भारतकोश
अष्टाङ्गहृदयम्

अष्टाङ्गहृदयम्

Ashtanga Hridayam

श्रीमद्वाग्भट द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान - निर्मला हिन्दी व्याख्या (डॉ० ब्रह्मानन्द त्रिपाठी) · चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान, दिल्ली · 1999 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished387 पृष्ठ

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प्रयोग किया गया है। इस प्रकार के काव्यकौशल का प्रयोग वाग्भट ने अनेक स्थानों पर किया है। कतिपय अन्य उदाहरण भी देखें—

१. हिङ्गुग्राविङ्गुण्ठजजिजिजयावाटचाभिधानामयै-

शृणुः कुम्मनिकुम्ममूलसहितैर्भागोत्तरं वर्धितैः।

पीतः कोण्णजलेन कोण्णजर्जुगे गुल्मीदरादीनयं

शार्दूलः प्रसभं प्रमथ्य हरति व्याधीन् मुगौधानिव ॥ (अ.हू.चि. १४३६)

उक्त 'शार्दूलविक्रीडित' छन्द के चतुर्थ चरण में द्वयर्थक 'शार्दूल' शब्द का प्रयोग अपने विविध अर्थों को प्रकट कर रहा है।

२. 'सहचरं सुरदारं सनागरं क्वथितमम्भसि तैलविमिश्रितम्।

पवनपीडितेदेहगतिः पिबेत् द्रुतबिलम्बितगो भवतीच्छ्या' ॥ (वही, २१।५५)

इस पद्य में आया हुआ 'द्रुतबिलम्बित' पद छन्द तथा अपने प्रसंगोचित महत्त्वपूर्ण अर्थ का भी बोध करा रहा है।

३. 'बीजकस्य रसमङ्गुलिहार्यं शर्करां मधु घृतं त्रिफलां च।

शीलयत्सु पुरुषेषु जरत्ता स्वागताऽपि विनिवर्तत एव' ॥ (अ.हू.उ. २९।५५३)

इस पद्य में प्रयुक्त 'स्वागता' पद छन्द एवं अपने अर्थ का विशिष्ट सूचक भी है।

४. 'मधु मुखमिव सोत्पलं प्रियायाः कलरणना परिवादिनीं प्रियेव।

कुसुमचयमनोरमा च शभ्या किसलयिनीं लतिकेव पुष्पिताग्रा' ॥ (वही, ४०।४६)

यहाँ श्लेषप्रतिभोत्पापित पुष्पिताग्रा का एक प्राकराणिक अर्थ है और दूसरा है छन्द नाम। यह अधिसमवृत्त का उदाहरण है।

आचार्य वाग्भट की यहाँ प्रवृत्ति अष्टांगसंग्रह के रचना काल में भी रही है। देखिये—पृथ्वीवृत्त का उदाहरण अ.सं.उ. ४९।३७९-३८० में। प्रायः वृत्तरत्नाकर, छन्दोमञ्जरी, सूवृत्ततिलक आदि के सभी छन्दों के उदाहरण वाग्भट की रचनाओं में सुलभ हैं। अतः कतिपय विशिष्ट छन्दः प्रयोगों को ऊपर दे दिया गया है।

वाग्भट द्वारा प्रयुक्त छन्द—यहाँ हम अकारादि क्रम से छन्दों के नामों का उल्लेख कर रहे हैं। यदि आप इनको देखना चाहें तो सम्पूर्ण अष्टाङ्गहृदय पर लिखी गयी अरुणदत्त की टीका का अवलोकन करें। छन्द नाम—१. अनुष्टुप्, २. आर्या, ३. आर्यागीति, ४. आर्याजघनचपला, ५. आर्याविपुला, ६. इन्द्रवज्रा, ७. उदगीतार्या, ८. उपचित्रा, ९. उपजाति, १०. उपेन्द्रवज्रा, ११. औपच्छन्दसिक, १२. कुसुमितलता, १३. गीति, १४. गीतिसमुखचपला, १५. तोटक, १६. दण्डकोऽण्णस्य; १७. दण्डको व्यालाख्यः, १८. दोधक, १९. द्रुतविलम्बित, २०. धीरललिता, २१. नर्कुटक, २२. पुष्पिताग्रा, २३. पृथ्वी, २४. प्रहरिणी, २५. भद्रा, २६. मत्तमयूर, २७. मन्दाक्रान्ता, २८. मात्रासमक, २९. मालिनी, ३०. मुखचपला, ३१. रथोद्वता, ३२. वसन्त-तिलका, ३३. वंशस्थ, ३४. विपुला, ३५. वैतालौय, ३६. वैश्वदेवी, ३७. शार्दूलविक्रीडित, ३८. शालिनी, ३९. शुद्धविराट, ४०. प्रमघरा, ४१. स्वागता, ४२. हरिणी। इनमें १६ वें तथा १७ वें दो गद्य छन्द हैं।

अलंकार परिचय—वाग्भट की प्रस्तुत रचना में वृत्त्यनुप्रास, छेकानुप्रास, यमक आदि शब्दालंकारों के अनेक उदाहरण अनायास उपलब्ध होते हैं। उन्हें आप निम्न सन्दर्भ सेकतो के अनुसार स्वयं देखने का प्रयत्न करें—हू.सू. ३।३५; ३।५१; १४।३५; २७।१।हू.नि. ७।२५; १०।१३।हू.चि. १८।३२; १९।७; १९।१७; १९।३२।हू.उ. २।३६; ७।२३; २१।३६; ३९।८०; ३९।१२७ आदि।