अथर्ववेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)
Atharvaveda Samhita with Hindi Translation
डा. गंगा सहाय शर्मा द्वारा
स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)
पृष्ठ 364, कुल 1063 में से
संदर्भ में पढ़ेंयस्या उपस्थ उर्व १ न्तरिक्षं सा नः शर्म त्रिवरूथं नि यच्छात्.. (२) हम अन्न की उत्पत्ति के लिए, अन्न का निर्माण करने वाली विशाल एवं अखंडनीय अदिति की स्तुति करते हैं. जिस अदिति की गोद में विस्तृत आकाश है, वही अदिति हमें तीन मंजिला और तीन कक्षों वाला घर प्रदान करे. (२) सूक्त-८ देवता—अदिति दितेः पुत्राणामदितेरकारिषम् अमव देवानां बृहतामनर्मणाम्. तेषां हि धाम गभिषक् समुद्रियं नैनान् नमसा परो अस्ति कश्चन.. (१) मैं दिति के पुत्रों अर्थात् दैत्यों का स्थान छीन कर अदिति के पुत्रों अर्थात् देवों को देता हूं. वे देव गुणों से महान एवं शत्रुओं द्वारा पराजित न होने वाले हैं. उन का सागर अथवा आकाश में स्थित निवास स्थान दूसरों के लिए दुर्जेय और दुर्गम है. इन देवों से महान कोई भी नहीं है. (१) सूक्त-९ देवता—बृहस्पति भद्रादधि श्रेयः प्रेहि बृहस्पतिः पुरएता ते अस्तु. अथेममस्या वर आ पृथिव्या आरेषत्रुं कृणुहि सर्ववीरम्.. (१) हे वस्त्र, धन आदि का लाभ चाहने वाले पुरुष! तू उत्तरोतर कल्याणकारी संपत्ति प्राप्त कर. लाभ के हेतु जाते हुए तेरे आगेआगे बृहस्पति चलें. हे बृहस्पति! तुम पृथ्वी के उस उत्तम स्थान पर इस पुरुष को स्थापित करो, जहां धन आदि लाभ प्राप्त हों. इस के सभी पुत्र, पौत्र आदि वीर हों एवं इस के शत्रु इस से दूर रहें. (१) सूक्त-१० देवता—पूषा प्रपथे पथामजनिष्ट पूषा प्रपथे दिवः प्रपथे पृथिव्याः. उभे अभि प्रियतमे सधस्ते आ च परा च चरति प्रजानन्.. (१) मार्ग रक्षक सूर्य देव, मार्गों के आरंभ में रक्षा करने के लिए उपस्थित होते हैं. सूर्य देव पृथ्वी एवं आकाश के प्रवेश द्वार में उपस्थित होते हैं. अत्यधिक प्रेम करने वाले एवं परस्पर एक साथ स्थित धरती और आकाश दोनों को लक्षित कर के यजमानों द्वारा किए गए कर्म और उस का फल जानते हुए सूर्य आकाश से पृथ्वी पर आते हैं और पृथ्वी से आकाश पर जाते हैं. (१) पूषेमा आशा अनु वेद सर्वाः सो अस्माँ अभयतमेन नेषत्. स्वस्तिदा आघृणिः सर्ववीरो ऽ प्रयुच्छन् पुर एतु प्रजानन्.. (२) ebook converter DEMO Watermarks*