अष्टाङ्गहृदयम्
Ashtanga Hridayam
श्रीमद्वाग्भट द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान - निर्मला हिन्दी व्याख्या (डॉ० ब्रह्मानन्द त्रिपाठी) · चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान, दिल्ली · 1999 (उद्गम)
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में अञ्जन, पादलेप, रस, रसायन के रूप में किया है। कोषकार अमरसिंह बौद्ध थे। उन्होंने अपने कोष में पहले सांकेतिक रूप से बुद्ध को प्रणाम कर शास्त्रीय मर्यादा का पालन मंगलाचरण के रूप में किया है। तदनन्तर स्वर्ग, गणदेवता, देवयोनि तथा दैत्यों के नामों का उल्लेख कर बाद में बुद्ध के नामों का परिगणन करते हुए इहाँ में जिनका भी समावेश किया है, वे अब भिन्न रूप में देखे जाते हैं।
चीनी यात्री इत्सिंग ( ६७१-६९५ ई० ) ने समस्त भारत में प्रसिद्ध 'अष्टांगहृदय' के प्रचार का उल्लेख किया है। इत्सिंग से पूर्ववर्ती वराहमिहिर ( ५०५-५८७ ई० ) के ज्योतिष सम्बन्धी सिद्धान्तों से हृदयकार प्रभावित थे। जैसा कि इन्होंने आत्रेय आदि को अपनी संहिता का जीवातु माना है, परन्तु इन्होंने दृढबल का उल्लेख कहीं भी नहीं किया, इससे लगता है कि इनके सामने चरकसंहिता का आदिम स्वरूप ही सुलभ था, न कि दृढबल द्वारा प्रतिसंस्कृत स्वरूप। इससे प्रतीत होता है कि दृढबल तथा प्रथम वाग्भट प्रायः समकालीन ही रहे होंगे अथवा दृढबल कुछ पूर्व रहे हों। बाह्य एवं आभ्यन्तर साक्ष्यों की समानता होने पर भी 'हृदय' से 'संग्रह' का कलेवर विशाल है। अतः परिनिरीक्षण करने के बाद हम इस निष्कर्ष पर पहुँचते हैं कि वाग्भट प्रथम का काल ५५० ई० मान लेना चाहिए। जैसा कि इतिहासकारों ने स्वीकार किया है, तदनुसार यहाँ तक प्रथम अथवा वृद्धवाग्भट की चर्चा की गयी है। अब इसके आगे 'अष्टांगहृदय' के रचयिता वाग्भट की चर्चा प्रस्तुत है।
साम्प्रदायिक स्वरूप —शास्त्र-रचना अथवा शास्त्र-चिन्तन के क्षेत्र में सभी वर्गों के विद्वानों के विचार साम्प्रदायिक भावों को छोड़कर तत्त्वचिन्तन की ओर अग्रसर देखे जाते हैं। कतिपय उदाहरण—नामलिंगानुशासन के रचयिता अमरसिंह की भाँति वाग्भट भी अपने क्षेत्र में सर्वमान्य एवं सुप्रसिद्ध हुए। बौद्ध जिनन्दबुद्धि ने अष्टाध्यायी की काशिकावृत्ति पर 'काशिकाविवरण पञ्जिकाचार्य' नामक व्याख्या लिखी है। व्याकरणशास्त्र के क्षेत्र में इसका पर्याप्त सम्मान है। वैसे भी लोक में इन्हें बुद्ध के समान सम्मान प्राप्त है। बौद्ध पुरुषोत्तमदेव कृत त्रिकाण्डशेष, भाषावृत्ति ( अष्टाध्यायी व्याख्या ) ग्रन्थों का सर्वत्र सम्भाव से आदर है। इन शास्त्रकारों का कहीं भी धर्म की ओर दुराग्रह परिलक्षित नहीं होता। क्योंकि शास्त्रचिन्तन में परम्परा कहीं भी बाधक नहीं होती। देखें—हर्षवर्धन शैव थे और राज्यवर्धन सौगत थे, जबकि ये दोनों सहोदर भाई थे। वास्तुपाल जैन थे। इन्होंने सोमनाथ की यात्रा की तथा अनेक शिव मन्दिरों की स्थापना की—ऐसा वर्णन अरिसिंह कृत 'सुकृतसंकीर्तनकाव्य' में मिलता है। श्रीकृष्णभक्त जयदेव ने गीतगोविन्द में 'केशवधृतबुद्धशरीर' कहकर उनकी स्तुति की है। रत्नावली में श्रीहर्ष ने 'शिव-पार्वती' की और नागानन्द नाटक में 'बुद्धो जिनः पातु बः' कहकर बुद्ध की वन्दना की है। इन सभी उद्धरणों को देखकर हम इस निष्कर्ष पर पहुँचते हैं कि उस काल में आज का जैसा कलह तथा मनोमालिन्यपूर्ण दुराग्रह नहीं था। यहाँ कारण था कि वाग्भट ने आयुर्वेद के निर्वचन में मध्यममार्ग का अनुसरण किया जिससे वाग्भट तथा उनकी कृति का विश्व में सर्वत्र समादर है।
अष्टांगहृदयकर्ता वाग्भट —संग्रह तथा हृदय के कर्ता वाग्भट 'इति ह स्माहुरात्रेयादयो महर्षयः' इस अंश में दोनों समान हैं। मंगलाचरण के पद्य का आरम्भ 'रागादिरोग' पद से भी दोनों समान हैं और उपर्युक्त उद्धरण के अनुसार दोनों द्वारा ग्रथित ग्रन्थों में चरक-सुश्रुतानुयायित्व भी समान है। अधिक क्या कहें 'संग्रह' के अनेक अविकल पद्य 'हृदय' में सुलभ हैं। इन दृष्टियों से संग्रह एवं हृदय के रचयिताओं को एक मान लेना चाहिए। इसके समर्थन में हम नागपुर निवासी वैद्य श्रीगोवर्धनशर्मा छागाणी द्वारा लिखित अष्टांगसंग्रह सूत्रस्थान की भूमिका से कुछ अंश साभार उद्धृत कर रहे हैं—
'स्वर्गीय ज्योतिषचन्द्र सरस्वती ने भी अष्टांगहृदय उत्तरस्थान ( शिवदास सेन टीका ) के सम्पादकीय उपोद्घात में अष्टाङ्गसंग्रह और हृदय के कर्ता भिन्न-भिन्न माने हैं। इसमें आधार केवल संग्रह से हृदय की कुछ स्थानों में मत भिन्नता बतायी है। इस भिन्नता में संग्रह का मत तो दे ही दिया है परन्तु उसमें थोड़ा-सा