अनुरागसागर वाणी
Anuragsagar Vani
स्वामी मधु परमहंस जी द्वारा
स्रोत: साहिब बंदगी आध्यात्मिक संस्थान · साहिब बंदगी (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंशब्द के प्रेमी
कोई बूझाई जन जौहरी, जो शब्द की पारख करै । चितलाय सुनहिं सिखावनो, हितलाय के हिरदय धरै ॥ तम मोह मो सम ज्ञान रवि, जब प्रगट हो तब सूझई । कहत हौं मैं शब्द साँचा, संत कोई बूझई ॥
कोई जौहरी ही सत्य शब्द रूपी सोने की पारख कर सकता है । साहिब कह रहे हैं कि जो समझा रहा हूँ, ध्यान से समझो और हितकारी जानकर हृदय में बिठा लो । मेरे समान ज्ञान का सूर्य जब प्रगट होता है, तभी अज्ञान का अंधेरा समझ पड़ता है । सत्य शब्द कहता हूँ, जिसे कोई संत ही समझ सकता है ।
कोई इक संत सुजान, जो मम सब्द बिचारई ।
पावै पद निर्वाण, बसत अनुराग जासु उर ॥
जिसके हृदय में प्रेम होगा, वो ही निर्वाण पद को प्राप्त करेगा, जो मेरे इन शब्दों पर विचार करे, ऐसा कोई समझदार संत ही होगा ।
धर्मदास पूछते हैं
हे सतगुरु बिनवौं कर जोरी । संशय प्रभु इक मेटो मोरी ॥
जाके चित अनुराग समाना । ताको कहो कवन सहिदाना ॥
अनुरागी कैसे लखि परई । बिन अनुराग जीव नहिं तरई ॥
सो अनुराग प्रभु मोहि बताओ । देइ दृष्ट्यांत भले समझाओ ॥
धर्मदास जी हाथ जोड़कर प्रार्थना करते हुए कह रहे हैं कि कृपा करके मेरा एक संशय मिटा दो; यदि प्रेम के बिना जीव नहीं तर सकता तो मुझे यह बता दो कि जो सच्चा प्रेमी होता है, उसकी पहचान क्या है !
साहिब कहते हैं
धर्मदास परखहु चित लाई । अनुरागी लछन सुखदाई ॥
जैसे मृगा नाद सुनि धावै । मगन होय व्याध ठिग आवै ॥
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