श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)
Srimad Ananda Ramayana Hindi
महर्षि वाल्मीकि / अज्ञात द्वारा
स्रोत: Srimad Ananda Ramayana Complete 9 Kandas with Hindi Translation (उद्गम)
पृष्ठ 560, कुल 811 में से
संदर्भ में पढ़ें| ५७५ | आनन्दरामायणे | [सर्गः २४ |
|---|
अथ ते यमदूताश्च साश्रुनेत्राः समागताः । तूष्णींपाणिस्तैः कोपादास्फाल्य भुवि चाब्रवन् ॥३१॥ कथं करोष्यधिकारं तवाज्ञाकारिणां न्विमाम् । दृष्ट्वाऽवस्थां न लज्जा ते जायते हृदये यम ॥३२॥ तस्मादस्माकं राघवेण सुमन्त्रो मोचितः पथि । दिनानि नव शेषायुः पूर्त्यर्थमधुना वयम् ॥३३॥ वैहस्यां जले कूर्मो न जीविष्याम भो यम । तद्दूतवचनं श्रुत्वा प्रजज्वाल यमस्तदा ॥३४॥ प्राह दूतानद्य रामं बध्ध्वा दण्डं करोम्यहम् । चोरनीयानि सैन्यानि देवेन्द्रं सूचयाम्यहम् ॥३५॥ इत्युक्त्वा त्वरितो गत्वा वृत्तान्तमिन्द्रं न्यवेदयन् । पुनर्देवं यमः प्राह साहाय्यं क्रियतां मम ॥३६॥ रामस्य वचनं श्रुत्वा देवेन्द्रो यममब्रवीत् । किं भ्रान्तोऽसि यमाद्य त्वं विष्णुना योद्धुमिच्छसि ३७॥ गच्छ तूष्णीं संयमनीं रामस्य किं करिष्यसि । मद्भिया हि पुरा दत्तौ मया तौ सुरपादपौ ॥३८॥ एवं तद्वचनं श्रुत्वा वह्निलोकं ययौ यमः । अग्निना चाप्युक्तमेवं निर्ऋतिं वरुण तथा ।३९॥ वायुं कुबेरमीशानं रविं चन्द्रं बुधं गुरुम् । शुक्रं शनैश्चरं राहुं केतुं भूमिसुतं प्लवम् ॥४०॥ प्रार्थयामास युद्धाय साहाय्यं क्रियतामिति । उपगच्छीन्द्रवन्मर्त्ये दुर्द्धर्षान्नं यमं हि ते । ४१॥ ततो गत्वा विधिं चापि पातालान्गत्वाभिभिः । मण्डैर्निवामिनश्च यमः सप्रार्थयन्नृपन् ॥४२॥ तैरुच्युतुर्न करिष्यामः साहाय्यं राघवस्यतः । ततः क्रोधममाविष्टः स्वसैन्येन समन्वितः ॥४३॥ रामेण सङ्गरं कर्तुमयोध्यां स यमो ययौ । स्वगणैः सह वेगेन महामहिषसंस्थितः ॥४४॥ अयोध्यां वेष्टयामास नवद्वारविराजिताम् । नवप्राकारसहितां शतघ्नीयन्त्रसंयुताम् ॥४५॥ नवभिः परिखाभिश्च समन्तात्परिवेष्टिताम् । दृढरत्नकपाटाढ्यां रत्नभित्तिविराजिताम् ॥४६॥ सरयूवेष्टितां रम्यां रविकोटिसमप्रभाम् । नजायासत्पुष्पैश्च पताकाध्वजशोभिताम् ॥४७॥
धारण कर दिया ॥ ३० ॥ उधर वे यमदूत यमके आगे पहुंचे और अपनी पगड़ी जमीनपे फेंककर कहने लगे— ॥ ३१ ॥ हे यमराज ! तुम कैसे अपने अधिकारकी रक्षा करते हो ? अपने आज्ञाकारी हम सेवकोंकी यह दशा देखकर तुम्हें लाज नहीं आती ? ॥ ३२ । रास्तेमे रामने मारकर सुमन्त्रको छुड़ा लिया । क्योंकि उसके बीतनेके नौ दिन बाकी थे । राम वह नौ दिन पूरा कर लेनेपर सुमन्त्रको आने देंगे ॥ ३३॥ अब हम लोग जलमें डूबकर अपने प्राण दे देंगे । इस प्रकार दूतोंकी बात सुनकर धर्मराज मारे क्रोधके लाल हो गये ॥ ३४ ॥ उन्होंने दूतोंसे कहा— घबड़ाओ मत, आज ही रामको बांधकर मैं उनकी इस धृष्टताका दण्ड दूँगा । तुम जाकर सेना तैयार करो । तबतक मैं इन्द्रको सूचित करता आऊँ । ३५ ॥ ऐसा कहकर यमराज तुरंत इन्द्रके पास गये । उन्हें सारा हाल सुनाया और सहायता करनेकी प्रार्थना की ॥३६॥ यमराजकी बात सुनकर इन्द्रने कहा— यमराज ! क्या तुम पागल हो गये हो, जो विष्णुभगवान्के साथ युद्ध करना चाहते हो ? ॥ ३७ ॥ चुपचाप अपनी संयमनी नगरीको लौट जाओ । रामका तुम क्या कर लोगे ? उनके डरकर मैंने अपने हाथोंसे पारिजात और कल्पवृक्ष इन दोनों देववृक्षोंको उठाकर दे आया था ॥ ३८ ॥ ऐसा वचन सुनकर यम अग्निलोक गये, उनसे सहायता माँगी तो अग्निने भी वैसा ही उत्तर दिया इसके अनन्तर निर्ऋति, वरुण, ॥ ३९ ॥ वायु, कुबेर, ईशान, रवि, चन्द्र, बुध, गुरु, शुक्र, शनि, राहु, केतु तथा मङ्गललोक गये ॥ ४० ॥ सर्वत्र उन्होंने सहायताकी प्रार्थना की, किन्तु उस प्रस्तावपे यमराजको सबने इन्द्रके समान ही शुष्क उत्तर दिया ॥ ४१ ॥ तब यमराज लौटकर ब्रह्माके पास गये । पातालमे रहनेवाले राजाओं तथा सर्पलोकोंके राजाओंसे भी आकर सहायताकी प्रार्थना की । ४२ ॥ किन्तु उन्होंने भी कहा कि रामके विरुद्ध मैं तुम्हारी सहायता नहीं करूँगा । इसके बाद क्रोधाविष्ट होकर यमराज अपनी ही सेना लेकर रामके साथ युद्ध करने अयोध्या चले । उस समय उनके समस्त गण साथ थे और धर्मराज एक बड़े भारी भैंसेपर सवार थे ॥ ४३ ॥ ४४ ॥ वहाँ पहुँचकर उन्होंने चारों ओरसे उस अयोध्या नगरीको घेर लिया। जिसमें नौ बड़े बड़े फाटक थे और नौ ही खाइयाँ खुदी थीं । कितनी ही बन्दूकें और तोपें रक्खी थीं जिनमें रत्नजटित कपाट लगे थे और रत्न ही की दीवार चुनी हुई थी ॥ ४५ ॥ ४६ ॥ जिसके उत्तर सरयू बह रही थी और करोड़ों सूर्योंके प्रकाशकी नाई जिसकी