाण्डेन राज्यं हि मानवैर्रुवि लभ्यते । कांडं मनोहर श्रुत्वा लभ्यते मानसेप्सितम् ॥४७॥ पूर्णकाण्डश्रवाद्देव [त्तै] पूर्णस्य पदं लभेत् । सर्वं तान्मानवैः श्रुत्वाऽऽनन्दरामायणं भुवि । ४८। सच्चिदानन्दरूपे ते लीनो भवति मानवः । एवं राम त्वया पृष्टं तन्मयं कथित मया ॥४९॥ यदग्रेऽद्य चिकीर्षा ते तत्कुरुष्व रघूत्तम । इति रामं वसिष्ठस्तु यावत्प्राह नृपाग्रतः ॥५०॥


उन्होंने राजाओंकी अगवानी करनेके लिए सेना बुलवायी तो उन्हं भी सेना नहीं मिली ॥ ३२ ॥ लक्ष्मणने रामको यह वृत्तान्त सुनाया तो राम भी चौंक से रह गये ॥ ३३ ॥ अन्तमें रामने भी अपने परिवारके लोगोंको भेजकर राजाओंकी आगवानी करायी । राजाओंने अपनी-अपनी सेनाका समाचार सुनाया । सो सुनकर रामने आदरपूर्वक अपना सा सब हाल कहा ॥ ३४ । ३५ ॥ तदनन्तर रामने अपने कुलगुरु वसिष्ठको बुलवाया और हंसकर उनसे कहा हे गुरो ! हमारा तथा इन राजाओंकी सेना कहाँ चली गयी है, सो विस्तारपूर्वक बतलाइए । रामकी बात सुनकर वसिष्ठने कहा-हे राम ! हे महाबाहो ! आप स्वयं सब बातोंको जानते हैं ॥ ३६-३८ । फिर भी यदि मुझसे पूछ रहे हैं तो बतलाता हूँ बहुत दिनों पहले महर्षि वाल्मीकिने सौ करोड़ श्लोकोंमें आपके पावन चरितका वर्णन किया था । उसके मध्यम नौ काण्डोंका आनन्दरामायण है ॥ ३६ ॥ ४० ॥ उसका श्रवण तथा पाठ करनेसे आपकी सेनाके सारे सैनिकोंमेसे कुछ तो आपके परमपद (वैकुण्ठ) को और कुछ अन्यान्य लोकोंको चले गये हैं ॥ ४१ ॥ हे राम ! आप मेरी इस बातको सच मानिए । इस समय संसारमें कोई भी सेना नहीं है। नौ काण्डोंवाला आनन्ददायक एवं रमणीक वह आनन्दरामायण है ॥ ४२ ॥ उसका श्रवण करनेसे नीच जातिकाले लोग भी मुक्तिपद प्राप्त कर लेते हैं ॥ ४३ ॥ सारकाण्डके श्रवणसे प्राणी संसारसे मुक्त हो जाता है। यात्राकाण्डके श्रवणसे तीर्थोंकी यात्राका पुण्य प्राप्त होता है ॥ ४४ ॥ यागकाण्डसे यज्ञोंका शुभ फल प्राप्त होता है । विलासकाण्डके श्रवणसे प्राणी स्वर्गकी अप्सराओंके साथ आनन्द करता है ॥ ४५ ॥ जन्म-काण्डके श्रवणसे पुत्रादि सन्तति पाता है । विवाहकाण्डको सुननेसे मनुष्य संसारमें सुन्दरी स्त्री पाता है ॥ ४६ ॥ राज्यकाण्डके सुननेसे प्राणी राज्यपद पाता है और मनोहरकाण्डके सुननेसे अपनी अभिलाषाके अनुसार सब वस्तुयें पा जाता है ॥ ४७ ॥ पूर्णकाण्डके श्रवणसे पूर्णपद प्राप्त होता है और समस्त आनन्दरामायण श्रवण करके मनुष्य सच्चिदानन्दस्वरूप परमात्मामे लीन हो जाता है । हे राम ! आपने मुझसे जो पूछा, सो सब मैंने

सर्ग. २१ ] राज्यकाण्डम् ( उत्तरार्द्धम् ) ५४१

सर्ग. २१ ] राज्यकाण्डम् ( उत्तरार्द्धम् ) ५४१

शत्रुघ्ने याति किं जातं तच्छृणुष्व सविस्तरात् । गते शून्या तु दूतानां वाग्भिर्देशेषु ये नराः ॥५१॥ तेऽपि सर्वे वरानन्दरामायणश्रवादिभिः । नानाविमानसंस्थास्ते ययुः स्वलोकमुत्तमम् ॥५२॥ शून्यं दृष्ट्वा निजं लोकं यमो विधिमन्वितः । कैलासे शङ्करं गत्वा सर्वं वृत्तं न्यवेदयत् ॥५३॥ शिवः श्रुत्वा निशम्याथ यमेन सह दुर्गया । ययौ स वृषमारूढः साकेतं वेष्टितोऽमरैः ॥५४॥ शिवमागतमाज्ञाय प्रत्युद्गम्य रघूद्वहः । वरासनं शिवं देव्या निवेश्य पूजनं व्यधात् ॥५५॥ ससीतो ब्रह्मशक्रापि सुराणां च यमस्य च । एतस्मिन्नन्तरे ब्रह्मा राघवं प्राह वै तदा ॥५६॥ राम राजीवपत्राक्ष यमं पश्य निरामयम् । शून्या ह्ययमनी जाताऽऽनन्दरामायणश्रवात् ॥५७॥ शून्यो जातोऽस्तिभूलोकः खेऽवकाशो न दृश्यते । सर्वेषां तत्र वै वस्तुमग्र किंचिद्विधारय ॥५८॥ इति तस्य वचः श्रुत्वा समाहूय रघूत्तमः । शत्रुघ्नं प्रेष्य गम्भीरि तस्मै वृत्तं न्यवेदयत् ॥५९॥ सोऽपि श्रुत्वा विहस्याथ राघवं वाक्यमब्रवीत् । येन मत्कार्यतानाशो न भविष्यति वै भुवि ॥६०॥ तथा सुखं च सर्वेषां तेन तत्कुरु राघव । तथेति राघवश्चोक्त्वा तदा वचनमब्रवीत् ॥६१॥ सप्तजन्मार्जितं पुण्यं ममार्चनसमुद्भवम् । यस्य स्यात्तस्य चानन्दरामायणकथारुचिः ॥६२॥ भविष्यति न सर्वेषां भवन्त्वत्र कदाचन । इति रामवचः श्रुत्वा सर्वे स्तुष्टमानसाः ॥६३॥ ययुः स्वं स्वं पदं देवाः स्वं स्वं देशं नृपाः ययुः । तदारभ्य विष्णुदास मुक्काटामत शुभे ॥६४॥ रामायणे शिवेनोक्तमानन्दाख्यामिदं शुभम् । रामायणं क्वचिन्मूर्त काश्रद्वेत्स्यति मानवः ॥६५॥ न भूम्यां सकला लोका वेत्स्यंति द्वापरे कलौ । सप्तजन्मार्जितं पुण्यं येषां वेत्स्यंति ते नराः ॥६६॥

कह सुनाया ॥ ४७ ॥ ४८ ॥ भविष्यम अब जो कुछ करना चाहत हो, सो करत चलिए । इस प्रकार वसिष्ठ रामसे कह ही रहे थे, तब तक पृथ्वीमण्डलमें क्या हुआ सो कहते हैं । उन दूतांकी गति सुनकर संसारके जितने मनुष्य थे ॥ ५० ॥ वे सब आनन्दरामायणक पढन और श्रवणस अनेक प्रकारके विमानांपर चढ़-चढ़कर उत्तम स्वर्गलोकको चल गये ॥ ५१ ॥ ५२ ॥ अपन लोकको शून्य देख यमराज ब्रह्माको साथ लेकर शङ्करजीके पास पहुँचे और प्रणाम करके उन्हें सारा वृत्तान्त कह सुनाया ॥ ५३ ॥ शिवजी यह समाचार सुनकर ब्रह्मा, पार्वती और यमराजको साथ ले तथा बहुतसे देवताओंसे वेष्टित होकर अयोध्यामें रामके पास गये ॥ ५४ ॥ जब रामको यह समाचार मिला कि शिवजी आये हैं तो प्रेमपूर्वक अगवानी करक गवतीक साथ शिवजीको एक दिव्य सिंहासनपर बिठाकर उनकी पूजा की ॥ ५५ ॥ इसके अनन्तर ब्रह्मा तथा शक्रादि देवताओंकी भी पूजा की। वांहीं बैठ बार ब्रह्माने रामसे कहा—॥ ५६ ॥ हे राजीवपत्राक्ष राम अथवा निरामय इस यमराजको ओर निहारिए । आनन्दरामायणके श्रवणसे इनका सयमनी पुरी शून्य हो गयी है ॥ ५७ ॥ भूलोक खाली हो चुका है और स्वर्गमें उन सबके रहनक लिए कुछ जगह ही नहीं रह गयी है । अब उनको रहनेके लिए कोई और स्थान सोचिये ॥ ५८ ॥ इस प्रकार शिवजीकी बात सुनकर रामने शत्रुघ्नको बुलाया और उनको यह समाचार सुनानेके लिये वाल्मीकिक पास भेजा ॥ ५९ ॥ शत्रुघ्न गये और वाल्मीकिको बुला लाये । रामके मुखसे यह वृत्तान्त सुना तो वाल्मीक हंसकर कहने लगे—जिस तरह संसारमें मेरी कविताका नाश न हो ॥ ६० ॥ और सब लोग प्रसन्न भी रह ऐसा कोई उचित उपाय सोचकर करिये । रामने उनकी बात मान श्री ओर बोले—॥ ६१ ॥ मेरा पूजन करत-करत जिनके पास सात जन्मोंका पुण्य एकत्रित होगा, उनको ही रुचि आनन्दरामायण सुननेकी होगी ॥ ६२ । भविष्यम साधारण लोगोंकी रुचि ही इस ओर नहीं होगी। इस प्रकार रामकी वाणी सुनकर सबका मन प्रसन्न हो गया ॥ ६३ । तब देवतागण अपने-अपने लोकोंको तथा राजा लोग अपन-अपन देशोंको लोट गये । तभीसे हे विष्णुदास ! मत्तकटारामचरितान्तर्गत इस आनन्दरामायणके विषयमें ऐसा हो गया कि कहीं-कहीं कोई ही कोई मनुष्य आनन्दरामायणको जानने लगा ॥ ६४ ॥ ६५ ॥ द्वापर और कलिमं तो बहुत ही कम लोग इसे जाननवाल होंगे। क्योंकि उस समयसे यह नियम बन गया है कि रामचन्द्रके पूजनसे सात जन्मोंके पुण्य जब एकत्रित होंगे, तब आनन्दरामायणमें

५४२आनन्दरामायणे[ सर्गः २४

तद्रामवचनाद्भ्रान्त्या बभूव पूर्ववत्सदा । नाभूकस्य कदा मेधाऽऽनन्दरामायणं प्रति ॥ ६७॥
सहस्रेषु नरः कश्चित्सप्तजन्मसु पुण्यवान् । आनन्दरामचरितं वेद स्तोत्रं न चापरः ॥६८॥
इति श्रीमत्कोटिरामचरितान्तर्गते श्रीमदानन्दरामायणे वाल्मीकीये राज्यकाण्डे
उत्तरार्द्धे आनन्दरामायणमहिमावर्णनं नाम त्रयोविंशः सर्गः ॥ २३ ॥


चतुर्विंशः सर्गः

( रामका यमको उपदेश, सुमन्त्रका वैकुण्ठगमन और प्रजाको रामकी शिक्षा )

श्रीरामदास उवाच
एकदा संस्थितं रामं सभायां सेवकोऽब्रवीत् । राजराज महाराज रविवंशैकभूषण ॥ १ ॥
सुमन्त्रस्तेऽन्वितोवृद्धः स मन्त्री नाकं गतः प्रभो । तपन्त्यस्तं गन्तुमन्वाज्ञां पृच्छन्ति राघव ॥ २ ॥
तद्दूतवचनं श्रुत्वा चकितः हृष्टमानसः । शीघ्रं सुमन्त्रगेहं स ययौ यानेन राघवः ॥ ३ ॥
सुमन्त्रजन्मपट्टं तस्यायुःसंख्यां ददर्श सः । जन्मकालात्सहस्राणि नव नवशतानि च ॥ ४ ॥
नवनवतिवर्षाणि मासांस्त्वेकादशैव हि । एकविंशद्दिनान्यास्तांस्तथा शेषा दिना नव ॥ ५ ॥
ज्ञात्वैवं रामचन्द्रः स तदा प्राह गुरुं प्रति । कृत युगे तु लक्षायुः सहस्रं द्वापरे स्मृतम् ॥ ६ ॥
शतवर्षं कलौ प्रोक्तं सहस्राणि दशाथ वा । त्रेतायां कायतं चायुस्तन्मद्राज्ये मृषा कृतम् ॥ ७ ॥
यमेन मामवज्ञाय महद्दण्डं लघ्वामहेच्छता । दिनानिनव शेषाणि सांत मे मन्त्रिणः कथम् ॥ ८ ॥
यमेन नीतस्त्वद्यैव यमं दण्ड्या नयाम्यहम् । सुमन्त्रं त्रापयाम्यद्य पश्य मे त्वं पराक्रमम् ॥ ९ ॥
इत्युक्त्वा गरुडारूढः कोदण्डं कलयन् करे । वेगेन रघुनन्दनः स ययौ संयमनीं पुरीम् ॥ १०॥
तावन्मार्गे सुमन्त्रं तं पाशबद्धं यमानुगाः । गच्छन्तं राघवो दृष्ट्वा तान्त्सर्वांस्ताडयन्मुहुः ॥११॥
सुमन्त्रं मोचयामास लिंगरूपधरो प्रभुः । तदा तं राघवं प्रोचुश्चापराधं तवाद्य किम् ॥१२॥


लोगोंके हाथ होंगे और तथा लोग इस जानग । तबस रामके कथनानुसार किसीकी बुद्धि आनन्दरामायणकी ओर नहीं गयी ॥ ६६ ॥ ६७ ॥ क्योंकि हजारोंमे कोई एक-आध मनुष्य ही संत जन्मोंका पुण्यवान् होगा और वही आनन्दरामायणको जान पायगा ॥ ६८ ॥ इति श्रीमत्कोटिरामचरितान्तर्गते श्रीमदानन्दरामायणे वाल्मीकीये पं० रामतेजपाण्डेयरचित व्याख्याभावाटीकासहित राज्यकाण्डे उत्तरार्द्धे त्रयोविंशः सर्गः ॥ २३ ॥

श्रीरामदास कहते लग—एक बार राम अपनी सभामें बैठे थे । तभी एक सेवकने आकर कहा—हे राज-राज ! हे सूर्यवंशके अलङ्कारस्वरूप महाराज आपका वृद्ध मन्त्री सुमन्त्रस्वर्ग चल गये। उनकी स्त्रियां सती होकर पतिकी अनुसरण करनेके लिये आपकी आज्ञा चाहती हैं ॥ १ ॥ २ ॥ इस प्रकारका सन्देश सुनकर राम एक रथपर सवार होकर सुमन्त्रके घर गय ॥ ३ ॥ वहाँ उन्होने उनकी जन्मकुण्डली मँगाकर देखा, जिससे ज्ञात हुआ कि ९९९९ वर्ष ग्यारह महीना सुमन्त्रकी आयु थी । जिसमे सब तो बीत गये, केवल नौ दिन बाकी रह गय थे ॥ ४ ॥ ५ ॥ ऐसा जानकर रामने गुरु वशिष्ठको बुलवाकर उनसे कहा कि सत्ययुगमें मनुष्यकी वायु लाख वर्षोंकी, द्वापरमें हजारकी, कलियुगमे सो वर्षकी तथा त्रेतायुगमें दस हजार वर्षकी कही गयी है । सो यमराजने मेरे राज्यमें मेरा अपमान करके उस नियमका उल्लङ्घन किया है ॥ ६ ॥ ७ ॥ ऐसा ज्ञात होता है कि वह मेरे द्वारा दण्ड पाना चाहता है । मेरे मन्त्रीकी वायुके अभी नौ दिन बाकी हैं तो यम उसे यहाँसे क्या ले गया ? मैं आज यमको दण्डकर लाता हूँ और सुमन्त्रको जिलाता हूँ। मेरा पराक्रम देखिए ॥ ८ ॥ ९ ॥ ऐसा कहकर राम गरुड़पर बैठ और धनुषको टङ्कार करत हुए यमकी संयमनी पुरीको चल दिये । तब तक रास्ते ही में उन्होंने पाशबद्ध सुमन्त्रको ले जात हुए कुछ यमदूतोंको दृष्टा । देखते ही रामने मुष्टियोंका मारकर लिंगरूपधारण सुमन्त्रको छुड़ा लिया। तब यमदूतोंने विनयपूर्वक

सर्गः २४ ] राज्यकाव्यम् (उत्तरार्द्धम्) ५५३

सर्गः २४ ] राज्यकाव्यम् (उत्तरार्द्धम्) ५५३


अस्माभिर्भेदृशो दण्डो यतोऽस्माकं कृतस्त्वया । तदा तान्माधवः प्राह दिनान्यप्युर्नवास्व हि ॥१३॥
वर्तन्ते शेषभूतानि कथमद्यैव नीयते । भविष्यन्ति दिनान्यग्रे यदा नव यमानुगाः ॥१४॥
तदाऽऽनेयः सुखेनैषं न निषेधं करोम्यहम् । इति रामवचः श्रुत्वा तमूचुस्ते यमानुगाः ॥१५॥
अपूर्वमभवज्जन्म सुमन्त्रस्यास्य राघव । मातुर्योन्या बहिस्तस्य मुखं हस्तौ विनिर्गतौ ॥१६॥
पूर्वं तनोजस्य दशमे दिवसे दैवयोगतः । उदरादीन्यथोऽङ्गानि पदांशानि शनैः शनैः ॥१७।
विनिर्गतानि धीराश्च सुमन्त्रं रक्षिणो बुधैः । यस्माज्जन्मन्ययं तस्मात्सुमन्त्राख्याऽस्यमार्पिता १८॥
अतः पूर्वदिनारभ्य संख्ययाऽऽयुः प्रपूरितम् । अस्य तद्दिनादारभ्य संख्यया दिवसा नव ॥१९॥
शेषभूताश्च भवता कीर्त्यन्ते ये रघूत्तमः । अतोऽस्माकं नापराधः संदिग्धं जन्म चास्य हि ॥२०॥
वृथाऽयं नीयते राम वृथा शिक्षाऽपि नः कृता । इति तेषां वचः श्रुत्वा रामः प्राह यमानुगान् ॥२१॥
अस्य मौल्यदिनो ज्ञेयोऽप्रथमो हि यमानुगाः । यस्मिन् दिने सुप्रसूतिर्भवदस्यैव मातृकात् ॥२२॥
जन्माहदिवसो ज्ञेयः स एव जातकं तथा । तस्मिश्चैव दिनेऽप्यत्र कृतं पित्रा द्विजोत्तमैः ॥२३॥
ज्योतिर्विदा जन्मपत्रे स एव लिखितो दिनः । अतः शेषदिनाः मन्ये ऽस्यास्त्वद्याप्युतो नव ॥२४॥
अतो युष्माभिर्गन्तव्यं नेयोऽयं दशमे दिने । पुनरागत्य सान्निध्यान्मे निषेधं करोमि न ॥२५॥
इति रामवचः श्रुत्वा तूष्णीमेव यमानुगाः । साध्वसाच्च छिन्नाङ्गा यमराजं शनैर्ययुः ॥२६॥
रामोऽपि परिवर्त्याथ ययौ स्वनगरीं प्रति । स्त्रीभिर्निराजितो मार्ग विवेश मन्त्रिणो गृहम् ॥२७॥
तावत्सर्वान्प्रमुदितान्सुमन्त्रेण समन्वितान् । ददर्श रामचन्द्रः स तावद्दृष्ट्वा रघूत्तमम् ॥२८॥
प्रणनाम सुमन्त्रः स पूजयामास राघवम् । ततो रामो ययौ गेहं सर्वे स्युर्मुदिताननाः ॥२९॥
दिनानि नव शेषापुर्ज्ञात्वा दानादिकं सुधीः । चकार प्रत्यहं भक्त्या सुमन्त्रो राघवाज्ञयाः ॥३०॥


कहा—हमने आपका क्या अपराध किया था, जिसके लिए आपने हमें ऐसा दण्ड दिया ? रामने कहा कि अभी इसके जीवनके नौ दिन बाकी हैं ॥ १०-१३॥ तब तुम आज ही इसे क्यों लिये जा रहे हो ? जब इसके दिन पूरे हो जायें, तब आकर आनन्दपूर्वक ले जाना। तब मैं भी कुछ नहीं बोलूँगा इस प्रकार रामकी वाणी सुनकर यमके अनुचर कहन लगे-॥ १४। १५। हे राघव ! इसका जन्म भी एक अपूर्व प्रकारसे हुआ था। पहिले दिन माताकी योनिसे इसके दोनो हाथ तथा मुख बाहर निकल आया था। तदनन्तर दशवें दिन धार-धारे इसके और अङ्ग निकल ये ॥ १६ ॥ १७ ॥ तबसे धीरोंने दैवियोगसे इसको रक्षा कर ली थी। अतएव इसका सुमन्त्र नाम पडा था ॥ १८ ॥ इसके पूर्व दिनसे अर्थात् जिस दिन इसका हाथ तथा मस्तक बाहर आया, उस दिनसे लेकर आज तकमें इसकी आयु समाप्त हो गयी। आप जो इसके नौ दिन बाकी बतलाते हैं, वे संदिग्ध हैं। इसलिए हे राम ! हमारा कुछ दोष नहीं है ॥ १९ ॥ २० ॥ आप व्यर्थ इसे छीने लिये जात हैं, हमपर व्यर्थ आपक भाग भी है। उनकी बात सुनकर यमदूतोंसे रामने कहा—॥ २१ । हे यमानुचर ! वह अन्तका दिन अर्थात् जिस दिन माताके गर्भसे इसका अच्छी तरह जन्म हुआ है, वही जन्मका दिन माना जायगा ॥ २२ ॥ जिस दिन इसके जन्मका उत्सव मनाया गया है, वास्तव-में वही जन्मदिन है। उसी रोज इसके पिता तथा ज्योतिर्विदोंने इसका जन्म लिखा है। इसलिए अभी इसके नौ दिन बाकी हैं ॥ २३ ॥ २४ ॥ तुम लोग जाओ और दसवें दिन आकर इसे ले जाना । तब मैं तुम लोगोंको नहीं रोकूँगा ॥ २५ ॥ रामकी बात सुन और छिप्तअङ्ग होकर शोचोम आंसू भरे हुए वे दूत यम-लोकको लौट गये ॥ २६ ॥ राम भी लौटकर अयोध्या चले आय। वहीं स्त्रियोंने उनकी आरती उतारी और राम सुमन्त्रके घर गये ॥ २७ ॥ वहाँ सब लोगोंको सुमन्त्रके साथ प्रसन्न देखा। सुमन्त्रने रामको देखते ही प्रणाम किया और उनकी पूजा की । इसके बाद राम अपने भवन गये । तबसे सब लोग परम प्रसन्न रहे ॥ २८ ॥ २९ ॥ सुमन्त्रने अपने जीवनके केवल नौ दिन बाकी जानकर रामके आज्ञानुसार खूब दान-पुण्य

५७५आनन्दरामायणे[सर्गः २४

अथ ते यमदूताश्च साश्रुनेत्राः समागताः । तूष्णींपाणिस्तैः कोपादास्फाल्य भुवि चाब्रवन् ॥३१॥ कथं करोष्यधिकारं तवाज्ञाकारिणां न्विमाम् । दृष्ट्वाऽवस्थां न लज्जा ते जायते हृदये यम ॥३२॥ तस्मादस्माकं राघवेण सुमन्त्रो मोचितः पथि । दिनानि नव शेषायुः पूर्त्यर्थमधुना वयम् ॥३३॥ वैहस्यां जले कूर्मो न जीविष्याम भो यम । तद्दूतवचनं श्रुत्वा प्रजज्वाल यमस्तदा ॥३४॥ प्राह दूतानद्य रामं बध्ध्वा दण्डं करोम्यहम् । चोरनीयानि सैन्यानि देवेन्द्रं सूचयाम्यहम् ॥३५॥ इत्युक्त्वा त्वरितो गत्वा वृत्तान्तमिन्द्रं न्यवेदयन् । पुनर्देवं यमः प्राह साहाय्यं क्रियतां मम ॥३६॥ रामस्य वचनं श्रुत्वा देवेन्द्रो यममब्रवीत् । किं भ्रान्तोऽसि यमाद्य त्वं विष्णुना योद्धुमिच्छसि ३७॥ गच्छ तूष्णीं संयमनीं रामस्य किं करिष्यसि । मद्भिया हि पुरा दत्तौ मया तौ सुरपादपौ ॥३८॥ एवं तद्वचनं श्रुत्वा वह्निलोकं ययौ यमः । अग्निना चाप्युक्तमेवं निर्ऋतिं वरुण तथा ।३९॥ वायुं कुबेरमीशानं रविं चन्द्रं बुधं गुरुम् । शुक्रं शनैश्चरं राहुं केतुं भूमिसुतं प्लवम् ॥४०॥ प्रार्थयामास युद्धाय साहाय्यं क्रियतामिति । उपगच्छीन्द्रवन्मर्त्ये दुर्द्धर्षान्नं यमं हि ते । ४१॥ ततो गत्वा विधिं चापि पातालान्गत्वाभिभिः । मण्डैर्निवामिनश्च यमः सप्रार्थयन्नृपन् ॥४२॥ तैरुच्युतुर्न करिष्यामः साहाय्यं राघवस्यतः । ततः क्रोधममाविष्टः स्वसैन्येन समन्वितः ॥४३॥ रामेण सङ्गरं कर्तुमयोध्यां स यमो ययौ । स्वगणैः सह वेगेन महामहिषसंस्थितः ॥४४॥ अयोध्यां वेष्टयामास नवद्वारविराजिताम् । नवप्राकारसहितां शतघ्नीयन्त्रसंयुताम् ॥४५॥ नवभिः परिखाभिश्च समन्तात्परिवेष्टिताम् । दृढरत्नकपाटाढ्यां रत्नभित्तिविराजिताम् ॥४६॥ सरयूवेष्टितां रम्यां रविकोटिसमप्रभाम् । नजायासत्पुष्पैश्च पताकाध्वजशोभिताम् ॥४७॥

धारण कर दिया ॥ ३० ॥ उधर वे यमदूत यमके आगे पहुंचे और अपनी पगड़ी जमीनपे फेंककर कहने लगे— ॥ ३१ ॥ हे यमराज ! तुम कैसे अपने अधिकारकी रक्षा करते हो ? अपने आज्ञाकारी हम सेवकोंकी यह दशा देखकर तुम्हें लाज नहीं आती ? ॥ ३२ । रास्तेमे रामने मारकर सुमन्त्रको छुड़ा लिया । क्योंकि उसके बीतनेके नौ दिन बाकी थे । राम वह नौ दिन पूरा कर लेनेपर सुमन्त्रको आने देंगे ॥ ३३॥ अब हम लोग जलमें डूबकर अपने प्राण दे देंगे । इस प्रकार दूतोंकी बात सुनकर धर्मराज मारे क्रोधके लाल हो गये ॥ ३४ ॥ उन्होंने दूतोंसे कहा— घबड़ाओ मत, आज ही रामको बांधकर मैं उनकी इस धृष्टताका दण्ड दूँगा । तुम जाकर सेना तैयार करो । तबतक मैं इन्द्रको सूचित करता आऊँ । ३५ ॥ ऐसा कहकर यमराज तुरंत इन्द्रके पास गये । उन्हें सारा हाल सुनाया और सहायता करनेकी प्रार्थना की ॥३६॥ यमराजकी बात सुनकर इन्द्रने कहा— यमराज ! क्या तुम पागल हो गये हो, जो विष्णुभगवान्‌के साथ युद्ध करना चाहते हो ? ॥ ३७ ॥ चुपचाप अपनी संयमनी नगरीको लौट जाओ । रामका तुम क्या कर लोगे ? उनके डरकर मैंने अपने हाथोंसे पारिजात और कल्पवृक्ष इन दोनों देववृक्षोंको उठाकर दे आया था ॥ ३८ ॥ ऐसा वचन सुनकर यम अग्निलोक गये, उनसे सहायता माँगी तो अग्निने भी वैसा ही उत्तर दिया इसके अनन्तर निर्ऋति, वरुण, ॥ ३९ ॥ वायु, कुबेर, ईशान, रवि, चन्द्र, बुध, गुरु, शुक्र, शनि, राहु, केतु तथा मङ्गललोक गये ॥ ४० ॥ सर्वत्र उन्होंने सहायताकी प्रार्थना की, किन्तु उस प्रस्तावपे यमराजको सबने इन्द्रके समान ही शुष्क उत्तर दिया ॥ ४१ ॥ तब यमराज लौटकर ब्रह्माके पास गये । पातालमे रहनेवाले राजाओं तथा सर्पलोकोंके राजाओंसे भी आकर सहायताकी प्रार्थना की । ४२ ॥ किन्तु उन्होंने भी कहा कि रामके विरुद्ध मैं तुम्हारी सहायता नहीं करूँगा । इसके बाद क्रोधाविष्ट होकर यमराज अपनी ही सेना लेकर रामके साथ युद्ध करने अयोध्या चले । उस समय उनके समस्त गण साथ थे और धर्मराज एक बड़े भारी भैंसेपर सवार थे ॥ ४३ ॥ ४४ ॥ वहाँ पहुँचकर उन्होंने चारों ओरसे उस अयोध्या नगरीको घेर लिया। जिसमें नौ बड़े बड़े फाटक थे और नौ ही खाइयाँ खुदी थीं । कितनी ही बन्दूकें और तोपें रक्खी थीं जिनमें रत्नजटित कपाट लगे थे और रत्न ही की दीवार चुनी हुई थी ॥ ४५ ॥ ४६ ॥ जिसके उत्तर सरयू बह रही थी और करोड़ों सूर्योंके प्रकाशकी नाई जिसकी

सर्गः २४ ] राज्यकाण्डम् ( उत्तरार्द्धम् ) ५४५


यमेन वेष्टितां दृष्ट्वा पुरीं रामो महामनाः । लवमाज्ञापयामास गच्छ योद्धुं यमेन हि ॥४८॥ लवस्तदा रथारूढो दुन्दुभीनां महास्वनैः । अयोध्याया बहिर्गत्वा चकार सङ्गरं महत् ॥ ४९ ॥ तदा लवशराघातच्छिन्नदेहा यमानुगाः । निपेतुः क्षणमात्रेण कोटिशो रणभूमिषु ॥५०॥ तान्सर्वान्निहतान् दृष्ट्वा यमो महिषसंस्थितः । चकार तुमुलं युद्धं लवेन क्रोधभासुरः ॥५१॥ स्वबाणौघैर्धनुः शीघ्रं रथं सूतं दृढं धनुः । कवचं मुकुटं चापि चिच्छेद स लवस्य च ॥५२॥ तदा लवश्चातिक्रुद्धः स्वसैन्येन स्थित पुनः । चकार सङ्गरं घोरं यमेनातिभयंकरम् ॥५३॥ तदामरा विमानस्था ददृशुर्युद्धकौतुकम् । ततो लवः स्वबाणौघैर्महिषं मूर्च्छितं भुवि ॥५४॥ कृत्वा तं ताडयामास शतबाणौघैर्म जवात् । ततो यमोऽप्यतिक्रुद्धो यमदण्डं मुमोच तम् ॥५५॥ तं दण्डं मोचितं दृष्ट्वा ब्रह्मास्त्रं सन्दधे लवः । ब्रह्मास्त्रमागतं दृष्ट्वा यमदण्डो न्यवर्तत ॥५६॥ तदा यमोऽपि विकलः पलायनपरोऽभवत् । ब्रह्मास्त्रं तस्य पृष्ठे तप्यौ कालानलप्रभम् ॥५७॥ तदा दृष्ट्वा रविः शीघ्रं स्त्रीयो भिन्नो प्रकल्प च । रथे मूर्त्ति ययौ वेगात् प्रार्थयामास तं लवम् ॥५८॥ रे रे बाल यमं त्राहि चोपसंहाराद्य हि । त्वयोग्मृष्ट ब्रह्मास्त्र त्वमेवास्त्रविदां वरः ॥५९॥ त्व मे वंशसमुद्भूतन्म्वयं मे तनयो यमः कथं स्वपूर्वजं त्वद्य न्व यमं हन्तुमिच्छसि । ६०॥ येदेको मूर्खतां यातः सर्वे मूर्खा भवन्ति न । शत्रुं रणात्पशीअंश्च वीरान्न रघ्यन्ति हि ॥६१॥


प्रकाश था। उसने नाना प्रकारके महल बने थे और वह पुरी बहुत-सी पताकाओं तथा ध्वजाओंसे अलंकृत थी ॥ ४७ ॥ यमराजसे घिरी अयोध्याको देखकर रामने लवसे कहा—तुम यमराजसे युद्ध करनेके लिए जाओ ॥ ४८ ॥ तब दुन्दुभीके विकराल निनादके साथ लव रथपर आरूढ़ होकर अयोध्याके बाहर आये और यमराजके साथ भयङ्कर युद्ध किया ॥ ४९ ॥ उस समय लवके बाणोंसे विद्ध होकर यमके करोड़ों अनुयायी क्षणमात्रमें धराशायी हो गये ॥ ५० ॥ उन सबोंको मरा देखकर रथमें नयनमग्न हुए यमराजने स्वयं लवके साथ तुमुल युद्ध प्रारम्भ कर दिया ॥ ५१ । यमराजने अपने विकराल बाणोंकी वर्षासे शीघ्र लवके रथ, सारथी, धनुष, कवच तथा मुकुटको काट डाला ॥ ५२ ॥ तब अत्यन्त कुपित लवने एक दूसरे रथपर आरूढ़ होकर यमराजके साथ महाभयंकर युद्ध प्रारम्भ कर दिया ॥ ५३ ॥ उस समय समस्त देवता अपने विमानोंपर आरूढ़ होकर समराङ्गणमें आये और वह युद्ध देखने लगे । इसके अनन्तर लवने अपने बाणोंकी वर्षासे यमराजके भैंसेको मूर्छित कर पृथ्वीपर लौटा दिया और बणके साथ बाण चलात हुए सौ बाणोंकी वर्षासे यमराजपर प्रहार किया तब यमराजने अतिशय क्रुद्ध होकर लवपर यमदण्ड छोड़ा ॥ ५४ ॥ ५५ ॥ यमदण्डको देखकर लवने ब्रह्मास्त्र चला दिया, जिससे यमदण्ड लौट पड़ा। तब यम विकल होकर भाग निकले और कालानलके समान ब्रह्मास्त्र उनके पीछे-पीछे चला ॥ ५६ ॥ ५७ ॥ उस ब्रह्मास्त्रको देखकर सूर्यने समझा कि इससे यम नहीं बच सकता। मेरा बेटा अवश्य मारा जायगा तब सूर्यदेव स्वयं रथपर आरूढ़ होकर लवके पास आये और प्रार्थना करने लगे ॥ ५८ ॥ सूर्यने कहा—अरे अरे हे बच्चे ! इस अस्त्रको लौटाकर यमको बचाओ। तुम्हींने इसे चलाया है और तुम्हीं इसका निवारण भी कर सकते हो। तुम अस्त्रविद्या जाननेवालोंमें सर्वश्रेष्ठ हो ॥ ५९ ॥ तुम हमारे वंशमें उत्पन्न हुए हो और यम भी मेरा ही पुत्र है। क्या अपने पूर्वज यमको ही तुम मार डालना चाहते हो ? ॥ ६० ॥ यदि एक लड़का मूर्ख हो गया तो क्या उसके साथ सब मूर्ख हों

५५६ आनन्दरामायणे [ सर्गः २४


इत्यादिनानावचनैः प्रार्थितो रविणा यदा ।
तदा लवेोऽपि संहारं चक्रास्त्रस्य ब्रह्मणः ॥६२॥
ततो लवं पुरस्कृत्य यमेन तपनः पुरीम् । विवेश रघुनाथस्य दर्शनार्थं मुदान्वितः ॥६३॥
तदा खे देववाद्यानि नेदुः कुसुमवृष्टिभिः । लवं ववर्षुरमरा ननृतुश्चाप्सरोगणाः ॥६४॥
पौरनार्यो लवं मार्गे दवर्षुः पुष्पवृष्टिभिः । गोपुराट्टालमस्थाश्च ददृशुस्तं मुहुर्मुहुः ॥६५॥
नेदुनानासुवाद्यानि ननृतुर्वारयोषितः । तुष्टुवुर्मगधाश्चाथ जगुर्गन्धर्वकिन्नराः ॥६६॥
एवं नानामहोत्साहैः स्त्रीभिर्नीराजितः पथि ।
ययौ स विजयी बालः प्रननाम रघूत्तमम् ॥६७॥
रविमागतमाज्ञाय प्रत्युद्गम्य रघूत्तमः । नत्वा रविं करे धृत्वा सभायां सन्निवेश्य ह ॥६८॥
ततः सिंहासने भानुं निवेश्य स्वीयपूर्वकम् । पूजयामास श्रीरामः षोडशैरुपचारकैः ॥६९॥
बद्धाऽञ्जलिर्द्विविं रामः सभायां पुरतः स्थितः ।
पूर्वजस्त्वं क्षमस्वाथ यल्लवेनापराधिनाम् ॥७०॥
तद्रामवचनं श्रुत्वा शमं प्राह रविस्तदा । त्वन्नाभिकमलाद्ब्रह्मा समुद्भूतो रघूत्तम ॥७१॥
मरीच्याद्या विधेः पुत्रा मरीचेः कश्यपः सुतः ।
कश्यपस्य च ममोत्पत्तिः पौत्रपौत्रस्त्वहं तव ॥७२॥
क्षमस्व मम पुत्रेण यद्यमेनापराधिनाम् । एवं संप्रार्थ्य श्रीरामं चासने संन्यवेशयत् ॥७३॥
यमेन कारयामास रघुनाथाय वन्दनम् । तदा समाययुर्देवा नेमुः सर्वे रघूत्तमम् ॥७४॥
रामोऽपि सकलान्देवान्पूजयामास सादरम् ।
ततो रामाज्ञया चेन्द्रः सुधावृष्ट्या रणे मृतान् ॥७५॥
शीघ्रमुत्थापयामास सर्वान्वीरान्सवाहनैः । ततो रामो यमं प्राह यावद्राज्यं करोम्यहम् ॥७६॥

पावेंगे । वीर लोग संग्रामभूमिसे भागे हुए शत्रुकी भी रक्षा ही करते हैं ॥ ६१ ॥ इस प्रकार कितनी ही बातोंके सूर्यके प्रार्थना करनेपर लवने ब्रह्मास्त्रका संम्हरण कर लिया ॥ ६२ ॥ इसके अनन्तर लवको आगे करके यमराजके साथ-साथ सूर्य रामचन्द्रका दर्शन करनेके लिए हर्षपूर्वक अयोध्या नगरीमें गये ॥ ६३ ॥ उस समय देवताओंने अपने बाजे बजाये, लवपर फूलोंकी वर्षा की और अप्सरायें नाचने लगीं ॥ ६४ ॥ पुरवासिनी स्त्रियें भी रास्तेमें कोठेपरसे फूल बरसाती हुई बार-बार लवको निहार रही थीं । ६५ ॥ उस समय विविध प्रकारके बाजे बजे, गणिकाय नाचने लगीं और मागध, गन्धर्व तथा किन्नरगण स्तुति करने लगे ॥ ६६ ॥ इस तरह अनेक उत्सवके साथ रास्तेमें आरती उतरवाता हुआ वह विजयी बालक लव रामके पास पहुंचा और प्रणाम किया ॥ ६७ ॥ रामने सूर्यभगवानका आगमन सुनकर उनकी अगवानी की, प्रणाम किया और हाथ पकड़कर सभाभवनमे ले गये ॥ ६८ ॥ इसके अनन्तर अपने पूर्वज सूर्यको रामने सिंहासनपर बिठलाया और षोडशोपचारसे उनकी पूजा की । ६९ ॥ फिर रामने सूर्यभगवान्से कहा—आप हमारे पूर्वज हैं। अतएव लवने जो कुछ अपराध किया हो, सो क्षमा कीजिये ॥ ७० ॥ रामकी ऐसी बात सुनकर सूर्यने भगवान्से कहा—हे रघूत्तम ! आपकी नाभिकमलसे ब्रह्माजी उत्पन्न हुए थे और उनसे अत्रि आदि उत्पन्न हुए मरीचिसे कश्यप हुए और कश्यपसे मैं उत्पन्न हुआ हूं । अतएव मैं आपके पौत्रका पौत्र हूं ॥ ७१ ॥ ॥ ७२ ॥ हमारे पुत्र यमने जो अपराध किया हो, सो क्षमा करिये । इस प्रकार विनय करके सूर्यने रामको आसनपर बिठलाया और यमसे प्रणाम करवाया । इसके बाद समस्त देवतावृन्द वहां आ पहुंचे और उन्होंने रामचन्द्रजीकी वन्दना की ॥ ७३ ॥ ७४ ॥ रामने भी सादर सब देवताओंकी पूजा की । इसके बाद रामकी आज्ञासे इन्द्रने संग्राममें मरे हुए लोगोंपर अमृतकी वर्षा की और वाहनसमेत समस्त वीरोंको उठा-

सर्गः २४ ] राज्यकाण्डम् उत्तरार्द्धम् ५४७

सर्गः २४ ] राज्यकाण्डम् उत्तरार्द्धम् ५४७

तावत्त्वया तु पूर्णायुर्नरो नेयो न चेतरः । तद्रामवचनं श्रुत्वा तथेत्याह यमस्तदा ॥७७॥ ततः प्राप्ते सुदशमे दिने स्त्रीभिर्गताध्व मः । सुमन्त्रो राघव नत्वा तदग्रे जीवितं जहौ ॥७८॥ ततः स दिव्यदेहाभिः स्वस्त्रीभिर्दिव्यदेहभृत् ७९॥ सुमन्त्रः पूजितः सर्वैर्विमाने प्रस्थितो बभौ । रामाग्रे मरणादेव सुरैः सर्वत्र वेष्टितः ॥८०॥ ततः दृष्ट्वा रवी रामं यमेन स्वस्थलं ययौ । ययौ सुमन्त्रः स्वस्त्रीभिर्वैकुण्ठं निर्जरा दिवम् ॥८१॥ रामः सुमन्त्रपुत्रेण यत्क्रियादि सुमन्तुना । कारयित्वा यथाशास्त्रं तत्पदे तं न्यवेशयत् ॥८२॥ ततो रामो लक्ष्मणैव पृथिव्यां घोषयन्मुहुः । गजन्यतां दुन्दुभिं स्वां पाताळध्वजशोभिताम् ॥८३। तथेति लक्ष्मणश्चापि दूतानाज्ञापयत्तदा । दूतास्तेऽथ गजारूढाः सप्तद्वीपान्तरेषु हि । ८४। रामाज्ञां श्रावयामासुर्नानन्दुन्दुभिनिःस्वनैः । अपूर्णायुर्मृतः कश्चिन्नैवान्यो राज्यस्य प्रति ॥८५॥ पौराणिकाः स्थापनीया गेहे ग्रामे पृथक् पृथक् । नित्यनैमित्तिकं कर्म न त्याज्यं वै कदाचन ॥८६॥ नावमान्या भूसुराश्च द्वेषः कार्यो न कस्यचित् । द्रव्यं कस्य सदा देयं दण्डन याश्च तस्कराः ॥८७॥ शासनीया दुराचारतत्परा ये जना भुवि । वन्दनीया सदा माता वन्दनीय सदा पिता ॥८८॥ पूजनीयाः सदा देवाः कार्यो धर्मो निरन्तरम् । नेत्रस्नानं सदा कार्यमयोग्यायामथापि वा ॥८९। रामतीर्थेषु सर्वत्र कार्या धर्मा विशेषतः । द्वारकां सदा गत्वा कार्यं वैशाखमज्जनम् ॥९०। ऊर्जे कार्या पञ्चतपदे स्नातव्यं विधिवत्कदा । गत्वा प्रयागं प्रत्यब्दं कर्तव्यं माघमज्जनम् ॥९१॥

कर खड़ा किया । तदनन्तर रामने यमराजस कहा कि जबतक में पृथ्वीपर शासन करता रहूँ, तबतक तुम उन्हीं मनुष्योंको अपने लोकमें ले जाओ जिनकी आयु पूर्ण हो गयी हो और किसीको नहीं। रामकी बात सुन-कर यमराजने कहा कि "ऐसा ही होगा" । ७५-७७। इसके पश्चात् दशव दिन स्त्रियोंको साथ लेकर सुमन्त्रने रामको प्रणाम करके उनके सामने ही प्राण त्याग किया । ७८॥ सुमन्त्रकी स्त्रियोने भी उसी समय प्राण त्याग दिया और उन स्त्रियोंके साथ दिव्यहूप धारण करके सुमन्त्र सब लोगोंसे पूजित होते हुए विमान-पर बैठकर अतिशय शोभित हुए । रामके समक्ष मरनेसे वे समस्त देवत.ओँके साथ देवलोकको गये ॥ ७९ ॥ ॥ ८० ॥ इसके पश्चात् सूर्य भी रामसे आज्ञा लेकर यमके साथ लौट पड़े। रामने सुमन्त्रके पुत्र सुमन्तुके हाथों सुमन्त्रकी क्रिया करवायी और पिताके आसनपर उसी पुत्रको बिठाला । ८१ ॥ ८२ ॥ तदनन्तर रामने लक्ष्मणको पृथ्वीतलमें इस बातकी घोषणा करनेकी आज्ञा दी ॥ ८३ ॥ लक्ष्मणन भा "बहुत अच्छा" कहकर दुन्दुभी बजानेवालोँको आज्ञा दे दी। वे हाथीपर सवार हो तथा सातोँ द्वीपोम जा जाकर नगाड़े बजाते हुए रामकी आज्ञा सुनाने लगे । उन्होंने कहा—राजा रामचन्द्रका आदेश है कि यदि मेरे राज्यमें कोई मनुष्य बिना आयु पूर्ण हुए ही मरे तो उसे मेरे पास ले आया जाय ॥ ८४ । ८५ ॥ घर-घर तथा गाँव-गाँवमें पुराणों-को जाननेवाले पौराणिक रक्खे जायें। कोई मनुष्य अपने नित्य-नैमित्तिक कर्मोंको न छोड़े ॥ ८६ ॥ ब्राह्मणोंका कोई अपमान न करे, कोई किसीके साथ द्वेषभाव न रक्खे, कोई किसीके द्रव्यको न ले और चोरोँको दण्ड दे ॥ ८७॥ जो लोग दुराचारी हों, उनपर कड़ा शासन किया जाय । धर्म कर्म सदा होता रहे । अयोध्यामें अथवा किसी अन्य रामतीर्थमें जाकर लोग नेत्रस्नान किया करें । ८८ । ८९ ॥ विशेषतः

५४६ आनन्दरामायणे [ सर्ग २४

चातुर्मास्यव्रतादीनि कर्त्तव्यानि व्रतानि हि । प्रत्यंगणेषु तुलसी पूजनीया हि सर्वदा ॥९२॥ न निराकरणीयोऽत्र स्वातिथिश्च कदाचन । न विप्रयाच्ञा कर्तव्या मृषा क्वापि कदाचन ॥९३॥ यदीच्छेन्स ततो देयं सर्वस्वं ब्राह्मणाय वै । ग्रामे गृहे क्वचिच्चैव कलहं तु समाचरेत् ॥९४॥ सदा गुरुर्वन्दनीयः कर्णपर्व श्रवं सदा । प्रातःस्नानं सदा कार्यं होतव्या विहिताग्नयः ॥९५ । कार्यो जपः शंकरस्य ध्येयो नित्यं महेश्वरः । एकांते हि तपः कार्यं द्वाभ्यामध्ययनं तदा । ९६॥ त्रिभिर्गीतानि कार्याणि चतुर्भिर्विचरेत्पथि । परदाररतिस्त्याज्या नावलोक्याऽन्यकामिनी । ९७ । परलक्ष्म्याः स्पृहा कार्या न नरैश्च कदाचन । तीर्थं विना पुण्यकाले न स्नातन्ये गृहेष्वपि ॥९८॥ न द्वेष्या गणका वैद्यास्ते पोष्याश्च पुरे पुरे । न वेश्यागमनं कार्यं न दासीं स्वहषेद्बुदि ॥९९॥ नित्यकर्म यथाकाले कर्तव्यं भवदा नरैः । नावमान्या हि गुरवः परनिंदा न कारयेत् ।१००॥ जलाशया वने कार्या रोपणीया गणाः पथि । धर्मशालाः पृथक्कार्या न नग्नां वीक्ष्यद्वधूम् ॥१०१॥ अन्नसत्राणि कार्याणि पुरे ग्रामे वने तथा । प्रकुर्वन्तु वने रक्षां मार्गस्थानां वनेचराः ॥१०२॥ भयं साऽस्तु वने क्वापि निशायां मार्गगामिनाम् वैश्येभ्यस्तु करो ग्राह्यो नेतरेषां कदाचन ॥१०३। पादद्योः पादुके धुन्वा तीर्थे देवं गुरुं प्रति । मातु वृन्दावने होमशालां गच्छेन्न सर्वदा ॥१०४॥ पारायणानि ग्रंथानां वेदानां च सदा नरैः । कर्तव्यानि तु निष्कामं ग्रामकार्याणि कारयेत् ॥१०५॥


होत धर्मकर्म करते रह। द्वारकापुरीमे जाकर लोग वैशाखस्नान कर ॥ ६० ॥ कार्तिक मासमे काशीका पञ्चगङ्गामे और प्रतिवर्ष माघमासम प्रयाग जाकर स्नान करं ॥ ९१ ॥ चातुर्मास आदिका व्रत करते रहे। हर एक घरके आँगनमे तुलसीकी पूजा होती रहनी चाहिए ॥ ९२ ॥ भर राज्यम कभी कोई आये हुए अतिथि-का अनादर न करे । कभी कोई किसी ब्राह्मणकी मति व्यर्थ न कर ॥ ९३ ॥ यदि वह चाहता हो तो ब्राह्मणके लिये अपना सर्वस्व दे डाले । किसी घर या गाँवमें कोई लड़ाई झगड़ा न करे ॥ ९४ ॥ सदा गुरुकी वन्दना करे, उनसे सर्वदा धर्मग्रंथ सुनता रह, नित्य प्रातःस्नान कर और विधिवक अग्निहोत्र करता रहे ॥ ९५ ॥ नित्य शिवजीका ध्यान और जप करता हुआ एकान्तम तपस्या करे । दो व्यक्ति साथ बैठकर अध्ययन करें, तीन मनुष्य साथ बैठकर गायें-बजायें और चार मनुष्य साथ होकर टहलने निकले । दूसरोकी स्त्रीसे प्रेम न करे, दूसरी स्त्रीको देखे भी नहीं ॥ ९६ ॥ ९७ ॥ दूसरोंकी लक्ष्मीका पानेकी इच्छा न करे, किसी पर्वकालके समय घरमें स्नान न करे, बल्कि किमा तीर्थस्थानपर चला जाय ॥ ९८॥ ज्योतिषी तथा वैद्यके साथ कोई विगाड़ न करे । यदि किसी दूसरे गाँवम भा रहते हों तो उनका पालन करे । न कोई वेश्यागमन करे और न दासीस प्रेम कर ॥ ९९ ॥ ठीक समयपर लोग अपने नित्यकर्म करते रहें । गुरुजनोका अपमान कभी न करे और न दूसरोकी निन्दा ही कर । वनमें जलाशय बनवाये । अलग-अलग धर्मशालायें बनवाये । कभी नङ्गी स्त्रीको न देखे ॥ १०० ॥ १०१ ॥ पुर, ग्राम और वनोंमें जहाँ-तहाँ अन्नक्षेत्र खोले । बनचर मनुष्य वनमें पहुँच हुए पथिकोकी रक्षा करें ॥ १०२ ॥ रात्रिके समय भी चलनेवालोको वनमे किसो प्रकारका भय न रहे, केवल वैश्योंसे कर लिया जाय और लोगोंसे नहीं ॥ १०३ ॥ पाँवमे जूता पहिनकर किसी तीर्थस्थान देवता तथा गुरुके पास न जाय । गोशाला तथा तुलसीकी बगीचीमें भी जूता पहिनकर न जाय ॥ १०४ ॥ धर्मग्रंथों और वेदोका पारायण सर्वदा सब लोग निष्कामभावसे करते रहें ॥ १०५ ॥

सर्गः २४ ] राज्यकाण्डम् ( उत्तरार्द्धम् ) [ ५४९

सर्गः २४ ] राज्यकाण्डम् ( उत्तरार्द्धम् ) [ ५४९


यतयो वन्दनीयाश्चभोजनीया गृहे गृहे । यतये कमण्डलवः कौपीनं पादुकां तथा ॥१२०६॥
वंशदण्डाः सदा देयाः सदा तोष्याः सुकाषवैः ।
न खेदयेच्च स्त्रीयां दिन निद्रां न कारयेत् ॥१२०७॥
हविदिन्यां न भोक्तव्यमुपोष्या च चतुर्दशी ।
कृष्णपक्षस्य तस्यां रात्रौ कार्यं शिवान्नम् ॥१२०८॥
नानामहोत्सवाद्यैश्चयथाविधिपुरःसरम् । अष्टमी कृष्णपक्षस्य यशोदाप्या शुभा तिथिः ॥१२०९॥
देवालयेषु कर्तव्याबलयो भक्तिपूर्वकः । नानप्रकारान्नवेद्यान्देवेभ्यश्च समर्पयेत् ॥१२१०॥
धेनुदानं वाजिदानंगजदानं प्रकारयेत् । भूसुरेभ्यः प्रदेयानि गृहदानानि सादरम् ॥१२११॥
गेहे गेहे सदा कार्यं धेनुविप्रप्रपूजनम् ।
वसन्ते चन्दनं देयं छत्राणि व्यजनानि च ॥१२१२॥
पानकं जलकुंभांश्चकार्यं पादावनेजनम् । दधि तक्रं हि जंबीरं देयं विप्रेभ्य आदरात् ॥१२१३॥
कार्त्तिके दीपदानानिरात्रौ जागरणांनि च । तुलसीसेवनं धात्रीच्छायामाश्रित्य भोजनम् ॥१२१४॥
गीतनृत्यादिकरणं विष्णोग्रे निरन्तरम् ।
त्रिपुरारेः समीपे हि पौर्णिमायां हि कार्त्तिके ॥१२१५॥
करणायो महादाहोघृताक्तवर्त्तिकादिभिः । माघ देवानि काष्ठानि कम्बलांश्च त्रिजास्तथा ॥१२१६॥
चैत्रे तांबूलदानं चतथा रंभाफलानि च । उशीरकानि दयानि चन्दनं रवितक्रकम् ॥१२१७॥
आदर्शदानं कस्तूरीदानंजातीफलस्य च । एलाकर्पूरदानानि वपुषामपि प्रकारयेत् ॥१२१८॥
पदाऽग्रजं न स्पृशेच्चन पादं क्षेपयेत्परा । द्वाभ्यां कराभ्यां कूर्द्दान्तमस्तकस्य न कारयेत् ॥१२१९॥
दातव्यः करभारो हि विना विप्रेन्द्रपाय हि ।
नोपेक्ष्योयो राज्ञश्च अर्थदण्डः कदाचन ॥१२२०॥
माननीयाश्च श्वशुराःपोष्याः पाल्याः सदैव हि । सुहृदम्तोपर्णायश्च मित्रे कोपं न कारयेत् ॥१२२१॥

महात्माओंकी वन्दना की जाय और घर-घर भोजन कराया जाय । उन्हें कमण्डलु, कौपीन, चरणपादुका आदि दान दिया जाय ॥ १०६ ॥ उन्हें बाँसकी छड़ी भी दे और भठा मज्जा दातारू प्रसन्न करे । कभी कई अपनी स्त्रीको दुःखित न करे और दिनमें शयन न करे। एकादशका अन्नका आहार न करे और कृष्णपक्षकी चतुर्दशीका भी व्रत किया करे । उस रात्रिमें सांग उत्साहसे शिवजीका पूजन करे ॥ १२०७ ॥ १२०८ ॥ कृष्णपक्षकी अष्टमीका भी व्रत सब लोग किया करें। क्योंकि यह बड़ा शुभ तिथि है ॥ १२०९ ॥ देवालयोंमें भक्तिपूर्वक पूजन करके विविध प्रकारके नैवेद्य देवताम को समर्पित किये जायें ॥ १२१० ॥ लोग समय-समयपर धेनुदान, वाजिदान, गजदान आदि दान आदरपूर्वक ब्राह्मणोंको दिया करें ॥ १२११ ॥ घर-घरमें सदा गौओं तथा विप्रोंका पूजन होता रहना चाहिए । वसन्त ऋतुमें चन्दन, छत्र तथा पंखेका दान करें ॥ १२१२ ॥ पानी पीनेके लिये लोटा, जल भरनेके लिए घड़ा, पैर धोनेके लिए झारी, दही, मट्ठा और नींबूका दान ब्राह्मणोंको दे ॥ १२१३ ॥ कार्त्तिक मासमें दीपदान, रात्रिको जागरण, तुलसीका सेवा और आंवलेकी छायामें भोजन करे ॥ ११४ ॥ निरन्तर विष्णुभगवान्के सामने नाच-गायें। कार्त्तिकका पूर्णिमाको शिवजीके सामने घीमें भीगी बत्ती आदिका महादान करे । माघ मासमें लक्कड़ियों तथा वस्त्र, विरजै कम्बलोंका दान करे ॥ १२१५ ॥ १२१६ ॥ चैत्रमें ताम्बूल तथा केलेके फल दान करके अगर, चन्दन, दही और मट्ठा आदि दे ॥ १२१७ ॥ वैशाखके महीनेमें शीशा, कस्तूरी, जायफल, इलायची तथा कपूरका दान करे ॥ १२१८॥ पैरसे बड़े भाईको न छुए पैरसे पैर न रगडे, दोनों हाथोसे सिर न सुहलाये ॥ १२१९ ॥ ब्राह्मणके अतिरिक्त सब लोग राजाको राजकर देते रहें । राजाके दिये दण्डकी उपेक्षा न करे ॥ १२२० ॥ अपने-अपने श्वशुरकी इज्जत करे

५६० आनन्दरामायणे [ सर्गः २४

न कर्तव्यो रिपूणां च विश्वासश्च कदाचन । कार्पण्यं नैव कर्तव्यं दानकर्मसु सर्वदा ॥१२२॥ न द्यूतेन क्वचित् कार्यो क्रीडा दारिद्र्यसूचिनी । न श्रोतव्या कदा वार्त्ता मद्यानां च नरोत्तमैः । १२३ तीर्थयात्रा सदा कार्या कृच्छ्रकृच्छ्रादि ममाचरेत् । कार्यं लिंगार्चनं नित्यं कोटिलिङ्गानि श्रावणे ॥१२४॥ कर्त्तव्यानि नरोत्कन्या मठेष्वाप च कारयेत् । लघुरुद्रान्महारुद्रानतिरुद्रान्ममादरेत् ॥१२५॥ दानानि पुस्तकनां च कर्तव्यानि निरन्तरम् । कीर्तनानि च कार्याणि देवगारेषु वा गृहे ॥१२६ साधूनां पूजनं कार्यं नमस्कार्यः सदा रविः । ग्रामे ग्रामे वायुपुत्रप्रतिमाः सर्वदा पृथक् ॥१२७॥ सिन्दूराक्ताश्च तैलाक्ताः पूजनीया निरन्तरम् । चतुर्थ्यां गणराजस्य पूजनानि प्रकारयेत् ॥१२८। अपयेद्गणराजाय मोदकान्पूलपूरितान् । पञ्च खाद्यानि सिंदूरदूर्वादिन्यर्पयेन्मदा ॥१२९॥ सदाऽऽत्मचर्चा कर्त्तव्या स्तोत्रपाठान्प्रकारयेत् । गीतायाः पठनं वेदानध्यापयेन्मदा । १३०। सदैव शान्तिसूक्तानि पुण्यसूक्तान्यनेकशः । पुण्यं पुरुषसूक्तं च श्रीसूक्तादीनि वै पठेत् ॥१३१॥ सदा धर्मे मतिः कार्या कार्यों धर्मस्य संग्रहः । दुष्टबुद्धिः सदा त्याज्या पातकं परिमार्जयेत् । १३२। ज्ञातव्यं चपलं चायुः क्रूरो ज्ञेयो यमो महान् । दारुणा नारकी पीडा स्मर्त्तव्या हृदि सर्वदा ॥१३३॥ गतस्तातो मृता माता गतश्च प्रपितामहः । पितामहो गतश्चेति गमनं स्वं निरीक्षयेत् ॥१३४। गतं यथाऽत्र बालित्वं तारुण्यं च गतं यथा । यथा गच्छति वार्द्धक्यं स्मरेच्चै यमशासनम् ॥१३५।

और नौकरोंका सदा पालन करता रहे । अपने कलत्राणको प्रसन्न रक्खे । मित्रपर कोप न करे । १२१ ॥ कभी भी शत्रुपर विश्वास न करे और दानादि कर्मोंमें कभा कृपणता न करे । कभा जुआन खेले । क्योंकि यह दरिद्रता-को पास बुलानेवाला रोग है । अच्छे लोग कभी भांगकी बात भी न सुनें ॥ १२२ ॥ १२३ ॥ सदा तीर्थों की यात्रा करे और कभी कभी कृच्छ्रचान्द्रायण आदि व्रत भा किया करे । प्रतिदिन शिवलिंगका पूजन करे और श्रावणम, सम एक करोड़ शिवलिंग बनाकर उनकी पूजा करे ॥ १२४ ॥ बन पड़े तो सदा ऐसा करे । लघुरुद्र, महारुद्र एवं अतिरुद्र इन तीनों यज्ञोंको बराबर करता जाय ॥ १२५ ॥ निरन्तर पुस्तकदान करे । घरमें अथवा देवालयमें जाकर प्रतिदिन कीर्तन करे ॥१२६॥ सब काल साधुओंका पूजन और प्रतिदिन सूर्यको नमस्कार करे । गाँव-गाँवमें हनुमान्जीकी मूर्तियाँ रक्खा जायें । १२७ ॥ तेलमें मिला सिन्दूर लगाकर नित्य उनकी पूजा की जाय । प्रत्येक चतुर्थी तिथिको गणेशजी का पूजन किया जाय । १२८ ॥ मोदक तथा पूरनपूरी आदि पकवान बनाकर गणेशजीको अर्पण करे और सिन्दूर-दूर्वा आदि भी चढ़ाये । १२९ ॥ प्रतिदिन आत्मज्ञान-सम्बन्धी चर्चा, स्तोत्रपाठ, गीताका अध्ययन तथा वेदोंका अध्ययन-अध्यापन करता रहे ॥ १३० ॥ नित्य शान्तिसूक्त तथा श्रीसूक्त आदिका पाठ किया करे ॥ १३१ ॥ सदा अपनी बुद्धि धर्ममें स्थित रक्खे और धर्मका संग्रह करता चले । दुष्ट बुद्धिका परित्याग करे और किये हुए पापोंसे छूटनेका उपाय करता रहे ॥ १३२ ॥ आयुको चंचल तथा यमराजको महाक्रूर समझे । नरककी दारुण पीड़ाओंका सदा स्मरण करता रहे ॥ १३३ ॥ यह सोचता रहे कि पिताजी चल गये, माता मर गयी, पितामह और प्रपितामह भी चल बसे, अब हमारी बारी है । जिस तरह बाल्यकाल गुजर गया, तरुणाई बीत गयी, उसी तरह यह बुढ़ा-

सर्गः २४ ] राज्यकाण्डम् ( उत्तरार्द्धम् ) ६५१

सर्गः २४ ] राज्यकाण्डम् ( उत्तरार्द्धम् ) ६५१

गता दंता गते नेत्रे श्लथा जाता त्वगत्र हि । कृष्णकेशाः सिता जाता मृत्युर्ज्ञेयः पुरःस्थितः ॥१३६॥
दाने विलंबो नो कार्यः कार्यं चित्तं सुनिर्मलम् । तुषद्वच्च धनं देयं मा कार्पण्यात्प्रसङ्गत्वम् ॥१३७॥
एवं श्रीरामदूतास्ते सप्तद्वीपांतरस्थितान् ।
श्रावयित्वा गधवाज्ञां महादुंदुभिनिःस्वनैः ॥१३८॥
अयोध्यां स्वां ययुः सर्वे रामं वृत्तं न्यवेदयन् ।
संश्राविता तवाज्ञास्मिन्नाज्ञा भग्नान् जनान्मुहुः ॥१३९॥
सप्तद्वीपेषु सर्वत्र दुंदुभीनां महास्वनैः । दत्तेशं वचनं श्रुत्वा रामस्तुष्टोऽभवत्तदा ॥१४०॥
एवं रामेण भूम्यां हि चरित्राणि महान्ति च । आचरित्राण्यनेकानि कस्तान्प्रवक्तुं वदिष्यति ॥१४१॥
एवं शिष्य मया प्रोक्तं राज्यकांडं मनोहरम् ।
चतुर्विंशत्सुवर्गैश्च महामङ्गलकारकम् ॥१४२॥
राज्यकांडं नृपा यत्र पठन्ति भक्तिसत्पराः । न ते राज्यात्परिभ्रष्टा भवन्ति हि कदाचन ॥१४३॥
राज्यकांडं महापुण्यं महामांगल्यदायकम् । ये शृण्वंति नरा भूम्यां ते मांगल्यं भजन्ति हि । १४४॥
एकैकरधितैः सर्गेरैकैकेन क्षयेन च । मन्त्रवत्पंचाशिद्दिनानुष्ठानं सुसिद्धिदम् ॥१४५॥
आधिपत्यं नराः प्राप्य राज्यकांडं पठन्ति ये ।
आधिपत्यान्परिभ्रष्टा न भवन्ति कदाचन ॥१४६॥
राज्यकांडं पठित्वा तु रणे वादे जयो भवेत् । शरणं शत्रवः शीघ्र यान्त्येतत्कवचादिना । १४७॥
आनन्दरामायणमध्यमार्थं ये राज्यकांडं मनुजाः पठन्ति ।
राज्याच्च्युता राज्यपदं लभन्ते भवन्ति भ्रष्टा न तु ते पदस्थाः ॥१४८॥
आनन्दरामायणमेतदुत्तमं तत्रापि कांडेपु विचित्रमुत्तमम् ।
श्रीराज्यकांडं परमं सुखौघ्यदं महाऽतिभक्त्या श्रवणोपमादगात् ॥१४९॥

अवस्था भी चली जायगी, यह सोचकर यमके कठोर शासनका स्मरण करे ॥ १३४ ॥ १३५ ॥ दांत टूट गये, आँखोंसे कम सूझने लगा, शरीरके चमड़े ढीले पड़ गये और काले-काले बाल श्वेत हो गये । तब यह समझे कि अब मृत्यु सामने आकर खड़ा है ॥ १३६ ॥ दानमें विलम्ब न करे और अपना चित्त निर्मल रक्खे । भूसीकी तरह समझकर धनका दान करे । कंजूस बनकर उसकी रक्षा न करे ॥ १३७ ॥ इस तरह सातों द्वीपोंमें रहनेवालोंको रामकी आज्ञा सुनाकर वे दूत रामके पास लौट गये और उनको सब समाचार सुनाते हुए कहने लगे- हे राघव ! हमने सप्तद्वीपके निवासियोंको दुन्दुभीकी गर्जनाके साथ आपकी आज्ञा सुना दी । उनकी बात सुनकर राम प्रसन्न हुए ॥ १३८-१४० ॥ इस प्रकार रामने इस पृथिवीतलपर कितने ही बड़े-बड़े काम किये । उन सबको पूरी तरह बतलानेवाला कौन है ? ॥ १४१ ॥ हे शिष्य ! इस रीतिस मैंने तुम्हें चौबीस सर्गोंमें महा मङ्गलकारक मनोहारी राज्यकाण्ड सुनाया ॥ १४२ ॥ भक्तिपरवर होकर राजा लोग यदि इस राज्यकाण्डको पढ़ेंगे-सुनेंगे तो वे कभी भी अपने-अपने राज्यसे च्युत न होंगे ॥ १४३ ॥ यह राज्यकाण्ड बड़ा पवित्र और महामङ्गलदायक है । जो मनुष्य पृथिवीतलपर इसे सुनेंगे, उनका सदा कल्याण होगा ॥ १४४ ॥ प्रतिदिन एक-एक सर्ग बढ़ाता हुआ और पूरा होनेपर एक-एक कम करता हुआ यदि इसका अनुष्ठान करे तो यह सब प्रकार-की सिद्धियां प्रदान करता है ॥ १४५ ॥ कहींका आधिपत्य पाकर जो इसका पाठ करते हैं, वे अपने आधिपत्यसे कभी भी भ्रष्ट नहीं होते ॥ १४६ ॥ राज्यकाण्डका पाठ-पूजन आदि करनेसे शत्रु शीघ्र अपनी शरणमें आ जाते हैं ॥ १४७ ॥ आनन्दरामायणके अन्तर्गत इस राज्यकाण्डको जो लोग पढ़ते हैं वे यदि राज्यसे भ्रष्ट हो गये हों तो फिर राज्याधिकारी हो जाते हैं । फिर कभी वे उससे भ्रष्ट नहीं होते ॥ १४८ ॥ पहले तो आनन्दरामायण ही उत्तम है, फिर उसके सब काण्डोंमें यह राज्यकाण्ड उत्तम है । यह हर तरह सुखदायक

५५२आनन्दरामायणे[ सर्गः २४

राज्यस्थित्यर्था व्यवसायतत्परैः सदैत चैतच्छ्रवणींयमादरात् ।
उत्साहकाले प्रनयेन्थमङ्गले विवाहकाले पठनीयमुत्तमम् ॥१५०॥
श्रीराज्यकाण्डं भुवि सौख्यदायकं पुण्येषु कालेषु पठन्ति ये नराः ।
लभन्ति सौख्यान्यभिमङ्गलानि त गच्छन्ति विष्णोर्परमान्त्याः पदम् । १५१॥
पुण्यं पवित्रं परमं विचित्र श्रीरामचन्द्रस्य कथानकं सदा ।
भक्त्या मुनीनामपि मङ्गलप्रदं श्रोतव्यमेतत्पठनीयमादरात् ।१५२।

इति श्रीमत्कौशिके रामायणे आनन्दरामायणे राज्यकाण्डे उत्तरार्धे उमामहेश्वरसंवादे तथा रामदशाकथनंनाम तीर्थवर्णनं नाम चतुर्विंश सर्ग ॥२४॥

है, इसलिए इस काम में उत्साह पाने के लिए जो लोग उद्योग में लगे हों, उन्हें यह काण्ड सुनना चाहिए। तथा जब कोई विवाह अथवा कोई उत्साहका समय हो, तब इसे अवश्य सुनें ॥ १५० ॥ जो मनुष्य इस काण्ड को किसी पवित्र समयमें पढ़ते या सुनते हैं, वे अंत समयमें विमानपर चढ़कर विष्णुलोकको जाते हैं। १५१ ॥ परम पवित्र और अति विचित्र श्रीरामचन्द्रका यह कथानक मुनि तथा भक्तगण सादर इसका पठन और श्रवण करना चाहिए । १५२ ॥
इति श्रीमत्सकलपण्डितमण्डलाग्रगण्य पं० रामेश्वरपाठकविरचित'ज्योत्स्ना'भाषाटीकासहित राज्यकाण्डे उत्तरार्द्धे चतुर्विंशः सर्गः ॥ २४ ॥

। इति राज्यकाण्डं उत्तरार्द्धं समाप्तम् ।

श्रीरामचन्द्रार्पणमस्तु

श्रीसीताप्तये नमः

श्रीवाल्मीकिमहामुनिकृतशतकोटिरामचरितान्तर्गतं-

आनन्दरामायणम्

'ज्योत्स्ना'ऽभिधया भाषाटीकयाऽऽटीकितम्


मनोहरकाण्डम्

प्रथमः सर्गः

( लघुरामायण )

विष्णुदास उवाच

गुरो ते प्रष्टुमिच्छामि यत्तत्त्वं वक्तुमर्हसि । वेदवाक्यं पुरा प्रोक्तं नारदेन महात्मना ॥ १ ॥
रामायणं वाल्मीकये संक्षेपच्चेति मेऽकथि । तावदेवार्थमादाय श्लोकरूपं वदस्व माम् ॥ २ ॥

श्रीरामदास उवाच

सम्यक् पृष्टं त्वया वत्स सावधानमनाः शृणु यत्पृष्टं च त्वया सर्वं तद्वदामि तवाग्रतः ॥ ३ ॥
नारदाद्वेदवाक्यञ्च यथा वाल्मीकिना श्रुतम् । तावदेवार्थमादाय तेन वाल्मीकिना पुरा ॥ ४ ॥
शतश्लोकमितं रामचरितं पापनाशनम् । शतकोटिमितार्थां स्वकवितानां मनोरमम् ॥ ५ ।
आदावेवैकमेवास्ति तत्तवाग्रे वदाम्यहम् । शतकोटिमित्ते रम्यं लघुरामायणाह्वयम् ॥ ६ ।
कूजन्तं राम रामेति मधुरं मधुराक्षरम् । आरुह्य कविताशाखां वन्दे वाल्मीकिकोकिलम् ॥ ७ ॥
वाल्मीकेर्मुनिसिंहस्य कवितावनचारिणः । शृण्वन्रामकथानादं को न याति परां गतिम् ॥ ८ ॥


विष्णुदासने कहा—हे गुरो ! मै आपसे यह पूछना चाहता हूँ कि वेदवाक्योंका सारांश लेकर संक्षेपमें नारदजीने महर्षि वाल्मीकिसे कौन सी रामायण कही थी ? उसी सार वस्तुको श्लोकरूपमें बनाकर वाल्मीकिने आपको सुनाया था, वह हमसे भी कहिए । १ ॥ २ ॥ श्रीरामदासने कहा-हे वत्स ! तुमने अच्छा प्रश्न किया है अब सावधान होकर सुनो तुमने जो प्रश्न किया है उसका उत्तर तुम्हारे आगे कह रहा हूँ ॥ ३ ॥ जब वाल्मीकिजीने नारदके मुखसे वेदवाक्योंसे संकलित रामचरित्र सुन लिया तब उसी अर्थको लेकर उन्होंने सौ श्लोकोंमें पापनाशक लघुरामायणकी रचना की और अपने रामायणके आदिमें उन्होंने उसी लघुरामायणको स्थान दिया। वही सौ श्लोकोंवाला लघुरामायण आज मैं तुम्हारे आगे कह रहा हूँ ॥ ४-६ ॥ कवितारूपिणी शाखापर बैठकर मीठे मीठे अक्षरोंमें रामनामका गान करनेवाले वाल्मीकिरूपी कोकिलको मैं वन्दना करता हूँ ॥ ७ ॥ कवितारूपी वनमें विहार करनेवाले तथा मुनियोंमें सिंह-सदृश वाल्मीकिकी रामकथारूपिणी गर्जनाको सुनकर संसारमें कौन ऐसा प्राणी है, जो उत्तम गतिको न

५५४ आनन्दरामायणे [ सर्गः १

यः पिबन्सततं रामचरितामृतसागरम् । अतृप्तस्तं मुनिं वन्दे प्राचेतसमकल्मषम् ॥ ९ ॥ गोष्पदीकृतवारीशं मशकीकृतराक्षसम् । रामायणमहामालारत्नं वन्देऽनिलात्मजम् ॥१०॥ अञ्जनीनंदनं वीरं जानकीशोकनाशनम् । कपीशमक्षहन्तारं वन्दे लङ्काभयङ्करम् ॥११॥ उल्लंघ्य सिन्धोः सलिलं सलीलं यः शोकवह्निं जनकात्मजायाः । आदाय तेनैव ददाह लंकां नमामि तं प्राञ्जलिराञ्जनेयम् ॥१२॥ मनोजवं मारुततुल्यवेगं जितेन्द्रियं बुद्धिमतां वरिष्ठम् । वातात्मजं वानरयूथमुख्यं श्रीरामदूतं मनसा स्मरामि ॥१३॥ रामाय भद्राय रामचन्द्राय वेधसे । रघुनाथाय नाथाय सीतायाः पतये नमः ॥१४॥ जितं भगवता तेन हरिणा लोकधारिणा । अनेन विश्वरूपेण निर्गुणेन गुणात्मना ॥१५॥ इति मंगलाचरणम्

तपःस्वाध्यायनिरतं तपस्वी वाग्विदां वरम् । नारदं परिपप्रच्छ वाल्मीकिर्मुनिपुंगवम् ॥ १ । को न्वस्मिन्सांप्रतं लोके गुणवान्कश्च वीर्यवान् । धर्मज्ञश्च कृतज्ञश्च सत्यवाक्यो दृढव्रतः । २ ॥ चारित्रेण च को युक्तः सर्वभूतेषु को हितः । विद्वान्कः कः समर्थश्च कश्चैकः प्रियदर्शनः ॥ ३ ॥ आत्मवान्को जितक्रोधो द्युतिमान्कोऽनसूयकः । कस्य बिभ्यति देवाश्च जातरोषस्य संयुगे ॥ ४ ॥ एतदिच्छाम्यहं श्रोतुं परं कौतूहलं हि मे । महर्षे त्वं समर्थोऽसि ज्ञातुमेवंविधं नरम् । ५ ॥ श्रुत्वा चैतत्त्रिलोकज्ञो वाल्मीकेर्नारदो वचः । श्रूयतामित्यामन्त्र्य प्रहृष्टो वाक्यमब्रवीत् ॥ ६ ॥ बहवो दुर्लभाश्चैव ये त्वया कीर्तिता गुणाः । मुने वक्ष्याम्यहं बुद्ध्वा तैर्युक्तः श्रूयतां नरः ॥ ७ ॥

प्राप्त होता हो ? कोई नहीं ॥८॥, जो निरन्तर रामचरितरूपी अमृतरूपसागरका पान करते हुए भी कभी नहीं तृप्त होने वाले, ऐसे कल्मषरहित श्रीवाल्मीकि मुनिको मैं प्रणाम करता हूँ । विशाल समुद्रको जिन्होंने गोके खुर डूबने योग्य बनाया, राक्षसको मच्छर समझा और जो इस रामायणरूपिणी महामालाके रत्न हैं, उन हनुमान्‌जीको मैं प्रणाम करता हूँ ॥ ९ । १० ॥ अञ्जनाके सूनून्, जानकीके शोकनाशक, वानरोंके प्रभु, अक्षयकुमारके संहारकारी तथा लंकाके लिए भयावने वीर मारुतिकी मैं वन्दना करता हूँ ॥११॥ जो हंस खेलमें समुद्रकी जलराशिको लांघकर लङ्का पहुंचे, वहीं सीताके शोकरूपी अग्निको लेकर उन्होंने उसान से ही लंकाका भस्म कर दिया, उन अञ्जनीनन्दनको मैं हाथ जोड़कर प्रणाम करता हूँ ॥ १२ ॥ जिनमे मनके समान वेग है, वायुके सदृश त्वरा है, जिन्होंने इन्द्रियां जीत ली है, जो बुद्धिमानोंमें श्रेष्ठ हैं, ऐसे वायुके पुत्र, वानरसंघके मुखिया और श्रीरामके दूत हनुमान्‌को मैं मनमें स्मरण करता हूँ । १३ ॥ राम, रामभद्र, रामचन्द्र, विधातास्वरूप, रघुवंशके नाथ, जगन्नाथ और सीतापति रामचन्द्रजीको मैं प्रणाम करता हूँ ॥ १४ ॥ भगवान्, संसारके पालक, अज, और विश्वरूप उन रामने निर्गुण होकर भी सगुणरूपसे सारे संसारको अपने वशमें कर लिया है ॥ १५ ॥ इति मङ्गलाचरणम् ।

विद्वानोंमें श्रेष्ठ, तपस्या और स्वाध्यायमे संलग्न मुनिश्रेष्ठ नारदसे तपस्वी वाल्मीकिने पूछा— ॥ १ ॥ इस संसारमें इस समय गुणवान्, वशपराक्रमशाली, धर्मज्ञ, कृतज्ञ, सत्यवक्ता और अपने व्रतपर दृढ़ कौन है ? ॥ २ ॥ कौन ऐसा है, जो सच्चरित्रयुक्त है ? कौन सब प्राणियोंके हितमें लगा हुआ है और कौन ऐसा है जो विद्वान् समर्थ तथा देखनेमें सुन्दर है ॥ ३ ॥ कौनमा ऐसा पुरुष है जो आत्मज्ञानी, क्रोधको वशमें किये हुए तथा तेजस्वी है और दूसरेसे ईर्ष्या नहीं करता ? संग्रामभूमिमें जिसके कुपित होनेपर देवता भी भयभीत होजाते, ऐसा कौन है ? ॥ ४ ॥ यह मैं सुनना चाहता हूँ। उसे जाननेके लिए मुझे बड़ा कौतूहल है । हे महर्षि ! आप उक्त प्रकारके पुरुषको जान सकते हैं ॥ ५ ॥ त्रिलोकीके ज्ञाता नारद वाल्मीकिकी बात सुनकर बोले—अच्छा, सुनो । इस तरह संबोधव करके महर्षि नारद कहने लगे—॥ ६ ॥ हे मुने ! आपने जिन गुणोंका वर्णन किया है, वे बहुत ही दुर्लभ हैं । फिर भी मैं अच्छी तरह विचार करके

सर्गः १ ] मनोहरकाण्डम् ५५५


इक्ष्वाकुवंशप्रभवो रामो नाम जनैः श्रुतः। नियतात्मा महावीर्यो द्युतिमान्धृतिमान्वशी ॥ ८ ॥
बुद्धिमान्नीतिमान्वाग्मी श्रीमान् शत्रुनिबर्हणः। विपुलांसो महाबाहुः कम्बुग्रीवो महाहनुः ॥ ९ ॥
महोरस्को महेष्वासो गूढजत्रुररिन्दमः । आजानुबाहुः सुशिराः सुललाटः सुविक्रमः ॥ १०॥
समः समविभक्तांगः स्निग्धवर्णः प्रतापवान् । पीनवक्षा विशालाक्षो लक्ष्मीवान् शुभलक्षणः ॥११॥
धर्मज्ञः सत्यसन्धश्च प्रजानां च हिते रतः । यशस्वी ज्ञानसम्पन्नः शुचिर्वश्यः समाधिमान् ॥१२॥
प्रजापतिसमः श्रीमान् धाता रिपुनिषूदनः । रक्षिता जीवलोकस्य धर्मस्य परिरक्षिता ॥१३॥
रक्षिता स्वस्य धर्मस्य स्वजनस्य च रक्षिता । वेदवेदांगतत्त्वज्ञो धनुर्वेदे च निष्ठितः । १४॥
सर्वशास्त्रार्थतत्त्वज्ञः स्मृतिमान् प्रतिभानवान् । सर्वलोकप्रियः साधुरदीनात्मा विचक्षणः । १५॥
सर्वदाऽभिगतः सद्भिः समुद्र इव सिन्धुभिः । आर्यः सर्वसमश्चैव सदैव प्रियदर्शनः ॥१६॥
स च सर्वगुणोपेतः कौसल्यानन्दवर्धनः । समुद्र इव गांभीर्ये धैर्येण हिमवानिव ॥१७॥
विष्णुना सदृशो वीर्ये सोमवत्प्रियदर्शनः । कालाग्निसदृशः क्रोधे क्षमया पृथिवीसमः ॥१८॥
धनदेन समस्त्यागे सत्ये धर्म इवापरः । तमेवंगुणसम्पन्नं रामं सत्यपराक्रमम् ॥१९॥
ज्येष्ठं ज्येष्ठगुणैर्युक्तं प्रियं दशरथः सुतम् । प्रकृतीनां हिते युक्तं प्रकृतिप्रियकाम्यया ॥२०॥
यौवराज्येन संयोक्तुमैच्छत्प्रीत्या महीपतिः । तस्याभिषेकसंभारं दृष्ट्वा भार्या च कैकयी ॥२१॥
पूर्वं दत्तवरा देवी वरमेनंमयाचत । विवासनं च रामस्य भरतस्याभिषेचनम् ॥२२॥
स सत्यवचनाद्राजा धर्मपाशेन संयतः । विवासयामास सुतं रामं दशरथः प्रियम् । २३॥


उन गुणान् युक्त मनुष्यको बतलाना हूँ। ७॥ जिसके विषयमे आप सब कुछ कहना चाहता है उन्हे लोग राम कहते हैं । वे आत्मज्ञानी, महाबली, तेजस्वी, धैर्यवान् और जितेन्द्रिय हैं ॥८॥ वे बुद्धिमानी, नीतिज्ञ, वक्ता, श्रीमान् और शत्रुओंके विनाशक हैं उनका खूब लम्बा-चौडा कन्धा है। लम्बी-लम्बी भुजायें हैं। शंखकी तरह उनकी ग्रीवा है और विशाल डाढ़े हैं ॥९॥ उनकी विशाल छाती है। वे हाथमें विशाल धनुष धारण किये रहते हैं उनकी पसलियां छिप रहती हैं। वे शत्रुओंका दमन करनेकी प्रबल शक्ति रखते हैं जानु (घुटनों) तक पहुंचनेवाले उनके हाथ हैं, सुन्दर माथा है, बलिष्ठ ललाट है, सराहनीय पराक्रम है, बराबर और सुडौल उनके अंग हैं, मनोहारीरंग है और उनका प्रताप भा साधारण नहीं है। उनकी सुदृढ छाती है, बडी-बडी आँखें हैं वे शोभासम्पन्न हैं और उनमें सभी शुभ लक्षण विद्यमान हैं ॥१०।११॥ वे धर्मज्ञ और सत्यसन्ध (अपनी प्रतिज्ञाको निभानेवाले) हैं। वे सदा प्रजाके हितमें रत रहते हैं। वे यशस्वी, ज्ञानसम्पन्न, पवित्र, वशी और समाधिमान् हैं ॥ १२॥ वे राम प्रजापतिके समान श्रीमान्, जगत्के पालक एवं शत्रुओंके विनाशक हैं। वे समस्त संसारकी तथा धर्मकी सर्वथा रक्षा करते हैं । १३ वे धर्मके रक्षक हैं और निज जनकी रक्षा करते हैं। वे वेद-वेदाङ्गोंके सारे तत्त्वोंको जानते हैं और धनुर्वेदमे एक असाधारण प्रतिभा रखते हैं ॥ १४। वे सम्पूर्ण शास्त्रोंके अर्थ तथा तत्त्वको जाननेवाले, स्मृतिमान् प्रतिभाशाली, सबको प्रिय, साधु, उदानात्मा और पण्डित हैं ॥ १५ ॥ जैसे समुद्र नदियोंसे मिलता है वैसे ही वे सदा सज्जनोंसे मिलते हैं और उनका दर्शन सबको सुखदायी होता है ॥ १६। वे राम सर्वगुणसंपन्न, कौसल्याका आनन्द बढ़ानेवाले, समुद्रके तुल्य गम्भीर तथा हिमालयके समान धैर्यशाली हैं ॥ १७॥ वे वीर्य एव बलमें विष्णुके सदृश हैं, चन्द्रमाके सदृश सबको उनका दर्शन प्रिय है वे क्रोधमें कालानिके समान और क्षमामें पृथ्वीके समान हैं ॥ १८॥ त्यागमे कुबेरके सदृश, सत्यमें दूसरे धर्मराजके समान तथा सब गुणोंसे युक्त हैं। सब पुत्रोंमे बड़े प्रजाके हितमें संलग्न एवं प्रजाप्रिय उन सत्यपराक्रम रामको राजा दशरथने प्रजाके हितके लिए युवराज बनानेका निश्चय किया । श्रीरामके अभिषेककी तैयारी देखकर पूर्वकालमें वरप्राप्त दशरथकी प्यारी रानी कैकेयीने उसी समय अपने पतिसे रामके निर्वासन तथा भरतके राज्याभिषेकका वर माँगा ॥ १६।२०।२१।२२॥ तदनुसार