अनुरागसागर वाणी
Anuragsagar Vani
स्वामी मधु परमहंस जी द्वारा
स्रोत: साहिब बंदगी आध्यात्मिक संस्थान · साहिब बंदगी (उद्गम)
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होना चाहिए और यदि नमक रहित रूखा साग भी मिल जाए तो उसे त्यागना नहीं चाहिए बल्कि ज्यादा खुशी के साथ खाना चाहिए।
इन्द्री दुष्ट महा अपराधी। कुटिल काम कोई विरले साधी।।
कामिनि रूप काल की खानी। तजहु तासु संग हो गुरुज्ञानी।।
काम इन्द्री तो बड़ी ही दुष्ट और अपराधी है, जिसे कोई बिरला ही साध सका है, इसलिए जो स्त्री के सुंदर रूप को काल की खानि समझ उसका संग त्याग दे, वो ज्ञानी है, वो साधु है।
जबहि काम उमंग तन आवै। ताहि समय जो आप जुगावे।।
शब्द विदेह सुरत लै राखे। गहि मन मौन नाम रस चाखे।।
जब हिय तत्त्व में जाय समाई। तबही काम रहै मुरझाई।।
साधु का परिचय देते हुए साहिब कह रहे हैं कि उसे चाहिए, जब काम वेग के साथ शरीर में आए तो युक्तिपूर्वक अपने को बचाकर रखे, उसे रोके रखे। ऐसे में सार शब्द में अपनी सुरति लगाए रखे, मौन रहते हुए मन को पकड़े रहे और नाम रूपी रस का पान करता रहे क्योंकि जब सुरति नाम में जाकर समा जाती है, तब काम उदास होकर शांत हो जाता है।
काम परबल अति भयंकर, महा दारुण काल हो।
सुर नर मुनि यक्ष गन्धर्व किन्नर, सबहिं कीन्ह बेहाल हो।।
सबहि लूटे बिरले छूटे, ज्ञान गुरु जिन्ह दूढ़ गहे।
गुरु ज्ञान दीप समीप सतगुरु, भक्ति मार्ग तिन्ह लहे।।
साहिब कह रहे हैं कि यह काम बड़ा ही प्रबल है, यही काल रूप है, जिसने देवता, मनुष्य, मुनि, यक्ष, किन्नर (नपुंसक) सबको बेहाल किया हुआ है। काम ने सबको लूट लिया है। इससे कोई बिरला ही छूट सकता है, जो गुरु के ज्ञान को दूढ़ता से पकड़े रहे, हर समय चेतन रहे। जहाँ गुरु-ज्ञान रूपी दीपक का प्रकाश है, वहीं सदगुरु का वास है। ऐसा जीव ही भक्ति मार्ग को पा सकता है, उस पर चल सकता है।