वेदान्त दर्शन: ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य व हिन्दी अनुवाद सहित)
Vedanta Darshana: Brahma Sutra with Shankara Bhashya
भगवान् बादरायण व्यास व आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें२२२ वेदान्त-दर्शन [ पाद ३ सम्बन्ध—शरीरके एक देशमें आत्माकी स्थिति है—यह सिद्ध करनेके लिये पूर्वपक्षी कहता है— अवस्थितिवैशेष्यादिति चेन्नाध्युपगमाद्धृदि हि ॥ २।३।२४॥ चेत् = यदि कहो; अवस्थितिवैशेष्यात् = चन्दन और आत्माकी स्थितिमें भेद है, इसलिये (चन्दनका दृष्टान्त उपयुक्त नहीं है); इति न = तो यह बात नहीं है; हि = क्योंकि; हृदि = हृदय-देशमें; अध्युपगमात् = उसकी स्थिति स्वीकार की गयी है। व्याख्या—यदि कहो कि चन्दनकी स्थिति तो एक देशमें प्रत्यक्ष है; किंतु उसके समान आत्माकी स्थिति शरीरके एक देशमें प्रत्यक्ष नहीं है; इसलिये यह दृष्टान्त उपयुक्त नहीं है। तो यह कहना ठीक नहीं; क्योंकि श्रुतिने आत्माको हृदयमें स्थित बताकर उसकी एक देशमें स्थिति स्पष्ट स्वीकार की है, जैसे—'हृदि ह्येष आत्मा' 'यह आत्मा हृदयमें स्थित है।' (प्र० उ० ३। ६) तथा 'कतम आत्मेति योऽयं विज्ञानमयः प्राणेषु हृद्यन्तर्ज्योतिः पुरुषः'—'आत्मा कौन है', ऐसा पूछनेपर कहा है कि 'प्राणोंमें हृदयके अंदर जो यह विज्ञानमय ज्योतिःस्वरूप पुरुष है।' (बृह० उ० ४। ३। ७) इत्यादि। सम्बन्ध—उसी बातको प्रकारान्तरसे कहते हैं— गुणाद्वा लोकवत् ॥ २।३।२५॥ वा = अथवा यह समझो कि अणुपरिमाणवाले जीवात्माका; गुणात् = चेतनतारूप गुणसे समस्त शरीरको चेतनायुक्त कर देना सम्भव है; लोकवत् = क्योंकि लोकमें ऐसा देखा जाता है। व्याख्या—अथवा जिस प्रकार लोकमें यह बात प्रत्यक्ष देखी जाती है कि घरके किसी एक देशमें रखा हुआ दीपक अपने प्रकाशरूप गुणसे समस्त घरको प्रकाशित कर देता है वैसे ही शरीरके एक देशमें स्थित अणु मापवाला जीवात्मा अपने चेतनतारूप गुणके द्वारा समस्त शरीरको चेतनायुक्त कर देता है; अतः इसमें कोई विरोध नहीं है।