भारतकोश
श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)

श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)

Srimad Ananda Ramayana Hindi

महर्षि वाल्मीकि / अज्ञात द्वारा

स्रोत: Srimad Ananda Ramayana Complete 9 Kandas with Hindi Translation (उद्गम)

DevanagariHindipublished811 पृष्ठ

पृष्ठ 681, कुल 811 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 681

सर्गः १ ] मनोहरकाण्डम् ६१५

प्रत्यहं धर्मघटको वस्त्रसंवेष्टिताननः । ब्राह्मणस्य गृहे देयः शीतलामलजलः शुचिः ॥६१॥ ताम्बूलफलवान्द्रव्यैश्च दक्षिणाभिः समन्वितः । एष धर्मघटो दत्तो ब्रह्मविष्णुशिवात्मकः ॥६२॥ अस्य प्रदानात्सफलाः सर्वे सन्तु मनोरथाः । अनेन विधिना यस्तु धर्मकुम्भं प्रयच्छति ॥६३॥ गयादानफलं सोऽपि प्राप्नोर्नाह न संशयः । तृतीयायां चैत्रशुक्ले सीतारामौ प्रपूजयेत् ॥६४॥ कुंकुमागुरुकर्पूरमणिवस्त्रसुगन्धकैः । स्रग्गंधैर्धूपदीपैश्च दमनेन विशेषतः ॥६५॥ आदोलयेत्ततः सीतारामौ च दोलकस्थितौ । वसन्तमभ्यासाद्य तृतीयायां द्विजोत्तम ॥६६॥ सौभाग्याय तथा स्त्रीभिः सौभाग्यशयनव्रतम् । कार्यं महोत्सवेनैव सुख पुत्रसुखेप्सुभिः ॥६७॥ विशेष चात्र वक्ष्यामि तृतीयायां द्विजोत्तम । तृतीयायां तु नारीभिः शुक्लपक्षे मधौ शुभे ॥६८॥ स्नात्वा मृण्मयदुर्गं हि कार्यं चित्रविचित्रितम् । तत्राष्टादश धान्यानि वापयेत्तदनन्तरम् ॥६९॥ पुष्पवृक्षांस्तृभांश्चैव वापयेत्सर्वतस्ततः । जयन्त्राणि ह्यपाराणि चित्राण्यपि विलेखयेत् । ७०॥ तूर्वद्द्वाराणि कार्याणि पूर्ववन्मण्डपादिकम् । यथा श्रागमपूजायामुक्तं तद्वत्प्रकारयेत् ॥७१॥ दुर्गोपरि घटं स्थाप्य सजलं पुष्पगन्धितम् । दोलकं च ततो न्यस्य घटपृष्ठे महच्छुभम् ।७२॥ कार्या राजती मूर्तिः सीतायाः परिकल्प्य च । रामस्यापि शुभां मूर्तिं कृत्वा तौ पूजयेत्ततः । ७३॥ दोलकोपरि संस्थाप्य मासमेकं प्रपूजयेत् । केचिच्छिवस्य पार्वत्या शिवेन च प्रपूजनम् ॥७४॥ वदन्ति ह्यत्रयस्तत्र निर्णयं शृणु वक्ष्यते । रामस्य हृदयं शंभुः श्रीरामो हृदयं स्मृतः ॥७५॥ शंकरस्य तथा गौरीहृदयं जानकी स्मृता । जानक्या हृदयं गौरी द्विधा नैवास्ति कर्हिचित् ।७६॥ रामस्य च शिवस्यापि सीतागिरिजयोस्तथा । ये मानयति वै भेदं तेषां वासस्तु रौरवे ॥७७॥ अतश्चैत्रतृतीयायां सीतारामौ प्रपूजयेत् । अशक्तौ ताम्रजे मूर्ती कार्ये वा काष्ठनिर्मिते । ७८॥


घड़ा बाँधकर जलधारा देनेका प्रबन्ध करे ॥ ६० ॥ उन दिनों प्रतिदिन एक घड़ेमे ठण्डा और निर्मल जल भरके उसका मुंह कपड़ेके बाँधकर ताम्बूल, फल, द्रव्य तथा दक्षिणा आदिके साथ किसी सुपात्र ब्राह्मणके घर दे आया करे। यह कहा। 'विष्णुशिवमयं घटदान करमम मेद सब मनोरथ सफल हो जायें। दान करते समय यह कहना नाय । जा प्राणी इस रीतिम धर्मकुम्भका दान करता है, उस गयादानका फल प्राप्त होता है। इसमे कुछ संशय नहीं है ॥ ६१-६४ ॥ चैत्र शुक्लपक्षकी तृतीयाको कुमकुम, अगरु, कर्पूर, मणि, वस्त्र तथा सुगन्धित मालाश्री विशेषकर दमनकक फूलसे सातरामका पूजन करे ॥ ६५.। इसके बाद झूलेपर बिठाल-कर झूला झुलावे। जिनका पुत्रसुख आदि पाना हो, व स्त्रियां वसन्तमासमे लेकर तृतीया तक एक महात् उत्सवके साथ सौभाग्यशयन व्रत करे ॥ ६६ ॥ तृतीयाम कुछ विशेषतायें है, सो तुम्हे बतलाता हूँ। उस चंतशुक्लकी तृतीयाको स्नान करक मिट्टीका एक चित्र-विचित्र दुर्ग बनावे । उसम अट्ठारह प्रकारके धान्य बोये। वहींपर अच्छे-अच्छे फूलोंके वृक्ष लगाय और उसम नाना प्रकारके उपयन्त्रोंकी रचना करे । ६७-७० ॥ उस दुर्गमें पहलेकी तरह मण्डप आदि बनाये। जैसा कि पहले श्रीरामपूजाके प्रकरणम बतला आये हैं ॥ ७१ । उस दुर्गके ऊपर जलसे पूर्ण और पुष्पसे गुम्फित घटका स्थापन करे। घटके पाछे झूला रखकर सुवर्ण या चांदो-की सीताजीको मूर्ति बनवाये और रामचन्द्रजीकी भी सुन्दर प्रतिमा बनवाकर दोनोंकी पूजा करे। इस प्रकार झूलेपर बिठालकर एक मास तक पूजन करे । हे शिष्य पार्वताजीके साथ शिवजीकी पूजा करे, कुछ लोग ऐसा कहते हैं। अब इस विषयका निर्णय मुझसे सुनता हूँ। रामचन्द्रजी शिवजीके हृदय है और शिवजी राम-के हृदय है ॥ ७२-७५ ॥ उसी तरह गौरी सीताजीका हृदय है और सीताजी गौरीका हृदय हैं। इन दोनोंमें कोई अन्तर नहीं है ॥ ७६ ॥ राम, शिव और सीता तथा गिरिजामे जो लोग किसी प्रकारका भेदभाव मानते हैं, वे रौरव नरकमें बास करते हैं ॥ ७७ ॥ इसीलिये चैत्रकी तृतीयाको सीतारामका पूजन करना चाहिए । यदि सामर्थ्य न हो तो सुवर्ण या चाँदीकी प्रतिमा न बनवाकर ताम्र अथवा काष्ठकी बनवाये ॥ ७८ ॥

श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित) · पृष्ठ 681, कुल 811 में से · BharatKosha