भारतकोश
वेदान्त दर्शन: ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य व हिन्दी अनुवाद सहित)

वेदान्त दर्शन: ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य व हिन्दी अनुवाद सहित)

Vedanta Darshana: Brahma Sutra with Shankara Bhashya

भगवान् बादरायण व्यास व आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished486 पृष्ठ

पृष्ठ 429, कुल 486 में से

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पृष्ठ 429

४२६ वेदान्त-दर्शन [पाद २ प्राणके निकलनेपर उसके साथ सब इन्द्रियाँ निकलती हैं।' (बृह० उ० ४।४।२)। श्रुतिके इस गमनविषयक वाक्यसे यह सिद्ध हो जाता है कि इन्द्रिय और मनसहित प्राण अपने स्वामी जीवात्मामें स्थित होता है। यद्यपि पूर्व श्रुतिमें प्राणका तेजमें स्थित होना कहा है, किंतु बिना जीवात्माके केवल प्राण और मनसहित इन्द्रियोंका गमन सम्भव नहीं; इसलिये दूसरी श्रुतिमें कहे हुए जीवात्माको भी यहाँ सम्मिलित कर लेना उचित है। सम्बन्ध—उसके बाद क्या होता है? इस जिज्ञासापर कहते हैं— भूतेषु तच्छ्रुतेः ॥ ४।२।५ ॥ तच्छ्रुतेः = तद्विषयक श्रुति-प्रमाणसे यह सिद्ध होता है कि; भूतेषु = (प्राण और मन-इन्द्रियोंसहित जीवात्मा) पाँचों सूक्ष्म भूतोंमें (स्थित होता है)। व्याख्या—पूर्वश्रुतिमें जो यह कहा है कि प्राण तेजमें स्थित होता है, उससे यह सिद्ध होता है कि जीवात्मा, मन और समस्त इन्द्रियाँ— ये सब-के-सब सूक्ष्मभूत-समुदायमें स्थित होते हैं; क्योंकि सभी सूक्ष्मभूत तेजके साथ मिले हुए हैं। अतः तेजके नामसे समस्त सूक्ष्मभूत-समुदायका ही कथन है। सम्बन्ध—पूर्वश्रुतिमें प्राणका केवल तेजमें ही स्थित होना कहा गया है, अतः यदि सब भूतोंमें स्थित होना न मानकर एक तेजस्तत्त्वमें ही स्थित होना मान लिया जाय तो क्या हानि है? इस जिज्ञासापर कहते हैं— नैकस्मिन्दर्शयतो हि ॥ ४।२।६ ॥ एकस्मिन् = एक तेजस्तत्त्वमें स्थित होना; न = नहीं माना जा सकता; हि = क्योंकि; दर्शयतः = श्रुति और स्मृति दोनों जीवात्माका पाँचों भूतोंसे युक्त होना दिखलाती हैं। व्याख्या—इस बातका निर्णय पहले (ब्रह्मसूत्र ३।१।२ में) कर दिया गया है कि एक जल या एक तेजके कथनसे पाँचों तत्त्वोंका ग्रहण