बौधायन धर्मसूत्र (विवरण टीका व हिन्दी अनुवाद)
Baudhayana Dharmasutra Hindi
महर्षि बौधायन द्वारा
स्रोत: Baudhayana Dharmasutram with Vivarana & Hindi Translation by Dr. Umesh Chandra Pandey (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंतृतीयः खण्डः ] प्रथमप्रश्ने द्वितीयोऽध्यायः २७
श्लाघनं विकत्थनं तच्च क्रीडनं करताडनादिः । तथा च वसिष्ठः—'न पादेन पाणिना वा जलमभिहन्यान्न जलेन जलम्' इति ॥ ४० ॥
दण्ड इव प्लवेत् ॥ ४१ ॥
**अनु०—**जल में सीधा दण्ड की भाँति तैरे ॥ ४१ ॥
अप्सूदूर्त्तनप्रतिषेधोऽयम् ॥ ४१ ॥
अब्राह्मणादध्ययनमापदि ॥ ४२ ॥
**अनु०—**आपत्ति काल में ( अर्थात् ब्राह्मण गुरु उपलब्ध न होने पर ) ब्राह्मणेतर वर्ण के गुरु से ( ब्राह्मण के अभाव में क्षत्रिय गुरु से और क्षत्रिय के अभाव में वैश्य गुरु से ) विद्या ग्रहण करे ॥ ४२ ॥
**टि०—**अब्राह्मण से शूद्र का भी ग्रहण नहीं होगा । 'शूद्र से कभी भी लौकिकी विद्या भी नहीं ग्रहण करनी चाहिए ।'—गोविन्द स्वामी ।
कुर्यादिति शेषः । आपत् ब्राह्मणाभावः । अध्ययनं श्रवणस्याऽपि प्रदर्शनार्थम् । ब्राह्मणाभावे क्षत्रियात्, तदभावे वैश्यात् । अब्राह्मणग्रहणात् त्रैवर्णिका गृह्यन्ते । ततश्च न कदाचिच्छूद्रालौकिक्यपि विद्या ग्रहीतव्या ॥ ४२ ॥
क्षत्रियवैश्ययोरपि—
शुश्रूषाऽनुव्रज्या च यावदध्ययनम् ॥ ४३ ॥
**अनु०—**जब तक अध्ययन करे तब तक ही उस अब्राह्मण ( क्षत्रिय, वैश्य वर्ण के ) गुरु की प्रसाधन आदि सेवा करे ॥ ४३ ॥
तावत् । शुश्रूषा प्रसाधनादि । अनुव्रज्या अनुगमनम् ॥ ४३ ॥
अयुक्तमेतदिति चेत् —
तयोस्तदेव पावनम् ॥ ४४ ॥
**अनु०—**उन दोनों का ( शिष्य और उपाध्याय का ) यह संबन्ध स्वतः ही वर्ण व्यतिक्रम दोष को पवित्र करने वाला होता है ॥ ४४ ॥
पावनं शुचिहेतुः । एवं कृतेऽपि शिष्योपाध्याययोर्वर्णधर्मव्यतिक्रमदोषोनाऽस्तीत्यभिप्रायः ॥ ४४ ॥
भ्रातृपुत्रशिष्येषु चैवम् ॥ ४५ ॥
**अनु०—**इसी प्रकार गुरु के भ्राता, पुत्र तथा अन्य शिष्यों के प्रति भी ( अध्ययन काल तक ) सेवाकार्य करे ॥ ४५ ॥