बौधायन धर्मसूत्र (विवरण टीका व हिन्दी अनुवाद)
Baudhayana Dharmasutra Hindi
महर्षि बौधायन द्वारा
स्रोत: Baudhayana Dharmasutram with Vivarana & Hindi Translation by Dr. Umesh Chandra Pandey (उद्गम)
पृष्ठ 121, कुल 486 में से
संदर्भ में पढ़ेंदशमः खण्डः ] प्रथमप्रश्ने पञ्चमोऽध्यायः ४९
नीवीं विस्रस्य परिधायाऽप उपस्पृशेत् ॥ १६ ॥ आर्द्रं तृणं (१)गोमयं भूमिं वा समुपस्पृशेत् ॥ १७ ॥
अनु०—नीवी (धोती के बन्धन) को खोलने पर या वस्त्र पहनते समय नीवी बन्धन बाँधने के बाद जल का स्पर्श करे अथवा भीगी हुई घास, गोबर या भूमि का स्पर्श करे ॥ १६-१७ ॥
परिहितस्य वाससो बन्धो नीवी । अपामुपस्पर्शनं प्रक्षालनं वा सम्भवा- पेक्षो विकल्पः ॥ १६-१७ ॥
नाभेरधस्स्पर्शनं कर्मयुक्तो वर्जयेत् ॥ १८ ॥
अनु०—देव, पितृ सम्बन्धी धार्मिक कर्म करते समय शरीर के नाभि से नीचे के भाग का स्पर्श न करे ॥ १८ ॥
देवपितृसंयुक्तं कर्म कुर्वाण इत्यर्थः ॥ १८॥
तत्र कारणमाह— २“ऊर्ध्वं वै पुरुषस्य नाभ्यै मेध्यमवाचीनममेध्यमि”ति श्रुतिः ॥१९॥
अनु०—पुरुष की नाभि से ऊपर का भाग पवित्र होता है और नीचे का भाग अपवित्र होता है ऐसा वेद का वचन है ॥ १९ ॥ टि०—द्रष्टव्य-तैत्तिरीय संहिता ६. १. ३. ४
पुरुषस्य नाभ्या ऊर्ध्वं मेध्यम् । अवाचीनमधस्तात्, अमेध्यम्, अयज्ञार्हमित्यर्थः ॥ १९ ॥
शूद्राणामार्याधिष्ठितानामर्धमासि ३मासि वा वपनम् ॥ २० ॥
अनु०—आर्यों की सेवा में रहनेवाले शूद्रों का अर्धमास (१५ दिनों) में अथवा पूरे मास में एक क्षोर होना चाहिए ॥ २० ॥
टि०—ब्यूह्लर ने यहाँ पुनः इस बात का संकेत किया है कि शूद्र द्विजातियों के यहाँ रसोइये का कार्य भी करते थे। आपस्तम्ब धर्म सूत्र २. १. २. ४-५ से भी यही अभिप्राय ध्वनित है।
१. गां भूमिमिति आ. ग. पु.
२. ज्योतिष्टोमे दीक्षाप्रकरणे यजमानस्य मेखलाबन्धनविधिसमीपे श्रुतोऽयमर्थ-वादः। कटिप्रदेशे मेखला बद्धव्या। तस्यां च बद्धायां शरीरे मेध्यामेध्ययोः स्थानयो-विभागो भवतीति।। नाभ्यै इति षष्ठ्यर्थे चतुर्थी।
३. मासि मासीति. घ. पु.