वेदान्त दर्शन: ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य व हिन्दी अनुवाद सहित)
Vedanta Darshana: Brahma Sutra with Shankara Bhashya
भगवान् बादरायण व्यास व आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 129, कुल 486 में से
संदर्भ में पढ़ें१२६ वेदान्त-दर्शन [ पाद ४ जगद्वाचित्वात्॥ १।४।१६॥ जगद्वाचित्वात्=सृष्टि या रचनारूप कर्म जड-चेतनात्मक सम्पूर्ण जगत्का वाचक है; इसलिये (चेतन परमेश्वर ही इसका कर्ता है, जड प्रकृति नहीं)। व्याख्या—कौषीतकि-ब्राह्मणोपनिषद्में अजातशत्रु और बालाकिके संवादका वर्णन है। वहाँ बालाकिने 'य एवैष आदित्ये पुरुषस्तमेवाहमुपासे।' (४।२) अर्थात् ‘जो सूर्यमें यह पुरुष है, उसकी मैं उपासना करता हूँ।' यहाँसे लेकर अन्तमें 'य एवैष सव्येऽक्षन् पुरुषस्तमेवाहमुपासे।' (४।१७)—'जो यह बायीं आँखमें पुरुष है, उसकी मैं उपासना करता हूँ।' यहाँतक क्रमशः सोलह पुरुषोंकी उपासना करनेवाला अपनेको बताया; परंतु उसकी प्रत्येक बातको अजातशत्रुने काट दिया। तब वह चुप हो गया। फिर अजातशत्रुने कहा—'बालाके! तू ब्रह्मको नहीं जानता, अतः मैं तुझे ब्रह्मका उपदेश करता हूँ। तेरे बताये हुए सोलह पुरुषोंका जो कर्ता है, जिसके ये सब कर्म हैं, वही जाननेयोग्य है।'* इस प्रकार वहाँ पुरुष-वाच्य जीवात्मा और उनके अधिष्ठानभूत जड शरीर दोनोंको ही परब्रह्म परमेश्वरका कर्म बताया गया है; अतः कर्म या कार्य शब्द जड-चेतनात्मक सम्पूर्ण जगत्का वाचक है। इसलिये जड प्रकृति इसका कारण नहीं हो सकती; परब्रह्म परमेश्वर ही इसका कारण है। सम्बन्ध—उपर्युक्त प्रकरणमें 'ज्ञेय' रूपसे बताया हुआ तत्त्व प्राण या जीव नहीं, ब्रह्म ही है, इसकी पुष्टिके लिये सूत्रकार कहते हैं— जीवमुख्यप्राणलिङ्गान्नेति चेत्तद् व्याख्यातम्॥ १।४।१७॥ चेत् इति=यदि ऐसा कहो कि; जीवमुख्यप्राणलिङ्गात्=(उस प्रसंगके वाक्यशेषमें) जीव तथा मुख्य प्राणके बोधक लक्षण पाये जाते हैं, इसलिये
- ब्रह्म ते ब्रवाणि स होवाच यो वै बालाक एतेषां पुरुषाणां कर्ता यस्य वैतत्कर्म स वै वेदितव्यः । (४।१८)