वेदान्त दर्शन: ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य व हिन्दी अनुवाद सहित)
Vedanta Darshana: Brahma Sutra with Shankara Bhashya
भगवान् बादरायण व्यास व आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंसूत्र ५५-५६ ] अध्याय ३ ३६३ आदि अंगोंमें भेद है, अतः यज्ञादिके अंगोंसे सम्बन्ध रखनेवाली उपासना एक शाखामें कहे हुए प्रकारसे दूसरी शाखावालोंको करनी चाहिये या नहीं, इसपर कहते हैं— अङ्गावबद्धास्तु न शाखासु हि प्रतिवेदम्॥ ३।३।५५॥ अंगावबद्धाः=यज्ञके उद्गीथ आदि अंगोंसे सम्बद्ध उपासनाएँ; शाखासु हि=जिस शाखामें कही गयी हों, उसीमें करनेयोग्य हैं; न=ऐसी बात नहीं है; तु=किंतु; प्रतिवेदम्=प्रत्येक वेदकी शाखावाले उसका अनुष्ठान कर सकते हैं। व्याख्या—'ओमित्येतदक्षरमुद्गीथमुपासीत'—'ॐ इस एक अक्षरकी उद्गीथके रूपमें उपासना करनी चाहिये' (छा० उ० १।१।१), 'लोकेषु पञ्चविधँ सामोपासीत'—'पाँच प्रकारके सामकी लोकोंके साथ सम्बन्ध जोड़कर उपासना करनी चाहिये' (छा० उ० २।२।१)। इत्यादि प्रकारसे यज्ञादिके अंगरूप उद्गीथ आदिसे सम्बन्ध रखनेवाली जो प्रतीकोपासना बतायी गयी है, उसका जिस शाखामें वर्णन है, उसी शाखावालोंको उसका अनुष्ठान करना चाहिये, अन्य शाखावालोंको नहीं करना चाहिये, ऐसी बात नहीं है; अपितु प्रत्येक वेदकी शाखाके अनुयायी उसका अनुष्ठान कर सकते हैं। सम्बन्ध—इसी बातको उदाहरणसे स्पष्ट करते हैं— मन्त्रादिवद्वाविरोधः ॥ ३।३।५६॥ वा=अथवा यों समझो कि; मन्त्रादिवत्=मन्त्र आदिकी भाँति; अविरोधः=इसमें कोई विरोध नहीं है। व्याख्या—जिस प्रकार एक शाखामें बताये हुए मन्त्र और यज्ञोपयोगी अन्य पदार्थ, दूसरी शाखावाले भी आवश्यकतानुसार व्यवहारमें ला सकते हैं, उसमें किसी प्रकारका विरोध नहीं है; उसी प्रकार पूर्वसूत्रमें कही हुई यज्ञांगोंसे सम्बन्ध रखनेवाली उपासनाओंके अनुष्ठानमें भी कोई विरोध नहीं है।