भारतकोश
बौधायन धर्मसूत्र (विवरण टीका व हिन्दी अनुवाद)

बौधायन धर्मसूत्र (विवरण टीका व हिन्दी अनुवाद)

Baudhayana Dharmasutra Hindi

महर्षि बौधायन द्वारा

स्रोत: Baudhayana Dharmasutram with Vivarana & Hindi Translation by Dr. Umesh Chandra Pandey (उद्गम)

DevanagariHindipublished486 पृष्ठ

पृष्ठ 95, कुल 486 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 95

सप्तमः खण्डः ] प्रथमप्रश्ने चतुर्थोऽध्यायः ४३

प्रथमप्रश्ने चतुर्थाध्याये सप्तमः खण्डः

अथाऽप्युदाहरन्ति—

कमण्डलुद्विजातीनां शौचार्थं विहितः पुरा ।
ब्रह्मणा मुनिमुख्यैश्च तस्मात्तं धारयेत्सदा ॥
ततश्शौचं ततः पानं सन्ध्योपासनमेव च ।
निर्विशङ्केन कर्तव्यं य इच्छेच्छ्रेय आत्मनः ॥ १ ॥

**अनु०—**इस विषय में निम्नलिखित पद्य उद्धृत किये जाते हैं—
प्राचीन काल में द्विजातियों की शुद्धि के लिए कमण्डलु का विधान ब्रह्मा तथा प्रमुख मुनियों ने किया, अतएव कमण्डलु सदैव धारण करना चाहिए । जो अपने कल्याण की कामना करता हो उसे बिना शङ्का के कमण्डलु से ही शरीर की शुद्धि करनी चाहिए उसी से जल पीना चाहिए और उसी से सन्ध्योपासन भी करना चाहिए ॥ १ ॥

कमण्डलूदकेन शौचं अपानदेशमलनिर्हरणादिकम्। पानसन्ध्योपासने दृष्टादृष्टकार्योपलक्षणार्थे ॥ १ ॥

कथमनेनाऽन्तःकरणेन देवतापूजादि कुर्यादित्याशङ्का न कार्या—
कुर्याच्छुद्धेन मनसा न चित्तं दूषयेद् बुधः । सह कमण्डलुनात्प-
न्नस्स्वयंभूस्तस्मात्कमण्डलुनाऽऽचरेत् ॥ २ ॥

**अनु०--**बुद्धिमान् व्यक्ति को ( कमण्डलु से उपर्युक्त सभी कार्य ) शुद्ध मन से करना चाहिए और अपने चित्त को दूषित नहीं करना चाहिए । स्वयंभू ब्रह्मा कमण्डलु के साथ ही उत्पन्न हैं अतएव कमण्डलु से जल का व्यवहार करना चाहिए ॥२॥

**टि०—**कमण्डलु का व्यवहार सभी प्रकार के जल के प्रयोग में किया जा सकता है इसी नियम को इस सूत्र द्वारा पुष्ट किया गया है । यह सूत्र मानसिक पवित्रता को प्रधानता देता है और कमण्डलु की सभी प्रकार के कार्यों के लिए उपयोगिता को असन्दिग्ध प्रमाणित करता है।

शास्त्रलक्षणेष्वर्थेषु सामान्यतो दृष्ट्या भ्रान्तिर्न कार्या। विशिष्टोत्पत्त्या च कमण्डलुप्रशंसैव। आचरेत् अनुतिष्ठेत् जलकार्यम् ॥ २ ॥

मूत्रपुरीषे कुर्वन् दक्षिणे हस्ते गृह्णाति सव्ये आचमनीयम् ॥३॥