श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)
Srimad Ananda Ramayana Hindi
महर्षि वाल्मीकि / अज्ञात द्वारा
स्रोत: Srimad Ananda Ramayana Complete 9 Kandas with Hindi Translation (उद्गम)
पृष्ठ 626, कुल 811 में से
संदर्भ में पढ़ें६१० आनन्दरामायणे [ सर्गः ६
अथवा पट्टकूलस्य चैव कार्यं परासनम् अथवा लेखयेत्पत्रे सर्वभावे द्विजोत्तमः ॥९४॥ भूर्जपत्रे विलिखितं विशेषान्निद्धिदं शृणु। वा वस्त्रोपरि लेख्यं वा कर्तव्यं चित्रतन्तुभिः ॥९५। विनासनेन या पूजा सा पूजा निष्फला भवेत्। रामभद्रासने पूजा सा पूजाऽतिफलप्रदा ॥९७॥ यद्यद्रामपरं कर्म तत्तच्च द्विजपुंगवैः। रामासनानन्वितं रामं पुरस्कृत्य समारभेत् ॥९८॥ रामभद्रासनैर्हीनं यत्कर्म तच्च निष्फलम्। तस्मादेव स्वमेवैतःकर्तव्यं रामपूजने ॥९९॥ अष्टोत्तरसहस्रं च रामलिंगात्मकं हि यत्। आसनं तद्वरिष्ठं हि राघवस्यातितोषद्म् ॥१००। तदधो रामतोभद्रमष्टोत्तरसहस्रकम्। तदधो रामलिंगाख्यमष्टोत्तरशतात्मकम् ॥१०१॥ तदधो रामतोभद्रमष्टोत्तरशतात्मकम्। तदधः पञ्चविंशत्यूरामभद्रासनं शुभम् ॥१०२॥ तदधो रामतोभद्रं षोडशात्मकमरीरितम्। त्रयोदशात्मकं रामतोभद्रं तदधः स्मृतम् ॥१०३॥ द्वादशं च नवाख्यं च ह्यष्टमुद्रात्मकं तथा। चतुर्मुद्रात्मकं वापि पूर्वैरुक्तपरं ह्यधः ॥१०४। एवं क्रमेण ज्ञेयानि रामभद्रासनानि हि। श्रेष्ठासनेषु या पूजा तस्याः श्रेष्ठं फलं स्मृतम् ॥१०५॥ लघ्वासनेषु या पूजा तादृशं सत्फलं स्मृतम्। एवं ज्ञात्वा फलं बुद्ध्या श्रेष्ठमेवासनं शनैः ॥१०६। यत्नेनैव प्रकर्तव्यं रामोपासन मानवैः। प्रतिवर्षं नवीनं च कार्यमासनमादरात्। १०७॥ एकस्मिन्नासने पूजा न वर्षादूर्ध्वतः शुभा एवं द्विशन्मानानां च भेदाः पृष्टास्त्वया पुरा ॥१०८॥ तत्राग्रे हि मयाख्याताः श्रीरामस्यातितोषदाः स्वन्तृष्ण रामतोभद्रवर्णनस्य प्रसङ्गतः ॥१०९॥ स्मारिता रामचंद्रस्य किञ्चिलीला मयाऽथ हि। तदाम्यहं तवाग्रे तां त्वं शृणुष्व द्विजोत्तम ॥११०। प्रत्यब्दं श्रावणे मासे शुक्लश्रावणदृद्युत्तमः। सन्मार्गिशङ्खमितसुवर्णस्य पृथक् पृथक् ॥१११॥
लगाकर भद्रोंमें उनकी रचना करें ॥९३॥ उसमको चाहिए कि सुवर्णके तारांका एक सुन्दर आसन रामचन्द्रजीके लिए बनवावे । यदि सुवर्णके तारका न हो सके तो चाँदीक तारका ही बनवा ले । वह भी न बन पड़े तो रेशमके सुतका अच्छा सा आसन बनवावे । यदि इनमेंसे काई भी न बनवा सके तो किसी पत्तपर आसन लिखवा ले ॥ ९४ ॥ ९५ ॥ भूर्जपत्रपर लिख हुआ आसन विशेष सिद्धिदायक होता है । इसके अतिरिक्त कपड़ेपर लिखवा ले या रङ्गीन सूतसे बुनवा ले ॥ ९६ । बिना आसनके जो पूजा की जाती है, वह व्यर्थ होती है और रामभद्रासनके ऊपर जो पूजाकी जाती है, वह अतिशय फलदायिनी हुआ करती है ॥ ९७ ॥ द्विजश्रेष्ठ ब्राह्मणोंको चाहिए कि श्रीरामचन्द्रक प्रायश जो-जो कार्य करना हो, वह रामको सामने करके उनके आगे ही करें ॥ ९८ ॥ रामभद्र समसे रहित जो काम होता है, वह निष्फल होता है । इससे रामके पूजनमे आसनकी रचना अवश्य करें ॥ ९९ ॥ जो अष्टोत्तरसहस्र रामलिंगात्मक भद्र है, वह रामचन्द्रजीको अत्यन्त प्रसन्न करनेवाला सर्वश्रेष्ठ आसन है ॥ १०० ॥ उससे कुछ मध्यम अष्टोत्तर सहस्र रामतोभद्र है । उससे भी मध्यम अष्टोत्तरशत रामलिंगात्मक भद्र है ॥ १०१ ॥ उससे मध्यम अष्टोत्तरशत रामतोभद्र तथा उससे मध्यम पञ्चविंशत् श्रीरामभद्रासन है । १०२ ॥ उससे मध्यम षोडशात्मक रामतोभद्र है । उससे मध्यम त्रयोदशात्मक रामतोभद्र है ॥ १०३ ॥ उससे भी न्यून क्रमशः द्वादश रमक, नवान्मक, अष्टमुद्रात्मक, चतुर्मुद्रात्मक भद्र है ॥ १०४ । इस क्रमसे रामचन्द्रके आसनोंको जानना चाहिए । जितने ही श्रेष्ठ आसनपर पूजा की जाती है, यह उतनी ही अधिक फलवती हुआ करती है ॥ १०५ ॥ जितने ही साधारण आसनपर पूजा की जाती है उतना ही साधारण फल भी प्राप्त होता है। ऐसा समझकर रामकी उपासना करनेवालोंको चाहिए कि बुद्धि लगाकर धीरे धीरे श्रेष्ठ आसनकी ही रचना करें और प्रतिवर्ष पूजनके समय नयी-नयी किस्मके आसन बनाया करें ॥ १०६ ॥ १०७ ॥ एक किस्मके आसनपर एक वर्षसे अधिक समयतक पूजन करना अच्छा नहीं होता । हे शिष्य ! तुमने पहले हमसे आसनोंका भेद पूछा था। सो रामको प्रसन्न करनेवाले उन भेदोंको मैंने तुम्हारे सामने कह सुनाया हाँ, तुम्हारे पूछे हुए रामतोभद्रके प्रसङ्गवश मुझे रामचन्द्रजीकी एक लीला याद आ गयी है। हे द्विजोत्तम ! उसे मैं