श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)
Srimad Ananda Ramayana Hindi
महर्षि वाल्मीकि / अज्ञात द्वारा
स्रोत: Srimad Ananda Ramayana Complete 9 Kandas with Hindi Translation (उद्गम)
६१२ आनन्दरामायणे [ सर्गः ६
एकादशपदा वल्ली वापी त्रिदशपादिका । अष्टादशपदैः शम्भुः सर्वत्रैवं लिखेत्क्रमात् ॥१२८॥ तत्र प्रथमपरिधौर्वाक् लिङ्गानि योजयेत् । त्रिरैकादशसंख्यानि वाप्यस्त्वेकाधिकास्ततः ॥१२९॥ भद्रेऽर्कार्कपदेः कार्या द्वितीये लिङ्गसंततिः । एकत्रिंशन्मिता कल्प्या भद्रे नवनवात्मके ॥१३०॥ तृतीये नवनेत्रेशसंख्या भद्रे तु षट् पदे । तुर्ये षड्विंशलिङ्गानि भद्रेऽर्कार्कपरे मते ॥१३१॥ पञ्चमे तुर्यनेत्रांशा भद्र नवनवात्मके । षष्ठे द्वादशलिङ्गानि भद्रे षट् षट् पदे स्मृते ॥१३२॥ सप्तमे लिङ्गविततिरेकोनविंशत्संख्यकाः । भद्रेऽर्कार्कपदे ज्ञेयेऽष्टमे सप्तदेश्वराः ॥१३३॥ भद्रे नवनवपदे नवमे मनुशङ्कराः । भद्रे शसिकलासंख्ये दशमेऽर्कमिताः शिवाः ॥१३४॥ भद्रेऽर्कार्कपदे ज्ञेये तथा त्वेकादशे दश । शिवा नव नवपदे भद्रे ज्ञेये मनोरमे ॥१३५॥ द्वादशे सप्त लिङ्गानि भद्रे चन्द्रकलात्मके । त्रयोदशे पञ्च दृग भद्रेऽर्कार्कपरे मते ॥१३६॥ चतुर्दशे त्रिलिङ्गानि भद्रे नवनवात्मके । चरमे तत्तथु रवयेन्मतोभद्रसुत्तमम् ॥१३७॥ खण्डेन्दुस्त्रिपदः कोणे शृङ्खला षट्पदान्मिका । त्रयोदशपदा वल्ली वापी तत्त्वमितैर्मठा ॥१३८॥ भद्रे षोडश षोडशपदेऽन्तः परिधिर्भवेत् । तदन्तरे पञ्च पञ्च पदैः पद्म समुद्धरेत् ॥१३९॥ विचित्र चित्रवर्णं च श्वेतेन्दुः शृङ्खलाऽसिता । वापी शुक्लाऽमितः शङ्करक्त भद्रे प्रकल्पयेत् ॥१४०॥ नीला वल्लीश्चमच्छकध्रकोष्ठानिवा यथारुचि । यत्र यत्र पदान्यीह शेषभूतानि यानि तु ॥१४१॥ यथायोग्यं धिया तत्र शृङ्खलार्थे नियोजयेत् । शुक्लरक्तकृष्णवर्णा ह्येते परिधयस्त्रयः ॥१४२॥ वा पूर्वेणेवपरिधि इन्ता देशसयन्तनः । एतेषां परिधीनां वै पदान्यष्टाधिकानि हि ॥१४३॥ नोक्तानि पूर्वसख्याया ज्ञान्वेव बुद्धिमाचरेत् । अग्रेऽप्येवं हि वोद्धव्यं परिधीनां नतूह्यये ॥१४४॥ एतदष्टोत्तरदशसतं भद्रं लिङ्गोद्भवं स्मृतम् । एकस्त्वयं प्रकारो हि प्रकारांतरमुच्यते ॥१४५॥
॥ १२८॥ ग्यारह पादकी वल्ली और तेरह पादकी वापी बनायी जायगी। अठारह पादके शंभु बनाये जायेंगे। इसी क्रमस लिखे ॥ १२८ ॥ उसमें पहली परिधिके पहल लिङ्गोकी योजना करे। इसके अनन्तर चौबीस वापियाँ बनावे ॥ १२९ ॥ सव्यञ्चात् भद्रमें बारह बारह पादक ३१ लिङ्ग बनावे। फिर तीसरी पंक्तिम नौ-नौ पादके २९ भद्र बनाये। फिर छः पादके दो भद्रोंकी रचना करे। चोथी पंक्तिमें बारह-बारह पादके २६ लिङ्ग बनावे । १३० ॥ १३१ ॥ पाँचवी पंक्तिमें नौ-नौ पादके २४ शिव बनावे। छठी पंक्तिम छ-छः पादके भद्रोंमें १२ लिङ्गोकी रचना करे ॥ १३२। सातवी पंक्तिम बारह पादवाली १९, शिवांकी श्रेण बनावे। आठवी पंक्तिके नौ पादक भद्रोंमें १७ शिव बनावे। नवीं पाक्तके सोल्लह सोल्लह पादात्मक भद्रोंमें १४ शङ्कर बनाये दसवी पंक्तिके बारह-बारह पादके भद्राम बारह शिव बनावे ॥ १३३ ॥ १३४ ॥ ग्यारहवीं पंक्तिमें नौ-नौ पादात्मक भद्रोम दस शिवकी रचना करे । १३५ ॥ बारहवी पंक्ति के सोलह माह पादात्मक भद्राम सात लिङ्गाकी रचना करे। तरहवीं पंक्ति के बारह-बारह पादात्मक भद्रोन पाँच शिव बनावे ॥१३६॥ चौदहवीं पंक्ति के नौ-नौ पादात्मक भद्रोम तीन लिङ्गोकी रचना करे। अन्तमे उत्तम सर्वतोभद्र बनावे ॥ १३७ ॥ कोणभागमें तीन पादका एक खण्डेन्दु और छः पादकी शृङ्खला बनावे। तेरह पादकी वल्ली और पच्चीस पादककी वापी बनावे । १३८ ॥ भद्रम सोलह-सोलह पादका परिधि बनावे। इसके बाद पाँच पाँच पादका कमल बनावे ॥ १३९ ॥ उस कमलका रङ्ग चित्र-विचित्र रहेगा। दल श्वेतवर्णं और शृङ्खला काले वर्णंकी रहेगी। वापी सफेद, शिव शुक्ल, लाल भद्र, नील वल्ली रहेगी और वल्ली तथा शिवके स्कन्धवाले कोष्ठक अपने इच्छानुसार चित्र-विचित्र वर्णके बनाये। इसमें भी जो पाद शेष बचे, वे अपने इच्छानुसार रङ्गसे रङ्गे जाकर शृङ्खलानिर्माणके काममें आ जायेंगे अन्तकी तीन परिधियां सफेद लाल और काले वर्णकी रहेंगी ॥ १४०-१४२। अथवा पहली परिधि पीते रङ्गकी बनाकर तीन परिधियाँ और बनावे। इन सब परिधियोंमें आठ पाद अधिक रहा करेंगे ॥ १४३ ॥ किन्तु यह बाद पूर्वसंख्याकी गणना करते समय नहीं गिनाये हैं। ऐसा समझकर बुद्धि करे। इसके आगे बारों परिधियोंमें भी यही क्रम रहेगा ॥ १४४ ॥ यही अष्टोत्तरसहस्र रामतोभद्रका क्रम है। यह एक प्रकार हुआ। अब दूसरा प्रकार
६१४ | आनन्दरामायणे | [ सर्गः ५
मूल श्लोक (Sanskrit Shlokas)
शृङ्खला कृष्णवर्णा च पदैः पञ्चभिरुत्तमा । तस्याः पार्श्वद्वये कार्ये वल्ल्यौ हरितवर्णके ॥ १६४॥
पृथगेकादशपदैस्ततः पीते तु शृङ्खले । षड्भिः पदैरुभयतो भद्रं षोडशपादकम् ॥ १६५॥
आरक्तं च सिता वाप्यो दक्षाष्टादशपादजाः । कृष्णान्यष्टादशपदैरेव लिङ्गानि कारयेत् ॥ १६६॥
मस्तकोपरि भद्रस्य लोहिते शृङ्खले शुभे । द्वाभ्यां पदाभ्यां च पृथङ् मध्ये हरितशृङ्खला ॥ १६७॥
रचिता त्रिपदा रम्या वापीनां मस्तकोपरि । आरक्ते द्वे पदे कार्ये चैकं हरितशृङ्खला ॥ १६८॥
उभयोः पार्श्वयोर्लिङ्गमन्तर्कल्प्यं सिते पदे । एवं सर्वत्र वेत्तव्यं परिधिः पीतवर्णकः ॥ १६९॥
सप्ताशीतिपदैश्चैव समाप्ता प्रथमा ततिः । प्रोच्यतेऽथ द्वितीया तु पक्तिस्त्रिपञ्चपदजा ॥ १७०॥
शशी च शृङ्खलावल्ल्यौ शृङ्खले ज्ञेयं पूर्ववत् । भद्रं विंशतिपदैर्ज्ञेयं नव वाप्यश्च षोडशैः ॥ १७१॥
पदैरष्टाथ लिङ्गानि भद्रयोर्मस्तकोपरि । द्वाभ्यां कार्ये शृङ्खलेऽत्र लोहिते ह्युत्तरे तयोः ॥ १७२॥
द्विपदा शृङ्खला पीता हरिता त्रिपदा स्मृता । आरक्तं च पदं कार्यं वापीनां मस्तकोपरि ॥ १७३॥
पूर्ववत्सकलं ज्ञेयमेकषष्टिपदैः शुभाः । परिधिः पीतवर्णश्च ज्ञाता पक्तिर्द्वितीियका ॥ १७४॥
ऊनेकेन पदा षष्टिपदैः पक्तिस्तृतीियका । भद्रं षड्भिः पदैः प्रोक्तं सप्तलिङ्गानि कारयेत् ॥ १७५॥
दसु वाप्यः स्मृताः शेषं पूर्ववच्च प्रकीर्तितम् । सप्तचत्वारिंशत्पदैः परिधिश्च प्रकीर्तितः ॥ १७६॥
ज्ञाता तृतीया पक्तिरियं चतुर्थ्यर्थ निगद्यते । पञ्चचत्वारिंशत्पदैरियं पक्तिरुदाहृता ॥ १७७॥
भद्रमेकपदैर्ज्ञेयं पञ्च वाप्यस्तत्र कीर्तिताः । तुर्यलिङ्गानि कार्याणि भद्रस्य मस्तकोपरि ॥ १७८॥
आरक्ता षट्पदा वल्ली पीतपीतं त्रिभिः पदैः । ज्ञाता चतुर्थपक्तिर्हि पञ्चम्यैकोनत्रिंशद्भिः पदैः ॥ १७९॥
भद्रं नवपदं ज्ञेयं त्रिवाप्यो द्वौ हरी स्मृतौ । त्रिपदा शृङ्खला भद्रस्य मद्रस्यापरि कीर्तिता ॥ १८०॥
एकोनविंशतिपदैः परिधिः प्रप्रकीर्तितः । ज्ञेयेयं पञ्चमा पक्तिस्सप्तम्यङ्गं सप्तदशैः पदैः ॥ १८१॥
हिन्दी टीका (Hindi Commentary)
तीन पादका श्वेत चन्द्रमा बनाये। पाँच पादम... सुन्दर शृङ्खला बनाये। उसके दोनों बगल हरे रंगसे ग्यारह पादकी बल्लियाँ बनावे। इसके छह पादसे पीले रंगका शृङ्खला बनावे और सोलह पादस दोनों ओर भद्र बनावे, जिसका रंग लाल रक्खे ॥ १६३-१६४॥ तदनन्तर अट्ठारह पादसे सफेद वापिय बनाये। अठ्ठारह पादस काले रंगका नौ लिङ्गोंकी रचना करे। इसके अनन्तर लाल रंगकी दो शृङ्खलायें बनावे, दो पादोंसे अलग और बीच दोषम हरे रंगकी शृङ्खला बनावे ॥ १६५-१६६॥ जिसमें कुल तीन पाद रहेंगे। वापीके मस्तकपर लाल रंगका दो पादोंका शृङ्खल हरे रंगकी बनेगी। आसपास तथा शिवके मस्तकपर सफेद रंगसे दो पादका शृङ्खला बनेगा। इसी तरह सर्वत्र जानना चाहिए। इसको परिधिर्या पीत वर्णका रहेगी। इस तरह सतासी पादोंकी पहली पंक्ति समाप्त हुई। अब तिहत्तर पादोंवाली दूसरी पंक्ति के विषयम कहते हैं ॥ १६८-१७०॥ इसमें चन्द्रमा, शृङ्खला तथा बल्लियाँ ये पूर्व पादतक समान रखें। बीस पादका भद्र और तेरह पादकी नौ वापियें बनेंगी। तरह ही पादोंसे भद्रके मस्तकपर आठ लिंग बनाये जायेंगे। इसी जगह दो पादोंसे लाल रंगकी दो शृङ्खलायें बनावे। दो पादसे पीली शृंखला और तीन पादकी हरी शृङ्खला बनावे। बापीके मस्तकपर कुछ लाल पाद रक्खे ॥ १७१-१७३॥ बाकी सब चीज पहली पंक्तिके समान ६१ पादोंसे बनेगी। दूसरी पंक्तिकी परिधि पील वर्णकी रहेगी। यह दूसरी पंक्ति समाप्त हो गयी ॥ १७४॥ उनसठ पादकी तीसरी पंक्ति रहेगी। छह पादोंस एक भद्र, सात लिंग और आठ वापिय बनावे। बाकी सब पहली पंक्तिकी तरह रहेगा। इसमें संतालिस पादोंका परिधि बनायी जायगी ॥ १७५॥ ॥ १७६॥ इस प्रकार तीसरी पंक्ति समाप्त हुई। अब चौथा पन्तिके विषयमे बख्यान है यह चौथी पंक्ति पैंतालिस पादोका रहेगी। १७७॥ इसमें बारह पादका एक भद्र बनेगा। पाँच वापियें बनेंगी। भद्रके मस्तकपर चार लिंग रहेंगे ॥ १७८॥ छः पादोस बिल्कुल लाल वणका बल्ली बनेगी तीन तीन पादोंकी परिधि बनेगी। इस तरह चौथी पंक्ति समाप्त हुई। पाँचवी पंक्ति कुल इक्कीस पादांकी रहेगी ॥ १७९॥ इसमें नौ पादका भद्र लिंगा, तीन वापियें बनेंगी और दो शिवकी रचना की जाएगी। भद्रके मस्तकपर लाल रंगकी तीन पादवाली
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षडधिक्रांशीतिरेखास्तियंगूर्ध्वं प्रकल्पयेत् । पञ्चाशीति पदानि स्युः पंक्यस्तत्र सर्वतः ।।१९९।।
तत्र षट् षत् पदान्ते स्यादाग्नीध्रिः शिवार्ककः । मन्त्रेणेनेन विधिना चतुःषष्टिरथाः क्रमात् ।।२००।।
तेषु वै पंक्तिकोष्ठेषु लिंगादि रचयेद्भिषक् । कोणेषु त्रिपदश्चन्द्रस्तदादि शृंखला मता ।।२०१।।
ततो वह्नी ततो भद्रं वापी लिंगं क्रमं तृणम् । तत्र प्रथमपंक्तौ तु शृंखला पञ्चपादिका ।।२०२।।
एकादशपदा वह्नी भद्रञ्च षट्पदात्मकः । भद्रमेकपदं वाप्री त्रिषट् कोष्ठैः प्रकल्पयेत् ।।२०३।।
ईशानम्मन्मिते कार्य एवं ते षट्संस्थया । भवन्ति वाप्यो दश वा भद्रञ्चपममीप्सितम् ।।२०४।।
द्वितीयपंक्तौ वापी तु त्रयोदशपदा मता । भद्रं तु षट्पदास्पदं ज्ञेयं पूर्वं मयीन्दिनम् । २०५।
अष्टौ लिंगानि वाष्यन्तू सर्वांन्त न०सदिताः । तृतीयायां तुर्यपदं भद्रं ज्ञेयं तु पूर्ववत् ।।२०६।
अष्टौ वाप्यः सत दृगाः क्रमज्ञा स्युः समुद्धृताः । द्वे वाप्यौ वह्नि मन्मन्ते त्रिभिः कोष्ठैस्तु मंस्मृते ।।२०७।।
चतुर्थपंक्तौ वाप्यस्तु पञ्च शक्रं त्रयम् । भद्रं द्विदशकं ज्ञेयं पूर्ववदुद्धरेत् ।।२०८।
चतुर्थपंक्तिपर्यन्तं वाष्यान्ते परिधिर्भवेत् तम्पक्तौ शृंखले न्यूने पर्यैकेकेन वह्नरी ।।२०९।।
द्वभ्यां पदाभ्यां चन्द्रस्तु यथापूर्वं प्रकल्पयेत् । भद्रद्वयं षट्पदं त्वन्यं भद्रं नवात्मके ।।२१०।
त्रयोदशपदैर्वापी मत्र तत्र प्रकल्पयेत् । भद्रयोरूर्ध्वं स्याद्भद्रद्वयं षट्पदं शुभम् ।।२११।
समुन्दानि पदान्येव शृङ्खलार्थे नियोजयेत् । सम्योपरि परिधिस्तत्र बाप्यान्ते परिकल्पयेत् ।।२१२।।
उभयान्तरे वापी त्रयोदशपदाम्मिका ।।२१३।।
भद्रद्वयं षट्पदं शेषं सर्वं यथोदितम् । अन्तिमङ्गन्तः पञ्चपञ्चपदैः पम समुद्धरेत् ।।२१४।।
रक्तं वा निरवणे च श्वेतश्चन्द्रोऽसितर मना । शृंखला हरिता वह्नी पीतं सच्छृङ्खलाद्वयम् ।।२१५।
रक्तं भद्रं सिता वापी लिंगं कृष्णं प्रकल्पितम् । लिङ्गस्कथगताः कोष्ठाः शोभाकोष्ठाः प्रकल्पयेत् २१६।
हे शिष्य अब मै तुझको अथागान्तर बतला रहा हूँ सुनो ॥ १९८ ॥ सीधी और टेढ़ी छियासी-छियासी रेखायें खींच ऐसा करनेपर उत्तर व दक्षिण पचास पचास पदकी एक एक पंक्तियां तैयार होंगी ॥ १९९ ॥ उसमें छ-छः पादके बाद दोनों तरफ परिधि रहेगी। इस रीतिस क्रमशः चार परिधियां बनेंगी उनकी पंक्ति तथा कोष्ठकमे अपनी बुद्धिके अनुसार लिंग आदिकी रचना कर । प्रत्येक कोनेमे तीन-तीन पादका इन्दु बनावे और उसके आदिमें शृंखलाकी रचना करे ॥ २००, २०१ ॥ फिर उसके बाद वह्नी, फिर छः पादकी शृंखला, एक पादका भद्र और अठारह कोष्ठकी वापी का निर्माण कर ॥ २०२ ॥ २०३ ।। उतना ही सबके शिव बनावे। इस प्रकार दस वापिय और दश भद्र बनगे ।। २०४ ।। इस पंक्तिमें तेरह पादका वापी बनेगी, सोलह पादका भद्र बनेगा । बाक़ी सब चीज पहली पंक्तिके समान रहेगा । २०५ । तीसरी पंक्तिम आठ लिंग, दो वापिय और चार पादका एक भद्र रहेगा। बाक़ी सब चीज पूर्ववत् रहेगा ।। २०६, आठ वापि, सात शिव एवं मन्ममे तीन पादकी दो वापी बनेगी । २०७ । चौथी पंक्तिमें चार वापी, सात शङ्कर, बारह भद्र बनेंगी। बाक़ी सब पहली पंक्तिके समान रहेगा ।। २०८ । चौथी परिधिके ऊपर पांचवी परिधिके बाद भी परिधि रहेगा। इस पंक्तिके पूर्व पंक्तिकी अपेक्षा एक कम शृंखला रहेगी और एक पादका वह्नी घटाया जायगी । २०९ । तदनन्तर पहलेकी तरह दो पादोंका चन्द्रमा बनावे । छः छः पादका दो भद्र बनावे । बाकी दो भद्र नौ नौ पदके रहेंगे । २१०।। अपने अपने स्थानपर तरह-तरह पादकी वापी बनावे। दोनों भद्र के ऊपर छः छः पादके दो भद्र बनाव ॥ २११ ॥ शृंखलाके लिये बने पादोंको नियुक्त करे । उनके ऊपर पाँच पादके अनन्तर परिधिकी रचना करे । २१२॥ उन दोनोंके बीच तेरह पादका एक वापी बनायी जायगी ।। २१३।। छः पादके बाद दो भद्र बनावे । बाक़ी सब पूर्ववत् रक्खे । अन्तिम पंक्तिम पाँच-पाँच पदके कमल बनावे । उसका वर्ण लाल अथवा बहुरंगा रहे । चन्द्रमा सफेद और शृङ्खला काल वर्णाका रहेगी। इसी प्रकार उलटी हुयी, उसकी दोनों शृङ्खलायें पीली, लाल भद्र, सफेद वापी और काला लिंग रहेगा। लिंगके स्थानगतके कोष्ठक या भाके लिये रहेंगे ॥ २१४-२१६॥
सर्गः ५ ] मनोहरकाण्डम् ५२७
पदानि शेषभूतानि यत्र क्व च भवन्ति हि । तानि तत्र यथायोग्यं धिया सम्यङ्नियोजयेत् ।२१७॥
यद्वा तुर्यपरिध्यूर्ध्वमेकादशपदारुणम् । परिधि स्यात्तयोर्मध्ये कोणे चन्द्रो यथोदितः ।२१८॥
शृङ्खला दशपादा स्याद्वल्ली स्यादेकविंशतिः । शृङ्खलान्या रुद्रपदा भद्रं त्रिंशत्पदान्मकम् ॥२१९॥
एकषष्टिपदैर्वापी सम्यग्बुद्धया प्रकल्पयेत् । अथवा द्वे पदे चान्ये संयोज्य गिरिशिस्तुषु ।२२०॥
पदेषु रचयेद्बुद्ध्या लिंगानां पंक्तयः क्रमात् । नवसप्तसमीपेचेका शेषं पूर्वं यथोदितम् ।२२१॥
विशेषस्तत्र भद्रेषु षड्लिंगे षोडशात्मकम् । एकलिंगे विंशपदं द्वाभ्यामन्यत्र चाधिकम् ॥२२२ ।
पूर्ववत्सर्वतोभद्र पद्मवर्णास्तु पूर्ववन् । पीतशुक्लरक्तकृष्णा बहिः परिधयः स्मृताः ॥२२३ ।
एतदष्टोत्तरशतं लिंगतोभद्रमीरितम् । प्रकारान्तरमन्यच्च शृणु शिष्य ब्रवीमि यत् ॥२२४ ।
तिर्यगूर्ध्वं गता रेखा नवाशीतिद्दिजाः स्मृताः । तत्कोष्ठैश्चतुर्विधर्नेत्राग्निकोष्ठकं रचयेद्दिजा ॥२२५॥
सर्वतोभद्रक रड्य परित परिधिर्मतः । ततो रसरमानि स्युश्चतष्परिधयः शुभाः ॥२२६।
तत्र चतुर्षु पार्श्वेषु कोणेषुद्वित्रिपदः स्मृतः । शृङ्खला पञ्चभिर्वल्ली त्वेकादशपदा मता ॥२२७॥
लिंगं चतुर्विंशपदं वापी त्वष्टादशा भवेत् । नव सप्त तथा पंचयुगनेत्रमिताः शिवाः ॥२२८।
पञ्चपंक्तय एव स्युर्वापिकैकाधिका ततः । तुर्यलिंगानि द्वे वाप्यौ त्रयोदशपदान्मिके ॥२२९ ।
षडर्काकैरमरसभद्रसंख्या क्रमाद्भवेत् । सर्वतोभद्रके वापी युगनेत्रमिता तथा ॥२३०॥
नरुकोष्ठमितं भद्रं शेषं सर्वं तु पूर्ववत् । ततोऽन्तःपरिधिः कार्यस्तत्र पद्म समुद्धरेत् ॥२३१ ।
श्वेतोऽब्जः शृङ्खला कृष्णा नीला बह्निकिशाऽरुणा । भद्रं वापि सिता कृष्ण लिंग परिधयोऽन्तिमाः २३२.।
पीतशुक्लरक्तकृष्णा ज्ञेयाः पीतश्च मध्यमाः । एतदष्टोत्तरशतं लिंगतोभद्रमीरितम् ॥२३३॥
इनमें जहाँ कोई कोष्ठक बाकी बच जाय, उसे अपनी इच्छासे जिस रंगसे चाहे रंग दे ॥ २१७ । अथवा चौथी परिधिके ऊपर ग्यारहवें पदके आगे एक परिधि बनाये । उसके बीचवाले कोणमें उस प्रकारसे चंद्रमा बनाये ॥ २१८ ॥ इसमें पहली शृङ्खला दस तथा दूसरी ग्यारह पादकी बनेगी और भद्र तीस पादका रहेगा ॥ २१९ ॥ एकसठ पादकी बापी बनेगी । उन सबको अच्छी तरह मन लगाकर बनावे । अथवा और दो पादोंकी योजना करके सातवें और दसवें पादमें अपनी बुद्धिसे लिंगोंकी रचना करे । नौ, आठ, छः, तीन और एक यह उनकी संख्या रहेगी । बाकी सब पूर्ववत् रहेगा ॥ २२० ॥ २२१ ॥ इन भद्रमम छः लिंगवाले भद्रमें एक सोलह पादका और दूसरा बीस पादका लिंग रहेगा। इसमे अधिक लिंगवाले भद्रमें पूर्ववत् सर्वतोभद्रकी रचना होगी । इसके बाहरकी परिधियाँ पीत, रक्त तथा कृष्ण वर्णकी रहेंगी ॥ २२२ ॥ २२३ ॥ यह मैने तुम्हे अष्टोत्तरशत लिंगतोभद्रका प्रकार बतलाया । अब दूसरा प्रकार बतलाता हूँ सुनो ॥ २२४ ॥ खडी और बेड़ा कुल नवासी रेखाएँ खींचे । उसके आनेवाले चार, दो तीन कोष्ठकोंसे सुन्दर सर्वतोभद्र बनावे । उसके चारों ओर परिधि रक्खे । इसके अनन्तर छ, छः पादोंके बाद परिधियोंकी रचना करे ॥ २२५ ॥ २२६ ॥ उसके चारों तरफके कोनोंमें तीन-तीन पादक चन्द्रमा बनावे । पाँच पादसे शृङ्खला और ग्यारह पादकी बल्ली बनावे ॥२२७॥ चौबीस पादका लिंग और अट्ठारह पादकी वापी बनानी होगी । इसमें नौ, सात, पाँच, चार, दो क्रमशः शिव बनाये जायेंगे ॥ २२८ ॥ इसमें कुल पाँच पंक्तियाँ रहेंगी और वापियोंकी संख्या एक-एक करके बढ़ती जाएगी । इसमें चार लिंग और तेरह-तेरह पादकी दो वापियाँ रहेंगी । २२९ ॥ छः, नौ, बारह, छः, छः, इस क्रमसे भद्रकी संख्या रहेगी । सर्वतोभद्रमे चार और दो वापी बनेंगी ॥ २३० ॥ इनम नौ कोष्ठकका भद्र बनेगा । बाकी सब बात पहलेके समान रहेगी । इस प्रकार भद्रकी रचना कर लेनेके बाद उसके भीतर परिधि बनाकर कमलकी रचना करे ॥ २३१ ॥ कमलका रंग सफेद रहेगा और उसकी शृङ्खला काली रहेगी । बल्लरियाँ नीली तथा भद्र लाल रहेगा । बापी सफेद लिंग काला और अन्तिम परिधियाँ पीला, सफेद, लाल तथा कृष्ण वर्णकी रहेंगी । यह भी एक प्रकारका अष्टोत्तरशत लिंगतोभद्र बतलाया ॥ २३२ ॥ २३३ ॥ अथवा
६१८ आनन्दरामायणे [ सर्गः ६
निर्यगूर्ध्वं पञ्च पञ्च रेखाः कार्या सुलोहिताः । सन्कोष्ठेषु परिधयः षट् षडन्ते त्रयः स्मृताः । २३४॥ त्रिद्वयङ्खलिंगरचना चतुर्विंशतिपादिका । वापी त्रिंशद्द्वादशपदा षट्त्रिशद्द्विदशाङ्ककम् ॥२३५॥ भद्रं भद्रं पीतमन्यद्भद्रपार्श्वे प्रकल्पयेत् । प्रथमं नवपादं स्याद्द्वितीयं षट्पदान्वकम् ॥२३६॥ वापीपार्श्वे च त्रिपदा श्रृंखला लोहिता भवेत् । प्रतिपार्श्वे भवेदेतरङ्गला पञ्चपादिका ॥२३७॥ एकादशपदा वल्ली त्रिपदश्चन्द्र ईरितः चतुर्विंशपदेनैव लिंगं परमसुन्दरम् । २३८॥ मध्ये चन्द्रः शृंखला च त्रिपदा षट्पदा लता । भद्रमर्कपदं लिंगमष्टाविंशत्पदामकम् , लिंगमस्तकपार्श्वस्थे पदानि पीतकानि तु ॥२३९॥ लिंगं कृष्णं सिता वापी भद्रं रक्त सितं शशी शृंखला कृष्णहरिता वल्ली वणास्त्वेवंविगर्हिताः॥२४०॥ परिधिः पीतवर्णः स्यात्पदान्यङ्गानि तु यथेष्ट रञ्जयेदेतद्द्वाचां शिलिंगसाधनम् । २४१॥ पीतशुक्लरक्तकृष्णा बाह्याः परिधयः क्रमात् । प्रकारान्तरमन्यद्वा शृणु शिष्य ब्रवीम्यहम् । २४२॥ चन्द्राद्विपदसंख्यासु भवेत्तत्पञ्चगभितम् लिंगंषट् त्रिग्नयेन्पडने परिघ्री मतौ । २४३। तयोर्ध्वाग्लिंगपंक्तिद्वयं सम्यक् प्रकल्पयेत् । अष्टादशपदं लिंगं वापी त्रिदशपादिका । २४४॥ त्रिपदोऽब्जः श्रृंखला च पञ्चपादेञ्चवल्लरी । प्रथमा युगलिंगान्या पंक्तिर्लिङ्गद्वयान्विता ॥२४५॥ अष्टा भद्रं नवपदं परं भद्रं तु षट्पदम् । परिध्यन्ते त्रयस्त्रिंशत्कोष्ठैर्लिङ्गं प्रकल्पयेत् । २४६॥ मूलस्कन्धौ सप्तसप्तपदज्ञौ षट्पदैः शिरः । पंचपंचपदैः पार्श्वों कटि. शुभोन्त्रिपादतः । २५७॥ चतुर्दिक्षु ङ्गस्त्यस्य चतुर्भद्रं नवाधिकम् । चंद्रोऽत्र त्रिपदो ज्ञेयः शृंखला द्विपदा स्मृत । २४८। वल्लरी पंचपादा स्याच्छृङ्खलाऽन्या त्रिपादतः । लिंगस्कन्धगताः कोष्ठाः पीताः कार्याः शुभावहाः २४९॥
सीधी और तिरछी लाल वर्णकी पांच-पांच रेखायें खींच। उसके कोष्ठकोंमें छः परिधियां और छः परिधिके आगे फिर तीन परिधि बनावे । २३४ । चौबास पदम तंत्र, दो अथवा नौ लिंग बनाना होगा । बहत्तरह पादकी वापी बनेगी। छत्तीस, बीस, नौ इन संख्याकेके भद्र बनावे ।। २३५ ।। उन भद्रोंके पास ही दूसरे पीत वर्णके दो भद्रोंकी रचना करे। जिसमें पहला नौ पादका और दूसरा छः पादका रहेगा ।। २३६ । वापीके पास तीन पादकी लाल श्रृंखला रहेगी। इस प्रकार हर एकमम पांच-पाँच पादका श्रृंखलाय रहेगी ॥ २३७ । इसमें ग्यारह पादकी वल्लरी और तीन पादकी लता रहेगी। बारहपादका सित चन्द्रमा । २३८ ॥ मध्यमे एक चन्द्रमा, तीन पादकी शृंखला और छ पादकी लता रहेगी । बारह पादका भद्र और अठ्ठाइस पादका लिंग बनेगा । लिंगके मस्तकपर तथा बगलम पीले वर्णके कुछ खाली कोष्ठक भी रहेंगे ॥ २३९ ॥ इसमें लिंग कृष्ण, वापी उज्ज्वल, लाल भद्र, उज्ज्वल चन्द्रमा काली शृंखला, हरित वर्णकी वल्लरी ये वर्ण रहेंगे । २४० ॥ इसकी परिधि पीत वर्णकी रहेगी। बाकी जितने कोष्ठक बचे, उनका अपने इच्छानुसार जैसा चाहे वैसा रङ्ग दे। पच्चीस लिंग इस भद्रके प्रधान साधन माने गये हैं । २४१ । बाहरका परिधियाँ पीला सफेद लाल तथा काली रहेगी हे शिष्य ! अब मैं तुम्हें इसी भद्रका प्रकारान्तर बतला रहा हूँ । २४२ । एकचालिस वादोंमे पच्चीस लिङ्ग और छः लिगके बाद दो परिधि बनावे ॥ २४३ ।। उन दोनो परिधियांके पहले दो पंक्तियोंमे लिङ्गोंकी रचना करे। इसमें अठारह पादका लिंग बनेगा और बारह पादकी वापी बनायी जायगी ॥ २४४ तीन पादका कमल और पाँच-पाँच पादके शिव तथा वल्लरीकी रचना की जाएगी। पहिली पंक्तिमें चार और अन्य पंक्तियोंम दो लिंग रहा करेंगे । २४५ ॥ पहला भद्र नौ पादका रहेगा । बाकी सब भद्र छः छः पादके रहेंगे । परिधिके बाद तैंतीस पादका लिंग बनावे । २४६ ॥ इसके मूल स्कन्ध सात सात पादके रहेंगे। छः पादका मस्तक, पांच पांच पादका पार्श्वभाग और तीन पादकी कटि बनेगी ।। २४७ ।। शिवके चारो ओर नौ-नौ पादके चार भद्र बनाये जायेंगे। इसमें चन्द्रमा तीन पादका, शृंखला दो पादकी, वल्लरी पाँच पादकी और दूसरी शृंखला तीन पादकी रहेगी । लिंगके स्कन्धवाले ख ती कोष्ठके पीले रङ्गसे रङ्ग दिये
सर्गः ५] मनोहरकाण्डम् १९९
सर्गः ५] मनोहरकाण्डम् १९९
अन्यानि शेषभूतानि पदानि पूरयेद्धिया । यथेच्छं वै परिध्रित्य कुर्याद् वेदिमिता बहिः ॥ २५०॥ पञ्चविंशतिसंख्यैस्तैः प्रकारैर्द्वा मयोदितौ । अतिप्रियौ शङ्कराय शान्तयो द्विजसत्तम ! ॥२५१॥ नमस्कृत्य महद्वक्ष गुरुपादारविन्दयोः संसारात्मकं वक्ष्ये कथामध्यात्मसङ्ग्रहाम् ॥२५२॥ पञ्चविंशतिसंख्याक लिङ्गतोभद्रमीरितम् । केनांचित् कल्पितं तन्किं तन्च वक्तुमुच्यते स्फुटम् २५३॥ लिङ्गतोभद्रमित्येतस्मिकन्नपर्थेऽद्भवेत् । लिङ्गं गमकमिथ्याहुर्ज्ञानं ज्ञापकमित्यपि ॥२५४॥ पीयूषवापनाद्वार्वी भद्रं भद्रमभीप्सताम् । माध्यशब्दाः प्रसिद्धा हि वर्तन्ते साधनेष्वपि । २५५॥ तस्मिन् शुक्लमुखं नीलमित्यादिश्रुतिसम्मतात् । कूर्चा अपि परिभ्रम्यमाणार्थे भवन्ति हि ॥ २५६॥ सङ्कल परम् लिङ्गं मङ्गलं भद्रवाचकम् । मङ्गलं मङ्गलानां च शिवं शान्तमिति स्फुटम् ॥२५७॥ लीयते यत्र भूतानि निगच्छन्ति यतः पुनः । तेन लिङ्गं परं व्योम निष्कलः परमः शिवः ॥२५८॥ सत्त्वं रजस्तमोवर्णत्रय मायामु दीरितम् । मनश्चन्द्रो महामोहः शृङ्खला स्नेहवल्लिका ॥ ५९॥ तैरिदं सर्वतरङ्गैश्च वेष्टितं घटव्योमवत् । तिर्यगूर्ध्वमहङ्कारः प्रसूतः पञ्चतन्तुवन् । २६०॥ तेन स्थानानि जातानि लक्षाणां चतुरशीति । गुणास्तेषु प्रपूर्यन्ते यथा चित्रपटो भवेत् ॥२६१॥ आसीदेकं पुरा तत्त्वं तस्मिन्कामाविनियोगतः । कामो बहुधा भवति भवेयमिति सादरम् ॥२६२॥ एकः सन्निभि चान्यान् स्वयमकुरुतेति च । इन्द्रो मायाभिरिति च एकधा बहुधेति हि ॥२६३॥ ऊनूश्च श्रुतयः प्राप्यो ब्रह्मणो भवन प्रति । तज्जनानिति च श्रुत्या न ततोऽस्मि हि क्रिञ्चन ॥२६४॥ यद्यप्येदं तथाप्यस्मिन् स्थितिर्ब्रह्मणो भवेत् । यावदहंकृतो भादनावगम्यर आयतः ॥२६५॥ भिद्योऽहमिति हृद्ग्रन्थो न समस्तस्तदाशयः । रावेने जगद्यंनु याति स्वप्नो निद्रानुगो यथा । २६६॥
भावेंगे ॥ २४८ ॥ २४९ ॥ बाकी जितने कोष्ठ खाली बचें, उन्हें अपने इच्छानुसार रङ्ग दे। बाहरकी ओट स्वच्छ से चार परिघियां बनाये । २५०। ये दोनों प्रकार मैने पच्चीस शिवके बतलाये हैं। हे द्विजसत्तम ! ये दोनों यह शिवके गो परम प्रसन्न करनेवाले हैं ॥ २५१ ॥ अब मै अपने गुरुके महत्पदाश्रयम्प चरणकमलको प्रणाम करके संसारात्मक एक आध्यात्मिक कथा सुनाऊंगा । २५२। किसीने पञ्चविंशति लिङ्गतोभद्र- का रचना क्यों की ? अब उसका स्पष्ट तत्त्व बतलाता हूँ ॥ २५३ ॥ पहले 'लिङ्गतोभद्र' इस शब्दका अर्थ बताते हुए कहते हैं कि लिङ्ग गमक, ज्ञान अथवा ज्ञापक नामसे पुकारा जाता है। २५४ ॥ पीयूष (अमृत) का वपन करनेसे वाणीका वाणी 'भद्र नाम पड़ा है। भद्र यानी कल्याणका समीक्षण करनेसे 'भद्र' का भद्र नाम रक्खा गया है। प्रत्येक मन्त्रनाम उक्त साध्य शब्द बतलाये जाते हैं ॥ २५५ ॥ "तस्मिन् शुक्लमुखं नीलम्" आदि श्रुतियोंके कथनानुसार उपमन्त्रोंके विशेषणोंकी आवश्यकता पडती है ॥ २५६ ॥ वह परतत्त्व ही लिङ्ग एवं मङ्गलमय, वह भद्र शब्दसे अभिहित होता है। मङ्गलका भी मङ्गल करनेवाला शिव अर्थात् शान्त कहलाता है । २५७ ॥ प्रलयके समय जिसमें सब प्राणी लय हों और सृष्टिकालमें उसीमेसे निकल आयें उसीको 'लिङ्ग' कहते हैं। ऐसा कौन है ? वह परम व्योम, कलारहित तथा परम मङ्गलकारी शिव है ॥ २५८॥ सत्त्व, रज और तम ये तीन वर्ण मायाके जान्स वेष्टित है। इसमें मन चन्द्रमा, महामोह शृङ्खला और स्नेह वल्लिकायें हैं ॥ २५६। इन सबसे अन्तः इसी तरह वेष्टित है, जैसे व्योम (आकाश) से घट-पट आदि जगत्के पदार्थ वेष्टित रहते हैं। उनपर भी रङ्गके समान अहङ्कारने उसे चारो ओरसे घेर रक्खा है । २६०॥ इसीसे चौरासी लख योनियोंकी उत्पत्ति हुई है। उनमें गुणका उसी तरह समावेश हो जाता है, जैसे एक कपड़ेपर कई रङ्ग बना दिये जायें जिसमें उसका रङ्ग विचित्र प्रकारका हो जाय । २६१॥ सृष्टिके पहले केवल एक तत्त्व वाली वस्तु था। आगे चलकर उससे बहुत प्रकारकी कामनायें उत्पन्न हुई। तब उसे अकेले बहुतसे मायायोगोंसे अपने इच्छानुसार उस अकेले रूपसे बहुतर रूप बना लिये ॥ २६२। २६३ ॥ इसके अनन्तर श्रुतियोंने ब्रह्माकी उत्पत्तिके लिए 'तज्जनान्' इस भूमिसे उस ब्रह्माको प्रार्थना की तब ब्रह्माकी उत्पत्ति हुई ॥ २६४॥ यद्यपि ये सब कार्य हुए हैं। तथापि मोहवश इसमें ब्रह्मकी स्थिति नहीं हो सकती। जबतक
| ६२० | आनन्दरामायणे | [सर्ग ५ |
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एतदर्थं विरक्तः सन् जिज्ञासुः श्रेय उत्तमम् । आश्रयेत्सद्गुरुं प्राज्ञं सूक्ष्मद्रष्टारं निरामयम् ॥२६७॥
तेन प्रबोधितः सिद्धमात्मानं मन्यतात्मनि । जानीयाद्ब्रह्मभावेन जगत्स्वप्नं स्थितं सदा ॥२६८॥
ईश्वरः सर्वभूतानां हृद्देशे संस्थितोऽमलः । एकोऽद्वितीयः परमो नान्तः प्रज्ञादिलक्षणः ॥२६९॥
अक्षरः सच्चिदानन्दोऽजरोऽमर उत्तमः । निर्विकारो निराकारो निरामय उदीरितः ॥२७०॥
अलिङ्गोऽरूप एवासावेकत्वान्गणनात्परः । मायया लिङ्गरूपीव स्नेह इत्यभिधीयते ॥२७१॥
पुरुषश्च प्रकृतिश्च व्यक्तोऽहंकार एव च । चतुर्लिङ्गानि प्रोक्तानि लक्षणानि शिवस्य च ॥२७२॥
कार्यकारणभूतानामेकमेव हि पञ्चकम् । सत्त्वं रजस्तम इति वसुलिङ्गानि चात्मनः ॥२७३॥
दशेन्द्रियाणि च मनो बुद्धिश्चाद्वादशकं स्मृतम् । लिङ्गानां परमेशस्य विवंचोऽत्र प्रतिष्ठितः ॥२७४॥
इति कारणलिङ्गानि कार्यलिङ्गानपनेकशः । शतं सहस्रमयुतं कोटिशः सति संख्यया ॥२७५॥
सर्वाणि ज्ञापकान्येव शिवस्य परमात्मनः । वस्तुतस्तु परं तत्त्वं सजातीयादिहीनकम् ॥२७६॥
विचारे वर्तमाने तु तन्त्वाद्येव पटादि न । एवं सर्वं शिवो भाति न सर्वं शिव एव हि ॥२७७॥
बिन्दुनादमकारादि मात्रत्रयमुदीरितम् । आत्मेव पञ्चधा साक्षान्नवा ब्रह्मेसरो हरिः ॥२७८॥
विधिर्दुद्रौ एव पञ्च सद्योजातादिरूपकः । शुद्धः साक्षी तथा प्राज्ञस्तैजसो विश्व एव च ॥२७९॥
सच्चित्सुखरूपं नामरूपे ब्रह्मव केवलम् । जातं पञ्चात्मकं नान्यद्ब्रह्मैवेदमिति श्रुतिः ॥२८०॥
प्रधानं महदहं च पञ्चतन्मात्रकं च तत् । अष्टप्रकृतिरित्युक्तंच्छास्त्रेषु परिगीयते ॥२८१॥
बर्हभाव है, तभीतक इस संसारका विस्तार है।२६४। "यह" इस दृष्टिसे भिन्न होते ही न संसार रहता है और न उसका आश्रय ही रह जाता है। तेजके विलीन होने पर जगत्का भी नाश हो जाता है। जैसे कि निद्राका नाश होनेके साथ ही स्वप्न भी नष्ट हो जाता है ॥२६५॥ इसलिये जिज्ञासुको चाहिए कि वह विरक्त साक्षात् ब्रह्मस्वरूप तथा दोष लोभाङ्गरहित किसी सद्गुरुका शरण ले ॥२६७॥ जब कि उनके उपदेशसे वह प्रबुद्ध हो जाय और अपने आत्मारूप ही सिद्ध हो जाय, तब अपने जगत्स्वरूप चित्तको ब्रह्मभावसे देखे ॥२६८॥ सब प्राणियोंके हृदयमें वह अमल ईश्वर निवास करता है। वह एक, अद्वितीय और सर्वश्रेष्ठ है। न उसका अन्त है और न प्रज्ञा आदि लक्षणोंसे ही वह जाना जा सकता है ॥२६९॥ वह अक्षर (कभी नष्ट न होनेवाला), सच्चिदानन्द, अजर, अमर और सबसे श्रेष्ठ विद्वान् है। इसीलिये यह निर्विकार, निराकार और निरामय कहलाता है ॥२७०॥ उसका न कोई रूप है, न लिङ्ग है। यह अकेला रहकर भी गणनासे परे है। वह अपनी मायाके साथ लिङ्गरूपसा दीखता है किन्तु वास्तवमें रहता है अकेला ही ॥२७१॥ पुरुष, प्रकृति, व्यक्त, अहंकार, ये चिह्न उस लिङ्गरूप ब्रह्माको पहचाननेके लिए बताए हैं ॥२७२॥ प्राणियोंके कार्य, कारण, सत्त्व, रज, तम इनको भी कुछ लोग आत्माका लक्षण बताते हैं ॥२७३॥ कुछ लोग दश इन्द्रिय तथा मन और बुद्धि, इन बारहको भी उसके चिह्न बतलाते हैं। इस प्रकार यहाँ उस परमेश्वरके लिङ्गोंका विचार किया गया है ॥२७४॥ ऊपर बतलाये हुए सब चिह्न कार्यके हैं। इनके अतिरिक्त कारणके भी बहुतसे लिङ्ग हैं। इन लिङ्गोंकी संख्या सैकड़ा, हजार, दस हजार एवं करोड़ों पर्यंत है ॥२७५॥ उस मङ्गलमय परमात्माकी तो संसारकी समस्त वस्तुएँ ही ज्ञापक हैं। लेकिन वास्तवमें बड़ा सर्वप्रधान तत्त्व है और उसका कोई सजातीय और विजातीय नहीं है ॥२७६॥ अच्छी तरह विचार हो जानेपर यही निश्चित होता है कि वह केवल तन्तु ही है, पट आदि नहीं ॥२७७॥ जिस तरह बिन्दु-नादसे वह अकारादि मात्रत्रया-त्मक कहा जाता है। उसी तरह वह ब्रह्मा, ईश्वर या हरि अकेला रहता हुआ भी पाँच प्रकारका है ॥२७८॥ सद्योजातादि रूपोंद्वारा विधि (ब्रह्मा) और शिव भी पाँच ही पाँच प्रकारका है। वह स्वयं शुद्ध, साक्षी, प्राज्ञ, तैजस तथा विश्वरूप है ॥२७९॥ नाम और रूपके भेदसे वह सत्, चित् तथा आनन्द तीन प्रकारका है। किन्तु वह अकेला ही है। 'ब्रह्मैवेदम' इस श्रुतिसे भी यही सिद्ध होता है कि वह अकेला ब्रह्म ही पाँच प्रकारका हुआ था ॥२८०॥ प्रधान, महत्, अहङ्कार, पांच तन्मात्रायें और
सर्गः ५] मनोहरकाण्डम् ५२१
अष्टमूर्त्तिस्वरूपं सद्भुवनादिनामभृत्। स्वस्वरूपस्वरूपेण मायया भाति सर्वतः। २८१॥
ज्योतिर्लिङ्गद्विषट्कं च द्वादशादित्यनामकम्। दशेंद्रियमनोबुद्धिनामभिर्भाति सन् स्फुटम् ॥२८२॥
दशेंद्रियाणि च प्राणपञ्चकं भोग्यपंचकम्। क्षेत्रज्ञतुच्छमात्मैव पंचविंशमतो बुधः ॥२८४॥
लक्षणां चतुरशीति भोगायतनविस्तरः। तस्यैव कल्प्यते भ्रान्त्या कर्मनिर्गुणभेदतः ॥२८५॥
जाग्रत्स्वप्नसुषुप्तिं च भोगस्थानानि चात्मनः। भोगो भोक्ता भोजयिता सर्वं ब्रह्मैव न पृथक् ॥२८६॥
अध्यात्ममधिदैवं च अधिभूतमिति त्रिधा। स्थूलं सूक्ष्मं कारणं च सर्वं ब्रह्मैव न पृथक् ॥२८७॥
एतज्ज्ञानं च ध्यानं च त्रिवेकश्च विरागिता। जीवेश्वरजगद्ज्ञानमात्मैवेति न तु पृथक् ॥२८८॥
सर्वं खल्विदमिति चेदं सर्वं यदयमात्मता। ब्रह्मैवेदं सर्वमिति श्रुतयः प्रवदंति हि ॥२८९॥
अयं सिद्धस्य विषयो यन्मर्त्यान्मनि दर्शनम्। आरुरुक्षुः शांतशमन्वितस्तुः सर्वतो भवेत् ॥२९०॥
स्वदेशे प्राप्तपुरुषं निवघ्नंति वशीकृतम्। तैनामो विषयाः प्रोक्ता मुमुक्षुस्तांश्च विवर्जयेत् ॥२९१॥
विविक्तसेवी लघ्वाशीत्यादि आहत वचः। किं बहुकेन विधिना समाप्त शास्त्रहृद्गतम्। २९२॥
दत्तं मे गुरुणा किमप्यजडमानन्दामृतमव्यय
यत्संब्वात् इदं वदाम्यरुमहं न्यंचाशु नष्टं तमः।
आपूर्णं सहसोदितं मह ऋत गभीरमव्याहृतं
येनाच्छादितमिन्दुसूर्यपवन विध विशेषात्मकम् ॥२९३॥
तिर्यगूर्ध्वगता रेखाश्चत्वारिंशत्समाः शुभाः। तासामेकांक्रकोष्ठेषु परिधीं द्वौ प्रकल्पयेत् ॥२९४॥
समाप्ते प्रथमाभ्यास्तु ततो वाणांतकोष्ठके, तन्मध्यं रुद्ररुद्रषु पदष्वष्टादशः पदः ॥२९५॥
आठ प्रकृतियों ये शास्त्रोंने बतलायी गयीं हैं। २८१॥ उन आठों मूर्त्तिका स्वरूप सद्भूवन आदि नामों से विख्यात है और मायावश ये आठ वानुश्रुक नामस भी श्रामिहत हान है ॥ २८२॥ आठ ज्योतिर्लिंग, द्वादश आदित्य, दस इन्द्रियां, मन और बुद्धि इन नामोंसे भी वह विभुम स्पष्ट दिखायी देता है। २८३॥ दस इन्द्रियाँ, पाँच प्राणवायु, भोग्यपंचक और चार प्रकारका चित्त यह सब मिलकर वह पच्चीस प्रकारका माना गया है ॥२८४॥ चौरासी लाख योनियां ही उसके भोगरूपी घरका विस्तार है। भ्रान्तिवश या गुण-कर्मके भेदसे उसमें इन सबका कल्पना की जाती है॥ २८५॥ जाग्रत्, स्वप्न और सुषुप्ति ये आत्माके भोगस्थान हैं। भोग, भोक्ता, भोज्य ये सब वह ब्रह्म ही है और कोई नहीं॥ २८६॥ अध्यात्म, अधिदेव, अधिभूत, स्थूल और सूक्ष्मका कारण एकमात्र ब्रह्म ही है॥२८७॥ यह ज्ञान, ध्यान, विवेक, विरागिता, जीव, ईश्वर, जगत्का भान यह सब वह आत्मा ही है और कोई नहीं ॥ २८८॥ "सर्वं खल्विदं ब्रह्म" "यदयमात्मा' 'ब्रह्मैवेदम्' ये श्रुतियाँ भी इसी बातकी पुष्टि करती हैं॥ २८९॥ संसारके सब वस्तुओक अपनी आत्मामे देखना, यह विषय सिद्धपुरुषाका है। जो प्राणी सिद्धिके शिखरपर चढ़ना चाहता हो। उसे चाहिये कि वह शान्त, दान्त (इन्द्रियोंका दमन करनेवाला) और तितिक्षु बने ॥ २९०॥ अपने देशमे आये हुए पुरुषको ये सांसारिक विषय बाँध लेते हैं। इसीसे इन्हें लोग विषय (विशेषेण विन्वन्तं तिविषयाः। अर्थात् भली-भाँति पकड़ लेनेवाल) कहते हैं। मुमुक्षु प्राणीको चाहिए कि इनका परित्याग कर दे । २९१ । "एकान्त स्थानमे रहे, थोड़ा खाय" इत्यादि बात भगवानने गीतामें स्वयं कही है। यहाँ विशेष विधि विधान बतलानेकी आवश्यकता नहीं है। हृदयमे ज्ञानका प्रकाश होते ही सारे शास्त्र समाप्त हो जाते हैं॥ २९२॥ यदि किसी सद्गुरुने कृपा करके जड़तारहित आनन्दामृतक ज्ञानरूप वस्तु दे दी हो 'वह' 'हृणं सब एक हैं। यह भाव उत्पन्न होनेसे हृदयका अज्ञानान्धकार नष्ट हो गया। एक अनिर्वचनीय प्रकाश और चन्द्रमा-सूर्य तथा पवनपर भी आधिपत्य जमानेवाली गतिसे सहसा यह विश्व आलोकित हो उठा, तब और किसी उपदेशकी आवश्यकता ही क्या है? ॥२९३॥ सीधी और टेढ़ी चालीस रेखायें बराबर-बराबर खींचे। उनके उनतालीस कोष्ठकोंमें दो परिधियें बना दे॥ २९४॥ इस
६२२ आनन्दरामायणे [ सर्गः ६
लिंगमेकं खंडवाप्यौ तुर्यतुर्यपदामिके । अष्टकोष्ठात्मकं भद्रं प्रोक्तं पश्चाच्चतुष्टये । २९६ । शृङ्खला द्विपदा चन्द्र स्त्रिपदा वल्लरी तथा । पञ्चाशः स्मृता वल्ल्यो त्रिपञ्चेषु नियोजयेत् । २९७ । द्वितीये त्रिपदश्चन्द्रः शृङ्खला वेदपादिका । वल्ली नवपदा भद्रत्रयं नवपदात्मकम् ॥ २९८ ॥ अष्टादशपदं वाप्योद्वयं पार्श्वे तु शृङ्खले द्विपदे रक्तवर्णे च भद्रं तुर्यपदं हरित् । २९९ । प्रतिपार्श्व भवेदेतत्प्रथमायःसु योजयेत् । प्रतिपार्श्वे चतुर्लिंगं वापोनां पञ्चकं तथा । ३००॥ अष्टादशपदं लिंगं वापी त्रयोदशात्मिका । भद्रं ग्यष्टैर्द्वयं वल्ली रुद्रपदामिका । ३०१॥ शृङ्खला पञ्चभिः पादैःखपदश्चंद्र ईरितः । लिंगोपस्थिता वीथी नीलवल्ल्या नियोजयेत् । ३०२॥ यद्वा रमते परिधि विधाय तदनन्तरम् । त्रिलिंगमेक लिंगं यद्दयोः पक्त्योः प्रकारयेत् । ३०३॥ आदौ चन्द्रकलं भद्र षट्कर्मपदैः स्मृतम् । शृङ्खलापञ्चभिर्वल्ली रुद्रकोष्ठा समीरिता ॥३०४॥ वापीचतुष्टय पूर्व पर वार्णद्वयं स्मृतम् । पूर्ववत्सकलं शेष बाह्याः परिधयः क्रमात् ॥३०५॥ पीतशुक्लरक्तकृष्णा ज्ञेयाः सङ्ख्याधिका शुभाः । एतन्मर्पेन्द्र लिंगाख्यं पीठं सम्यगुदाहृतम् । ३०६ । अथवाऽस्मिंस्त्रिकोष्ठानि वर्धयित्वा क्रमेण तु । पञ्चाते परिधी कार्या तत्रलिंगानि योजयेत् । ३०७॥ प्रथमे त्रीणि लिंगानि द्वितीये चैकमादितम् । चतुर्विशंत्पदैर्लिंग वाप्यष्टादशपादजा । ३०८॥ आदौ वेदमिला वाप्यो द्वे वाप्यो च द्वितीयके । आदौ नवपदं भद्र द्वितीयेऽर्कपदं स्मृतम् । ३०९॥ चंद्रवल्ल्यादिपूर्वोक्तं मध्ये लिंगं प्रकारयेत् । अष्टाविंशतिभिः पादैः शिरः कटिः ॥३१०। अर्कअर्कपदं खंडवाप्यौ द्विपदशृङ्खलाः । पञ्चपादा स्मृता वल्ली त्रिपदा पीतशृङ्खला । ३११॥ अर्कपदेचतुर्दिक्षु मध्ये भद्रचतुष्टयम् । चतस्र त्रिपदः कोणे शिवमस्तक शशंके ॥३१२॥
कोष्ठकोंके बाद पहली परिधि बनाकर बाकी परिधियां पांच पांच कोष्ठकोंके बाद बनावे। उनके बीचमें एक सौ छब्बीस पादोंमेंसे अट्ठारह-अट्ठारह पादका एक एक लिंग बनावे। फिर चार-चार पदकी दो खण्डवापियां बनावे। इसके बाद बगल अष्टकोष्ठात्मक भद्र बनावे ॥ २९६ । २९७ । इसके बाद दो पादकी शृङ्खला एकसे चन्द्रमा और तीन पादकी वल्लरी बनाकर इसके तीन बगलमें पाँच-पाँच पादकी वल्लरियां बनावे ॥ २९७ ॥ दूसरी परिधिमें तीन पादका चन्द्रमा, चार पादकी शृङ्खला, नौ पादकी वल्लरी, नौ-नौ पादके तीन भद्र, तरह पादकी दो वापियें, बंगलमे दो लाल शृङ्खलायें और चार पादमे हरे भद्रकी रचना करे । २९८ ॥ २९९ । यह क्रम प्रत्येक पार्श्वभागमें रहेगा प्रत्येक पार्श्वभागमें चार लिंग होंगे तथा, अट्ठारह पादका लिंग, तेरह पादकी वापी, छै पादका भद्र, बारह पादकी वल्ली, फिर पाँच पादकी वल्लरी और तीन पादका चन्द्रमा बनेगा। लिंगके ऊपरकी वीथी नीली रहेगी और उसके साथ-साथ वल्लरी भी नीली रहेगी ॥ ३०० ॥ ३०१ ॥ ३०२ । अथवा छः कोष्ठकन द्वार परिधि बनाकर तीन लिंग या एक लिंग दोनों पंक्तियोंमे बनावे ॥ ३०३ । पहले सोलह पदका भद्र बनाकर पन्द्रह पादोंकी शृङ्खला और बारह कोष्ठकोंमेंसे पाँच पादकी वल्ली बनावे ॥ ३०४ ॥ पहले चार वापी और फिर द वापियोंकी रचना करे । बाकी सब पूर्ववत् रहेंगे और बाहरकी परिधियां क्रमश पीली, सफेद, लाल और काली रहेगा। यह सप्तन्दुलिंगात्मक पीठ मैने अच्छी तरह बतलाया । ३०५ ॥ ३०६ । अथवा इसी पीठमें दो कोष्ठक और बढ़ाकर छः के बाद दो परिधि बनावे और इस प्रकार लिंगोंकी योजना करे । ३०७ । प्रथम पंक्तिम तीन और दूसरीमें एक लिंग बनावे । इसी पीठमें चौबीस पादका लिंग बनेगा और अट्ठारह पादकी वापी बनेगी । ३०८ ॥ आदिये चार वापियें और दूसरेमे दो वापी रहेगी। आदिम नो पादका भद्र बनेगा और दूसरेमे बारह पादका भद्र बनेगा । चन्द्रमा तथा वल्लरी आदि पूर्वोक्त नियमके अनुसार ही रहेंगे और मध्यमें लिंगकी रचना की जायगी। उसमे अट्ठाइस पाद रहेंगे और चार पादमे शिर तथा कमरकी रचना होगी बारह-बारह पादसे दो खण्डवापियां बनायी जायेगी । दो पादकी शृङ्खलायें बनेंगी । पाँच पादकी वल्ली बनायी जायगी तीन पादसे पीतवर्णकी शृङ्खला बनेगी ॥ ३०९ ॥ ३१० ॥ ३११ । बारह पादसे चारों ओरको शृङ्खला बनेगी।
[सर्गः ६] मनोहराख्यम् ६२३
नेत्रार्थे द्वे परे शुक्ले शेषानि च पदानि हि । लिङ्गार्थं पञ्च पञ्च चथैवं तानि पूरयेत् ॥३१३॥ पीतशुक्लरक्तकृष्णा बहिःपरिधयो मताः । एतन्मण्डललिङ्गैर्लिङ्गतोभद्रमीरितम् ॥३१४॥ दशकं कारणानां च प्राणानां पञ्चकं मनः । षोडशैताः कला आत्मा साक्षी सप्तदशः स्मृतः ॥३१५॥ अरुर्लिङ्गात्मकं भद्रं शृणु शिष्य मयोच्यते । प्रागुदीच्या गता रेखाः षट्त्रिंशद्भिः प्रकल्पयेत् ३१६॥ पदानि द्वादशशतं पञ्चविंशतिरेव च। सर्वैस्तुखिपदैः कोणे शृङ्गता षट्पदात्मिका ॥३१७॥ त्रयोदशपदा वल्ली भद्रं तु नवभिः पदैः । भद्रोर्ध्वं त्रिपदा शेपा द्वितीया पीतश्रृङ्खला ॥३१८॥ त्रयोदशपदा वापौ लिङ्गमष्टादशैः स्मृतम् । लिंग नियम्य पक्तौ तु शोभा कोष्ठं चतुर्वश ॥३१९॥ तैराशुपरि पक्तौ तु कोष्ठाः सप्तदशैव तु । पूजापंक्तिः सिता ज्ञेया परितः परिकल्पिता ॥३२०॥ पूजापक्त्यंतरापक्षौ कोष्ठा अष्टादिसंख्यया । परिधिः स च विज्ञेयो मंडलीवरपोर्द्वयोः ॥३२१। परिव्यंतरकोष्ठेषु सर्वतोभद्रमालिखेत् । विशेषञ्चात्र कहेरो शृङ्खला षट्पदा भवेत् ॥३२२॥ त्रयोदशपदा बल्ली भद्रं तु द्वादशैः पदैः । पञ्चविंशत्पदा वापौ परिधिः षोडशात्मकः ॥३२३॥ मध्ये नवपदैः पद्मं कर्णिकाकेसरान्वितम् । सत्वं रजस्तमोवर्याः परितो मण्डलस्य च ॥३२४॥ अपः परिधयः कार्यास्तत्र द्वाराणि कारयेत् । शितेंदुः शृङ्खला कृष्णा वल्ली नीला वपुःपदम् ॥३२५॥ भद्रं रक्तं श्रुङ्खलाऽन्या पीता वापी सिता स्मृता । लिंगानि कृष्णवर्यानि पार्श्वद् द्वारमेव तु ॥३२६॥ परिधिः पीतवर्णः स्यात्कमलं पञ्चवर्णकम् । कर्णिका च केसराणि पीतवर्णानि कारयेत् ॥३२७॥ प्रकारांतरमन्यच्च शृणु शिष्य मयोच्यते । पूर्वोत्तरगता रेखा मप्तविंशन्मिताः शुभाः ॥३२८॥ तच्छट्त्रिंशत्पदैष्वेव सर्वतोभद्रमुत्तमम् । अग्निवेनेत्र त्रिकै र्दृथं रवनेत्रुपरंचलुधम् ॥३२९॥
मध्यमें चार भद्र बनेंगे । कोणमे तीन पादका चन्द्रमा बनेगा। लिङ्गके मण्डलके बाम नेत्रके लिए दो पद सादा ही छोड़ दे । जितने पाद हैं, उनमेंसे लिङ्गके आसन्तसबाले पञ्च-पांच पदोंको अपन इच्छानुसार पूर्ण करे । ३१२ ॥ ३१३ ॥ बाहरकी सब परिधियां पीत, शुक्ल, रक्त तथा कृष्ण वर्णकी होंगी । यह शप्तरणलिङ्गात्मक भद्रको रचनाका प्रकार बतलाया गया ॥ ३१४ ॥ दस इन्द्रियोकी, पांच प्राणोको, एक मनकी ये सोलह कलायें होती हैं और सत्रहवां आत्मा साक्षी माना जाता है । ३१५ ॥ हे शिष्य ! अब मैं द्वादशलिङ्गात्मक लिङ्गतोभद्रको रचनाका प्रकार बतलाता हूं, सुनो। पूर्व-पश्चिम तथा उत्तर-दक्षिणकी ओर छत्तीस-छत्तीस रेखायें खींचे ॥ ३१६ ॥ इससे कुल बारह सौ पच्चीस पाड होंगे । तीन पादसे खण्डेन्दु बनेगा और कोणकी ओर छः पादकी शृङ्खला रहेगी । ३१७॥ तरह पादकी दी वल्लरी, नौ पादका भद्र, भद्रके ऊपर तीन पादकी पीली शृङ्खला, तेरह पादकी वापी और अठारह पादका लिंग बनाकर पंक्तिमें कोष्ठ काष्ठक शोभाके लिये रहने दें । उसके ऊपरवाला पंक्तिमें सत्रह काष्ठक रहेंगे और चारों ओरसे सफेद रङ्गका एक पूजापंक्ति रहेगी ॥ ३१८-३२० ॥ पूजापंक्तिकी भितरवाला पंक्तिमें अठारह काष्ठक रहेंगे। वे उन दम्पतियोंके बीचमें पण्डिका काम देगें । ३२१। परिधिके भीतरवालि कोष्ठकोंमें सर्वतोभद्रकी रचना करे । इस भद्रमे जो विशेषता है, उसे समझ लो । इसकी शृङ्खला छः पादका रहेगी । ३२२ ॥ तेरह पादकी बल्लरी बनेगी । बारह पादका भद्र रहेगा । पच्चीस पादका बापी रहेगी और सोलह पादका परिधि बनेगी ॥ ३२३ । बीचमे नौ पादका एक कमल बनेगा, जिसमें कर्णिका तथा केसर आदि भार रहेंगे। पद्मके चारों ओर सत्व, रज, तम इन तीनों गुणकी रचना करनी होगी ॥ ३२४ ॥ इसमें तीन परिधियां रहेंगी और कई द्वार भी रहेंगे। इसमें उज्ज्वल चन्द्रमा, काली शृङ्खला, नील बल्लरी और लाल भद्र रहेगा। दूसरी शृङ्खला पीत वर्णकी और बापी सफेद रहेगी। आस-पास कृष्ण वर्णके बारह लिंग बनेंगे ॥ ३२५ ॥ ३२६ ॥ परिधि पीले रङ्गकी और कमल पांच रङ्गका बनेगा । उसकी कर्णिका तथा केसर पीतवर्णका रहेगा ॥ ३२७॥ हे शिष्य ! अब मैं इसका एक दूसरा प्रकार बतला रहा हूं। पूर्व-पश्चिम तथा उत्तर-दक्षिण दोनों ओर सत्ताईस-सत्ताईस रेखायें खींचे ॥ ३२८ ॥ इसके छत्तीस पादोंसे सर्वतोभद्र तथा ३२४ पादसे अन्य वस्तुओंकी रचना करे
६२२ आनन्दरामायणे [ सर्ग ५
परिधित्रन्समेताश्च प्रकल्प्याः पीतवर्णकाः । अष्टोत्तरशतैर्लिङ्गतोभद्रं कथितं यथा ॥३३०॥ तस्य चतुर्षु पार्श्वेषु रचयेदर्कलिङ्गकम् । कोणे कोणे त्रिपदोऽब्जं शृङ्खला सप्तपादिका ॥३३१॥ वल्लीमनुपदा भद्रं षट्पदं श्रीदृशामिका । लिङ्गं षड्विंशपदकं भद्रं स्याद्गर्भकोपरि ॥३३२॥ लिख्यात्षट्पदान्येव षट् पीतानि प्रकल्पयेत् । लिङ्गोपरितना वीथी नीला रन्ध्रोनियोजयेत् ३३३॥ चतुष्पदैर्लिङ्गमस्तकस्था परिधयो बहिः । सर्वाणि तु यथापूर्वमुक्तवर्णैः सुरञ्जयेत् ॥३३४॥ चतुर्विंशतिरालेख्या रेखाः प्राग्दक्षिहायताः । कोणेषु शृङ्खला पंचपदा वल्ल्यश्च पार्श्वतः ॥३३५॥ षट्नवभिर्गलैरूवाथतन्निर्गलुषुशृङ्खलाः । लघुवल्ल्यः पदां षड्भिस्ततोष्टादशभिः पदैः ॥३३६॥ कुर्याल्लिङ्गानि बाह्यान्तु त्रयोदशभिरन्तरम् । ततो दीर्घीद्वयेनैव पीठं कुर्याद्विचक्षणः ॥३३७॥ तस्य पादाः पंचदश द्वारमप्यपि तथैव च । एकाशीतिपदं मध्ये पद्मं स्वस्तिकमिष्यते ॥३३८॥ कोणेषु शृङ्खलाः कार्याः पदैस्त्रिभिरतः परम् । पदैश्चतुर्भिर्दिक्षु स्युर्भद्राण्येषां समंततः ॥३३९॥ एकादशपदे वल्ल्यौ मध्येऽष्टदलमालिखेत् । पद्मं नवपदं ज्ञेयँलिङ्गतोभद्रमिष्यते ॥३४०॥ शृङ्खला कृष्णवर्णेन वल्ली नीलेन पूरयेत् । रक्तेन शृङ्खला लघ्वी वल्ली पीतेन पूरयेत् ॥३४१॥ लिङ्गानि कृष्णवर्णानि श्वेतेनाप्यथ द्वारिका पीठं स्वपादं श्वेतेन पीतेन द्वारपूरणम् ॥३४२॥ मध्ये स्युः शृङ्खला रक्ता वल्लीनीलेन पूरयेत् । भद्राणि पीतवर्णानि वीना पंकजकर्णिका ॥३४३॥ दलानि श्वेतवर्णानि यद्वा चित्राणि कल्पयेत् त्रिशो रेखा बहिः कार्याः सितरक्तासिताः क्रमात् ॥३४४॥ ऊर्ध्वलिङ्गोद्भवं बहल्लिङ्गतोभद्रमुच्यते । अन्यन्मयातिरम्यं शृणुष्व नृपमात्र कौतुकात् ३४५॥ अष्टाविंशतिरेखाश्च निर्यगूर्ध्वं समंततः । सप्तविंशतिकोष्ठेषु पदन्ते परिधयः स्मृताः ॥३४६॥ कोणेषु त्रिपदश्चन्द्रः शृङ्खला पञ्चपादिका । वाष्यर्कपादजा भद्रषट्कं षट्षट्पदाल्यकम् ॥३४७॥
॥ ३२९ ॥ उसके आगे चार पीतवर्णकः परिधि बनावे। पहले जो मैंने अष्टोत्तरशतात्मक लिङ्गतोभद्र बतलाया है, उसके चारों बग़ल द्वादश लिङ्गकी रचना करे। प्रत्येक कायमें तीन पादका कमल बनाकर सात पादकी शृंखला बनावे ॥ ३३० ॥ ३३१ ॥ फिर चौदह पादकी वल्ली, छ पादका भद्र, तीन तीन पादका चन्द्रमा और वापी तथा छब्बीस पादका लिङ्ग वर्णिकाके ऊपर बनाया जायगा । ३३२ । लिङ्गके अगलवाले छः पाद पीले रङ्गसे रङ्ग दिये जावें। लिङ्गके ऊपरवाली शृङ्खला नीले अन्तरियाके वोचम नियुक्त कर दे । ३३३ ॥ चौदह पादसे लिंग, मस्तक तथा परिधियाँ बनावे बाकी सब रंगा ऊपर कह आये हैं उसके अनुसार ही रङ्गने के ॥ ३३४ ॥ पूर्व-पश्चिम तथा उत्तर-दक्षिणकी ओर चौबीस चौबीस रेखाएं खींचे। कोणमें पांच पादकी शृंखला तथा नौ पादोंकी वल्लियाँ बनावे। चार पादको छोटी शृङ्खला बनावे। छः पादकी लघु वल्लरी बनावे। अठारह पादोंके लिङ्ग एवं तेरह पादकी वापियाँ बनावे, फिर दो वीथियोंसे पीठकी रचना करे ॥ ३३५-३३७॥ उस पीठका पैर पाँच पादमं तथा द्वार पाँच पादसे बनाकर मध्यमें इक्यासी पादका कमल बनेगा ॥ ३३८ ॥ तीन-तीन पादोंसे कोनोंम शृङ्खलायें बनावे चारों दिशाओ़म चार-चार पादके भद्र बनेंगे ॥ ३३९ ॥ ग्यारह पादकी दो वल्लरियां बनावे । नौ पादसे मध्यम अष्टदल कमलकी रचना करे। यह भी एक प्रकारका लिङ्गतोभद्र है । ३४० ॥ इसमें की शृङ्खला कृष्ण वर्ण और दूसरी नील रङ्गसे पूर्णकी जायगी। रक्त वर्णसे लघु शृङ्खला एवं पीत वर्णसे शेष वल्लरीकी पूर्ति की जायगी ॥ ३४१ ॥ इसक लिङ्ग कृष्ण वर्णके और वहरी सफेद रङ्गकी रहेगी। इसकी पीठ और इसके पाद भी श्वेत रङ्गसे और पीत वर्णसे इसके द्वार रंगे जायेंगे ॥ ३४२ ॥ मध्यमें रक्त वर्णकी शृंखला और नील वर्णसे वल्लरी पूर्ण की जायगी। सब भद्र पीतवर्णके रहेंगे और कमलकी कर्णिका भी पीले रङ्गकी रहेगी । ३४३ ॥ कमलके दलोंको सफेद या चित्र वर्णसे पूर्ण करे। बाहर तीन रेखायें रहेगी और क्रमशः उनका वर्ण उज्ज्वल, रक्त तथा कृष्ण रहेगा । ३४४ ॥ अब हम ऊर्ध्वलिंगारणक बहल्लिङ्गतोभद्रकी रचनाका दूसरा प्रकार बतलाते हैं, उसे मन लगाकर सुनो ॥ ३४५ ॥ सीधी और तिरछी अट्ठाईस-अट्ठाईस रेखाएं खींचे। सत्ताईस कोष्ठक पर्यन्त छः छः काष्ठकके बाद परिधिदी रहेगी ॥ ३४६ ॥ कोणमें
सर्गः ६ ] मनोहरकाण्डम् ६२५
सर्गः ६ ] मनोहरकाण्डम् ६२५
ऊर्ध्वे भद्रे रविपदे पदैःषड्भिः शिताः । आत्मनोऽभिमुखाः सर्व्वं कार्यं ह्यष्ट शुभावहाः ॥३४८॥
त्रयोदशांघ्रिका वापी तस्यां पश्चिमे स्मृता । पूर्व्वे त्वेका द्वे शकले शेषं सर्वं तु पूर्व्ववत् ॥३४९॥
तिर्य्यग्भद्रे वेदपदे षट्पून्योर्ध्ववल्लरी । दक्षिणोत्तरतश्चापि वापीनां शकलाष्टकम् ॥३५०॥
उभयोर्लिङ्गयोर्माला मा त्रिभर्नेत्रनैः स्मृता । सर्व्वत्र नेत्रे द्वे त्र्ये दक्षिणोत्तरयोस्त्रिभिः ॥
पृथक् चत्वारि भद्राणि अधोभद्रे चतुष्पदे ॥३५१॥
दक्षिणोत्तरदिग्भागे पूर्व्ववन्नृपौ च संनयेत् । उल्लङ्गे मध्ये तु परिधिः पञ्चविंशैर्जलेरुहम् ॥३५२॥
शृङ्खला द्विपदा मध्ये वल्ली षट्पादजा स्मृता । वाप्यः पञ्चपदैर्ज्ञेया भद्रं वेदपदान्मकम् ॥३५३॥
सिता वापी शिवः कृष्णः पद्ममद्रे च लोहिते । तिर्य्यग्भद्रं लिंगपाले परिधी पीतवर्णकौ ॥३५४॥
नेत्रेन्दू धवलौ कृष्णा शृङ्खला हरिता लता । पदत्रयं हि वाप्यूर्ध्वं तथारुचि पूरयेत् ॥३५५॥
पीतशुक्लरक्तकृष्ण बहिः परिवयः स्मृताः । अष्टलिंगात्मकं ज्ञेयं लिंगतोभद्रमुत्तमम् ॥३५६॥
अथवान्यौ द्वौ प्रकारौ प्रोच्येते शृणु तापसि । द्वात्रिंशच्चरणेष्वेवं चतुर्लिङ्गं तथाऽष्टकम् ॥२५७॥
युक्त्या विरचयेत्तत्र विशेषोऽथ निरूप्यते । प्राग लिंगं चतुर्विंशपदमृतेष्टवापिका ॥३५८॥
भद्रं विंशपदं चान्यल्लिंगमष्टादशात्मकम् । भद्र नवपदं शेषं यावदवधि योजयेत् । ३५९॥
रेखास्त्वष्टादश प्रोक्ताश्चतुर्लिंगसमुद्भवे । कोणेष्विन्द्विपदः श्वेतस्त्रिपदः कृष्णशृङ्खला । ३६०॥
वल्ली सप्तपदा नीला भद्रं रक्तं चतुष्पदम् । भद्रपार्श्वे महालिंगं कृष्णमष्टादशैः पदैः ॥३६१॥
शिवपार्श्वे तु वापीं च कुर्य्यात्पञ्चपदां सिताम् । पदमेकं तथा पीतं भद्रं वाप्यस्तु मध्यतः ॥३६२॥
शिरसि शृङ्खला पार्श्वे कुर्य्यात्पीतं पदत्रयम् । लिंगानां स्कन्धतः कोष्ठा विंशत्यो रक्तवर्णकाः । ३६३॥
तीन पादका चन्द्रमा रहेगी और चौद पादकी श्रृंखला बनायी जायगी। बारह पादकी वापी और छः छः पादके छः भद्र बनेंगे ॥ ३४७। ऊपरके दोनों भद्र बारह पादके रहेंगे और अट्ठारह पादके भद्र बनाये जायेंगे। इन सबको अपने अभिमुख बनावे । ३४८ ॥ तेरह पादोंकी कुल वापियाँ रहेंगी। तिसमें पश्चिमकी ओर तीन वापी, पूर्वकी ओर एक वापी तथा दो खण्डवापी बनायी जायगी। शेष सब पूर्ववत् रहेंगे ॥ ३४९ ॥ इसमें बेड़ा भद्र चार पादका और तीन पादकी ऊर्ध्ववल्ली रहेगी। दक्षिण और उत्तरकी ओर खण्डवापियें रहेंगी ॥ ३५० ॥ तीन नेत्रोंसे इन दोनों लिङ्गों की माला बनाया जायगा दक्षिण और उत्तर दो-दो और तीन-तीन पादोंके दो नेत्र बनेंगे। चार भद्र पृथक् बनाये अर्थोंगे और उनमें नीचेवाले दोनों भद्र चार पादके रहेंगे ॥ ३५१ ॥ दक्षिण और उत्तरकी ओर दा वल्लियोंकी योजना की जायगी। तीन पादसे मध्यमे परिधि बनेगी और पच्चीस पादका कमल बनेगा । ३५२ ।। इसमें शृङ्खला दो पादकी और मध्यमें छ पादसे वल्ली बनायी जायगी। पाँच पादकी वापियां बनगी और चार पादका भद्र बनेगा ॥ ३५३ ।। इसकी वापियां सफेद, शिव कृष्ण, पद्म और भद्र रक्तवर्णके रहेंगे। तिरछा भद्र लिङ्ग माला तथा दोनों परिधियां पीत वर्णकी रहेगी ॥ ३५४ ।। नेत्र तथा इन्दु ये दोनों सफेद रहेंगे। शृङ्खला काली और लता हरी रहेगी। वापीके ऊपरवाले तीन पादोंको जैसी अपनी रुचि हो, उस प्रकार रंगकर बनावे ॥ ३५५ ॥ इसके बाहरकी परिधियां क्रमशः पीली, सफेद, लाल तथा काली रहेगी। यह मैंने तुमको अष्टलिङ्गात्मक लिंगतोभद्र बतलाया ॥ ३५६ ।। अब इसके अन्य दो प्रकार बतलाते हैं, उन्हें भी सुन लो । बत्तीस चरणोंसे चार या आठ लिंग युक्तिपूर्वक बनावे। अब उसमें जो विशेषतायें हैं, उन्हें बतलाते हैं। आदिवाली पंक्तिमें चौबीस पादकी अट्ठ रह वापिएं बनगी । ३५७ ।। ३५८ ।। बीस पादका भद्र बनेगा। दूसरा लिंग अट्ठारह पादका बनेगा। नौ पादका भद्र बनेगा। बाकी सब पहलेके समान बनेंगे ॥ ३५९ ।। चतुर्लिङ्गात्मक भद्रमें अट्ठारह रेखायें होंगी। इसमें भी कोणका चन्द्रमा तीन पादका और कृष्ण वर्णकी शृंखला रहेगी । ३६० ।। सात पादसे नील रङ्गकी बल्लरी, चार पादसे रक्त वर्णका भद्र औच भद्रके पास अट्ठारह पादस कृष्ण वर्णका महालिंग बनाय ॥ ३६१ ॥ शिवके पास पाँच पादकी सफेद वापी बनाये ।
| ६२६ | आनन्दरामायणे | [ सर्गः ५ |
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परिधिः पीतवर्णस्तु पदैः षोडशभिः स्मृतः । पदैस्तु नवभिः पश्चात्पद्मं चित्रं सकर्णिकम् ॥ ३६५॥
तिर्यगूर्ध्वं गता रेखाः कार्याः स्निग्धाम्बुयोद्भव । कोणेन्दुस्त्रिपदः कार्यः श्रृंखला त्रिपदा स्मृता ॥३६६॥
वल्ली च षट्पदा नीला रक्तं भद्रं प्रकस्पयेत् । पदैर्द्वादशभिः स्पष्टमुत्तरे पूर्वदक्षिणे । ३६६॥
पश्चिमायां महारुद्रमष्टत्रिंशत्तिकोष्ठके । लिंगशार्यं तथा मूर्ध्नि षाट् कोष्ठान्त्तु पीतकाः ॥३६७॥
लिंगमेकं तथा गौर्यास्तिलकं प्रोक्तमण्डले । पूजयेन्मण्डले चैव तस्य गौरी प्रसीदति । ३६८॥
प्रागुदीच्यां गता रेखाः कुर्यादेकोनविंशतिः । खण्डेन्दुस्त्रिपदः कोणे शृङ्खला पञ्चभिः पदैः । ३६९॥
एकादशपदा वल्ली भद्रं तु नवभिः पदैः । चतुस्त्रिंशत्पदा वापी परिधिर्विंशकैः पदैः । ३७०॥
मध्यं षोडशभिः कोष्ठैः पद्ममष्टदलं स्मृतम् । श्वेतेन्दुशृंखला कृष्णा वल्ली नीलेन पूरयेत् ॥३७१॥
भद्रारुणं सिता वापी पाते परिधिकर्णिके ।
रक्तं वा चित्रितं पद्मं बाह्याः सत्त्वरजस्तमाः । सर्वतोभद्रकं चेदं कल्प्यं सर्वकर्मसु ॥३७२॥
एवं लिंगतोभद्राणां रचनाः कथिता मया । एताः शिवपरा ज्ञेया न योग्या विष्णुपूजने ॥३७३॥
रामलिंगात्मकं योग्यं श्रीविष्णोर्गौरयस्य च । पूजने त्वेक एवात्र तद्विस्तारेण कथ्यते । ३७४॥
शिवस्य पूजने लिंगमुपाश्यं परिचिंतयेत् । उपासिका राममुद्रा ज्ञेया तद्वद्भवानपि ॥३७५॥
लिंगतोभद्रवच्चात्र समावाद्यातिबुद्धिदः । रामतोभद्रक यच्च ज्ञेयं विष्णुपदं हि तत् । ३७६॥
रमा रामेति वर्णव्यंक्तिह्वितं भद्रकं कृतम् । धिया देवीपरं तच्च ज्ञातव्यं सर्वकर्मसु । ३७७।
इति श्रीमत्कोटिरामचरितान्तर्गते श्रीमदानन्दरामायणे वाल्मीकीये मनोहरकाण्डे रामशसविष्णुपूजन-संवादे रामलिंगतोभद्राणां तथा लिंगतोभद्राणां रचनाप्रकारकथनं नाम पञ्चमः सर्गः ॥ ५ ॥
एक पादका एक पीला भद्र बनावे। मध्यमें वापी, मस्तकपर शृंखला, बगलमे पीले रंगके तीन बाद और लिङ्ग, स्कन्धमे लाल वर्णके बास कोष्ठक बनावे ॥ ३६२ । ३६३ ॥ सोलह पादोंसे पीत वर्णकी परिधि ओर उसके आगे नौ पादोंसे विविध वर्णकी कर्णिकायुक्त कमल बनावे ॥ ३६४ ॥ तांबी ओर सीधी तरह रेखाये खींचे। कोणम तीन पादका चन्द्रमा बनावे ॥ ३६५ । पीले वर्णसे छः पादकी वल्ली और रक्त वर्णका भद्र बनावे । फिर उत्तर पूर्व दक्षिण तथा पश्चिम कोणमें बारह पादोंसे अट्ठाईस काष्ठकोमे महारुद्रका निर्माण करे। लिङ्गके बगलमें तथा मस्तकके बाठ कोष्ठकोंका पीले रंगसे रखे ॥ ३६६-३६७ ॥ इसके मण्डलम गौरीका लिङ्ग बनावे। जो प्राणी इस मण्डलका पूजन करता है, उसपर गौरी प्रसन्न होता है । ३६८ ॥ पूर्व और उत्तरकी ओर १९ रेखाये खींचे । कोणमें तीन पादका चन्द्रमा बनावे। पाँच पादकी श्रृंखला, ग्यारह पादकी वल्ली और नौ पादं से भद्रकी रचना करे । चौंतीस पादकी वापी और बीस पादकी परिधि बनावे । ३६९ । ३७० ॥ मध्यमे सोलह पादका अष्टदल कमल बनावे । इस भद्रम चन्द्रमा सफेद, श्रृंखला काली, बल्ली नीली, भद्र लाल, वापी सफेद, परिधि पीले वर्णकी, कर्णिका लाल और विविध वर्णका कमल बनावे। बाहिर सत्त्व, रज और तम रहेगा । इस सर्वतोभद्रको सब कामोंमें बनाना चाहिए ॥ ३७१ ॥ ३७२ ॥ यह सब लिङ्गतोभद्रकी रचनाका प्रकार मैने बतलाया है। ये सब शिवकी पूजाम ही काम देगे विष्णुपूजनमें नहीं ॥ ३७३ ॥ विष्णुकी पूजाम श्रीरामलिंगातोभद्रका ही उपयोग करना चाहिए। प्रत्येक पूजनमं एक देवताकी ही प्रधानता रहती है। इसी बातको अब विस्तारपूर्वक बतला रहे हैं ॥ ३७४ ॥ शिवकी पूजामें लिङ्ग उपास्य रहता है। इसलिये उसीका ध्यान करना चाहिए । इसमें उपासिका राममुद्रा है और लिंगतोभद्रके समान ही इसमें भी आवाहन किया जाता है । रामतोभद्र विष्णुपदरक है ॥३७५॥३७६॥ इसम रमा राम ये वर्ण चिह्नित किये हुए रहते हैं। इसलिए कुछ लोग रामतोभद्रको देवीपरक भी कहते हैं । अस्तु, कहनेका भाव यह है कि यह भद्र सब कामोंमें प्रयुक्त किया जा सकता है ॥ ३७७ ॥ इति श्रीमत्कोटीरामचरितान्तर्गते श्रीमदानन्दरामायणे बाल्मीकीये पं० रामतेजपाण्डेयकृत'ज्योत्स्ना'भाषाटीकासहिते मनोहरकाण्डे पञ्चमः सर्गः ॥ ५ ॥
सर्गः ६ ] मनोहरकाण्डम् १२७
सर्गः ६ ] मनोहरकाण्डम् १२७
षष्ठः सर्गः
(रामनोभद्रमें देवताओंकी स्थापनाविधि तथा रामनवमीकी कथा)
अथ सर्वतोभद्र तद्देवताश्च लिख्यन्ते । प्राणानायम्य देशकालौ स्मृत्वा रामतोभद्रदेवतास्थापनं वा रायलिंगतोभद्रदेवतास्थापनं वा रमानामनोभद्रदेवतास्थापनं वा रमानामनोभद्रदेवतास्थापनं करिष्य इति संकल्प्य । ब्रह्मजज्ञानमिति मन्त्रस्य वामदेवऋषिः त्रिष्टुप्छन्दः ब्रह्मदेवता ब्रह्मस्थापने विनियोगः ॥ 'ब्रह्मजज्ञान०' सर्वतोभद्रमध्ये ब्रह्माणमावाहयामि ॥ १ ॥ उत्तरे वापीप्राणनामे 'आप्यायस्व०' सोमाय नमः सोममावाहयामि ॥ २॥ ईशान्यौ खंडेन्दौ 'तमीशानं०' ईशानाय नमः ईशानमावाहयामि । ३ ॥ पूर्व्वस्यां वाप्यां 'त्रातारमिन्द्र०' इन्द्राय नमः इन्द्रमावाहयामि ॥ ४ ॥ आग्नेय्यां खंडेन्दौ 'अग्निदूतं०' अग्नये नमः अग्निमावाहयामि ॥ ५ ॥ दक्षिणस्यां वाप्यां 'यमायत्वांगिर०' यमाय नमः यममावाहयामि । ६ ॥ नैर्ऋत्यां खंडेन्दौ 'असुन्वंत०' निर्ऋतये नमः निर्ऋतिमावाहयामि ॥ ७ ॥ पश्चिमायां वाप्यां 'तत्त्वायामि०' वरुणाय नमः वरुणमावाहयामि ॥ ८ ॥ वायव्ये खंडेन्दौ 'आनो नियुद्भिः०' वायवे नमः वायुमावाहयामि ॥ ९ ॥ शम्भुसोममध्ये मन्त्रे 'निवेशनेोवंगमरोवनां०' ध्रुवं अध्वा सोम आपः अनिलं अनल प्रत्यूष प्रभासमित्यष्टवसूनावाहयामि ॥ १० । सोमेशानमध्ये मन्त्रे 'नमस्ते रुद्र०' वीरभद्र शम्भु गिरीशं अजैकपादं अहिवुध्न्यं पिनाकिनं भूरनाधीश्वर कपालिन दिक्पति स्थाणुं रुद्रमित्येकादश रुद्र्रानावाहयामि ॥ ११ ॥ ईशानेंद्रमध्ये मन्त्रे 'आकृष्णेन०' भगं वरुण सूर्य वेदांग भानु रवि तमासि हिरण्यरेतसं दिवाकर मित्र आदित्य विष्णुनिति द्वादशादित्यानावाहयामि । १२ । इन्द्रामिमध्ये मन्त्रे 'अश्विना तेजसा चक्षु०' अश्विनीकुमाराभ्यां नमः अश्विनौ देवावावाहयामि ॥ १३ ॥ अग्नियममध्ये मन्त्रे 'समावर्त्तणितूंतो०' सर्व्वऋतॄन् देवानावाहयामि ॥ १४ ॥ यमनिर्ऋतिमध्ये मन्त्रे 'अमितवं देव०' मरुद्भ्यो नमः मरुतानावाहयामि ॥ १५ ॥ निर्ऋतिवरुणयोर्मध्ये मन्त्रे
अब सर्वतोभद्र और उसके देवताओंके आवाहन तथा स्थापनकी विधि बतलाते हैं। प्राणायामपूर्वक देश काल आदिका उच्चारण करके "रामतोभद्रके देवताका स्थापन, लिंगातोभद्रके देवताका स्थापन, रामनामतोभद्रके देवताका स्थापन अथवा रमारामतोभद्रके देवताका स्थापन करूँ।" ऐसा संकल्प करके "ब्रह्मजज्ञानम्" आदि मंत्रको पढ़ता हुआ विनियोग करे । "ब्रह्मजज्ञानम्" यह मंत्र पढ़कर ब्रह्माका आवाहन करे । उत्तर वापीके पास 'आप्यायस्व' यह मंत्र पढ़कर सोमका आवाहन करे ॥ १ ॥ २ ॥ ईशानके खण्डेन्दुमें 'तमीशानं' इस मंत्रसे ईशका आवाहन करे । ३ ॥ पूर्वकी वापीमें 'त्रातारं' इस मंत्रसे इन्द्रका आवाहन करे ॥ ४ ॥ अग्निकोणके इन्दुमें 'अग्निदूतं इस मंत्रसे अग्निका आवाहन करे ॥ ५ ॥ दक्षिण वापीमें 'यमायत्वा' इस मंत्रसे यमका आवाहन करे ॥ ६ ॥ नैर्ऋत्यके खण्डेन्दुमें 'असुन्दंत' इस मंत्रसे निर्ऋतिका आवाहन करे ॥ ७ ॥ पश्चिम वापीमें 'तत्त्वायामि' इस मंत्रसे वरुणका आवाहन करे ॥ ८ ॥ वायव्य कोणके खण्डेन्दुमें 'आनो नियुद्भिः' इस मंत्रसे वायुका आवाहन करे । ९ ॥ शंभु और सोमके मध्यवाले भद्रमें 'निवेशनीहं०' इस मंत्रसे ध्रुव, अध्वर, सोम आदि आठ वसुओंका आवाहन करे ॥ १० ॥ सोम और ईशानके मध्यवाले भद्रमें 'नमस्तेरुद्र' इस मंत्रसे वीरभद्र, शम्भू, गिरीश, अजैकपाद, अहिवुध्यं, पिनाकी, भूतानामीश्वर, कपाली, दिक्पति, स्थाणु और रुद्र इन एकादश रुद्रोंका आवाहन करे ॥ ११ । ईशान और इन्द्रके मध्यवाले भद्रमें 'आकृष्णेन' इस मन्त्रसे भग, वरुण, सूर्य, वेदांग, भानु, रवि, गभस्ति, हिरण्यरेतस, दिवाकर, मित्र, आदित्य और विष्णु इन द्वादश सूर्योंका आवाहन करे ॥ १२ ॥ इन्द्र और अग्निके मध्यवाले भद्रमें 'अश्विना तेजसा' इस मन्त्रसे अश्विनीकुमारोंका आवाहन करे ॥ १३ ॥ अग्नि और यमके मध्यवाले भद्रमें 'समावर्षणः
६२८ ] आनन्दरामायणे [ सर्गः ६
'आयंगौः०' भूतगणेभ्यो नमः भूतानागानावाहयामि ॥ १६ । वरुणवायुमध्ये भद्रे नदीभ्यः पौञ्जिष्टं गन्धर्वाप्सरोभ्यो नमः गन्धर्वाप्सरस आवाहयामि ॥ १७ ॥ ब्रह्मसोममध्ये वाप्यां 'यदक्रंदः प्रथमं०' स्कन्दाय नमः स्कन्दमावाहयामि ॥ १८ । 'नमः शंभवे०' नंदीश्वराय नमः नंदीश्वरमावाहयामि ॥१९। 'भद्रं कर्णेभिः०' शूलाय नमः शूलमावाहयामि ॥ २० । 'विश्वकर्मा- ह्यज०' महाकालाय नमः महाकालमावाहयामि ॥ २१ ॥ ब्रह्मैशानमध्ये वल्लीषु 'आदितिद्यौँ०' ऋक्षादिभ्यो नमः ऋक्षादीनावाहयामि ॥२२। ब्रह्मंद्रमध्ये वाप्यां 'श्रियस्ते०' दुर्गायै नमः दुर्गामा- वाहयामि ॥ २३ ॥ 'इदं विष्णु०' विष्णवे नमः विष्णुमावाहयामि । २४॥ ब्रह्माग्निमध्ये वल्लीषु 'उदीरिता०' स्वधायै नमः स्वधामावाहयामि । २५ । ब्रह्मयममध्ये वाप्यां 'अरन्मयो०' मृत्यवे नमः मृत्युमावाहयामि ॥ २६ ॥ ब्रह्मवरुणमध्ये वाप्यां 'गणानांत्वा०' गणपतये नमः गणपति- मावाहयामि ॥२७॥ ब्रह्मवरुणमध्ये वाप्यां 'शन्नोदेवी०' अद्भ्यो नमः अप आवाहयामि । २८ ॥ ब्रह्मवायुमध्ये वल्लीषु 'मरुतोयस्य०' मरुते नमः मरुतमावाहयामि ॥ २९ ॥ ब्रह्मणः पादमूले कर्णिकाधः 'स्योनापृथिवि०' पृथ्व्यै नमः पृथिवीमावाहयामि ॥३०॥ तत्रैव 'पञ्च नद्यः सरस्वती०' गंगादिसर्वनदीरावाहयामि ॥ ३१। तत्रैव धाम्नोद्याम्नोजगंस्ततोवरुण०' सप्तसागरेभ्यो नमः सप्त- सागरान्वावाहयामि ॥३२॥ ततः कर्णिकोपरि नाममंत्रेण मेरवे नमः गदामावाहयामि । ३३ । ततः पीतपरिधौ सोमादिसन्निधौ क्रमेण आयुधानि सोमसमीपे गदायै नमः गदामावाहयामि ॥ ३४ ॥ ईशानसमीपे शूलाय नमः शूलमावाहयामि ॥३५॥ इन्द्रसमीपे वज्राय नमः वज्रमावाहयामि ॥३६॥ अग्निसमीपे शक्तये नम शक्तिमावाहयामि ॥३७॥ यमसमीपे दंडाय नमः दंडमावाहयामि । ३८॥ निर्ऋतिसमीपे खङ्गाय नमः खड्गमावाहयामि ॥ ३९ । वरुणसमीपे पाशाय नमः पाशमावाह- यामि ॥४०॥ वायुसमीपे अंकुशाय नमः अंकुशमावाहयामि ॥४१॥ पुनः सोमस्योत्तरे सदा समीपे
इस मन्त्रसे सर्वरूप विश्वेदेवका आवाहन करे। १४॥ यम और निर्ऋतिके बीचवाले भद्रमे 'अग्नियं देव' इस मन्त्रसे यक्षोंका आवाहन करे ॥ १५ ॥ निर्ऋति और वरुणके बीचवाले भद्रमे 'आयंगौ' इस मन्त्रसे भूतों और नागोंका आवाहन करे ॥ १६ ॥ वरुण और वायुके मध्यमें नदीभ्यः' इस मन्त्रसे गन्धर्वों और अप्सराओं- का आवाहन करे ।। १७ ।। ब्रह्मा और सोमके मध्यवाली वापामे 'यदक्रन्दः' इस मन्त्रसे स्कन्दका आवाहन करे ! १८ ।। 'नमः शंभवे' से नन्दीश्वर, 'भद्रं कर्णेभिः' से शूल और 'विश्वकर्मा' इस मन्त्रसे महाकालका आवाहन करे । १९ ॥ २० ॥ २१ ॥ ब्रह्मा और ईशानके मध्यवाली वल्लियोंमे 'आदितिद्यौ' इस मन्त्रसे नक्षत्र आदिका आवाहन करे ।। २२ ।। ब्रह्मा और इन्द्रके मध्यवाली वापीमे 'श्रियस्ते' इस मन्त्रसे दुर्गाका आवाहन करे ॥ २३ ॥ 'इदं विष्णुः' इस मन्त्रसे विष्णुका आवाहन करे ॥ २४॥ ब्रह्मा और अग्निके मध्यवाली वल्लीमे 'उदीरिता' इस मन्त्रसे स्वधाका आवाहन करे ॥ २५ ॥ ब्रह्मा और यमके मध्यवाली वापीमें 'अरं मृत्यो' इस मन्त्रसे मृत्युका आवाहन करे । २६ ॥ ब्रह्मा और निर्ऋतिके मध्यवाली वल्लियोंमे 'गणानां त्वा' इस मन्त्रसे गणपतिक। आवाहन करे । २७। ब्रह्मा और वरुणके मध्यवाली वापीमे 'शन्नो देवी' इस मन्त्रसे जलका आवाहन करे ॥ २८ ॥ ब्रह्मा और वायुके मध्यवाली वल्लियोंमें 'मरुतो यस्य' इस मन्त्रसे मरुत्का आवाहन करे ॥ २९ ॥ ब्रह्माके पाँवके पासवाला कर्णिकाके नीचे 'स्योना पृथिवि' इस मन्त्रसे पृथ्वीका आवाहन करे ॥ ३० ॥ वहीं ही पञ्चनद्यः' इस मन्त्रसे गंगा आदि सब नदियोंका आवाहन करे ॥ ३१ । वहीं ही 'धाम्नो धाम्नो' इस मन्त्रसे सप्त सागरोंका आवाहन करे ॥ ३२ ॥ इसके बाद कर्णिकाके ऊपर नाममन्त्रस मेरका आवाहन करे ॥ ३३ ॥ पीत परिधिमे सोम आदिके पास क्रमशः आयुधोंका आवाहन करे । गदाके नाम- मन्त्रसे गदाका, ईशानके समीप शूलके नाममन्त्रसे शूलका, इन्द्रके समीप वज्रका, अग्निके पास शक्तिका यमके समीप दण्डका, निर्ऋतिके पास खड्गका और वरुणके पास पाशका आवाहन करे ॥३४-४०॥ फिर वायुके
सर्गः ६ ] मनोहरकाण्डम् ६२९
सर्गः ६ ] मनोहरकाण्डम् ६२९
गौतमाय नमः गौतममावाहयामि ॥४२॥ ईशान्यां भरद्वाजाय नमः भरद्वाजमावाहयामि ॥४३॥ पूर्वे विश्वामित्राय नमः विश्वामित्रमावाहयामि ॥४४॥ आग्नेय्यां कश्यपाय नमः कश्यपमावाहयामि ॥४५॥ दक्षिणे जमदग्नयेनमः जमदग्निमावाहयामि ॥४६॥ नैर्ऋत्यां वसिष्ठाय नमः वसिष्ठमावाह- यामि ॥४७ पश्चिमे अत्रये नमः अत्रिमावाहयामि ॥४८। वायव्यां अरुन्धत्यै नम अरुन्धतीमावा- हयामि ॥४९॥ पुनः पूर्वादििक्रमेण पूर्वे विश्वामित्रसमीपे ऐन्द्यैनमः ऐन्द्रीमावाहयामि ॥५०॥ आग्नेय्यां कौमार्यै नमः कौमारीमावाहयामि ॥५१। दक्षिणे ब्राह्मयै नमः ब्राह्मीमावाहयामि ॥५२॥ नैर्ऋत्यां वाराह्यै नमः वाराहीम० ॥५३। पश्चिमे चामुंडायै नमः चामुंडाम० ॥५४ वायव्ये वैष्णव्यै नमः वैष्णवीमा ॥५५॥ उत्तरे माहेश्वर्यै नमः माहेश्वरीमा० ॥५६। ईशान्य विनायक्यै नमः वैनाय- कीमा० ॥५७॥ अष्टदलमध्ये सूर्याय नमः सूर्यमा० ॥ ५८ ॥ बाह्यपूर्वाद्यष्टदिक्षु यथास्थानेषु पूर्वे सोमाय नमः सोममा० ॥५९॥ आग्नेय्यां भौमाय नमः भौममा० । ६०॥ दक्षिणे बुधाय नमः बुधमा० ॥ ६१ नैर्ऋत्यां बृहस्पतये नमः बृहस्पतिमा० ॥ ६२ ॥ पश्चिमे शुक्राय नमः शुक्रमा० ॥६३। वायव्यां शनैश्चराय नमः शनैश्चरमा० । ६४। उत्तरे राहवे नमः राहुमा० ॥६५॥ ईशान्यां केतवे नमः केतुमा० ॥ ६६। एता देवताः सर्वतोभद्रे प्रतिष्ठाप्य ततः परिधिभूतपंक्तौ सुषेणाय नमः सुषेणमा० ॥६७॥ सर्वेषु लिंगेषु रुद्राय नमः रुद्रमा०। ६८। सर्वासु वापीषु नलाय नमः नलमा० ॥६९॥ सर्वसु भद्रेषु सुग्रीवाय नमः सुग्रीवमा० ॥७०॥ सर्वेषु तिर्यग्भद्रेषु गवयाय नमः गवयमा० ॥७१॥ सर्वासु पीतश्रृंखलासु अंगदाय नमः अंगदमावा० ॥ ७२ ॥ सर्वासु कृष्णश्रृंखलासु विभीषणाय नमः विभीषणमा० ॥७३। सर्वासु वल्लीषु जाम्बवते नमः जाम्बवन्तमा० ।७४॥ सर्वेषु खण्डेषु मैंदाय नमः मैंदमा० ॥ ७५॥ सर्वासु परिधिषु द्विविदाय नमः द्विविदमा० ॥७६॥ मुद्रायां रामजानकीभ्यां नमः रामजानकीमा० ॥७७। मुद्रायाः पश्चिमे पीतपरिधौ लक्ष्मणाय नमः लक्ष्मणमा० ॥७८। मुद्राया उत्तरे भरताय नमः भरतमा० ॥७९॥ मुद्राया दक्षिणे शत्रुघ्नाय नमः शत्रुघ्नमा० ॥८०। मुद्रायाः पुरत वायुपुत्राय नमः वायुपुत्रमा० ॥८१॥ बहिश्चिपरिधिषु श्वेतपरिधौ
समीप अंगुष्ठका आवाहन करे ॥४१॥ तदनन्तर सोमके उत्तर ओर रुद्र के पास गौतमका आवाहन करे ॥४२॥ ईशान कोणमे भरद्वाजका, पूर्वमें विश्वामित्रका, आग्नेयमे कश्यपका, दक्षिणमे जमदग्निका, नैर्ऋत्यमे वसिष्ठका, पश्चिममे अत्रिका और वायव्यकोणमे अरुन्धतीका आवाहन करे ॥४३-४६। फिर पूर्व आदि दिशाओके क्रमसे पूर्वमें विश्वामित्रके समीप ऐन्द्रीका आवाहन करे ॥५०। आग्नेय कोणमें कौमारीका, दक्षिणमे ब्राह्मीका, नैर्ऋत्यमे वाराहीका पश्चिममे चामुण्डाका, वायव्यमे वैष्णवीका, उत्तरमें माहेश्वरीका और ईशान कोणमे वैनायकीका आवाहन करे ॥५१-५७॥ अष्टदलके मध्यमे सूर्यका आवाहन करे, बाहरके पूर्व आदि आठो दिशाओमे यथास्थान निम्नलिखित देवताओका आवाहन करे पूर्वमे सोमका आग्नेय कोणमे भौमका, दक्षिणमे बुधका, नैर्ऋत्यमे बृहस्पतिका, पश्चिममे शुक्रका वायव्यमें शनैश्चरका, उत्तरमें राहुका और ईशान कोणमे केतुका आवाहन करे ॥५८-६६॥ सर्वतोभद्रमें इन देवताओंकी स्थापना करके परिधिभूत पंक्तियामे सुषेणका आवाहन करे ॥ ६७॥ सब लिंगोंमे रुद्रका सब वापियोंमे नलका, सब भद्रोंमे सुग्रीवका, सब तियं भद्रोमें गवयका, सब पीत श्रृंखलाओमें अङ्गदका और सब कृष्ण श्रृंखलाओमें विभीषणका आवाहन करना चाहिए ॥ ६८-७३॥ सब वल्लियोंमें जाम्बवन्तसे जाम्बवान्का आवाहन करे ॥७४॥ उसी प्रकार सब खण्डोंम मैंदका, सब परिधियोंमे द्विविदका, मुद्रामें राम और जानकीका आवाहन करे ॥ ७५ ॥ ७६ ॥ ७७ ॥ मुद्राकी पश्चिमवाली पीत परिधिमें लक्ष्मणका आवाहन करे ॥७८॥ मुद्राके उत्तर ओर भरतका आवाहन करे ॥ ७९ ॥ मुद्राके दक्षिण ओर शत्रुघ्नका आवाहन करे ॥ ८० ॥ मुद्राके आगे
६३० आनन्दरामायणे [ सर्गः ६
भागीरथ्यै नमः भागीरथीमा० ॥ ८२ ॥ रक्तपरिधौ सरस्वत्यै नमः सरस्वत्तीमा० ॥८३ । कृष्णपरिधौ यमुनायै नमः यमुनामा० ॥ ८४ । एवमेव रमारामाभद्रदेवतावाहन कार्यम् । रमारामाभद्रे मुद्रायमेव विशेषः । आदौ रमामावाह्य राममावाहयेत् । एवमावाहनं कृत्वा षोडशोपचारैः पूजयेत् । शेषा- न्नेन दिग्बलिः कार्यः ॥ इति आनन्दरामायणान्तर्गतरामोभद्रदेवतास्थापनविधिः ।
अथ रामनवमीकथा
श्रीरामदास उवाच
शिष्य यद्यत्प्रियं तस्मै रामाय तद्वदाम्यहम् । मासेषु चैत्रमासस्तु राघवस्यातिवल्लभः ॥ १ ॥ पक्षयोः सितपक्षस्तु प्रियोऽस्ति राघवस्य हि सर्वासु तिथिषु श्रेष्ठा नवमी राघवप्रिया ॥ २ ॥ सूर्यवंशसमुद्भूतस्तत्सम्बन्ध भानुवासरः । प्रियोऽतिराघवस्यैव नक्षत्रेषु पुनर्वसुः ॥ ३ ॥ चंपकः पुष्पजातौ हि तुलसी वै तथैव च । अथवा नवकं चापि पुष्पाणां राघवप्रियम् । ४ ॥ जातिश्चंपकमन्दारौ तुलसी मुनिमालती । दमनः केतकी सिह्ली पुष्पाणां नवकं स्मृतम् ॥ ५ ॥ तथा नवविधं चान्नं राघवस्यातिवल्लभम् । मोदको लड्डुको मडो पूणंगर्भश्च फेणिका ॥ ६ ॥ घटकः पर्पटः खाद्यं घृतपक्वं नवं त्विति । एतानि नव भक्ष्याणि राघवस्य प्रियाणि हि ॥ ७ ॥ अथवाऽन्यत्प्रवक्ष्यामि दिव्यान्ननवकं शुभम् । मोदको लड्डुको मडो वटकः फेणिका तथा ॥ ८ ॥ दरान्नमोदनः शाकं पायसं नवकं शुभम् । अन्यच्छृणुष्व भो शिष्य मन्नान्नं राघवप्रियम् ॥ ९ ॥ एकाशीतिकुडवं च गोक्षीरं तण्डुलास्तथा । सपादद्विकुडवांश्च मुद्राय सितुषांस्तथा ॥ १० ॥ कुडवस्त्वेक एवाथ मुक्तेग कुडवा नव । त्रिकुडवं मधु प्रोक्तं घृतं च कुडवद्वयम् ॥ ११ ॥ मरीचं कुडवाष्टांशमितं नारीफलं तथा । कुडवस्त्वेक एवाथ जातीपत्रिमथैत च ॥ १२ ।
यमुनाजीका आवाहन कर ॥ ८१ ॥ बाहरकी लाल परिधिमेंमसे श्वेत परिधिम भागीरथी गंगाजीका
आवाहन करे ॥ ८२ ॥ रक्त परिधिम सरस्वतीजीका आवाहन करे ॥ ८३ ॥ काला परिधिमें यमुनाका आवाहन
कर ॥ ८४ ॥ रमा और रामक अभय भी इसी तरह आवाहन करना चाहिए । रमारामक भद्रकी मुद्रामे ही
विशेषता है । पहले रमाका आवाहन करके रामका आवाहन करना चाहिए । इस तरह आवाहन करके
षोडशोपचारसे पूजन कर और बाकी बचे अन्नसे दिग्बलि दे ॥
इति रामतोभद्रदेवतास्थापनविधिः ।
श्रीरामदासने कहा - हे शिष्य ! रामचन्द्रजीका जो जो वस्तुयें प्रिय हैं, अब उन्हें बतलाता हूँ । सब महीनोंमें चैत्रका महीना रामको प्रिय है ॥ १ ॥ शुक्ल कृष्ण इन दोनों पक्षोंमें रामको शुक्लपक्ष प्रिय है। सब तिथियोंमें नवमी तिथि प्रिय है ॥ २ ॥ सूर्यवंशमें रामका जन्म हुआ था । इसलिये उन्हें रविवार विशेष प्रिय है । सब नक्षत्रोंमें उन्हें पुनर्वसु नक्षत्र प्रिय है । ३ । फूलोंमें चम्पक तथा तुलसी प्रिय हैं । नौ पुष्प रामको विशेष प्रिय हैं ॥४॥ जैसे जूही, चम्पा, मन्दार, तुलसी, वैजयन्ती, मालती, दमनक, केतकी और सिह्ली इन्ही फूलोंको एकत्र करके रामचन्द्रको अर्पित करना चाहिये । ५। उसी तरह नौ प्रकारका अन्न भी भगवान्को प्रिय है। वे नवों ये हैं-मोदक, लडडूुक, मण्ड, पूरनपूड़ी, बटुक, बताशापेड़ी, पापड़, खाजा घीमें बना हुआ पकवान, ये नौ भी भक्ष्य पदार्थ रामचन्द्रजीको प्रिय हैं ॥ ६ ॥ ७ ॥ अब दूसरे नौ प्रकारके खाद्य पदार्थ बतलाते हैं-मोदक, लड्डुक, मड, बटुक, फेणिका, भात, शाक, पर्पट और पायस ये ही नौ वस्तु हैं । हे शिष्य ! अब रामको दूसरे प्रिय अन्न बतलाते हैं ॥ ८ । ९ ॥ एकाशी कुडव गौका दूध, उतना ही चावल, सवा दो कुडव छिलका उतारी हुई मूंग ॥ १० ॥ एक कुडव चीनी तीन कुडव मधु, दो कुडव घी, एक कुडवका अष्टमांश काली मिर्च, एक कुडव नारियलकी गरी, एक कडवका अष्टमांश जावित्री, इनको मिलाकर बनाया हुआ पाक रामचन्द्रजीको प्रिय है । इसलिये लोगोंको चाहिये कि ये पदार्थ बनाकर भगवान्को अर्पण करें ॥ ११ ॥ १२ ॥
सर्गः ६ ] मनोहरकाण्डम् ६३१
सर्गः ६ ] मनोहरकाण्डम् ६३१
ग्राह्या मरिचमानेन नवार्थं नवभिस्त्विदम् । तोषदं रामचन्द्रस्य भक्त्या कार्यं सदा नरैः ॥१३॥
लघु नवान्नं वक्ष्यामि नैवेद्यार्थं निरंतरम् । कुडवा नव गोक्षीरं तंदुलाः कुडवस्य च ॥१४॥
चतुर्थांशमिता ग्राह्याः कुडवाष्टांशसंमिताः । ग्राह्या विनुषमुद्गाश्च कुडवार्धं सिता स्मृता ॥१५॥
घृतं मुद्रसमं ग्राह्य तावन्मानं मधु स्मृतम् । तावन्मानं श्रीफलं च मरिचं टंकसंमितम् ॥ १६॥
टंकार्धा जातिपत्रीच नवान्नं लघु कीर्तितम् । कुडवोऽर्कटकैर्मितस्टंको माषचतुष्टयम् ॥ १७॥
लघु नवान्नमेतच्च राघवाय निवेदयेत् । निरंतरं हि पूजायां राघवस्यातिहर्षदम् ॥१८॥
पनसम्बूकपिन्याश बीजपूरं च दाडिमम् । खर्जूरी नारिकेलं च कदलीफलमेव च ॥१९॥
पनसं चेति रामाय फलानि नव सर्वदा । एतान्यतिप्रियाण्यत्र पूजायां ह्यभिनिवेदयेत् ॥२०॥
कूष्मांडकं च जंबीरं नारंगं स्निग्धमञ्जकम् । जातीफलं मातुलुंगं तथा द्राक्षाफलं शुभम् ॥२१॥
उर्वारुकं तथा धात्रीफलं चैतानि वै नव । फलानि रामपूजायामुक्तानि मुनिभिः सदा ॥२२॥
नरोपचारैस्तांबूलं राघवाय निवेदयेत् । नागवल्लीः कत्तुकं च खदिरः संघ एव च ॥२३॥
जातीपत्री लवणं च जातीफलवरागके । एला चेति नवविधम्नांबूलः कीर्त्यते बुधैः ॥२४॥
नवरानोपचारॉश्च राघवाय निवेदयेत् । छत्रं सिंहासनं यान चामरं व्यजनं तथा ॥२५॥
पानतांबूलयंत्रं च पात्रं निष्ठीवनस्य च । वस्त्रकोशश्चेति राजोपचारा नव स्मृताः ॥२६॥
नवाय भोग्यवस्तूनि राघवाय निवेदयेत् । चंदनं पुष्पमालां च द्रव्यं परिमलं तथा ॥२७॥
अवतंसः फलं चापि सुगन्धं तैलमुत्तमम् । ताम्बूलं कस्तूरी चापि तथा रक्ताक्षताः शुभाः ॥२८॥
एतानि भोग्यवस्तूनि राघवाय निवेदयेत् । नवोपचाराः शय्याऽपि राघवाय समर्पयेत् ॥२९॥
पर्यङ्कस्तूलिका रम्या वितानं चोषवर्हणम् । आदर्शो दीपिको तोयपात्रं प्रावरणं शुभम् ॥३०॥
व्यजनञ्चेति शय्यायाश्चोपचारा नव स्मृताः । नव वस्त्राणि रामाय देयान्यतिमहान्ति च ॥३१॥
पीतांबरमुत्तरीय चोष्णीषं कञ्चुकं तथा । उर्णापोर्ध्वस्थितं दिव्यं तथा च कटिबंधनम् ॥३२॥
॥ १३॥ अब मैं अर्पण करने योग्य लघु नवान्न बतलाता हूँ— नौ कुडव गायका दूध, एक कुडवका चतुर्थांश चावल, कुडवका अष्टमांश बिना छिलकेकी धुली मूंग, आधा कुडव चीनी, मूंगके बराबर ही घी, उतना ही मधु, उतना ही श्रीफल, एक टंक काली मिर्च, आधा टंक जातिपत्री, ये लघु नवान्न कहलाते हैं। बारह टंकका एक कुडव होता है और चार माशेके बराबर एक टंक होता है। यह लघु नवान्न रामचन्द्रजीको अर्पण करना चाहिए। यदि निरन्तर यह नवान्न रामचन्द्रजीको अर्पण किया जाय तो भगवान् अतिशय प्रसन्न होते हैं ॥ १४-१८॥ आम, जामुन, केंथा, बीजपूर, अनार, खजूर नारियल, केला और कटहल ये नौ फल रामचन्द्रजीको अतिशय प्रिय हैं। पूजामें इन्हें भी अर्पण करना चाहिये। कूष्मंडा, नींबु, नारङ्गी, कसेरू, जायफल, बिजौरा, अंगूर ककड़ी तथा आँवला ये नौ फल रामकी पूजामें आना आवश्यक है ॥ १९-२२॥ उसी तरह नौ उपचारोंके साथ ताम्बूल भी रामचन्द्रजीको अर्पण करना चाहिये। ताम्बूलके नौ उपचार ये हैं-पान, सुपारी, खैर, चूना, जावित्री, जायफल, कपूर, केसर और इलायची। नौ राजोपचार भी रामचन्द्रजीको अर्पण करने चाहिए। जैसे-छत्र, सिंहासन, रथ, चमर, पंखा, गिलास, पानदान, मोगासदान और कपड़ेकी पिटारी, ये ही राजाओंके नौ उपचार बतलाये गये हैं। उसी प्रकार नौ भोग्य वस्तु भी रामचन्द्रजीको अर्पण करना चाहिए। ये वस्तुयें इस प्रकार जाननी चाहिये-चन्दन, फूलोंकी मालाएँ, इत्र आदि सुगन्धित द्रव्य, तरह-तरहके फल, उत्तम सुगन्धित तेल ताम्बूल, कस्तूरी और लाल अक्षत, इन भोग्य वस्तुओंको रामचन्द्रजीको अर्पण करे। इसी तरह नौ उपचारयुक्त शय्या भी देनी चाहिये ॥ २३-२९॥ पलङ्ग, गद्दा, बढ़िया चाँदनी, तकिया, शीशा, दीपक, जलपात्र, चदरा और व्यजन, ये शय्याके नौ उपचार हैं। इसी तरह अत्यन्त सुन्दर नौ कपड़े भी रामचन्द्रजीको अर्पण करे। ३० ॥ ३१ ॥ जैसे-पीताम्बर, उपरना, पगड़ी, कंचुकी, परदाके ऊपर बांधनेवाला