भारतकोश
बावन कसनी (कबीर साहिब को 52 बार सजाए मौत दी गई)

बावन कसनी (कबीर साहिब को 52 बार सजाए मौत दी गई)

Bawan Kasni

सद्गुरु मधु परमहंस जी द्वारा

स्रोत: Sant Ashram Ranjari 2015 Edition · Sant Ashram Ranjari, Samba (J&K)

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12 साहिब बन्दगी

अलग अलग नामों से हर युग में आये साहिब

धर्म दास को साहिब जी समझा रहे हैं कि मैं हर युग में आकर हंसों को अपने धाम ले जाता हूँ। सतयुग का वर्णन करते हुए साहिब कह रहे हैं-

सुनु धर्मदास यह अकथ कहानी। सुर नर मुनि काहू नाहिं मानी॥
तन मन धनसो चित्त लगावे। गुरु का अंत कोई बिरला पावे॥
युगन युगन मोहि आवत भयऊ। सत्य शब्द मैं कहते रहेऊ॥
कहा कहौं कोई नाहिं मानै। जे समझै ते झगरा ठानै॥

सतयुग-सतयुग में सत्यसुकृत नाम से ज्ञानी पुरुष (कबीर साहिब) काल पुरुष के लोक में आए। इस युग में मनुष्य 21 हाथ ऊँचे शरीर के थे। साहिब ने चार हंसों को तारा-जिनके नाम थे, चित्ररेखा रानी, अष्टचौका (अष्टावक्र), राय हरचन्द (राजा हरीश चंद्र) और विकसी ग्वालिन। उन्होंने-आगे नौ लाख जीवों का कल्याण किया।

सतयुग चार हंस समझाये। प्रथम राय मित्र से नहिं आये॥
<ins>चित्ररेखा रानी</ins> कर नाऊ। तिन सुनि शब्द श्रवण चितलाऊ॥
राजा रानी पूछत मोही। सो हकीकत कहौं मैं तोही॥
<ins>अष्टचौका</ins> को शब्द सुनावा। राजा रानी लोक पठावा॥
दुसरे राय वटक्षेत्र के आवा। सतसुकृति तहँ नाम धरावा॥
तिन राजा पूछा चित लायी। तब तेहि भेद कह्यो समझायी॥
पान परवाना राजहिं दीन्हा। राजा वास लोक में कीन्हा॥
तिसरे <ins>राय हरचन्द</ins> कहँ आये। बन्ध काटि के लोक पठाये॥
चौथे पुरी मथुरा में आये। <ins>विकसी ग्वालिन</ins> को समझाये॥
चारि हंस सतयुग समझाये। ते चारों गुरुवंश कहाये॥
चारिहंस नौ लाख बचाये। शब्द भरोसे घरहिं पठाये॥

साहिब कह रहे हैं कि इस तरह सतयुग में आकर मैंने चार हंसों को तारा और आगे उन चारों ने नौ लाख जीवों का कल्याण किया। आगे कह रहे हैं-

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