भारतकोश
आनन्दमठ (वन्दे मातरम् एवं संन्यासी विद्रोह इतिहास)

आनन्दमठ (वन्दे मातरम् एवं संन्यासी विद्रोह इतिहास)

Anandamath with Vande Mataram - Bankim Chandra

बंकिमचन्द्र चट्टोपाध्याय द्वारा

DevanagariHindipublished78 पृष्ठ

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देती, सरोवर पर स्नानाथिर्यो की भीड़ नही है, गृह-द्वार पर मनुष्य दिखाई नही पड़ते हैं, वृक्षो पर पक्षी दिखाई नही पड़ते, चरनेवाली गौंओ के दर्शन मिलते नही हैं, केवल श्मशान मे स्यार और कुत्ते हैं, एक बहुत बड़ी आट्टालिका है, उसकी ऊंची चहारदीवारी और गगन-चुंबी गुंबद दूर से दिखाई पड़ते हैं। वह अट्टालिका उस गृह-जंगल मे शैल-शिखर-सी दिखाई पड़ती है। उसकी शोभा का क्या कहना हैं- लेकिन उसके दरवाजे बंद हैं, गृह मनुष्य-समागम से शून्य है, वायु-प्रवेश मे भी असुविधा है। उस घर के अंदर दिन-दोपहर के समय अंधेरा हैं; अंधकार मे रात के समय एक कमरे मे, फू ले हुए दो पुष्पो की तरह एक दंपति बैठे हुए चिंतामग्न हैं। उनके सामने अकाल का भीषण रूप है। 1174 मे फसल अच्छी नही हुई, अत: ग्यारह सौ पचहत्तर मे अकाल आ पड़ा- भारतवासियो पर संकट आया। लेकिन इस पर भी शासको ने पैसा-पैसा, कौड़ी-कौड़ी वसूल कर ली। दरिद्र जनता ने कौड़ी-कौड़ी करके मालगुजारी अदा कर दिन मे एक ही बार भोजन किया। ग्यारह सौ पचहत्तर बंगाब्द की बरसात मे अच्छी वर्षा हुई। लोगो ने समझा कि शायद देवता प्रसन्न हुए। आनंद में फिर मठ-मंदिरो मे गाना-बजाना शुरू हुआ, किसान की स्त्री ने अपने पति से चांदी के पाजेब के लिए फिर तकाजा शुरू किया। लेकिन अकस्मात आश्विन मास मे फिर देवता विमुख हो गए। अग्र-कार्तिक मे एक बूंद भी बरसात न हुई। खेतो मे धान के पौधे सूखकर खंखड़ हो गए। जिसके दो-एक बीघे मे धान हुआ भी तो राजा ने अपनी सेना के लिए उसे खरीद लिया, जनता भोजन पा न सकी। पहले एक संध्या को उपवास हुआ, फिर एक समय भी आधा पेट भोजन उन मिलने लगा, इसका बाद दो-दो संध्या उपवास होने लगा। चैत मे जो कुछ फसल हुई वह किसी के एक ग्रास भर को भी न हुई। लेकिन मालगुजारी के अफसर मुहम्मद रजा खां ने मन मे सोचा कि यही समय है, मेरे तपने का। एकदम उसने दश प्रतिशत मालगुजारी बढ़ा दी। बंगाल मे घर-घर कोहराम मच गया। पहले लोगो ने भीख मांगना शुरू किया, इसके बाद कौन भिक्षा देता है? उपवास शुरू हो गया। फिर जनता रोगाक्रांत होने लगी। गो, बैल, हल बेचे गए, बीज के लिए संचित अन्न खा गए, घर-बार बेचा, खेती-बारी बेची। इसके बाद लोगो ने लड़कियां बेचना शुरू किया, फिर लड़के बेचे जाने लगे, इसको बाद गृहलक्षिमयो का विक्रय प्रारंभ हुआ। लेकिन इसके बाद, लड़की, लड़के औंरते कौन खरीदता? बेचना सब चाहते थे लेकिन खरीदार कोई नही। खाद्य के अभाव मे लोग पेड़ो के पत्ते खाने लगे, घास खाना शुरू किया, नरस टहनियां खाने लगे। छोटी जाति की जनता और जंगली लोग कुत्ते, बिल्ली, चूहे खाने लगे। बहुतेरे लोग भागे, वे लोग विदेश मे जाकर अनाहार से मरे। जो नही भागे, वे अखाद्य खाकर, उपवास और रोग से जर्जर हो मरने लगे। रोग को भी अवसर मिला- ज्वर, हैजा, क्षय, चेचकफैल पड़ा। विशेषतः चेचक का बड़ा प्रसार हुआ। घर-घर लोग महामारी से मरने लगे। कौन किसे जल देता हैं- कौन किसे छूता? कोई किसी की चिकित्सा नही करता, कोई किसी को नही देखता था। मर जाने पर शव कोई उठाकर फेकता नही था। अति रमणीय गृह-स्थान आप ही सड़कर बदबू करने लगे। जिस घर में एक बार चेचक हुआ, रोगी को छोड़कर घरवाले भाग गए। महेंद्र सिंह पदचिन्ह के बड़े धनी व्यक्ति हैं-- लेकिन आज धनी-गरीब सब बराबर हैं। इस दुःखपूर्ण अकाल के समय रोगी होकर उसके आत्मीय-स्वजन, दासी-दास सभी चले गए है। कोई मर गया, कोई भाग गया। उस वृहत परिवार मे उनकी स्त्री, वे और गोद मे एक शिशु-कन्या मात्र रह गई हैं। इन्ही लोगो की बात कह रहा हूं। उनकी भार्या कल्याणी ने चिंता छोड़कर गोशाला मे जाकर गाय दुही। इसके बाद दूध गर्म कर कन्या को पिलाया और गऊ को घास खाने के लिए डाल दिया। वह लौटकर जब काई तो महेद्र ने कहा-‘‘इस तरह कितने

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