भारतकोश
अष्टाङ्गहृदयम्

अष्टाङ्गहृदयम्

Ashtanga Hridayam

श्रीमद्वाग्भट द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान - निर्मला हिन्दी व्याख्या (डॉ० ब्रह्मानन्द त्रिपाठी) · चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान, दिल्ली · 1999 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished387 पृष्ठ

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पुरोवचन

आयुर्वेदीय वाङ्मय का इतिहास ब्रह्मा, इन्द्र आदि देवों से सम्बन्धित होने के कारण अत्यन्त प्राचीन, गौरवास्पद एवं विस्तृत है। भगवान् धन्वन्तरि ने इस आयुर्वेद को 'तविदं शाश्वतं पुण्यं स्वर्ग्यं यशस्वमायुष्यं वृत्तिकरं चैति' (सु.सू. १।१९) कहा है। लोकोपकार की दृष्टि से इस विस्तृत आयुर्वेद को बाद में आठ अंगों में विभक्त कर दिया गया। तब से इसे 'अष्टांग आयुर्वेद' कहा जाता है। इन अंगों का विभाजन उस समय के आयुर्वेदज्ञ महर्षियों ने किया। कालान्तर में कालचक्र के अत्याहत आघात से तथा अन्य अनेक कारणों से ये अंग खण्डित होने के साथ प्रायः लुप्त भी हो गये। शताब्दियों के पश्चात् ऋषिकल्प आयुर्वेदविद् विद्वानों ने आयुर्वेद के उन खण्डित अंगों की पुनः रचना की। खण्डित अंशों की पूर्ति युक्त उन संहिता ग्रन्थों को प्रतिसंस्कृत कहा जाने लगा, जैसे कि आचार्य दृढबल द्वारा प्रतिसंस्कृत चरकसंहिता। इसके अतिरिक्त प्राचीन खण्डित संहिताओं में भेड(ल)संहिता तथा काश्यपसंहिता के नाम भी उल्लेखनीय हैं। तदनन्तर संग्रह की प्रवृत्ति से रचित संहिताओं में अष्टांगसंग्रह तथा अष्टांगहृदय संहिताएँ प्रमुख एवं सुप्रसिद्ध हैं। परवर्ती विद्वानों ने वर्गकरण की दृष्टि से आयुर्वेदीय संहिताओं का विभाजन बृहत्तृष्यो तथा लघुतृष्यो के रूप में किया। बृहत्तृष्यो में—चरकसंहिता, सुश्रुतसंहिता तथा अष्टांगहृदय का समावेश किया गया है, क्योंकि 'गुणा गुणज्ञेषु गुणा भवन्ति'। यह भी तथ्य है कि वाम्भट की कृतियों में जितना प्रचार-प्रसार 'अष्टांगहृदय' का है, उतना 'अष्टांगसंग्रह' का नहीं है। इसी को आधार मानकर बृहत्तृष्यो रत्नमाला में 'हृदय' रूप रत्न को लेकर पारखियों ने गूँथा हो?

चरक-सुश्रुत संहिताओं की मान्यता अपने-अपने स्थान पर प्राचीनकाल से अद्यावधि अक्षुण्ण चली आ रही है। अतएव इनका पठन-पाठन तथा कर्माभ्यास भी होता आ रहा है। यह भी सत्य है कि पुनर्वसु आत्रेय तथा भगवान् धन्वन्तरि के उपदेशों के संग्रहरूप उत्तम संहिताओं में जो लिखा है, वह अपने-अपने क्षेत्र के भीतर आप्त तथा आर्ष वचनों की चहारदिवारी तक सीमित होकर रह गया है तथा उक्त महर्षियों ने पराधिकार में हस्तक्षेप न करने की प्रतिज्ञा कर रखी थी। यह उक्त संहिताकारों का अपना-अपना उज्ज्वल चरित्र था। महर्षि अग्निवेश प्रणीत कायचिकित्सा का नाम चरकसंहिता और भगवान् धन्वन्तरि द्वारा उपदिष्ट शल्यतन्त्र का नाम सुश्रुतसंहिता है। ये दोनों ही आयुर्वेदशास्त्र की धरोहर एवं अक्षयनिधि हैं। उन-उन आचार्यों द्वारा इनमें समाविष्ट विषय-विशेष आयुर्वेदशास्त्र के जीवातु हैं, अतएव ये संहिताएँ समाज की परम उपकारक हैं।

चरकसंहिता में स्वास्थरक्षा के सिद्धान्तों, रोगमृत्ति के उपायों तथा आयुर्वेदीय सद्वृत्त आदि विषयों का जो विशद विवेचन उपलब्ध होता है, वह सभी दृष्टियों से महत्त्वपूर्ण है। अधिक क्या कहा जाय चरकोक्त सभी सिद्धान्त त्रिकालाबाधित हैं। इस प्रकार के विषयों की पुष्कल सामग्री से प्रभावित होकर आचार्य दृढबल ने 'यदिहास्ति तदन्यत्र यन्नेहास्ति न तत्त्वचित्' (च.सि. १।५४) यह जो डिग्डिमघोष किया है, वह चिकित्सा-सिद्धान्तों पर पूर्णतया सही उतरता है। सुश्रुतसंहिता में आयुर्वेद के आठों अंगों का विभाजन शल्यकर्मा को प्रधान मानकर किया गया है; फिर भी आधुनिक शल्य-शालाक्य चिकित्सा की दृष्टि से इन प्राचीन सिद्धान्तों में पग-पग पर प्रतिसंस्कारों की अपेक्षा प्रतीत होती है।

सिंहगुप्त के पुत्र वाम्भट ने इसी प्रतिसंस्कार की उत्कट भावना से प्रेरित होकर पहले अष्टांगसंग्रह की रचना की, जिसे उन्होंने 'युगानुरूपसन्दर्भ' संज्ञा दी (अ.सं.सू. १।१८)। फिर उसी अष्टांगसंग्रह में से 'हृदय' के समान सारभाग का स्वतन्त्र रूप से पृथक् संग्रह करके 'अष्टांगहृदय' की रचना कर डाली