अष्टाङ्गहृदयम्
Ashtanga Hridayam
श्रीमद्वाग्भट द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान - निर्मला हिन्दी व्याख्या (डॉ० ब्रह्मानन्द त्रिपाठी) · चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान, दिल्ली · 1999 (उद्गम)
पुरोवचन
आयुर्वेदीय वाङ्मय का इतिहास ब्रह्मा, इन्द्र आदि देवों से सम्बन्धित होने के कारण अत्यन्त प्राचीन, गौरवास्पद एवं विस्तृत है। भगवान् धन्वन्तरि ने इस आयुर्वेद को 'तविदं शाश्वतं पुण्यं स्वर्ग्यं यशस्वमायुष्यं वृत्तिकरं चैति' (सु.सू. १।१९) कहा है। लोकोपकार की दृष्टि से इस विस्तृत आयुर्वेद को बाद में आठ अंगों में विभक्त कर दिया गया। तब से इसे 'अष्टांग आयुर्वेद' कहा जाता है। इन अंगों का विभाजन उस समय के आयुर्वेदज्ञ महर्षियों ने किया। कालान्तर में कालचक्र के अत्याहत आघात से तथा अन्य अनेक कारणों से ये अंग खण्डित होने के साथ प्रायः लुप्त भी हो गये। शताब्दियों के पश्चात् ऋषिकल्प आयुर्वेदविद् विद्वानों ने आयुर्वेद के उन खण्डित अंगों की पुनः रचना की। खण्डित अंशों की पूर्ति युक्त उन संहिता ग्रन्थों को प्रतिसंस्कृत कहा जाने लगा, जैसे कि आचार्य दृढबल द्वारा प्रतिसंस्कृत चरकसंहिता। इसके अतिरिक्त प्राचीन खण्डित संहिताओं में भेड(ल)संहिता तथा काश्यपसंहिता के नाम भी उल्लेखनीय हैं। तदनन्तर संग्रह की प्रवृत्ति से रचित संहिताओं में अष्टांगसंग्रह तथा अष्टांगहृदय संहिताएँ प्रमुख एवं सुप्रसिद्ध हैं। परवर्ती विद्वानों ने वर्गकरण की दृष्टि से आयुर्वेदीय संहिताओं का विभाजन बृहत्तृष्यो तथा लघुतृष्यो के रूप में किया। बृहत्तृष्यो में—चरकसंहिता, सुश्रुतसंहिता तथा अष्टांगहृदय का समावेश किया गया है, क्योंकि 'गुणा गुणज्ञेषु गुणा भवन्ति'। यह भी तथ्य है कि वाम्भट की कृतियों में जितना प्रचार-प्रसार 'अष्टांगहृदय' का है, उतना 'अष्टांगसंग्रह' का नहीं है। इसी को आधार मानकर बृहत्तृष्यो रत्नमाला में 'हृदय' रूप रत्न को लेकर पारखियों ने गूँथा हो?
चरक-सुश्रुत संहिताओं की मान्यता अपने-अपने स्थान पर प्राचीनकाल से अद्यावधि अक्षुण्ण चली आ रही है। अतएव इनका पठन-पाठन तथा कर्माभ्यास भी होता आ रहा है। यह भी सत्य है कि पुनर्वसु आत्रेय तथा भगवान् धन्वन्तरि के उपदेशों के संग्रहरूप उत्तम संहिताओं में जो लिखा है, वह अपने-अपने क्षेत्र के भीतर आप्त तथा आर्ष वचनों की चहारदिवारी तक सीमित होकर रह गया है तथा उक्त महर्षियों ने पराधिकार में हस्तक्षेप न करने की प्रतिज्ञा कर रखी थी। यह उक्त संहिताकारों का अपना-अपना उज्ज्वल चरित्र था। महर्षि अग्निवेश प्रणीत कायचिकित्सा का नाम चरकसंहिता और भगवान् धन्वन्तरि द्वारा उपदिष्ट शल्यतन्त्र का नाम सुश्रुतसंहिता है। ये दोनों ही आयुर्वेदशास्त्र की धरोहर एवं अक्षयनिधि हैं। उन-उन आचार्यों द्वारा इनमें समाविष्ट विषय-विशेष आयुर्वेदशास्त्र के जीवातु हैं, अतएव ये संहिताएँ समाज की परम उपकारक हैं।
चरकसंहिता में स्वास्थरक्षा के सिद्धान्तों, रोगमृत्ति के उपायों तथा आयुर्वेदीय सद्वृत्त आदि विषयों का जो विशद विवेचन उपलब्ध होता है, वह सभी दृष्टियों से महत्त्वपूर्ण है। अधिक क्या कहा जाय चरकोक्त सभी सिद्धान्त त्रिकालाबाधित हैं। इस प्रकार के विषयों की पुष्कल सामग्री से प्रभावित होकर आचार्य दृढबल ने 'यदिहास्ति तदन्यत्र यन्नेहास्ति न तत्त्वचित्' (च.सि. १।५४) यह जो डिग्डिमघोष किया है, वह चिकित्सा-सिद्धान्तों पर पूर्णतया सही उतरता है। सुश्रुतसंहिता में आयुर्वेद के आठों अंगों का विभाजन शल्यकर्मा को प्रधान मानकर किया गया है; फिर भी आधुनिक शल्य-शालाक्य चिकित्सा की दृष्टि से इन प्राचीन सिद्धान्तों में पग-पग पर प्रतिसंस्कारों की अपेक्षा प्रतीत होती है।
सिंहगुप्त के पुत्र वाम्भट ने इसी प्रतिसंस्कार की उत्कट भावना से प्रेरित होकर पहले अष्टांगसंग्रह की रचना की, जिसे उन्होंने 'युगानुरूपसन्दर्भ' संज्ञा दी (अ.सं.सू. १।१८)। फिर उसी अष्टांगसंग्रह में से 'हृदय' के समान सारभाग का स्वतन्त्र रूप से पृथक् संग्रह करके 'अष्टांगहृदय' की रचना कर डाली
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और उसका विश्व में सादर प्रचार-प्रसार हुआ। वाग्भट ने न केवल आत्रेय आदि महर्षियों के वचनों का अनुकरण मात्र किया है, अपितु प्रसंगोचित अभिनव विषयों का भी इसमें स्थान-स्थान पर समावेश किया है, जो चिकित्सा की दृष्टि से उपादेय हैं। इन्होंने उत्तरस्थान में उन रोगों के निदान तथा चिकित्सा का वर्णन किया है, जिनका वर्णन आरम्भ के निदान तथा चिकित्सास्थानों में नहीं हो पाया था, अतएव आयुर्वेद की बृहतत्रयी में परवर्ती विद्वानों ने ‘अष्टांगसंग्रह’ को छोड़कर ‘अष्टांगहृदय’ का समावेश कर डाला, जो कि इस ग्रन्थ की सर्वांगीण गुणवत्ता का ज्वलन्त प्रमाण है।
वास्तव में कालिदास के अनुसार—‘पुराणमित्येव न साधु सर्वं, नवीनमित्येव न चाप्यवद्यम्। सन्तः परीक्ष्यात्यतद्वद् भजन्ते मूढः परप्रत्ययनेयबुद्धिः’ ॥ (मालविका ११२) इसका आशय यह है कि पुरानी अथवा नयी सभी वस्तुएँ अपनी गुणवत्ता के कारण ही ग्राह्य एवं तद्विपरीत होने से त्याज्य होती हैं। ऐसा कोई मापदण्ड नहीं है कि पुरानी सभी वस्तुएँ अच्छी हों और नयी सभी वस्तुएँ अनुपादेय हों। तात्पर्य यह है कि अच्छी वस्तु अपने गुणों के प्रभाव से सबका मन आकर्षित कर ही लेती हैं। नारायणभट्ट ने अपने ‘प्रक्रियासर्वस्व’ ग्रन्थ में इस बात की प्रामाणिक चर्चा की है कि जिस विषय को पाणिनि ने कहा है, उसकी कमी को उसके परवर्ती वार्तिककार ने पूरा किया; उसमें जो कमी रह गयी थी उसे भाष्यकार पतञ्जलि ने तथा उसमें भी जो त्रुटि रह गयी थी उसे भोज आदि विद्वानों ने सुधारा-सँवारा। अतएव व्याकरण सम्प्रदाय में यह सिद्धान्त सुप्रसिद्ध है—‘यथोत्तरं मुनीनां प्रामाण्यम्’। आयुर्वेद के क्षेत्र में इसी प्रकार का प्रामाण्य महर्षि वाग्भट की कला का भी है।
भारतीय वाङ्मय में ‘वाग्भट’ का उल्लेख बहुत मिलता है। यथा—वृद्ध, मध्य, लघु तथा रसवाग्भट नामों से प्रायः चार वाग्भट प्रसिद्ध हैं। इनके अतिरिक्त भी अन्य साहित्यिक क्षेत्र में अनेक वाग्भट कृतिकार के रूप में पाये जाते हैं। हारीतसंहिता में आयुर्वेद के ये आचार्य बहुचर्चित हैं—‘चरकः सुश्रुतश्चैव वाग्भटश्च तथा परः। मुख्याश्च संहिता वाच्यास्तिस्र एव युगे युगे ॥ अत्रिः कृतयुगे वैद्यो द्वापरे सुश्रुतो मतः। कलौ वाग्भटनामा च गरिमात्र प्रदृश्यते’ ॥ महर्षि वाग्भट के वचनों का उल्लेख निश्चलकर ने चक्रदत्त ग्रन्थ की रत्नप्रभा व्याख्या में किया है। १३वीं शती के रसरत्नसमुच्चय के रचयिता वाग्भट को ही यहाँ ‘रसवाग्भट’ के नाम से स्मरण किया गया है, क्योंकि इनके पिता का नाम भी सिंहगुप्त था। पिता-पुत्र के नाम की समानता को आधार मानकर कुछ ऐतिहासिक विद्वान् अष्टांगहृदय तथा रसरत्नसमुच्चय के रचयिताओं को एक ही मानने का आग्रह करते हैं। इतना सब होने पर भी समय का अन्तराल दोनों को एक स्वीकार करने में बाधक सिद्ध होता है।
वृद्ध या प्रथम वाग्भट—ऐतिहासिकों की मान्यता के अनुसार इन्होंने पूर्ववर्ती आर्यसंहिताओं को अपने ग्रन्थ की आधारशिला बनाकर ‘अष्टांगसंग्रह संहिता’ की रचना की। उसके उत्तरस्थान अद्याप ५०।१३२-३३ में अपना संक्षिप्त परिचय भी दिया है। हमारे विचार से ये अपने जीवन के आरम्भ में वैदिक धर्मानुयायी थे और ‘अवलोकित’ नामक बौद्ध गुरु से दीक्षा लेने के बाद इनके विचारों में परिवर्तन आया, जिसका पूर्ण प्रभाव इनकी उत्कृष्ट रचना में परिलक्षित होता है। जहाँ बौद्धधर्म के अतिरिक्त वचनों का समावेश हुआ है, उसे आत्रेय आदि महर्षियों के वचनों का तथा इनके पूर्वश्रम का प्रभाव समझ लेना चाहिए। चिकित्सा-क्षेत्र का विषय ‘बहुजनहिताय बहुजनसुखाय’ होता है। इसमें धार्मिक प्रभाव बाधक नहीं होता। प्रस्तुत वाग्भट ने वैदिकधर्म के साथ बौद्धधर्म का समुचित समन्वय अपनी कृतियों में स्थापित किया है। ऐसा अन्यत्र भी देखा जाता है। अवलोकितेश्वर की मूर्तियाँ गुप्तकाल में अधिकाधिक मात्रा में मिली हैं। कालक्रम में अवलोकितेश्वर की मूर्ति की भुजाओं की संख्या में वृद्धि होती गयी। देखें—कलकत्ता संस्कृत सिरोज XII-8.37-38. इसी के अनुसार वाग्भट ने अवलोकितेश्वर की १२ भुजाओं का उल्लेख किया है। वाग्भट के इस संग्रह तथा हृदय में मन्त्रयान का रूप तो दृष्टिगोचर होता है किन्तु वज्रयान का नहीं। बौद्ध ग्रन्थों में आठ प्रकार की सिद्धियों का जो वर्णन मिलता है, उनका उल्लेख वाग्भट ने रसायन प्रकरण
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में अञ्जन, पादलेप, रस, रसायन के रूप में किया है। कोषकार अमरसिंह बौद्ध थे। उन्होंने अपने कोष में पहले सांकेतिक रूप से बुद्ध को प्रणाम कर शास्त्रीय मर्यादा का पालन मंगलाचरण के रूप में किया है। तदनन्तर स्वर्ग, गणदेवता, देवयोनि तथा दैत्यों के नामों का उल्लेख कर बाद में बुद्ध के नामों का परिगणन करते हुए इहाँ में जिनका भी समावेश किया है, वे अब भिन्न रूप में देखे जाते हैं।
चीनी यात्री इत्सिंग ( ६७१-६९५ ई० ) ने समस्त भारत में प्रसिद्ध 'अष्टांगहृदय' के प्रचार का उल्लेख किया है। इत्सिंग से पूर्ववर्ती वराहमिहिर ( ५०५-५८७ ई० ) के ज्योतिष सम्बन्धी सिद्धान्तों से हृदयकार प्रभावित थे। जैसा कि इन्होंने आत्रेय आदि को अपनी संहिता का जीवातु माना है, परन्तु इन्होंने दृढबल का उल्लेख कहीं भी नहीं किया, इससे लगता है कि इनके सामने चरकसंहिता का आदिम स्वरूप ही सुलभ था, न कि दृढबल द्वारा प्रतिसंस्कृत स्वरूप। इससे प्रतीत होता है कि दृढबल तथा प्रथम वाग्भट प्रायः समकालीन ही रहे होंगे अथवा दृढबल कुछ पूर्व रहे हों। बाह्य एवं आभ्यन्तर साक्ष्यों की समानता होने पर भी 'हृदय' से 'संग्रह' का कलेवर विशाल है। अतः परिनिरीक्षण करने के बाद हम इस निष्कर्ष पर पहुँचते हैं कि वाग्भट प्रथम का काल ५५० ई० मान लेना चाहिए। जैसा कि इतिहासकारों ने स्वीकार किया है, तदनुसार यहाँ तक प्रथम अथवा वृद्धवाग्भट की चर्चा की गयी है। अब इसके आगे 'अष्टांगहृदय' के रचयिता वाग्भट की चर्चा प्रस्तुत है।
साम्प्रदायिक स्वरूप —शास्त्र-रचना अथवा शास्त्र-चिन्तन के क्षेत्र में सभी वर्गों के विद्वानों के विचार साम्प्रदायिक भावों को छोड़कर तत्त्वचिन्तन की ओर अग्रसर देखे जाते हैं। कतिपय उदाहरण—नामलिंगानुशासन के रचयिता अमरसिंह की भाँति वाग्भट भी अपने क्षेत्र में सर्वमान्य एवं सुप्रसिद्ध हुए। बौद्ध जिनन्दबुद्धि ने अष्टाध्यायी की काशिकावृत्ति पर 'काशिकाविवरण पञ्जिकाचार्य' नामक व्याख्या लिखी है। व्याकरणशास्त्र के क्षेत्र में इसका पर्याप्त सम्मान है। वैसे भी लोक में इन्हें बुद्ध के समान सम्मान प्राप्त है। बौद्ध पुरुषोत्तमदेव कृत त्रिकाण्डशेष, भाषावृत्ति ( अष्टाध्यायी व्याख्या ) ग्रन्थों का सर्वत्र सम्भाव से आदर है। इन शास्त्रकारों का कहीं भी धर्म की ओर दुराग्रह परिलक्षित नहीं होता। क्योंकि शास्त्रचिन्तन में परम्परा कहीं भी बाधक नहीं होती। देखें—हर्षवर्धन शैव थे और राज्यवर्धन सौगत थे, जबकि ये दोनों सहोदर भाई थे। वास्तुपाल जैन थे। इन्होंने सोमनाथ की यात्रा की तथा अनेक शिव मन्दिरों की स्थापना की—ऐसा वर्णन अरिसिंह कृत 'सुकृतसंकीर्तनकाव्य' में मिलता है। श्रीकृष्णभक्त जयदेव ने गीतगोविन्द में 'केशवधृतबुद्धशरीर' कहकर उनकी स्तुति की है। रत्नावली में श्रीहर्ष ने 'शिव-पार्वती' की और नागानन्द नाटक में 'बुद्धो जिनः पातु बः' कहकर बुद्ध की वन्दना की है। इन सभी उद्धरणों को देखकर हम इस निष्कर्ष पर पहुँचते हैं कि उस काल में आज का जैसा कलह तथा मनोमालिन्यपूर्ण दुराग्रह नहीं था। यहाँ कारण था कि वाग्भट ने आयुर्वेद के निर्वचन में मध्यममार्ग का अनुसरण किया जिससे वाग्भट तथा उनकी कृति का विश्व में सर्वत्र समादर है।
अष्टांगहृदयकर्ता वाग्भट —संग्रह तथा हृदय के कर्ता वाग्भट 'इति ह स्माहुरात्रेयादयो महर्षयः' इस अंश में दोनों समान हैं। मंगलाचरण के पद्य का आरम्भ 'रागादिरोग' पद से भी दोनों समान हैं और उपर्युक्त उद्धरण के अनुसार दोनों द्वारा ग्रथित ग्रन्थों में चरक-सुश्रुतानुयायित्व भी समान है। अधिक क्या कहें 'संग्रह' के अनेक अविकल पद्य 'हृदय' में सुलभ हैं। इन दृष्टियों से संग्रह एवं हृदय के रचयिताओं को एक मान लेना चाहिए। इसके समर्थन में हम नागपुर निवासी वैद्य श्रीगोवर्धनशर्मा छागाणी द्वारा लिखित अष्टांगसंग्रह सूत्रस्थान की भूमिका से कुछ अंश साभार उद्धृत कर रहे हैं—
'स्वर्गीय ज्योतिषचन्द्र सरस्वती ने भी अष्टांगहृदय उत्तरस्थान ( शिवदास सेन टीका ) के सम्पादकीय उपोद्घात में अष्टाङ्गसंग्रह और हृदय के कर्ता भिन्न-भिन्न माने हैं। इसमें आधार केवल संग्रह से हृदय की कुछ स्थानों में मत भिन्नता बतायी है। इस भिन्नता में संग्रह का मत तो दे ही दिया है परन्तु उसमें थोड़ा-सा
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सुश्रुतादि के अनुसार आगे और कुछ जोड़ा है जो कि संग्रह के रचनाकाल में छूट गया था। केवल इसी कारण को लेकर अष्टाङ्गसंग्रह और अष्टाङ्गहृदय के कर्ता भिन्न नहीं हो सकते। अष्टाङ्गसंग्रह की रचना पहले की है। उसके अनन्तर लिखे गये अष्टाङ्गहृदय में वही ग्रन्थकार छूटे हुए विषय को ले सकता है।
महामहोपाध्याय स्वर्गीय गणनाथसेन सरस्वती एवं श्रद्धेय यादवजी आचार्य ने स्पष्ट कर दिया है कि प्रस्तुत ग्रन्थ-द्वय के सर्वत्र भाषा-सादृश्य तथा पिता-पितामह का एक नाम आदि होने से संग्रह एवं हृदय के भिन्न-भिन्न कर्ता मानना यह बड़ी भूल की बात है। सारांश यह है कि अष्टाङ्गसंग्रह और अष्टाङ्गहृदय का कर्ता वास्तव में एक ही वाग्भट है।
इन्हीं तथ्यों से आश्चर्य अष्टांगसंग्रह के व्याख्याकार तथा वाग्भट के शिष्य श्री इन्दु ने अपने द्वारा किये गये मङ्गलाचरण 'वृत्त्यारव्याविषयसुतस्य वाग्भटस्यास्मदुक्तयः' में तथा व्याख्या 'सोऽयं वाग्भटनामा शास्त्रकारः' में कहीं भी वृद्ध, प्रथम, मध्य अथवा लघु विशेषणों का प्रयोग इनके नाम के पूर्व नहीं किया है। इन्होंने केवल सिंहगुप्तसुतु वाग्भट कहा है। इनकी दृष्टि से भी दोनों (संग्रह तथा हृदय) के कर्ता वाग्भट एक ही थे। उक्त मत के समर्थन में अष्टांगहृदय के रचयिता की निम्न सूक्तियों का अवलोकन तथा मनन करें और इनकी व्याख्या यथास्थान देखें—
तेभ्योऽति विप्रकीर्णभ्यः प्रायः सारतरोच्यवः। क्रियतेऽष्टाङ्गहृदयं नातिसङ्क्षेपवित्तरम्॥ (अ.हृ.सू. १।४) अष्टाङ्गवैद्यकमहोदधिमन्यनेन योऽष्टाङ्गसङ्ग्रहमहामुत्तराशिराप्तः। तस्मान्दण्पफलमल्पसमुद्यमानां प्रीत्यर्थमेतदुदितं पृथगेव तन्त्रम्॥ (अ.हृ.उ. ४०।८०)
ग्रन्थकारों की व्यास एवं समास पद्धति—प्राचीनकाल में ऐसे अनेक उदाहरण पाये जाते हैं, जहाँ एक ही ग्रन्थकार ने एक ही विषय की व्यास एवं समास पद्धति से रचनाएँ की हैं; यथा—भट्टोजिदीक्षित के पौत्र तथा नागेशभट्ट के विद्यागुरु श्री हरिदीक्षित ने बृहच्छब्दरत्न तथा लघुशब्दरत्न की रचना की थी। इसी का प्रभाव था कि उनके शिष्य आचार्य नागेशभट्ट ने व्याकरण विषय के अनेक ग्रन्थ लिखे; यथा—बृहच्छब्देन्दुशेखर तथा लघुशब्देन्दुशेखर, मञ्जूषा, लघुमञ्जूषा, परमलघुमञ्जूषा। जयपुर के राजा सवाई जयसिंह (१६८८-१७२८ ई०) का काल तथा श्रीनागेशभट्ट का काल समान ही था।
नामनिर्धारण परम्परा—प्रायः प्राचीनकाल में पितामह का ही नाम पौत्र का भी रखा जाता था। देखें—नीलकण्ठ दीक्षित विरचित 'गंगावतरणम्' की भूमिका, काव्यमाला गुच्छक ७६ पृष्ठ १२, निर्णय-सागर प्रेस से १९१६ में प्रकाशित—'विदितमेव है सर्वेषामस्माकमस्मद्देशीयाः प्रायशो विभ्रति पितामहानां नाम; यथा—आचार्य दीक्षितः,—आचार्य दीक्षित पौत्रः'। इस प्रकार की यह नाम निर्धारण परम्परा कहीं-कहीं थी और कब से चली आयी है, यह भी एक गवेषणीय विषय है, जिसका प्रभाव 'वाग्भट' नाम पर भी परिलक्षित होता है। देखें—'भिषग्वरो वाग्भट इत्यभून्मे पितामहः'। (अ.सं.उ. ५०।२०३)
अष्टाङ्गहृदय का कलेवर—'कायबालग्रहोर्ध्वज्ज्ञशत्यवैष्ण्वजरावृषान्। अष्टावङ्गानि'। (अ.हृ.सू. १।५) के अनुसार आयुर्वेद के आठ अंग ये हैं—१. कायचिकित्सातन्त्र, २. बाल (कौमारभृत्य) तन्त्र, ३. ग्रहचिकित्सा (भूतविद्या) तन्त्र, ४. ऊर्ध्वगचिकित्सा (शालाक्य) तन्त्र, ५. शत्यचिकित्सा (शल्यतन्त्र), ६. वैष्ण्व विषचिकित्सा (अगदतन्त्र), ७. जराचिकित्सा (रसायनतन्त्र) तथा ८. वृषचिकित्सा (वाजीकरणतन्त्र)। यद्यपि उक्त सभी अंगों में कायचिकित्सा एक ऐसा अंग है, जो सम्पूर्ण काय से सम्बन्ध रखता है, अतएव इससे सभी अंग प्रभावित हो जाते हैं, फिर भी अन्य अंगों की सत्ता अपने-अपने स्थान पर विशेष महत्त्व रखती ही है, तथापि कायचिकित्सा अंग को सबमें प्रधान माना जाता है। इन्होंने भी सुश्रुत की भांति अपने ग्रन्थ (अष्टाङ्गहृदय) को ६ स्थानों में विभाजित किया है।
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वाग्भट की प्रतिज्ञा—वैयाकरण सम्प्रदाय में यह प्रतिज्ञा प्रसिद्ध है कि ‘एकमात्रात्माद्यवेन पुत्रोत्सवं मन्यन्ते वैय्यकरणः।’ ऐसा लगता है कि अपने ग्रन्थ रचनाकाल में वाग्भट उक्त सूक्ति से प्रभावित थे। अतएव उन्होंने भी ‘न मात्रात्रामत्रमप्यत्र किञ्चिदागमवर्जितम्’ (अ.सं.सू. ११२०) एक ऐसी प्रतिज्ञा की, जिससे ग्रन्थ की प्रामाणिकता सिद्ध होती है। उक्त सूक्ति का आशय इस प्रकार है—इस सम्पूर्ण ग्रन्थ में शब्द अथवा वाक्य की बात तो कौन कहे, एक मात्रा भी शास्त्रों के विपरीत नहीं है। इसके अतिरिक्त भी इन्होंने अपने ग्रन्थ की प्रामाणिकता को सिद्ध करने के उद्देश्य से प्रत्येक अध्याय के आरम्भ में लिखा है—‘इति ह स्मार्हुरात्रेयादयो महर्षयः।’
आयुर्वेद के प्रति दृढ़ निष्ठा—वाग्भट कुलक्रमगत अधीतविद्य वैद्य एवं अनेक विषयों के उद्भट विद्वान् थे, अतएव वे आयुर्वेद के प्रति स्वयं भी अत्यन्त निष्ठावान् थे। यही कारण था कि उन्होंने सम्पूर्ण समाज को यह सन्देश दिया है—‘आयुर्वेदोपदेशेषु विधेयः परमादरः’ (अ.सं.सू. ११३ तथा अ.हृ.सू. ११२) अर्थात् धर्म, अर्थ, सुख (काम) नामक तीन पुरुषार्थों की प्राप्ति सुखायु से होती है। अतः इनकी इच्छा रखने वाले पुरुषों को आयुर्वेद के विश्वजननी उपदेशों का पालन अत्यन्त आदर के साथ सदैव करते रहना चाहिए।
धन्वन्तरि अवतार की कल्पना—‘सरलसमुच्चय’ ग्रन्थ की भूमिका में श्रीकृष्णराव शर्मा लिखते हैं—शल्यचिकित्सा के आदिदेव भगवान् धन्वन्तरि का ‘वाग्भट’ नाम से पुनः कलियुग में अवतार हुआ, इस बात को सिद्ध करने के लिए और उनकी पीयूषपाणित्व शक्ति को दिखाने के लिए ही अष्टाङ्गसंग्रहकर्ता वृद्धवाग्भट ने अपने प्राणहरण के बिना हृदय (अष्टांगहृदय) को सजीव अलग कर दिया, अर्थात् उन्होंने अपने इस उत्तिक्रैच्यय से ‘वाग्भट’ शल्यचिकित्सा विशेषज्ञ थे, यह विद्वानों को दिखाया। उक्त विषय को इस प्रकार समर्थ—‘अष्टांगसंग्रह’ सर्वावयव पूर्ण आयुर्वेद का शरीरस्वरूप है और ‘अष्टांगहृदय’ उसके महत्त्वपूर्ण विषयों का सारभूत ‘हृदय’ है। शल्यकर्म विशेषज्ञ वाग्भट ने ‘शरीर’ तथा ‘हृदय’ दोनों को अलग करके भी दोनों को जीवित रखा है, यह इनका वैशिष्ट्य है। वास्तव में यह वाग्भट का आलंकारिक परिचय है।
ग्रन्थरचना-कौशल—सरस्वती के वरदपुत्र वाग्भट द्वारा विरचित ‘अष्टांगहृदय’ की समृद्ध काव्य-सम्पदा से यह सुविदित है कि ये आयुर्वेदीय समस्त अंगों के ज्ञाता होने के साथ-ही-साथ सुकवि भी थे तथा साहित्यशास्त्र पारावारपारीण भी थे। जो इनके छन्द, रस, गुण, अलंकार आदि से परिपूर्ण प्रस्तुत काव्य-सम्पत्ति से प्रमाणित होता है। एतदर्थ आचार्य दण्डी कृत महाकाव्य-लक्षण का अवलोकन करें—
‘सर्वत्र भिन्नवृत्तान्तेरपेतं लोकरञ्जकम्।
काव्यं कल्पान्तरस्यापि जायते सदलङ्कृतिं ॥ (काव्यादर्श ११९)
छन्दःसन्दोह प्रयोग कौशल—आचार्य क्षेमेन्द्र ने अपने ‘मुनुवृत्तिलक’ में उन कवियों को दरिद्र कहा है, जिन्होंने अपने काव्य की रचना एक ही छन्द द्वारा पूर्ण की है, क्योंकि छन्दःप्रयोग में स्वच्छन्द कवि समवृत्त, अर्धसमवृत्त तथा मात्रावृत्त के प्रयोगों में पूर्ण स्वतन्त्र होते हैं। इसी प्रकार के कवियों में वाग्भट भी अन्यतम हैं। इन्होंने पाठकों के मनोविनोद के लिए वृत्तिमधुर विभिन्न छन्दों का स्थान-स्थान में प्रयोग किया है। कहीं-कहीं तो श्लेष अलंकार का सहारा लेकर स्वागता, पुष्पिताग्रा, पृथ्वी, शार्दूलविक्रीडित, द्रुतविलम्बित आदि छन्दों को मुद्रालंकार से अलंकृत किया है। यह कवि एवं कविराज वाग्भट का शास्त्र एवं काव्य-कौशल है।
मुद्रालंकार परिचय—‘सूक्ष्मार्थसूचनं मुद्रा प्रकृतार्थपरैः पदैः।
नितम्बगुर्वी तरणी द्रुममुमविपुला च सा’ ॥ (कुवल्लयानन्द)
अर्थात् जिस छन्द में उस छन्द का नाम सार्थक रूप से श्लेषप्रतिभा द्वारा प्रयुक्त किया गया हो, उसे ‘मुद्रा’ अलंकार कहते हैं। यहाँ अनुष्टुप् छन्द के भेदों में परिगणित ‘युम्मविपुला’ छन्द का द्वयर्थक
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प्रयोग किया गया है। इस प्रकार के काव्यकौशल का प्रयोग वाग्भट ने अनेक स्थानों पर किया है। कतिपय अन्य उदाहरण भी देखें—
१. हिङ्गुग्राविङ्गुण्ठजजिजिजयावाटचाभिधानामयै-
शृणुः कुम्मनिकुम्ममूलसहितैर्भागोत्तरं वर्धितैः।
पीतः कोण्णजलेन कोण्णजर्जुगे गुल्मीदरादीनयं
शार्दूलः प्रसभं प्रमथ्य हरति व्याधीन् मुगौधानिव ॥ (अ.हू.चि. १४३६)
उक्त 'शार्दूलविक्रीडित' छन्द के चतुर्थ चरण में द्वयर्थक 'शार्दूल' शब्द का प्रयोग अपने विविध अर्थों को प्रकट कर रहा है।
२. 'सहचरं सुरदारं सनागरं क्वथितमम्भसि तैलविमिश्रितम्।
पवनपीडितेदेहगतिः पिबेत् द्रुतबिलम्बितगो भवतीच्छ्या' ॥ (वही, २१।५५)
इस पद्य में आया हुआ 'द्रुतबिलम्बित' पद छन्द तथा अपने प्रसंगोचित महत्त्वपूर्ण अर्थ का भी बोध करा रहा है।
३. 'बीजकस्य रसमङ्गुलिहार्यं शर्करां मधु घृतं त्रिफलां च।
शीलयत्सु पुरुषेषु जरत्ता स्वागताऽपि विनिवर्तत एव' ॥ (अ.हू.उ. २९।५५३)
इस पद्य में प्रयुक्त 'स्वागता' पद छन्द एवं अपने अर्थ का विशिष्ट सूचक भी है।
४. 'मधु मुखमिव सोत्पलं प्रियायाः कलरणना परिवादिनीं प्रियेव।
कुसुमचयमनोरमा च शभ्या किसलयिनीं लतिकेव पुष्पिताग्रा' ॥ (वही, ४०।४६)
यहाँ श्लेषप्रतिभोत्पापित पुष्पिताग्रा का एक प्राकराणिक अर्थ है और दूसरा है छन्द नाम। यह अधिसमवृत्त का उदाहरण है।
आचार्य वाग्भट की यहाँ प्रवृत्ति अष्टांगसंग्रह के रचना काल में भी रही है। देखिये—पृथ्वीवृत्त का उदाहरण अ.सं.उ. ४९।३७९-३८० में। प्रायः वृत्तरत्नाकर, छन्दोमञ्जरी, सूवृत्ततिलक आदि के सभी छन्दों के उदाहरण वाग्भट की रचनाओं में सुलभ हैं। अतः कतिपय विशिष्ट छन्दः प्रयोगों को ऊपर दे दिया गया है।
वाग्भट द्वारा प्रयुक्त छन्द—यहाँ हम अकारादि क्रम से छन्दों के नामों का उल्लेख कर रहे हैं। यदि आप इनको देखना चाहें तो सम्पूर्ण अष्टाङ्गहृदय पर लिखी गयी अरुणदत्त की टीका का अवलोकन करें। छन्द नाम—१. अनुष्टुप्, २. आर्या, ३. आर्यागीति, ४. आर्याजघनचपला, ५. आर्याविपुला, ६. इन्द्रवज्रा, ७. उदगीतार्या, ८. उपचित्रा, ९. उपजाति, १०. उपेन्द्रवज्रा, ११. औपच्छन्दसिक, १२. कुसुमितलता, १३. गीति, १४. गीतिसमुखचपला, १५. तोटक, १६. दण्डकोऽण्णस्य; १७. दण्डको व्यालाख्यः, १८. दोधक, १९. द्रुतविलम्बित, २०. धीरललिता, २१. नर्कुटक, २२. पुष्पिताग्रा, २३. पृथ्वी, २४. प्रहरिणी, २५. भद्रा, २६. मत्तमयूर, २७. मन्दाक्रान्ता, २८. मात्रासमक, २९. मालिनी, ३०. मुखचपला, ३१. रथोद्वता, ३२. वसन्त-तिलका, ३३. वंशस्थ, ३४. विपुला, ३५. वैतालौय, ३६. वैश्वदेवी, ३७. शार्दूलविक्रीडित, ३८. शालिनी, ३९. शुद्धविराट, ४०. प्रमघरा, ४१. स्वागता, ४२. हरिणी। इनमें १६ वें तथा १७ वें दो गद्य छन्द हैं।
अलंकार परिचय—वाग्भट की प्रस्तुत रचना में वृत्त्यनुप्रास, छेकानुप्रास, यमक आदि शब्दालंकारों के अनेक उदाहरण अनायास उपलब्ध होते हैं। उन्हें आप निम्न सन्दर्भ सेकतो के अनुसार स्वयं देखने का प्रयत्न करें—हू.सू. ३।३५; ३।५१; १४।३५; २७।१।हू.नि. ७।२५; १०।१३।हू.चि. १८।३२; १९।७; १९।१७; १९।३२।हू.उ. २।३६; ७।२३; २१।३६; ३९।८०; ३९।१२७ आदि।
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रचना-वैशिष्ट्य —वागभट की रचना में स्थल-विशेष पर उनके काव्यगत प्रसाद, सुकुमार, माधुर्य आदि जो विशिष्ट गुण देखे गये हैं, उनमें से कतिपय स्थलों के संक्षिप्त संकेत सूत्र यहीं दिये जा रहे हैं, तदनुसार आप साहित्यसुधा का रसास्वादन करें। मद्यपान विधि का वर्णन देखें—अ.हू.चि. ७।७५ से ९० तक तथा अ.हू.उ. ४०।४९-४७।
पुत्रसुख का माहात्म्य —वागभट ने आलंकारिक शब्दशय्या द्वारा पुत्र का वर्णन इस प्रकार किया है—
‘स्वलद् गमनमव्यक्तवचनं धूलिधुरारम्। अपि लालाविलमूखं हृदयाह्लादकारकम्।
अपत्यं तुल्यतां केन दर्शनस्पशनादिषु। किं पुनर्वद यशोधर्मानश्रीकुलवर्धनम्॥
(अ.हू.उ. ४०।१०-११)
ऐसा लगता है कि पुत्र का वर्णन करते समय वागभट कालिदासीय निम्न पद्य से प्रभावित थे—
‘आलक्ष्य दन्तमुकुलाननिमित्तहासै-
रव्यक्तवर्णरमणीयवचःप्रवृत्तीन् ।
अङ्गाश्रयप्रणयिनस्तनयान् वहन्तो
धन्यास्तदङ्करजसा मलिनीभवन्ति’॥
(अ.शा. ७।१७)
वागभट की विशेषता —इन्होंने ‘इति ह स्माहुरात्रेयादयो महर्षयः’ इस प्रतिज्ञा का परिपालन करते हुए आत्रेय आदि के विचारों, सिद्धान्तों, चिकित्साविधियों तथा अपने सभी पूर्ववर्ती आचार्यों (ब्रह्मा, अश्विनीकुमार, वसिष्ठ, मार्गव, अगस्त्य, भेड(ल), हारीत, वृद्धकाश्यप, काश्यप, अश्विवेश, आत्रेय पुनर्वसु, धन्वन्तरि, शौनक, निर्मि, विदेहाधिपति, जिन, माणभद्र आदि) द्वारा कहे गये औषध योगों का अपने तन्त्र में संग्रह किया है। इनके इस रचनाकौशल को देखकर यह निःसंकोच कहा जा सकता है कि ऐसी विषय-सम्पदा इसके पूर्ववर्ती किसी दूसरे ग्रन्थ में दुर्लभ है। अतएव सूक्तिकारों ने ‘सूत्रस्थाने तु वागभटः’ कहकर इसकी प्रशंसा की है। दूसरे आचार्यों ने ‘कलौ वागभटनामा च’ कहकर आयुर्वेद जगत् में इसी का एकमात्र साम्राज्य स्वीकार किया है। सुना जाता है कि इसके अतिरिक्त इन्होंने ‘अष्टाङ्गनिघण्टु’ तथा ‘अष्टाङ्गवतार’ नामक दो अन्य ग्रन्थों की भी रचना की थी। इस विषय में अन्य विद्वान् सहमत नहीं हैं। ‘अष्टांगनिघण्टु’ की हस्तलिखित पाण्डुलिपियाँ ओरियण्टल लायब्रेरी मद्रास में तथा तज्ञौर ग्रन्थ संग्रहालय में हैं जो आज तक प्रकाशित नहीं हो सकीं।
वागभट सम्बन्धी किंवदन्ती —प्राचीनकाल से प्रचलित किंवदन्तियों का ऐतिहासिक क्षेत्र में महत्त्वपूर्ण स्थान होता है। तदनुसार सुना जाता है कि एक बार भगवान् धन्वन्तरि ‘कलियुग के कुप्रभाव से पीड़ित मनुष्य किस प्रकार नौरोग हो’—इस शुभकामना से वे अत्यन्त मनोहर पक्षी का रूप धारण कर उस समय में सुप्रसिद्ध वैद्यों के प्रत्येक घर के पास जाकर ‘कोऽरुक्, कोऽरुक्, कोऽरुक्’ इन तीन प्रश्नों को पूछते थे। उत्तर न मिलने पर वे एक घर से दूसरे घर में चले जाते थे। इस प्रकार एक दिन सिन्धुप्रदेश में स्थित वैद्यराज वागभट के आँगन के समीप स्थित खिले हुए वृक्ष की शाखा पर बैठकर फिर इन्होंने वे ही तीन प्रश्न पूछे। उस समय श्री वागभट रोगियों की चिकित्सा करने में व्यस्त थे, फिर भी उनका ध्यान उस पक्षी की स्पष्ट, श्रुतिमधुर तथा परोपकार प्रेरित गम्भीर अर्थ वाली वाणी को सुनकर और उस पक्षी के अत्यन्त सुन्दर रूप से प्रभावित होकर साथ ही उसे अलौकिक पक्षी समझकर इन्होंने सादर पके हुए फल एवं जल उसे समर्पित किये, किन्तु ग्रहण किये बिना उस पक्षी ने पुनः उन्हीं प्रश्नों को दुहराया। तब वागभट ने सोचा—यह पक्षी जब तक अपने प्रश्नों का उत्तर नहीं पायेगा, तब तक यह खायेगा-पीयेगा नहीं। यह निश्चय करके वागभट ने उसके उन प्रश्नों का उसी शैली में शास्त्रसम्मत उत्तर इस प्रकार दिया—‘हितभूक् मितभूक् अशाकभूक्’। वागभट के इन उत्तरों को सुनकर इनके द्वारा समर्पित फल-जल का सेवनकर प्रसन्न होकर उस पक्षी ने कहा—‘मैं सुयोग्य वैद्य की परीक्षा के लिए पक्षी का रूप धारण कर
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भारतवर्ष में घूमता हुआ यहाँ आया है। मैं तुम्हारे इस आयुर्वेदीय ज्ञान से अत्यन्त प्रसन्न हूँ। तुम अष्टांग आयुर्वेद की रचना करो। ऐसा कहकर वह पृथ्वी अन्तर्धान हो गया। उसके पश्चात् ही इन्होंने अपने इन ग्रन्थरत्नों की रचना की। यह किंवदन्ती निरकाल से 'वाग्भट' के साथ अनुस्यूत है।
परवर्ती कतिपय ग्रन्थकार एवं ग्रन्थ— 'कल्याणकारक'—इसकी रचना आचार्य उग्रादित्य ने की। ये जैन धर्मानुयायी थे, अतएव इन्होंने अपनी धर्मपरम्परा के अनुस्यू चरकोक्त 'माधुतैलिकबस्ति' के स्थान पर 'गौडतैलिकबस्ति' का विधान किया, क्योंकि जैन सम्प्रदाय के आचार्य प्राणिज द्रव्य (मधु) का प्रयोग नहीं करते।
योगशतक —इस ग्रन्थ के रचयिता श्री नागार्जुन हैं। अलबहूनी ने अपनी यात्रा के प्रसंग में जिस नागार्जुन का उल्लेख किया है, वे ८वीं अथवा ९वीं शती के आचार्य थे, न कि ये सुश्रुतसंहिता के प्रतिसंस्कर्ता थे। इन्होंने अपने ग्रन्थ में अनेक पद्य 'अष्टांगहृदय' से लिये हैं। अतः निश्चित रूप से यह वाग्भट से परवर्ती रचना है। इसमें आयुर्वेद के ८ अंगों के विवरण के अतिरिक्त उत्तररत्न भी दिया है। वरश्चि द्वारा लिखित 'योगशतक' इससे भिन्न है।
सिद्धसारसंहिता —इसके कृतिकार दुर्गुप्तात्माज 'रविगुप्त' हैं। ये बौद्धधर्मावलम्बी थे। १०वीं शती में वर्तमान चन्द्र ने अपनी रचनाओं में 'सिद्धसारसंहिता' के अनेक स्थलों को उद्धृत किया है। उक्त संहिता के रचयिता ९वीं शती में विद्यमान थे। यह ग्रन्थ अद्यावधि अप्रकाशित है। इसकी तीन पाण्डुलिपियाँ नेपाल सरकार के पुस्तकागार काठमाण्डू में सुरक्षित हैं।
हृदय के टीकाकार —अकोला निवासी हरिशास्त्री पराडकर वैद्य ने अष्टांगहृदय के 'वाग्भटविमर्श' में ३४ व्याख्याओं तथा २३ व्याख्याकारों के नाम दिये हैं। जिनमें श्री अरुणदत्त द्वारा रचित सर्वांगसुन्दरा व्याख्या सम्पूर्ण तथा श्री हेमाद्रि द्वारा रचित आयुर्वेदरसायना व्याख्या अपूर्ण है, जिसके शेष अंश अद्यावधि प्राप्त नहीं हुए हैं। वाग्भट संहिता अपने गुणों से सर्वत्र सम्मानित है, अतएव प्रायः सभी भाषाओं में इसके अनुवाद सुलभ हैं।
वाग्भट के व्याख्याकार अरुणदत्त —श्रीमुगांकदत्त पुत्र के श्री अरुणदत्त ने अष्टांगहृदय की 'सर्वांगसुन्दरा' नामक व्याख्या लिखी है। अन्य टीकाओं की तुलना में यह महत्त्वपूर्ण है। इन्होंने इसमें यथासम्भव पदों के अर्थ दिये हैं। शंकायुक्त स्थलों का समाधान किया है। प्रायः छन्दों के नाम-निर्देश तथा उनके लक्षण दिये हैं। विषय का समर्थन करने के लिए प्राचीन आयुर्वेदीय शास्त्रों के उद्धरण उद्धृत किये हैं, साथ में उनके ठीक-ठीक सन्दर्भ-संकेत भी दिये हैं। आवश्यकतानुसार यत्र-तत्र छन्द, व्याकरण आदि का परिचय भी दिया है। यद्यपि अरुणदत्त नामक अनेक विद्वान् हुए हैं तथापि अष्टांगहृदय के व्याख्याकार मुगांकदत्त के पुत्र अरुणदत्त ही हैं, जैसा कि इन्होंने ग्रन्थारम्भ की व्याख्या के तृतीय पद्य में कहा है—
श्रीमन्मुगाङ्कृतनयष्टीकामष्टाङ्गहृदयस्य । श्रीमानरुणः कुर्वते सम्यग्दृष्टः पदार्थबोधाय ॥ १ ॥
वाग्भट के व्याख्याकार हेमाद्रि —देवगिरि निवासी महाराजाधिराज महादेव के पुत्र श्रीरामदेव के शासन काल में हेमाद्रि ने 'चतुर्वर्गीचिन्तामणि' नामक ग्रन्थ की रचना की। इन्होंने ही इसके बाद 'अष्टांगहृदय' पर टीका की। प्राचीनकाल में पण्डितों की प्रतिभा बहुमुखी देखी जाती थी। आज 'हृदय' में जो इनकी टीका देखी जाती है, वह केवल अष्टांगहृदय के सूत्रस्थान तथा कल्पसिद्धि स्थानों पर ही है, अन्यत्र नहीं। इनकी टीका का नाम 'आयुर्वेदरसायना' है।
विशेष —हेमाद्रि ने अपनी व्याख्या द्वारा अष्टांगहृदय में निर्दिष्ट विषयों का अपनी योग्यतानुसार अत्यन्त सूक्ष्म विवेचन प्रस्तुत किया है। अनेक स्थानों पर इन्होंने अरुणदत्त की व्याख्या का खण्डन करके अपने मत की बुद्धिपूर्वक स्थापना की है और कहीं-कहीं तो इन्होंने अरुणदत्त की व्याख्या से भी विरुत्त
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विवरण उपस्थापित किया है। ऐसे अवसरों को चरक ने 'बुद्धेविशेषपस्तत्रासीत्' कहा है। सच तो यह है— 'विद्या गुरुणां गुरुः'।
पाठभेद तथा प्रक्षिप्त पद्य—वैदिक वाङ्मय को छोड़कर परवर्ती सभी प्रकार के साहित्य में पाठभेदों तथा प्रक्षिप्त गद्यों तथा पद्यों की भरमार देखी जाती है। तद्विद्य विद्वान् भी प्रसंगोचित पाठभेद को देखकर उसके समर्थक हो जाते हैं। 'इदम् इत्थम्' ( यह ऐसा ही है ) की कोई कसीटी उनके पास भी नहीं होती। प्रस्तुत 'हृदय' की व्याख्या करते समय मैंने निर्णयसागरीय प्रति को अपने ग्रन्थ का मूल आधार माना है। उसमें भी जहाँ-जहाँ स्वल्म थे, उनको 'यथाबुद्धिबलोदय' ठीक करने का प्रयास किया है। फिर भी अनेक स्थानों पर ऐसा अनुभव हुआ है कि जो पाठ मूल में ( ऊपर ) होना चाहिए था वह पाठ नीचे टिप्पणी में दिया गया है। ऐसे पाठनिर्णयकों को मेषदूत के व्याख्याकार पूर्णसरस्वती ने इस प्रकार आड़े हाथों लिया है। देखें—
'सुकविवचसि पाठानन्यथाकृत्य मोहाद् रसगतिमवधूय प्रौढमर्थं विहाय। विबुधवरसमाजे व्याक्रियाकामुकानां गुरुकुलविमुखानां धृष्टताये नमोऽस्तु'॥
टीकाकारों की आलोचना—धारानगरी के सुप्रसिद्ध भोजराज ऐसे अधिकांश टीकाकारों की आलोचना करते हुए कहते हैं—जो पाठ उनकी समझ में नहीं आता, उसे 'इति स्पष्टम्' लिखकर छोड़ देते हैं और जो पाठ स्वयं स्पष्ट है, उसकी निरर्थक समास, विग्रह आदि द्वारा विस्तार से व्याख्या कर दिया करते हैं। इनके अतिरिक्त जहाँ आवश्यकता नहीं है, वहाँ अनुपयोगी विषयों को डालकर पढ़ने तथा सुनने वालों के मन में प्रायः सभी टीकाकार भ्रम उत्पन्न कर देते हैं। यथा—
'दुर्बोधं यदतीव तद्विजहति स्पष्टार्थमित्युक्तिभिः स्पष्टार्थेष्विति विस्तृति विदधति व्यर्थः समासादिभिः। अस्थानेऽनुपयोगिभिश्च बहुभिर्जल्पैर्भ्रमं तन्वते श्रोतृणांमितिवाक्यविप्लवकृतः सर्वेऽपि टीकाकृतः॥ ( भोजराजकृत राजमार्तण्ड )
यद्यपि प्रस्तुत ग्रन्थ के श्रीअरुणदत्त एवं श्रीहेमाद्रि आयुर्वेद जगत् में स्वनाम धन्य प्राचीन व्याख्याकार हैं, तथापि 'दुर्बोधं यदतीव तद्विजहति' के अनेक उदाहरण इनकी टीकाओं में देखने को मिलते हैं, फिर भी उनकी योग्यता के सामने हम नतमस्तक हैं।
अष्टांगहृदय का कलेवर—निर्णयसागरीय अरुणदत्त तथा हेमाद्रि व्याख्या समूलस्तित अष्टांगहृदय की भूमिका की नवीं सूची में इसका उल्लेख विस्तार के साथ किया गया है। तदनुसार इसकी कुल स्थान संख्या ६, अध्याय संख्या १२० तथा श्लोक संख्या प्रायः ७४७ है।
'कीर्तिरक्षरसम्बद्धा स्थिरा भवति भूतले' इस सूक्ति के अनुसार विद्वान् लेखकों की कृतियों ही उन्हें सुदीर्घ काल तक जीवित रखने तथा यशस्वी बनाने में सहायक होती हैं। अतएव विद्वज्जन इस कार्य की ओर प्रवृत्त होते हैं। इसमें भी प्रकाशकों का महत्त्वपूर्ण योगदान होता है। वे न केवल ग्रन्थ के प्रकाशक होते हैं, अपितु ग्रन्थकार के भी प्रकाशक होते हैं। अन्यथा इनके अभाव में उत्तमोत्तम ग्रन्थों को दीमक चाट जाती है अथवा उन्हें प्राचीन ग्रन्थागारों की कारावास में शरण लेनी पड़ती है।
प्रस्तुत व्याख्या की विशेषता—अष्टांगसंग्रह की विस्तार से रचना करने के बाद जब वाग्भट ने साररूप 'हृदय' की रचना की तो विषयों को संक्षेप में उपस्थित करना आवश्यक हो गया था। व्यास-संक्षेप रचनाचतुर वाग्भट ने इस ग्रन्थ से सम्बन्धित विषयों की पूर्ति कैसे और कहाँ से की होगी, इसका ध्यान रखते हुए सम्पूर्ण ग्रन्थ में जहाँ-जहाँ जो संकेत दिये हैं, उन्हें व्याख्याकाल में सन्दर्भ-संकेत देकर अधिक स्पष्ट कर दिया गया है। इनकी सहायता से विज्ञ पाठक उन विषयों को यथास्थान सरलता से हूँद लेगा। साथ ही स्थान-स्थान पर 'अष्टांगहृदय' के दुरुह विषयों को स्पष्ट करने की दृष्टि से जिन-जिन विषयों को ग्रन्थान्तरों से लिया गया है, उनके भी सन्दर्भ-संकेत यथास्थान दे दिये हैं। मूल ग्रन्थ की टीका के
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अन्त में वक्तव्य तथा विशेष वचन दिये गये हैं, जो ग्रन्थ के आशय को स्पष्ट करने में सहायक होंगे। यद्यपि 'अष्टांगहृदय' में ग्रन्थकार ने तन्त्रयुक्तियों का उल्लेख नहीं किया है जिसका अष्टांगसंग्रह में उल्लेख हुआ है। अतः उनका परिगणन मात्र हमने यथाश्रम अपने वक्तव्य में कर दिया है। औषधनिर्माण प्रसंग में जहाँ-जहाँ आवश्यक समझा गया वहाँ-वहाँ औषध द्रव्य परिमाण तथा उसके निर्माण-विधि का भी उल्लेख कर दिया गया है। प्रस्तुत 'निर्मला' व्याख्या की ये विशेषताएँ हैं।
अष्टांगहृदय एक संग्रह-ग्रन्थ है। इसमें चरक, सुश्रुत, अष्टांगसंग्रह के तथा अन्य अनेक प्राचीन आयुर्वेदीय ग्रन्थों से उद्धरण लिये गये हैं। वाग्भट ने अपने विवेक से अनेक प्रसंगोचित विषयों का प्रस्तुत ग्रन्थ में समावेश किया है, यही कारण है कि इस ग्रन्थ का रूप अद्यतन बन पड़ा है। चरक आदि प्राचीन तन्त्रकारों ने जिन विषयों का सामान्य रूप से वर्णन किया था, उन्हें वाग्भट ने प्रमुख रूप देकर पाठकों का इस और विशेष ध्यानकर्षण किया है; जैसे—रक्तविकारों में रक्तनिर्हरण (सिरावेध, फस्द खोलना) एक महत्त्वपूर्ण चिकित्सा है। वातविकारों में आयुर्वेदीय विधि से बस्तित-प्रयोग करना अपने में एक दायित्वपूर्ण चिकित्सा है। जिसकी आज का चिकित्सक समाज प्रायः उपेक्षा कर बैठता है। शिलाजतु प्रयोग—शास्त्रीय विधि से इसका दीर्घकाल तक सेवन करना तथा कराना चाहिए। पथ्य-अपथ्य का विचार करके किया गया इसका प्रयोग रोग को नष्ट करके दीर्घायु प्रदान करता है। अग्रद्वयसंग्रह—यह (अ.हू.उ. ४०।४८-५८) प्रमुख रोगों में हितकर है। भूल किसी से भी हो सकती है, क्योंकि कहा गया है—'प्रमादो धीमतामपि'। अतः प्रामादिक अंशों को छोड़कर महत्त्वपूर्ण विषयों का ग्रहण करना विद्वानों का कर्तव्य है।
आभार—प्रस्तुत व्याख्या लिखते समय मेरे सामने श्रीअरुणदत्त, श्रीहेमद्रि कृत व्याख्याएँ तथा श्रीहरि शास्त्री द्वारा संगृहीत पाठभेद एवं टिप्पणियों से युक्त निर्णयसागरीय अष्टांगहृदय तथा पूज्य गुरुवर्य स्व० लालचन्द्रजी वैद्य की व्याख्यायुक्त अष्टांगहृदय था। इन सबसे मुझे प्रेरणा मिली, तदर्थ उन सबके प्रति मैं नतमस्तक हूँ।
आत्रेयकल्प सम्प्रति दिवंगत पीयूषपाणि गुरुवर्य पण्डितप्रवर लालचन्द्रजी वैद्य, प्रधानाचार्य श्रीअर्जुन आयुर्वेद महाविद्यालय, वाराणसी का आभार मैं किन शब्दों द्वारा प्रकट करूँ, जिनकी स्नेह-सुधा से छात्रावस्था में सिंचित मेरा शरीर, ज्ञानामृत से आप्लावित मेरा उत्तमांग तथा अमोघ आशीर्वादों से मेरा भूत, वर्तमान एवं भविष्यत् संवर्धित एवं परिरक्षित है, उनके प्रति सदैव नतमस्तक रहना ही मेरी शोभा है।
व्याकरण में पतञ्जलि, न्याय में गौतम, वैशेषिकदर्शन में कण्ठा, सांख्य में कपिल, मीमांसा में जैमिनि, छन्दःशास्त्र में पिंगलमुनि, साहित्य में भास एवं कालिदास के प्रतिस्पर्धी, पाश्चात्य साहित्य के विशेषज्ञ महाकवि पण्डितप्रवर बसन्त च्यम्बक शेबडे का भी मैं अधर्मण हूँ। जिन्होंने विविध शास्त्रों के उद्भट विद्वान् वाग्भट की प्रस्तुत कृति में स्थान-स्थान पर आये हुए व्याकरण सम्बन्धी पदों को स्पष्ट कर मेरा पथ प्रशस्त किया।
इस अवसर पर कुशकाय किन्तु अदम्य उत्साह-सम्पन्न अपनी सहधर्मिणी के स्वास्थ्थ सम्पन्न दीर्घायुष्य की कामना करता हूँ। जिनके सहयोग से मैं आज तक का साहित्य सृजन कर सका और भविष्य में भी कुछ कर सकूँ, यही साम्बसादाशिव से मेरी करबद्ध प्रार्थना है।
अन्त में प्रस्तुत अष्टांगहृदय के साज-सज्जा पूर्ण प्रकाशन में होने वाले व्ययभार आदि की चिन्ता न करके इसे यथासम्भव शुद्ध छापने में दत्तावधान चौखम्बा सुरभारती परिवार, वाराणसी ने जो तत्परता दिखायी है, तदर्थ उन्हें अनेकानेक साधुवाद देते हुए उनकी श्रीवृद्धि एवं यशोवृद्धि की कामना करता हूँ। इस ग्रन्थ के प्रूक-संशोधन में श्री योगेशकुमार पण्ड्या ने मनोयोगपूर्वक कार्य किया है, एतदर्थ वे धन्यवादार्ह हैं।
विदुषां विधेयः
डॉ० ब्रह्मानन्द त्रिपाठी
विषयानुक्रमणिका
सूत्रस्थानम्
| विषय | पृष्ठांक | विषय | पृष्ठांक |
|---|---|---|---|
| ( १ ) आयुष्कामीयाध्यायः | रोग की परीक्षा | १८ | |
| मंगलाचरण | १ | देश-भेदों का वर्णन | १८ |
| आयुर्वेद का प्रयोजन | ३ | भूमिदेश का वर्णन | १९ |
| आयुर्वेदावतरण | ४ | काल के भेद | १९ |
| अष्टांगहृदय का स्वरूप | ५ | औषध के भेद | २० |
| आयुर्वेद के आठ अंग | ५ | शारीरिक दोषों की चिकित्सा | २० |
| दोषों का वर्णन | ८ | मानसिक दोषों की चिकित्सा | २० |
| विकृत-अविकृत दोष | ८ | चिकित्सा के चार पाद | २० |
| दोषों के स्थान एवं प्रकोपकाल | ९ | वैद्य के चार लक्षण | २१ |
| वय आदि के अनुसार काल | ९ | औषध-द्रव्य के चार लक्षण | २१ |
| दोषों का अग्नि पर प्रभाव | ९ | परिचारक ( उपस्थाता ) के चार लक्षण | २१ |
| दोषों का कोष्ठ पर प्रभाव | ९ | रोगी के चार लक्षण | २१ |
| दोषों से गर्भप्रकृति का वर्णन | १० | साध्य-असाध्य के अनुसार व्याधि के भेद | २२ |
| वातदोष के गुण | १० | सुखसाध्य रोग के लक्षण | २२ |
| पित्तदोष के गुण | १० | कष्टसाध्य रोग के लक्षण | २३ |
| कफदोष के गुण | ११ | याप्य रोग के लक्षण | २३ |
| संसर्ग-सन्निपात परिभाषा | ११ | प्रत्याख्येय रोग के लक्षण | २३ |
| धातुओं का वर्णन | ११ | त्याज्य रोगी | २३ |
| मलों का वर्णन | ११ | अध्याय-संग्रह वर्णन | २४ |
| दोष, धातु, मलों की वृद्धि एवं क्षय | १२ | सूत्रस्थान के अध्याय | २४ |
| रसों का वर्णन | १२ | शारीरस्थान के अध्याय | २४ |
| रसों का वात आदि पर प्रभाव | १३ | निदानस्थान के अध्याय | २४ |
| द्रव्य का वर्णन | १३ | चिकित्सास्थान के अध्याय | २५ |
| वीर्य का वर्णन | १४ | कल्प-सिद्धिस्थान के अध्याय | २५ |
| विपाक का वर्णन | १४ | उत्तरस्थान के अध्याय | २५ |
| द्रव्य के गुणों का वर्णन | १५ | अष्टांगहृदय के छः स्थान | २५ |
| रोग एवं आरोग्य के कारण | १५ | ( २ ) दिनचर्याध्यायः | |
| रोग-आरोग्य में भेद | १६ | ब्राह्ममुहूर्त में जागना | २६ |
| रोगों के दो भेद | १६ | दत्तवन का विधान | २६ |
| दो प्रकार के रोगाधिष्ठान | १७ | दत्तवन करने की विधि | २७ |
| मानसिक दोषों का परिचय | १७ | दत्तवन का निषेध | २७ |
| रोगी की परीक्षा | १७ | अञ्जन-प्रयोग | २८ |
२ अ० भू०
( १८ )
विषय
रसाजन-प्रयोगविधि नय्य आदि सेवन-निर्देश ताम्बूलसेवन-विधि ताम्बूलसेवन-निषेध अभ्यंगसेवन-विधान अभ्यंग के प्रमुख स्थान अभ्यंग का निषेध व्यायाम का विधान व्यायाम का निषेध अर्धशक्ति एवं काल-निर्देश शरीरमर्दन-निर्देश अतिव्यायाम से हानि व्यायाम आदि का निषेध उबटन के गुण स्नान के गुण उष्ण-शीत जलप्रयोग स्नान का निषेध भोजन आदि कर्तव्य सुख का साधन धर्म मित्र-अमित्र सेवन-विचार पापकर्मों का त्याग अनुकूल व्यवहार-निर्देश समदृष्टिता का निर्देश सम्मान करने का निर्देश याचकों की सम्मान-विधि उपकार का निर्देश समभाव का निर्देश मधुरभाषण-निर्देश भाषण-विधि विचारों को गुप्त रखें परच्छन्दानुवर्तन इन्द्रियव्यवहार-विधि विवर्ग-विरोध का निषेध सभी धर्मों का आचरण शरीरशुद्धि के प्रकार रत्न आदि का धारण छाता आदि धारण दण्ड आदि धारण गमन-निर्देश
पृष्ठांक
२८ २८ २८ २९ २९ ३० ३० ३० ३१ ३१ ३१ ३१ ३२ ३२ ३२ ३३ ३३ ३३ ३४ ३४ ३४ ३४ ३५ ३५ ३५ ३५ ३५ ३५ ३६ ३६ ३६ ३६ ३६ ३६ ३६
विषय
निषिद्ध कार्य छौंक आदि करने की विधि आंगिक चेष्टाओं का निषेध शारीरिक आदि चेष्टाओं की मात्रा १. अन्य सदाचार २. अन्य सदाचार मद्यविक्रय आदि का निषेध अन्य निषिद्ध कर्म अन्य सदुपदेश सदाचारसूत्र विचार-पद्धति सदवृत्त का उपसंहार
( ३ ) ऋतुचर्याध्यायः
छः ऋतुएँ उत्तरायण तथा आदानकाल अग्निगुण-प्रधान आदानकाल विसर्गकाल-दक्षिणायन विसर्गकाल-परिचय बल का चयापचय हेमन्त ऋतुचर्या प्रातःकाल के कर्तव्य स्नान आदि की विधि शीतनाशक उपाय निवास-विधि शिशिर ऋतुचर्या वसन्त ऋतुचर्या मध्याह्नचर्या वसन्त ऋतु में अपथ्य ग्रीष्म ऋतुचर्या सेवनीय पदार्थ सत्सेवन-विधि मद्यसेवन-विधि मद्यपान का निषेध भोजन-विधान पेय-विधान रात्रि में दुग्धपान-विधि मध्याह्नचर्या १. शयन-विधान २. शयन-विधान
पृष्ठांक
३७ ३७ ३७ ३७ ३७ ३८ ३८ ३८ ३९ ३९ ३९ ४० ४० ४१ ४२ ४२ ४२ ४३ ४३ ४४ ४४ ४४ ४५ ४५ ४६ ४६ ४६ ४६ ४७ ४७ ४७
( १९ )
| विषय | पृष्ठांक | विषय | पृष्ठांक |
|---|---|---|---|
| रात्रिचर्या | ४८ | शोधन की आवश्यकता | ५९ |
| मनोहर वातावरण | ४८ | संशोधन कर्म की प्रशंसा | ५९ |
| वर्षा ऋतुचर्या | ४८ | रसायन, वाजीकरण योगों का प्रयोग | ६० |
| शरीर-शुद्धि | ४८ | शोधनोत्तर चिकित्सा | ६० |
| सैकनीय विहार | ४९ | चिकित्सा का फल | ६० |
| त्याज्य विहार | ४९ | आगन्तुज रोग | ६१ |
| शरद् ऋतुचर्या | ४९ | निजागन्तुज रोगों का निरोध एवं शमन | ६१ |
| आहार-विधि | ५० | शोधन योग्य ऋतुएँ | ६२ |
| हंसोदकसेवन-निर्देश | ५० | स्वस्थ रहने के उपाय | ६२ |
| विहार-विधि | ५० | ( ५ ) द्रवद्रव्यविज्ञानीयाध्यायः | |
| अपथ्य-निषेध | ५० | अथ तोयवर्गः | |
| संक्षिप्त ऋतुचर्या | ५० | गंगा का जल | ६४ |
| रससेवन-निर्देश | ५२ | गंगाजल का परिचय | ६४ |
| ऋतुसन्धि में कर्तव्य | ५२ | सामुद्र जल | ६५ |
| ( ४ ) रोगानुत्पादनीयाध्यायः | पानीय जल | ६५ | |
| वेगों को न रोकने का निर्देश | ५४ | न पीने योग्य जल | ६५ |
| अपानवायु को रोकने से हानि | ५४ | १. नदीजल का वर्णन | ६६ |
| मलवैगरोधज रोग | ५५ | २. नदीजल का वर्णन | ६६ |
| मूत्रवैगरोधज रोग | ५५ | ३. नदीजल का वर्णन | ६६ |
| उक्त रोगों की चिकित्सा | ५५ | कूप आदि का जल | ६७ |
| मूत्रवैगरोधज रोग-चिकित्सा | ५५ | जलपान-विधि | ६७ |
| उदगारवैगरोधज रोग-चिकित्सा | ५५ | जलपान का प्रभाव | ६७ |
| छाँक के वेग को रोकने से हानि | ५६ | शीतल जलपान के लाभ | ६७ |
| छिन्कावेगनिरोधज रोग-चिकित्सा | ५६ | उष्ण जलसेवन के लाभ | ६८ |
| तृषावेगनिरोधज रोग-चिकित्सा | ५६ | श्रुतशीत एवं बासी जल | ६८ |
| क्षुधावेगनिरोधज रोग-चिकित्सा | ५६ | मारियल का जल | ६८ |
| निद्रावेगनिरोधज रोग-चिकित्सा | ५६ | उत्तम एवं अधम जल | ६८ |
| कासवेगनिरोधज रोग-चिकित्सा | ५७ | अथ क्षीरवर्गः | |
| श्वमशवासवेगनिरोधज रोग-चिकित्सा | ५७ | सामान्य दूध के गुण | ६८ |
| जुम्भावेगनिरोधज रोग-चिकित्सा | ५७ | गाय के दूध के गुण | ६९ |
| अश्ववेगनिरोधज रोग-चिकित्सा | ५७ | भैंस के दूध के गुण | ६९ |
| छर्दिवेगनिरोधज रोग | ५८ | बकरी के दूध के गुण | ६९ |
| छर्दिवेगनिरोधज रोग-चिकित्सा | ५८ | ऊँटनी के दूध के गुण | ७० |
| शुक्र के वेग को रोकने के कारण उत्पन्न रोग | ५८ | मानुषी दूध के गुण | ७० |
| शुक्र के वेग को रोकने के कारण उत्पन्न | भेड़ी के दूध के गुण | ७० | |
| रोगों की चिकित्सा | ५८ | हथिनी के दूध के गुण | ७० |
| वेगरोधी के असाध्य लक्षण | ५८ | एकशफ दूध के गुण | ७० |
| सामान्य चिकित्सा | ५९ | आम-श्रुत दुग्ध-गुण | ७० |
| धारणीय वेग | ५९ | धारोष्ण दूध के गुण | ७० |
( २० )
विषय
दक्षिण-वर्णन तक्र का वर्णन मस्तु का वर्णन नवनीत-वर्णन दूध का नवनीत घृत के गुण पुराने घृत के प्रयोग किलाट आदि का वर्णन उत्तम-अधम विचार
अथ इक्षुवर्गः
ईख के रस का वर्णन अगले भाग का रस यान्त्रिक रस के भेद ईख के भेद एवं गुण शतपर्वक आदि ईखों के गुण फाणित के गुण गुड़ के गुण पुराने-नये गुड़ के गुण मत्स्यण्डिका आदि के गुण यासशर्करा के गुण सभी शर्कराओं के गुण शर्करा की उत्तमता
अथ मधुवर्गः
मधु का वर्णन उष्ण मधुसेवन का निषेध संशोधन में मधु-प्रयोग
अथ तैलवर्गः
सानान्य तैल का वर्णन एण्डतेल के गुण सरसों का तेल बहेड़े की गिरी का तेल नीम की गिरी का तेल अतसी-कुसुम्भ तेल प्राणिज स्नेह
अथ मद्यवर्गः
मद्य का वर्णन नया एवं पुराना मद्य मद्य का निषेध विभिन्न सुराओं का वर्णन
पृष्ठांक
विषय
७१ वाहणी-परिचय ७१ यव ( जो से निर्मित ) सुरा ७२ बहेड़ा की सुरा ७२ कौहली सुरा ७२ मधूलक सुरा ७३ अरिष्ट-परिचय ७३ मुनक्का ( मार्ट्रिक ) आसव ७३ खाजूँ, शार्कर आसव ७३ गुड़-निर्मित आसव सीधु का वर्णन
७४ मध्वासव का वर्णन ७४ शुक्त का वर्णन ७४ गुड़ आदि शुक्त ७४ कन्द आदि शुक्त ७५ शाण्डाकी-वर्णन ७५ धान्याम्ल आदि का वर्णन ७५ सौवीरक तथा तुषोदक
अथ मूत्रवर्गः
मूत्रों का वर्णन
( ६ ) अत्रस्वरूपविज्ञानीयाध्यायः
अथ शूकधान्यवर्गः
७६ शूकधान्यों का वर्णन ८७ रक्तशालि का वर्णन ८७ क्रमशः गुणहीनता ८७ यवक आदि शालिधान्य ८७ व्रीहिधान्य का वर्णन ८७ सामान्य गुण वाले षष्ठिक ८८ अन्य व्रीहिधान्य-वर्णन ८८ तुणधान्यों का वर्णन ८८ प्रियंगुधान्य का वर्णन ८८ कोटोधान्य का वर्णन ८८ जौ का वर्णन ८९ अनुयव का वर्णन ८९ वंशज जौ का वर्णन ८९ गोधूम का वर्णन ८९ नन्दीमुखी का वर्णन
अथ शिम्बोधान्यवर्गः
८९ शिम्बोधान्य-परिचय ९० मूँग, मटर, राजमाष
पृष्ठांक
८१ ८१ ८१ ८१ ८१ ८१ ८२ ८२ ८२ ८३ ८३ ८३ ८३ ८४ ८४ ८४ ८४
( २१ )
विषय
कुलथी का वर्णन १० सेम का वर्णन १० माष ( उड़द ) का वर्णन १० काकाण्डोला एवं केवाँच १० तिल का वर्णन ११ अतसी एवं कुसुम्भ बीज ११ माष, यवक-वर्णन ११ धान्य-विवेचन ११
अथ कृतान्नवर्गः
पकाये गये अन्नों का वर्णन १२ पेया का वर्णन १२ विलेपी का वर्णन १२ औदन ( भात ) का वर्णन १३ संक्षिप्त निर्देश १३ मांसरस के गुण १३ मूँग का यूप १३ कुलथी का यूप १३ तिल, पिण्याक आदि १३ रसाला के गुण १३ पानक ( शीतल पेय ) के गुण १४ लाजा का वर्णन १४ पृथुक ( च्यूड़ा ) का वर्णन १४ धाना का वर्णन १४ सतुओं का वर्णन १५ पिण्याक-वर्णन १५ वेसवार-वर्णन १५ मूँग आदि के वेसवार १५ अपूपों का वर्णन १६
अथ मांसवर्गः
मुग-परिचय १६ विष्किर-परिचय १६ प्रतुद-परिचय १७ बिलेशय-परिचय १७ प्रसहमुग-पक्षी १७ महामुग-परिचय १८ जलचर पक्षी १८ मत्स्य-परिचय १८ आठ प्रकार के मांस १८ बकरी-भेड़ का वर्णन १८
पृष्ठांक
१० शेष प्राणियों का निर्णय १८ मांसों का वर्णन १९ शशकमांस के गुण १९ वर्तक आदि के मांस १९ मोर का मांस १९ कुक्कुट का मांस १९ पालतू मुर्गा का मांस १९ क्रकर एवं उपचक्रक के मांस १९
काणकपोतक का मांस १९ चटक का मांस १९ आठों मांसों का वर्णन १९ महामुर्गों के मांस १०० बकरा का मांस १०० भेड़ का मांस १०० गाय का मांस १०० भैंसा का मांस १०० सूअर का मांस १०० मत्स्य का मांस १०० चिलिचिम मत्स्य का मांस १०० लाव आदि का वर्णन १०१ भक्ष्यमांस-वर्णन १०१ अभक्ष्यमांस-वर्णन १०१ विशिष्ट अवयवों के मांस १०१
अथ शाकवर्गः
शाकों का वर्णन १०२ सुनिष्पणक का वर्णन १०२ राजक्षव का वर्णन १०२ वास्तुक का वर्णन १०२ काकमाची का वर्णन १०२ चांगेरी का वर्णन १०२ पटोल आदि शाक १०३ परबल का शाक १०३ बृहतीद्रव्य का वर्णन १०३ अडूसा का वर्णन १०३ करेला का वर्णन १०३ बैगन का वर्णन १०३ करीर का वर्णन १०३ तोरई ( कोशातकी ) तथा बाकुची १०४ ( भवल्युज ) का शाक १०४
( २२ )
| विषय | पृष्ठांक | विषय | पृष्ठांक |
|---|---|---|---|
| तण्डुलीय का वर्णन | १०४ | उत्तम-अधम निर्णय | ११० |
| मुआतक का वर्णन | १०४ | अथ फलवर्गः | |
| पालंकी का वर्णन | १०४ | द्राक्षा-परिचय | १११ |
| उपीदिका का वर्णन | १०४ | दाडिमफल का वर्णन | १११ |
| चक्षु का वर्णन | १०४ | केला आदि फलों का वर्णन | १११ |
| विदारीकन्द का वर्णन | १०४ | ताल आदि फलों का वर्णन | ११२ |
| जीवन्ती का वर्णन | १०४ | बिल्वफल का वर्णन | ११२ |
| कूम्भाण्ड आदि का वर्णन | १०५ | कपित्थफल का वर्णन | ११२ |
| त्रपुस का वर्णन | १०५ | जामुनफल का वर्णन | ११२ |
| तुम्ब का वर्णन | १०५ | आम का वर्णन | ११३ |
| शीर्णवृन्त-फल-शाक | १०५ | वृक्षाम्ल का वर्णन | ११३ |
| मुणाल आदि का वर्णन | १०५ | शमीफल का वर्णन | ११३ |
| कलम्ब आदि का वर्णन | १०६ | पीलुफल का वर्णन | ११३ |
| चिल्ली शाक का वर्णन | १०६ | मातुलुंग ( बिजौरानीबू ) का वर्णन | ११३ |
| तकारी आदि शाक का वर्णन | १०६ | भिलावा का वर्णन | ११४ |
| पुनर्नवा एवं कालशाक | १०६ | पारेवत का वर्णन | ११४ |
| करञ्ज का शाक | १०६ | आरुक्फल का वर्णन | ११४ |
| शतावरी का शाक | १०६ | कच्चे दाख आदि फल | ११४ |
| वंशकरीर का शाक | १०७ | करमर्द ( करौदा ) के कच्चे फल | ११५ |
| पत्तूर का शाक | १०७ | कोल, कर्कन्धु-वर्णन | ११५ |
| कासमर्द का शाक | १०७ | इमली एवं बैर के सूखे फल | ११५ |
| कुसुम्भ का शाक | १०७ | बड़हर के फल | ११५ |
| सरसों ( सर्षप ) के पत्तों का शाक | १०७ | त्याज्य धान्य, शाक एवं फल | ११५ |
| बालमूली का शाक | १०७ | अथोषधवर्गः | |
| वृद्धमूली का शाक | १०७ | लवण सामान्य के गुण | ११५ |
| स्नेहसिद्ध मूली का शाक | १०७ | संधानमक के गुण | ११६ |
| सूखी मूली का शाक | १०८ | सौवर्चलनमक के गुण | ११६ |
| कच्ची मूली का शाक | १०८ | विड़नमक के गुण | ११६ |
| पिण्डालु का शाक | १०८ | सामुद्र नमक के गुण | ११६ |
| कुटेरक आदि शाक | १०८ | औदुभिद् नमक के गुण | ११७ |
| सुरस का शाक | १०९ | कृष्णलवण के गुण | ११७ |
| सुमुख का शाक | १०९ | रोमकलवण के गुण | ११७ |
| धानिया ( आर्दिवा ) का शाक | १०९ | सामान्य निर्देश | ११७ |
| लशुनकन्द का शाक | १०९ | यवक्षार के गुण | ११७ |
| पलाण्डु का शाक | १०९ | सभी प्रकार के क्षार | ११७ |
| गूञ्जनक का शाक | १०९ | हींग का वर्णन | ११८ |
| सूरण का शाक | ११० | हरीतकी का वर्णन | ११८ |
| भूकन्द का शाक | ११० | आमलक का वर्णन | ११८ |
| शाकों में उत्तरोत्तर गुहता | ११० | बिभीतक का वर्णन | ११८ |
( २३ )
| विषय | पृष्ठांक | विषय | पृष्ठांक |
|---|---|---|---|
| त्रिफल का वर्णन | ११९ | दोषों को दूषित न करें | १२९ |
| त्रिजात एवं चतुर्जात | ११९ | तीन उपस्तम्भ | १२९ |
| मरिच के गुण | ११९ | आहार नामक उपस्तम्भ | १२९ |
| पिप्ली के गुण | ११९ | निद्रा नामक उपस्तम्भ | १३० |
| सोठ के गुण | ११९ | निद्रा का अभाव | १३० |
| आद्रक के गुण | ११९ | निद्रा के गुण-दोष | १३० |
| त्रिकटु के गुण | ११९ | निद्रा सम्बन्धी विचार | १३० |
| चव्य तथा पीपलमूल | १२० | दिन में न सोने का निर्देश | १३० |
| चित्रक के गुण | १२० | अकालशयन से हानि | १३१ |
| पञ्चकोल के गुण | १२० | चिकित्सा-निर्देश | १३१ |
| बृहत्पञ्चमूल के गुण | १२० | निद्रानाश के लक्षण | १३१ |
| लघुपञ्चमूल के गुण | १२० | निद्रासेवन-निर्देश | १३१ |
| मध्यमपञ्चमूल के गुण | १२० | पूर्ण निद्राप्राप्ति-विधि | १३१ |
| जीवनपञ्चमूल के गुण | १२० | ब्रह्मचर्य नामक उपस्तम्भ | १३१ |
| तुणपञ्चमूल के गुण | १२१ | स्त्रीसहवास का वर्णन | १३२ |
| ( ७ ) अन्नरक्षाध्यायः | |||
| प्राणाचार्य की नियुक्ति | १२२ | मैथुन के अयोग्य स्थिति | १३३ |
| चिकित्सक का कर्तव्य | १२२ | मैथुन सम्बन्धी अन्य निर्देश | १३३ |
| विषैले भात के लक्षण | १२२ | विपरीत व्यवहार का फल | १३३ |
| विषैले व्यञ्जनों के लक्षण | १२३ | संयम का महत्त्व | १३३ |
| विषैले मांस आदि के लक्षण | १२३ | मैथुनोत्तर कर्तव्य | १३४ |
| विषदाता के लक्षण | १२३ | राजा आदि का कर्तव्य | १३४ |
| विषैले अन्न की परीक्षा | १२४ | ( ८ ) मात्रादशितियाध्यायः | |
| विषैले अन्न का प्रभाव | १२४ | आहारमात्रा का वर्णन | १३५ |
| स्पर्शज विषचिकित्सा | १२४ | मात्रा में गुरु-लघु विचार | १३५ |
| मुख में विष का प्रभाव | १२५ | हीनमात्रा वाले आहार से हानि | १३६ |
| आमाशयगत विष के लक्षण | १२५ | अधिक मात्रा वाले आहार से हानि | १३६ |
| पक्वाशयगत विष के लक्षण | १२५ | विमूचिका के लक्षण | १३६ |
| उक्त दोनों की चिकित्सा | १२५ | अलसक की परिभाषा | १३६ |
| ताम्र एवं स्वर्ण भस्म-प्रयोग | १२५ | विमूचिका की परिभाषा | १३६ |
| स्वर्णभस्म का प्रभाव | १२५ | विमूचिका के लक्षण | १३६ |
| विरोधी आहार | १२६ | अलसक का वर्णन | १३७ |
| आनुपदेशीय मांस | १२६ | दण्डालसक का वर्णन | १३७ |
| दुग्धपान-विचार | १२६ | आमविष का वर्णन | १३७ |
| विरुद्ध द्रव्यों के लक्षण | १२६ | आमदोष की चिकित्सा | १३७ |
| विरोधी आहारों का सेवन | १२८ | पाण्डिदाह-प्रयोग | १३८ |
| अपथ्य का त्याग एवं पथ्य का सेवन | १२९ | अन्य उपचार | १३८ |
| सहसा त्याग का निषेध | १२९ | अपतर्पण-प्रयोग | १३९ |
| दोषों का ह्रास, गुणों की वृद्धि | १२९ | हेतुविपरीत आदि चिकित्सा | १३९ |
| विपरीतार्थकारी चिकित्सा | १३९ |
( २४ )
| विषय | पृष्ठांक | विषय | पृष्ठांक |
|---|---|---|---|
| आमाजीर्ण के लक्षण | १३९ | द्रव्य-वर्णन की समाप्ति | १४८ |
| विष्टद्र्धाजीर्ण के लक्षण | १३९ | रसवर्णन-प्रस्ताव | १४८ |
| विद्र्धाजीर्ण के लक्षण | १३९ | द्रव्यगत वीर्य-वर्णन | १४८ |
| चिकित्सासूत्र | १३९ | चरकसम्मत वीर्य | १४८ |
| विलम्बिका के लक्षण | १३९ | वाग्भट का मत | १४८ |
| रसशेषाजीर्ण-चिकित्सा | १४० | रस आदि में वीर्य की श्रेष्ठता | १४८ |
| अजीर्ण का सामान्य लक्षण | १४० | वीर्य सम्बन्धी अन्य मत | १४८ |
| अजीर्ण के विविध कारण | १४० | वाग्भट का समर्थन | १४८ |
| समशन आदि के लक्षण | १४० | वीर्य के लक्षण | १४९ |
| शास्त्रीय भोजन-विधि | १४१ | विपाक का वर्णन | १४९ |
| त्याज्य भोजन-विधि | १४१ | विपाकज रस-क्षेद | १४९ |
| असेवनीय आहार | १४१ | रस, वीर्य, विपाक, प्रभाव | १४९ |
| सेवनीय आहार | १४२ | द्रव्य का स्वाभाविक बल | १५० |
| रात में सेवनीय पदार्थ | १४२ | रस आदि का स्वाभाविक बल | १५० |
| अन्य पदार्थों को खाने की विधि | १४२ | प्रभाव का वर्णन | १५० |
| आमाशय के चार भाग | १४२ | द्रव्य आदि के कर्म | १५० |
| विभिन्न प्रकार के अनुपान | १४२ | भिन्नता के उदाहरण | १५० |
| उत्तम अनुपान | १४३ | ( १० ) रसभेदीयाध्यायः | |
| अनुपान-सेवन का फल | १४३ | मधुर आदि रसों की उत्पत्ति | १५२ |
| १. अनुपान का निषेध | १४३ | मधुररस के लक्षण | १५२ |
| २. अनुपान का निषेध | १४३ | अम्लरस के लक्षण | १५२ |
| ३. अनुपान का निषेध | १४३ | लवणरस के लक्षण | १५३ |
| भोजन-समय का निर्देश | १४४ | तिक्तरस के लक्षण | १५३ |
| ( ९ ) द्रव्यादिविज्ञानीयाध्यायः | कटुरस के लक्षण | १५३ | |
| द्रव्य की प्रधानता | १४५ | कषायरस के लक्षण | १५३ |
| द्रव्य का स्वरूप | १४५ | रसों के स्वरूप | १५३ |
| द्रव्य की उत्पत्ति | १४५ | रसों के कर्म | १५३ |
| उत्पत्ति के कारण | १४५ | मधुररस के कर्म | १५३ |
| नामकरण में कारण | १४५ | अम्लरस के कर्म | १५३ |
| द्रव्य में अनेक रस | १४६ | लवणरस के कर्म | १५४ |
| अनेक दोषज रोग | १४६ | तिक्तरस के कर्म | १५४ |
| द्रव्यगत गुरु आदि गुण | १४६ | कटुरस के कर्म | १५४ |
| पार्थिव द्रव्य का वर्णन | १४६ | कषायरस के कर्म | १५४ |
| आयु द्रव्य का वर्णन | १४६ | मधुरस्कन्ध के द्रव्य | १५५ |
| आग्नेय द्रव्य का वर्णन | १४७ | अम्लस्कन्ध के द्रव्य | १५५ |
| वायव्य द्रव्य का वर्णन | १४७ | लवणस्कन्ध के द्रव्य | १५५ |
| नाभस द्रव्य का वर्णन | १४७ | तिक्तस्कन्ध के द्रव्य | १५५ |
| औषधमय द्रव्य | १४७ | कटुस्कन्ध के द्रव्य | १५५ |
| द्रव्यों की विशेषता | १४७ | कषायस्कन्ध के द्रव्य | १५६ |
( २५ )
| विषय | पृष्ठांक | विषय | पृष्ठांक |
|---|---|---|---|
| मधुररस का विशिष्ट वर्णन | १५६ | स्वेदक्षय के लक्षण | १६४ |
| अम्लरस का विशिष्ट वर्णन | १५६ | अन्य मलों के क्षय-लक्षण | १६४ |
| लवणरस का विशिष्ट वर्णन | १५६ | वृद्धि एवं क्षय-निर्देश | १६५ |
| तिक्त एवं कटु रसों का विशिष्ट वर्णन | १५६ | पुरीष आदि मलों का महत्त्व | १६५ |
| कषायरस का विशिष्ट वर्णन | १५६ | वात आदि के विशिष्ट स्थान | १६५ |
| रसों का वर्णन | १५६ | वातज रोग प्रतीकार | १६५ |
| रसों के ६३ भेद | १५७ | वृद्धरक्तादि की चिकित्सा | १६५ |
| रससंयोगों के असंख्य भेद | १५८ | मलों की वृद्धि एवं क्षय की चिकित्सा | १६६ |
| ( ११ ) दोषादिविज्ञानीयाध्यायः | |||
| शरीर के आधार | १६० | धातुओं की वृद्धि-क्षय | १६६ |
| प्रकृतिस्य दोषों के कर्म | १६० | वृद्धि-क्षय का कारण | १६६ |
| रस आदि धातुओं के कर्म | १६० | वृद्धि-क्षय का अन्य स्वरूप | १६७ |
| मलों के प्रमुख कर्म | १६१ | दोष, धातु, मल एवं स्रोतों की दुष्टि | १६७ |
| वातवृद्धि के लक्षण | १६१ | मलायनों का परिचय | १६७ |
| पित्तवृद्धि के लक्षण | १६१ | ओजस् का वर्णन | १६७ |
| कफवृद्धि के लक्षण | १६१ | ओजःक्षय के कारण, लक्षण एवं चिकित्सा | १६७ |
| रक्तवृद्धि के लक्षण | १६१ | ओजोवृद्धि के लक्षण | १६८ |
| मांसवृद्धि के लक्षण | १६२ | वृद्धि-क्षय का चिकित्सासूत्र | १६८ |
| मेदोवृद्धि के लक्षण | १६२ | द्वेष एवं प्रार्थना का कारण | १६८ |
| अस्थिवृद्धि के लक्षण | १६२ | अवस्थानुसार दोषों के कर्म | १६८ |
| मज्जावृद्धि के लक्षण | १६२ | दोषों को सम रखना | १६९ |
| शुक्रवृद्धि के लक्षण | १६२ | ( १२ ) दोषभेदोपाध्यायः | |
| पुरीषवृद्धि के लक्षण | १६२ | वात के प्रमुख स्थान | १७० |
| मूत्रवृद्धि के लक्षण | १६३ | पित्त के प्रमुख स्थान | १७० |
| स्वेदवृद्धि के लक्षण | १६३ | कफ के प्रमुख स्थान | १७१ |
| अन्य मलवृद्धि के लक्षण | १६३ | वात के पाँच भेद | १७१ |
| वातदोष के क्षय-लक्षण | १६३ | पाँच वातों का वर्णन | १७१ |
| पित्तदोष के क्षय-लक्षण | १६३ | उदानवायु का वर्णन | १७१ |
| कफदोष के क्षय-लक्षण | १६३ | व्यानवायु का वर्णन | १७१ |
| रसधातु के क्षय-लक्षण | १६३ | समानवायु का वर्णन | १७१ |
| रक्तधातु के क्षय-लक्षण | १६४ | अपानवायु का वर्णन | १७२ |
| मांसधातु के क्षय-लक्षण | १६४ | पित्त के पाँच भेद | १७२ |
| मेदोधातु के क्षय-लक्षण | १६४ | पाचकपित्त का वर्णन | १७२ |
| अस्थिधातु के क्षय-लक्षण | १६४ | रञ्जकपित्त का वर्णन | १७२ |
| मज्जाधातु के क्षय-लक्षण | १६४ | साधकपित्त का वर्णन | १७२ |
| शुक्रधातु के क्षय-लक्षण | १६४ | आलोचकपित्त का वर्णन | १७२ |
| पुरीषक्षय के क्षय-लक्षण | १६४ | भ्राजकपित्त का वर्णन | १७३ |
| मूत्रक्षय के क्षय-लक्षण | १६४ | कफ का वर्णन | १७३ |
| अवलम्बक कफ का वर्णन | १७३ | ||
| वलेदक कफ का वर्णन | १७३ |
( २६ )
विषय
बोधक कफ का वर्णन तर्पक कफ का वर्णन श्लेषक कफ का वर्णन उपसंहार वात के चय, कोप, शम का वर्णन पित्त के चय, कोप, शम का वर्णन कफ के चय, कोप, शम का वर्णन दोषों के चय का वर्णन दोषों के प्रकोप का वर्णन चय, कोप, शम का वर्णन चय आदि का विशेष वर्णन कालस्वभाव का वर्णन दोषों की व्याप्ति एवं निवृत्ति निदान, रूप, चिकित्सा-वर्णन रोगों की उत्पत्ति के कारण दोषों के प्रकोप के कारण हीनयोग आदि का वर्णन काल का वर्णन कर्म का वर्णन उपसंहार एवं रोगमार्ग बाहरी रोगमार्ग आभ्यन्तर रोगमार्ग मध्यम रोगमार्ग वातदोष के कर्म पित्तदोष के कर्म कफदोष के कर्म दोषलक्षण निर्वाचन का हेतु चिकित्सा में अभ्यास का महत्त्व रोगों के तीन भेद रोगों का परिचय त्रिविध रोग-चिकित्सा रोगों के दो भेद रोग-भेदों के नाम स्वतन्त्र रोग परतन्त्र रोग मलों का विचार दोषों का विचार चिकित्सासूत्र उपद्रवचिकित्सा-निर्देश
पृष्ठांक
१७३ १७३ १७३ १७४ १७४ १७४ १७४ १७४ १७५ १७५ १७५ १७५ १७६ १७६ १७६ १७७ १७७ १७७ १७७ १७८ १७८ १७८ १७८ १७९ १७९ १७९ १७९ १८० १८० १८० १८० १८० १८० १८० १८० १८०
विषय
रोगनामनिर्धारण-विचार दोषों का रोगकर्तृत्व चिकित्साविधि-निर्देश दूष्य आदि ज्ञान-निर्देश रोग की गुरुता-लघुता का विचार भ्रिषणबूब की निन्दा शूल का दुष्परिणाम चिकित्सक का कर्तव्य दोषभेदों का वर्णन दोषवृद्धि के तीन भेद संसर्ग के तीन भेद संसर्ग के छः भेद समस्त दोषवृद्धि के १३ भेद १३ भेदों के उदाहरण एक भेद का निर्देश पुनः छः भेद वृद्ध दोषों का योग क्षीण दोषों का योग वृद्धि, सम, क्षय भेद से छः क्षय-वृद्धि भेद से पुनः छः ६ भेद ६२ दोषभेद ६३वों भेद दोषों के अनन्त भेद
पृष्ठांक
१८० १८० १८१ १८१ १८१ १८१ १८२ १८२ १८२ १८२ १८२ १८२ १८२ १८२ १८२ १८२ १८२ १८२ १८२ १८२ १८२ १८२ १८२ १८२ १८२ १८२ १८२ १८२ १८२ १८२ १८२
( १३ ) दोषोपक्रमणीयाध्यायः
वातदोष की चिकित्सा पित्तदोष की चिकित्सा कफदोष की चिकित्सा विषयोपसंहार चिकित्सा-निर्देश चिकित्सा का समय शुद्ध प्रयोग का परिचय दोषों का स्थानान्तर गमन दोषों का कोष्ठगमन पुनः रोगोत्पादन अन्य स्थानों में दोषप्रकोप चिकित्सा-निर्देश तिर्थगत दोष-चिकित्सा चिकित्सा-विधि साम-निराम दोषों के लक्षण