भारतकोश
श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)

श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)

Srimad Ananda Ramayana Hindi

महर्षि वाल्मीकि / अज्ञात द्वारा

स्रोत: Srimad Ananda Ramayana Complete 9 Kandas with Hindi Translation (उद्गम)

DevanagariHindipublished811 पृष्ठ

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६१२ आनन्दरामायणे [ सर्गः ६


एकादशपदा वल्ली वापी त्रिदशपादिका । अष्टादशपदैः शम्भुः सर्वत्रैवं लिखेत्क्रमात् ॥१२८॥ तत्र प्रथमपरिधौर्वाक् लिङ्गानि योजयेत् । त्रिरैकादशसंख्यानि वाप्यस्त्वेकाधिकास्ततः ॥१२९॥ भद्रेऽर्कार्कपदेः कार्या द्वितीये लिङ्गसंततिः । एकत्रिंशन्मिता कल्प्या भद्रे नवनवात्मके ॥१३०॥ तृतीये नवनेत्रेशसंख्या भद्रे तु षट् पदे । तुर्ये षड्विंशलिङ्गानि भद्रेऽर्कार्कपरे मते ॥१३१॥ पञ्चमे तुर्यनेत्रांशा भद्र नवनवात्मके । षष्ठे द्वादशलिङ्गानि भद्रे षट् षट् पदे स्मृते ॥१३२॥ सप्तमे लिङ्गविततिरेकोनविंशत्संख्यकाः । भद्रेऽर्कार्कपदे ज्ञेयेऽष्टमे सप्तदेश्वराः ॥१३३॥ भद्रे नवनवपदे नवमे मनुशङ्कराः । भद्रे शसिकलासंख्ये दशमेऽर्कमिताः शिवाः ॥१३४॥ भद्रेऽर्कार्कपदे ज्ञेये तथा त्वेकादशे दश । शिवा नव नवपदे भद्रे ज्ञेये मनोरमे ॥१३५॥ द्वादशे सप्त लिङ्गानि भद्रे चन्द्रकलात्मके । त्रयोदशे पञ्च दृग भद्रेऽर्कार्कपरे मते ॥१३६॥ चतुर्दशे त्रिलिङ्गानि भद्रे नवनवात्मके । चरमे तत्तथु रवयेन्मतोभद्रसुत्तमम् ॥१३७॥ खण्डेन्दुस्त्रिपदः कोणे शृङ्खला षट्पदान्मिका । त्रयोदशपदा वल्ली वापी तत्त्वमितैर्मठा ॥१३८॥ भद्रे षोडश षोडशपदेऽन्तः परिधिर्भवेत् । तदन्तरे पञ्च पञ्च पदैः पद्म समुद्धरेत् ॥१३९॥ विचित्र चित्रवर्णं च श्वेतेन्दुः शृङ्खलाऽसिता । वापी शुक्लाऽमितः शङ्करक्त भद्रे प्रकल्पयेत् ॥१४०॥ नीला वल्लीश्चमच्छकध्रकोष्ठानिवा यथारुचि । यत्र यत्र पदान्यीह शेषभूतानि यानि तु ॥१४१॥ यथायोग्यं धिया तत्र शृङ्खलार्थे नियोजयेत् । शुक्लरक्तकृष्णवर्णा ह्येते परिधयस्त्रयः ॥१४२॥ वा पूर्वेणेवपरिधि इन्ता देशसयन्तनः । एतेषां परिधीनां वै पदान्यष्टाधिकानि हि ॥१४३॥ नोक्तानि पूर्वसख्याया ज्ञान्वेव बुद्धिमाचरेत् । अग्रेऽप्येवं हि वोद्धव्यं परिधीनां नतूह्यये ॥१४४॥ एतदष्टोत्तरदशसतं भद्रं लिङ्गोद्भवं स्मृतम् । एकस्त्वयं प्रकारो हि प्रकारांतरमुच्यते ॥१४५॥

॥ १२८॥ ग्यारह पादकी वल्ली और तेरह पादकी वापी बनायी जायगी। अठारह पादके शंभु बनाये जायेंगे। इसी क्रमस लिखे ॥ १२८ ॥ उसमें पहली परिधिके पहल लिङ्गोकी योजना करे। इसके अनन्तर चौबीस वापियाँ बनावे ॥ १२९ ॥ सव्यञ्चात् भद्रमें बारह बारह पादक ३१ लिङ्ग बनावे। फिर तीसरी पंक्तिम नौ-नौ पादके २९ भद्र बनाये। फिर छः पादके दो भद्रोंकी रचना करे। चोथी पंक्तिमें बारह-बारह पादके २६ लिङ्ग बनावे । १३० ॥ १३१ ॥ पाँचवी पंक्तिमें नौ-नौ पादके २४ शिव बनावे। छठी पंक्तिम छ-छः पादके भद्रोंमें १२ लिङ्गोकी रचना करे ॥ १३२। सातवी पंक्तिम बारह पादवाली १९, शिवांकी श्रेण बनावे। आठवी पंक्तिके नौ पादक भद्रोंमें १७ शिव बनावे। नवीं पाक्तके सोल्लह सोल्लह पादात्मक भद्रोंमें १४ शङ्कर बनाये दसवी पंक्तिके बारह-बारह पादके भद्राम बारह शिव बनावे ॥ १३३ ॥ १३४ ॥ ग्यारहवीं पंक्तिमें नौ-नौ पादात्मक भद्रोम दस शिवकी रचना करे । १३५ ॥ बारहवी पंक्ति के सोलह माह पादात्मक भद्राम सात लिङ्गाकी रचना करे। तरहवीं पंक्ति के बारह-बारह पादात्मक भद्रोन पाँच शिव बनावे ॥१३६॥ चौदहवीं पंक्ति के नौ-नौ पादात्मक भद्रोम तीन लिङ्गोकी रचना करे। अन्तमे उत्तम सर्वतोभद्र बनावे ॥ १३७ ॥ कोणभागमें तीन पादका एक खण्डेन्दु और छः पादकी शृङ्खला बनावे। तेरह पादकी वल्ली और पच्चीस पादककी वापी बनावे । १३८ ॥ भद्रम सोलह-सोलह पादका परिधि बनावे। इसके बाद पाँच पाँच पादका कमल बनावे ॥ १३९ ॥ उस कमलका रङ्ग चित्र-विचित्र रहेगा। दल श्वेतवर्णं और शृङ्खला काले वर्णंकी रहेगी। वापी सफेद, शिव शुक्ल, लाल भद्र, नील वल्ली रहेगी और वल्ली तथा शिवके स्कन्धवाले कोष्ठक अपने इच्छानुसार चित्र-विचित्र वर्णके बनाये। इसमें भी जो पाद शेष बचे, वे अपने इच्छानुसार रङ्गसे रङ्गे जाकर शृङ्खलानिर्माणके काममें आ जायेंगे अन्तकी तीन परिधियां सफेद लाल और काले वर्णकी रहेंगी ॥ १४०-१४२। अथवा पहली परिधि पीते रङ्गकी बनाकर तीन परिधियाँ और बनावे। इन सब परिधियोंमें आठ पाद अधिक रहा करेंगे ॥ १४३ ॥ किन्तु यह बाद पूर्वसंख्याकी गणना करते समय नहीं गिनाये हैं। ऐसा समझकर बुद्धि करे। इसके आगे बारों परिधियोंमें भी यही क्रम रहेगा ॥ १४४ ॥ यही अष्टोत्तरसहस्र रामतोभद्रका क्रम है। यह एक प्रकार हुआ। अब दूसरा प्रकार