संक्षिप्त ब्रह्मपुराण
Brahma Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 150, कुल 434 में से
संदर्भ में पढ़ें१४८ * संक्षिप्त ब्रह्मपुराण *
द्वारा वह सम्मान प्राप्त किया, जिसकी तीनों लोकोंमें कहीं उपमा नहीं है। उनकी बढ़ती हुई समृद्धि देखकर देवताओंको बड़ी चिन्ता हुई। वे आपसमें सलाह करने लगे कि हम बलिको कैसे जीतें। राजा बलिके शासनकालमें तीनों लोक निष्कण्टक थे। कहींपर आधि-व्याधि अथवा शत्रुओंकी बाधा नहीं थी। अनावृष्टि और अधर्मका तो नाम भी नहीं था। स्वप्नमें भी किसीको दुष्ट पुरुषका दर्शन नहीं होता था। देवताओंको उनकी उन्नति बाणकी तरह चुभती थी। बलिकी कीर्तिरूपी तलवारसे वे टुकड़े-टुकड़े हुए जाते थे तथा उनके शासनरूपी शक्तिसे देवताओंके समस्त अङ्ग विदीर्ण हो रहे थे। अतः उन्हें कभी शान्ति नहीं मिलती थी। देवता उनसे द्वेष करने लगे। उनके यशरूपी अग्निसे जलने लगे। अतः वे व्याकुल होकर भगवान् विष्णुकी शरणमें गये।
**देवता बोले—**शङ्ख, चक्र और गदा धारण करनेवाले जगन्नाथ! हम पीड़ित हैं। हमारी सत्ता छिन गयी है। आप हमारी ही रक्षाके लिये अस्त्र-शस्त्र धारण करते हैं। आप-जैसे स्वामीके होते हुए हमपर ऐसा दुःख आ पड़ा है। हमारी जो वाणी आपको प्रणाम करती थी, वही एक दैत्यको कैसे नमस्कार करेगी। सुरेश्वर! आपके ऐश्वर्यसे पुष्ट हो अपने ही पराक्रमसे तीनों लोकोंको जीतकर हम स्थिर होंगे। दैत्यको कैसे नमस्कार करें।
देवताओंका यह वचन सुनकर दैत्योंका संहार करनेवाले भगवान्ने देवकार्यकी सिद्धिके लिये इस प्रकार कहा—
**श्रीभगवान् बोले—**देवताओ! बलि मेरा भक्त है, उसे देवता और असुर कोई भी नहीं मार सकते। जैसे तुमलोग मेरे द्वारा पालन-पोषणके योग्य हो, वैसे बलि भी है। मैं बिना युद्धके ही स्वर्गसे बलिका राज्य छीन लूँगा और बलिको बाँधकर तुम्हारा राज्य तुम्हें लौटा दूँगा।
ब्रह्माजी कहते हैं—'बहुत अच्छा' कहकर देवता स्वर्गमें चले गये। इधर देवताओंके स्वामी भगवान् विष्णुने अदितिके गर्भमें प्रवेश किया। उनके जन्मके समय अनेक प्रकारके उत्सव होने लगे। यज्ञेश्वर यज्ञपुरुष स्वयं ही वामनरूपमें अवतीर्ण हुए। इसी समय बलवानोंमें श्रेष्ठ बलिने अश्वमेध-यज्ञकी दीक्षा ली। प्रधान-प्रधान ऋषि तथा वेद-वेदाङ्गोंके ज्ञाता पुरोहित शुक्राचार्यने उस यज्ञका आरम्भ कराया। स्वयं शुक्र ही यज्ञके आचार्य थे। उस यज्ञमें हविष्यका भाग लेनेके लिये जब सब देवता निकट आये, 'दान दो,' 'भोजन करो', सबका सत्कार करो,' 'पूर्ण हो गया', 'पूर्ण हो गया' इत्यादि शब्द यज्ञमण्डपमें गूँजने लगे, उसी समय विचित्र कुण्डल धारण किये साम-गान करते हुए वामनजी धीरे-धीरे यज्ञशालामें आये। आनेपर वे यज्ञकी प्रशंसा करने लगे। शुक्राचार्यने उन्हें देखते ही समझ लिया कि ये ब्राह्मणरूपधारी वामन देवता वास्तवमें दैत्योंके विनाशक, यज्ञ