भारतकोश
वेदान्त दर्शन: ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य व हिन्दी अनुवाद सहित)

वेदान्त दर्शन: ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य व हिन्दी अनुवाद सहित)

Vedanta Darshana: Brahma Sutra with Shankara Bhashya

भगवान् बादरायण व्यास व आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished486 पृष्ठ

पृष्ठ 112, कुल 486 में से

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सूत्र ४२ ] अध्याय १ १०९ रूपात्मक जगत्‌को धारण करनेवाला बताया गया है; इसलिये वह भूताकाश अथवा जीवात्माका वाचक नहीं हो सकता; क्योंकि भूताकाश तो स्वयं नाम-रूपात्मक प्रपंचके अन्तर्गत है और जीवात्मा सबको धारण करनेमें समर्थ नहीं है। इसलिये जो भूताकाशसहित समस्त जड-चेतनात्मक जगत्‌को अपनेमें धारण करनेवाला है, वह परब्रह्म परमात्मा ही यहाँ 'आकाश' नामसे कहा गया है। वहाँ जो ब्रह्म, अमृत और आत्मा- ये विशेषण दिये गये हैं, वे भी भूताकाश अथवा जीवात्माके उपयुक्त नहीं हैं; इसलिये उनसे भिन्न परब्रह्म परमात्माका ही वहाँ 'आकाश' नामसे वर्णन हुआ है। सम्बन्ध - यहाँ यह जिज्ञासा होती है कि मुक्तात्मा जब ब्रह्मको प्राप्त होता है, उस समय उसमें ब्रह्मके सभी लक्षण आ जाते हैं। अतः यहाँ उसीको आकाश नामसे कहा गया है; ऐसा मान लें तो क्या हानि है? इसपर कहते हैं- सुषुप्त्युत्क्रान्त्योर्भेदेन ॥ १। ३ । ४२ ॥ सुषुप्त्युत्क्रान्त्योः = सुषुप्ति तथा मृत्युकालमें भी; भेदेन = (जीवात्मा और परमात्माका) भेदपूर्वक वर्णन है (इसलिये 'आकाश' शब्द यहाँ परमात्माका ही बोधक है)। व्याख्या - छान्दोग्योपनिषद् (६।८।१)-में कहा है कि जिस अवस्थामें यह पुरुष सोता है, उस समय यह सत् (अपने कारण) -से सम्पन्न (संयुक्त) होता है। १ यह वर्णन सुषुप्तिकालका है। इसमें जीवात्माका 'पुरुष' नामसे और कारणभूत परमात्माका 'सत्' नामसे भेदपूर्वक उल्लेख हुआ है। इसी तरह उत्क्रान्तिका भी इस प्रकार वर्णन मिलता है - 'यह जीवात्मा इस शरीरसे निकलकर परमज्योतिः स्वरूप परमात्माको प्राप्त हो अपने शुद्धरूपसे सम्पन्न हो जाता है।' (छा० उ० ८।३।४) २ इसमें भी सम्प्रसाद नामसे जीवात्माका १-यह मन्त्र अर्थसहित पृष्ठ २९ में सूत्र १।१।९ की व्याख्यामें आ गया है। २-यह मन्त्र सूत्र १। ३। १९ की व्याख्या (पृष्ठ ९०) में आ गया है।