श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)
Srimad Ananda Ramayana Hindi
महर्षि वाल्मीकि / अज्ञात द्वारा
स्रोत: Srimad Ananda Ramayana Complete 9 Kandas with Hindi Translation (उद्गम)
पृष्ठ 615, कुल 811 में से
संदर्भ में पढ़ेंसर्गः ४ ] मनोहरणकाण्डम् ५९९
तन्नाम परमं ब्रह्म योगिगम्यमनामयम् । अनन्तनामरूपैश्च विधाकारं स्वमायया ॥२२३॥
भूत्वा सर्वेषु भूतेषु वशार्कं भूतचालकम् । स्फुटमप्यस्फुटं तेषामज्ञानं स्वात्मनः सदा ॥२२४॥
ब्रह्मज्ञाने परो हेतुः सर्वोऽपि परिवेष्टितः । मन्त्राः सन्ति तेनेदं विद्वद्ब्रह्म न प्रकाश्यते ॥२२५॥
परांचि खानि प्रभुणा सृष्टानि देवते तथा । नाऽऽस्ते सांतरात्मानं प्रसिद्धं श्रुत्युदाहृतम् ॥२२६॥
सर्वोऽपि मनुजो दम्भो गृहपुत्रात्मसम्भवम् । किञ्च कामदामोय तनाराध्यश्च काञ्चने ॥२२७॥
यदि भूतात्मदामन्यः स्वात्मानं परमुच्यते । तदा कस्याथ रोषेण व्यथयेद्यस्त्वयं हि ॥२२८॥
आत्मानं चेद्विजानीयादयमस्मीति पूरुषः । किमिच्छन् कस्य कामाय शरीरमनुसंज्वरेत् ॥२२९॥
इत्याह च श्रुतिः साध्वी बृहदारण्यगाऽभवत् । यस्यान्तरातिरात्रं स्यादामनत्रय मानवः ॥२३०॥
आत्मन्येव च सन्तुष्टस्तस्य कार्यं न विद्यते । इति भागवतश्चाथोपनिषाय प्रोक्तराञ्चयम् ॥२३१॥
भोगासक्तः पुमान्देवमेकाही रहने न च । तृष्णात्रयसम्पन्नो वारंवारं विपद्यता ॥२३२॥
स लोकैगुहार्थं श्रुत्वा दुर्बलः कामजः । जाया सम्पादयेत्यादावित्यूचेऽत्र गृहार्थः ॥२३३॥
पुत्रानुत्पाद्य देवेभ्यो देवानर्चयेत्ततः । पुत्राभावे स्वयं यजेदर्थं च धनेच्छया ॥२३४॥
अनिशं हूयते चित्ते न कामोज्झेद् व्यपेत्यतु । शास्त्रज्ञोऽप्यनिकेतश्चानन्नश्वाथः प्रतिग्रहम् ॥२३५॥
धनेच्छी याचयन्येवं ग्रामे भ्रमति सर्वदा । वायुभक्षाननां तु का वार्त्ता ब्रह्मचिन्तने ॥२३६॥
अनेकपुण्यपुञ्जैः सद्कुले जन्माऽथ लब्धिभिः । भजंत सद्गुरूनेव मार्गोऽहि पदा सदा ॥२३७॥
रामचन्द्रदर्शनार्थं मुद्रां स्वां पूरयन्मुदा । दृष्ट्वा गजादलपामन्त्रं स्वपादसलक्षणंक्वचित् ॥२३८॥
योगियोंके गम्यमान और कल्याणमय उस अनन्तब्रह्मने अपनी माया द्वारा विश्व आकारावाले बनकर सब प्राणियोंमें विद्यमान रहकर उनको सञ्चालन करते हैं। यद्यपि वह सबसे वशीभूत हैं, उनके आगे स्फुट या अस्फुट भावसे सामने होता हुआ भी वह ईश्वर नहीं दीखता ॥२२३-२२४॥ इस प्रकार ज्ञानमें अपनी आत्मा ही सर्वप्रधान है किन्तु मन्त्रोंकी शक्ति उसपर आवरण डाले रखती है। यही कारण है कि उस पर विद्वत्स्वरूप ब्रह्मज्ञान नहीं होता ॥२२५॥ एक प्रसिद्ध श्रुतिमें भगवान्ने कहा है कि प्राणियोंकी आंखें मैंने बाहर बनायी हैं; इसलिए लोग अन्तरात्माको नहीं देख पाते ॥२२६॥ संसारके सब मनुष्य अपने धन, स्त्री और पुत्रके दास बन रहे हैं। इसी कारण अन्तरात्मा उन्हें दीखती ही नहीं ॥२२७॥ यदि उनका ज्ञान न होकर सदा आत्मानन्दस्वरूप विष्णुमें परे रहें और आत्मा आत्माकी साक्षी बनाकर सब काम करे तो उन्हें लज्जाका बात ही नहीं रहता अथवा यदि जीव आत्माको जानकर यह समझ ले कि मैं ही वह परम पूज्य ब्रह्म हूँ तो फिर किसके लिए अपने शरीरका सांसारिक ज्वालामें भूने? यह बृहदारण्यकोपनिषद्में कहा गया है। इसके अतिरिक्त साक्षात् स्वयं भगवान्ने बहुतसा कहा है कि जो प्राणी और दिशा ओर अपना चित्तवृत्ति न लगाकर आत्मासे प्रेम करता है, आत्मामें ही तृप्त रहता है और आत्मामें सन्तोष करता है। उसके लिए संसारमें कुछ भी करना शेष नहीं रह जाता अर्थात् उस से उसकी सब काम पूर्ण हो जाता है ॥२२९-२३१॥ भोगोंमें आसक्त प्राणी पहले एकाएक इस ओर नहीं झुकता । वह तो तीन प्रकारकी इच्छाओंके चक्करमें पड़कर सदा धन पानेकी चेष्टा करता रहता है ॥ २३२ ॥ गृह सूत्र विधाने यदि स्वयं को अपुत्री समझता है तो पुत्रके उत्पादनमें तत्पर हो जाता है और इसके लिए 'जगतू यज्ञ' कर सकता है, करता है । २३३ । दैवतअं तथा तीर्थोंकी सेवासे यदि पुत्र उत्पन्न कर लेता है तो सूत्रात्मक भरण-पोषण तथा यज्ञके लिए धनकी इच्छासे मन ही मन रात दिन जला करता है, फिर भी अपनी कामना नहीं पूर्ण कर पाता। चाहे शास्त्रका पण्डित तथा सर्वज्ञ विद्यावान् हो क्यों न हो, यदि वह धनका अर्थी है तो प्रतिग्रह घर कुत्तेकी तरह दौड़ता रहता है। फिर यदि कोई अयुगपन्मति (समझदार) नहीं है तो इसके लिए आत्मचिन्तनकी चर्चा किस कामकी ॥ २३४-२३६ । अनेक प्रकारके पुण्य एकत्रित होनेपर प्राणी अच्छे कुलमें जन्म और सत्संगोंकी संगति पाता है। फिर उनकी बातोंपर चलता हुआ कथञ्चित् रामरूप ब्रह्माके दर्शनार्थ मुद्राओंकी भी पूर्ण करनेका उपाय करता है और