भारतकोश
श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)

श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)

Srimad Ananda Ramayana Hindi

महर्षि वाल्मीकि / अज्ञात द्वारा

स्रोत: Srimad Ananda Ramayana Complete 9 Kandas with Hindi Translation (उद्गम)

DevanagariHindipublished811 पृष्ठ

पृष्ठ 563, कुल 811 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 563

सर्गः २४ ] राज्यकाण्डम् उत्तरार्द्धम् ५४७

तावत्त्वया तु पूर्णायुर्नरो नेयो न चेतरः । तद्रामवचनं श्रुत्वा तथेत्याह यमस्तदा ॥७७॥ ततः प्राप्ते सुदशमे दिने स्त्रीभिर्गताध्व मः । सुमन्त्रो राघव नत्वा तदग्रे जीवितं जहौ ॥७८॥ ततः स दिव्यदेहाभिः स्वस्त्रीभिर्दिव्यदेहभृत् ७९॥ सुमन्त्रः पूजितः सर्वैर्विमाने प्रस्थितो बभौ । रामाग्रे मरणादेव सुरैः सर्वत्र वेष्टितः ॥८०॥ ततः दृष्ट्वा रवी रामं यमेन स्वस्थलं ययौ । ययौ सुमन्त्रः स्वस्त्रीभिर्वैकुण्ठं निर्जरा दिवम् ॥८१॥ रामः सुमन्त्रपुत्रेण यत्क्रियादि सुमन्तुना । कारयित्वा यथाशास्त्रं तत्पदे तं न्यवेशयत् ॥८२॥ ततो रामो लक्ष्मणैव पृथिव्यां घोषयन्मुहुः । गजन्यतां दुन्दुभिं स्वां पाताळध्वजशोभिताम् ॥८३। तथेति लक्ष्मणश्चापि दूतानाज्ञापयत्तदा । दूतास्तेऽथ गजारूढाः सप्तद्वीपान्तरेषु हि । ८४। रामाज्ञां श्रावयामासुर्नानन्दुन्दुभिनिःस्वनैः । अपूर्णायुर्मृतः कश्चिन्नैवान्यो राज्यस्य प्रति ॥८५॥ पौराणिकाः स्थापनीया गेहे ग्रामे पृथक् पृथक् । नित्यनैमित्तिकं कर्म न त्याज्यं वै कदाचन ॥८६॥ नावमान्या भूसुराश्च द्वेषः कार्यो न कस्यचित् । द्रव्यं कस्य सदा देयं दण्डन याश्च तस्कराः ॥८७॥ शासनीया दुराचारतत्परा ये जना भुवि । वन्दनीया सदा माता वन्दनीय सदा पिता ॥८८॥ पूजनीयाः सदा देवाः कार्यो धर्मो निरन्तरम् । नेत्रस्नानं सदा कार्यमयोग्यायामथापि वा ॥८९। रामतीर्थेषु सर्वत्र कार्या धर्मा विशेषतः । द्वारकां सदा गत्वा कार्यं वैशाखमज्जनम् ॥९०। ऊर्जे कार्या पञ्चतपदे स्नातव्यं विधिवत्कदा । गत्वा प्रयागं प्रत्यब्दं कर्तव्यं माघमज्जनम् ॥९१॥

कर खड़ा किया । तदनन्तर रामने यमराजस कहा कि जबतक में पृथ्वीपर शासन करता रहूँ, तबतक तुम उन्हीं मनुष्योंको अपने लोकमें ले जाओ जिनकी आयु पूर्ण हो गयी हो और किसीको नहीं। रामकी बात सुन-कर यमराजने कहा कि "ऐसा ही होगा" । ७५-७७। इसके पश्चात् दशव दिन स्त्रियोंको साथ लेकर सुमन्त्रने रामको प्रणाम करके उनके सामने ही प्राण त्याग किया । ७८॥ सुमन्त्रकी स्त्रियोने भी उसी समय प्राण त्याग दिया और उन स्त्रियोंके साथ दिव्यहूप धारण करके सुमन्त्र सब लोगोंसे पूजित होते हुए विमान-पर बैठकर अतिशय शोभित हुए । रामके समक्ष मरनेसे वे समस्त देवत.ओँके साथ देवलोकको गये ॥ ७९ ॥ ॥ ८० ॥ इसके पश्चात् सूर्य भी रामसे आज्ञा लेकर यमके साथ लौट पड़े। रामने सुमन्त्रके पुत्र सुमन्तुके हाथों सुमन्त्रकी क्रिया करवायी और पिताके आसनपर उसी पुत्रको बिठाला । ८१ ॥ ८२ ॥ तदनन्तर रामने लक्ष्मणको पृथ्वीतलमें इस बातकी घोषणा करनेकी आज्ञा दी ॥ ८३ ॥ लक्ष्मणन भा "बहुत अच्छा" कहकर दुन्दुभी बजानेवालोँको आज्ञा दे दी। वे हाथीपर सवार हो तथा सातोँ द्वीपोम जा जाकर नगाड़े बजाते हुए रामकी आज्ञा सुनाने लगे । उन्होंने कहा—राजा रामचन्द्रका आदेश है कि यदि मेरे राज्यमें कोई मनुष्य बिना आयु पूर्ण हुए ही मरे तो उसे मेरे पास ले आया जाय ॥ ८४ । ८५ ॥ घर-घर तथा गाँव-गाँवमें पुराणों-को जाननेवाले पौराणिक रक्खे जायें। कोई मनुष्य अपने नित्य-नैमित्तिक कर्मोंको न छोड़े ॥ ८६ ॥ ब्राह्मणोंका कोई अपमान न करे, कोई किसीके साथ द्वेषभाव न रक्खे, कोई किसीके द्रव्यको न ले और चोरोँको दण्ड दे ॥ ८७॥ जो लोग दुराचारी हों, उनपर कड़ा शासन किया जाय । धर्म कर्म सदा होता रहे । अयोध्यामें अथवा किसी अन्य रामतीर्थमें जाकर लोग नेत्रस्नान किया करें । ८८ । ८९ ॥ विशेषतः