श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)
Srimad Ananda Ramayana Hindi
महर्षि वाल्मीकि / अज्ञात द्वारा
स्रोत: Srimad Ananda Ramayana Complete 9 Kandas with Hindi Translation (उद्गम)
पृष्ठ 807, कुल 811 में से
संदर्भ में पढ़ें७१० आनन्दरामायणे [ सर्गः ९
चैत्रमासे सिते पक्षे नवम्यां रामजन्मनि। शतमाषसुवर्णेन वायुपुत्रं विधाय च ॥२४॥ एकविंशति माषैर्वा व्यर्धमाषोद्धवा नरैः। वायुपुत्रं सचित्रं चानन्दरामायणं निवेद् ॥२५॥ मौल्यद्वारा लिखयित्वान्याँर्वा स्वयमेव वा। तत्तच्चित्रैश्च संयुक्तं सुविशोधितम् ॥२६॥ वेष्टितं पट्टवस्त्राद्यैर्नानारत्नविभूषितम्। स्कन्धे चामात्यने हर्ष पूजां दद्याणान्वितम् ॥२७॥ मध्याह्ने ब्राह्मणं पूज्य नानालङ्कारैरदन्। तस्मै देयं पुस्तकं तद्वायुपुत्रसमन्वितम् ॥२८॥ एवं यः कुरुते दानं तस्य पुण्यं वदाम्यहम्। कोटिभारसुवर्णस्य कुरुक्षेत्रे रविग्रहे ॥२९॥ दानेन पुण्यं यत्प्रोक्तं तस्माद् बहुगुणं भवेत्। अक्षरमात्रं यावन्ति सन्ति चानन्दसंज्ञके ॥३०॥ तावद्युगसहस्राणि वैकुण्ठे मोदते नरः। यज्जन्म दुर्लभं प्राप्य वेदपारगः ॥३१॥ रम्यं पवित्रमानन्ददायकं च मनोहरम्। आनन्दसंज्ञकं रामायणं पुण्यवर्धनम् ॥३२॥ रामायणमिदं येऽत्र भक्त्या शृण्वन्ति मानवाः। पुत्रैः पौत्रैः सुहृद्भिश् च वियोगं लभन्ते ते ॥३३॥ रामायणमिदं येऽत्र भक्त्या शृण्वन्ति मानवाः। भर्त्रा प्राणवरायाऽत्र न कदापि हि जायते ॥३४॥ आनन्दसंज्ञकं पुण्यं यत्र शृण्वन्ति ये स्त्रियः। सौभाग्यनगरत्यागं ता न गच्छन्ति यथा रमा ॥३५॥ ग्रामं देशान्तरं गन्तुं न गताथ यिरे नराः। तद्भाग्यावगत्यर्थं हि पठनायमिदं सदा ॥३६॥ येषां भावान् करोत्यत्र लब्धुं संरभते मनः। आनन्दसंज्ञकं वस्तु पठनाय प्रयत्नतः ॥३७॥ प्रथमे दिवसे काण्डमेकं, पठे दुभयं नवार्थं च द्वितीये च द्वितीये दिवसे पठेत् ॥३८॥ एवं क्रमेण काण्डानां वृद्धिं नीत्वा नवं दिनं नव काण्डानि नवमे दिवसे सम्पटेश्नरः ॥३९॥ अष्ट काण्डानि दशमे इत्यादिना च मनस्वी। ततश्चाष्टदिनैश्चैवानुष्ठानान्मोदं महत् ॥४०॥ अथवा क्रमण काण्डानि प्रथमं प्रथमं पठेत्। द्वितीये च द्वितीयाश्च नवमं नवमे दिने ॥४१॥ दशमं दशमं प्रोक्तं क्षयः कार्यः क्रमेण हि। क्रमद्वयं दिनषट्कनुष्ठानं सुखप्रदम् ॥४२॥
पर सौ माष हनुमान्की मूर्ति बनाकर उसके आधे अथ इसकत्स माष अथवा जैसा अपना शक्ति हो, उसके अनुसार म.घतन। मूर्ति बनवाना चाहिए। इसे जनवन्तर । खल देकर या अपने हाथसे यह ग्रन्थ लिखकर इसमें विविध प्रकारके चित्र बनाय और अच्छी तरह मशोधन करे। फिर दक्षिणाके साथ इस रामायणको रेशमी कपड़ेके टुकड़ाम बाँधकर हनुमान्जीके कन्धेपर रखकर ॥२४-२७॥ फिर दोपहर के समय इसका यथा कहन-शास्त्र विधिवत् सत्कार अर प्रहार्यका पूजा करे। उस अच्छे-अच्छे वस्त्र पहनाव और वह हनुमान्की प्रतिमा तथा पुस्तक उस ब्राह्मणका दान दे दे। ॥२८॥ इस तरह दान करनका जो फल होता है, वह में तुमको बतलाता हूँ, सूर्यग्रहण लगनेपर कुरुक्षेत्रम एक करोडभार सुवर्ण दान करनेसे जो फल प्राप्त होता है, उससे खण्डा-गुणा अधिक फल इस प्रकार आनन्दरामायणका दान करनेसे प्राप्त होता है। ऐसा करनेपर इस आनन्दरामा-यणमे जित्तन अक्षर हैं, उतने हजार युग तक प्राणी वैकुण्ठके मध्य आनन्द करता है। इसके बाद सात जन्म तक विप्रके घरम उसका जन्म होता है और इस प्रकार वह एक बरसों सच्चा ब्राह्मण होता है ॥२९ ३१॥ यह आनन्दरामायण पवित्र, रम्य, मनोहर एवं पुण्य देने वाला है। जो लोग इसका श्रवण करते हैं, वे अपने पुत्र पौत्र तथा मित्रास कभी भी वियुक्त नहीं होते ॥३२-३३॥ और जो स्त्रियाँ रामायण भक्तिपूर्वक सुनती हैं, वे अपनी प्रियतींस कभी भी वियुक्त नहीं होती। जो स्त्रियाँ इस ग्रन्थका श्रवण करती हैं, वे लक्ष्मीकी तरह सुखी रहता हुई कभी भी अपने असल गतस वियुक्त नहीं होती ॥३४, ३५॥ इस विश्वास करनेवाले किन्हीं गाँव, देशा-न्तर अथवा तीर्थयात्राको गय हों तो उन्हें कुशलपूर्वक लानेके लिए इस आनन्दरामायणका पाठ करना चाहिए ॥३६॥ जिनका अपने किसी भावको सिद्ध करनेके लिए मन चंचल हुआ हो और उस कार्यको पूर्ण करना चाहते हों तो वे प्रयत्नपूर्वक इस आनन्दरामायणका पाठ करें ॥३७॥ पहले रोज एका काण्ड, दूसरे रोज पहला और दूसरा इन दो काण्डोका पाठ करे। इसी प्रकार फिर पहला, दूसरा और तीसरा इन तीना काण्डोंका, इस क्रम-से बढ़ाता हुआ नवें रोज नवा काण्डोंका पाठ करे। ॥३८-३९॥ फिर आठवे रोज आठ काण्ड, सातवें दिन